लोकतंत्र का चौथा खंभा कमज़ोर हो रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 67 सालों की बात करें, तो पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं. 1995 के मध्य में सेटेलाइट टीवी हमारे देश में आया. उसके बाद से 24 घंटे चलाए जाने वाले समाचार चैनलों ने अपना एक ब्रांड बनाया, जिसमें एक ही समाचार बार-बार दिखाया जाता है. यही नहीं, हंसी तो इस बात पर आती है कि अलग-अलग समाचार चैनल अलग-अलग समाचार दोहराते रहते हैं. टीवी चैनलों के आ जाने से समाचार-पत्रों पर उनका प्रभाव पड़ा है. समाचार-पत्र बहुत ज़्यादा समाचार नहीं दे पाते, क्योंकि एक दिन पहले ही हम टेलीविजन पर समाचार देख लेते हैं. लेकिन, समाचार-पत्रों की महत्ता इस बात के लिए है कि हम उनमें न केवल रोज़मर्रा के समाचार पाते हैं, बल्कि उसके साथ किसी मुद्दे पर विभिन्न लोगों के विचार भी हमें पढ़ने को मिलते हैं. समाचार-पत्रों में जो रोज़ के समाचार दिए जाते हैं, उन्हें ग़लत तरीक़े से पेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे समाचार लोग टीवी पर पहले ही देख लेते हैं.

पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि पिछले दस सालों से कुछ समाचार-पत्रों को छोड़कर, अधिकांश समाचार-पत्रों और टीवी चैनलों के मालिक व्यवसायिक घराने के हो गए हैं. इसका परिणाम यह हुआ कि आज जो समाचार हमें मिलते हैं, वे पूंजीपतियों के लिए होते हैं, न कि आम आदमी या फिर समाज के निचले तबक़े के लोगों के लिए. उदाहरण के तौर पर वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह के समय लाए गए आर्थिक सुधार को ले सकते हैं. मुझे विश्वास है कि किसी भी अन्य नीति की तरह इसके भी दो पक्ष हैं. यही वजह है कि कुछ लोग किसी नीति का समर्थन करेंगे और कुछ लोग विरोध, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि 1991 के बाद सभी समाचार-पत्र और टीवी चैनल इस बात का समर्थन कर रहे हैं कि आर्थिक सुधार ही भारत की सभी समस्याओं का अंतिम समाधान है. यही कारण है कि 25 वर्षों के बाद लोग यह कहते नज़र आ रहे हैं कि बहुत विकास हुआ है, लेकिन तथ्य कुछ और कहते हैं. यह विकास 1991 के पहले शुरू हुआ.

अगर आप प्रत्येक पांच साल का औसत निकालेंगे, तो पाएंगे कि परिणाम मिश्रित रहा है. कभी विकास की गति तेज़ रही, तो कभी का़फी धीमी. पिछले कुछ सालों की बात करें, तो विकास दर नीचे गिर रही है. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि विकास दर का संबंध केवल आर्थिक नीति से है. इसके कई अन्य कारण भी हैं. उदाहरण के तौर पर इस समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, इसलिए विकास दर धीमी रही है. इसके लिए किसी विशेष आर्थिक नीति को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. मतलब यह है कि मीडिया को वस्तुनिष्ठ होना चाहिए. आजकल मीडिया की निर्भरता कॉरपोरेट क्षेत्र पर अत्यधिक बढ़ गई है. किसी भी स्थिति में मीडिया विज्ञापनों के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र पर निर्भर रहता है, लेकिन पहले और आजकल की स्थिति में परिवर्तन आ गया है. पहले समाचार-पत्रों के प्रसार और लोगों तक उनकी पहुंच के आधार पर विज्ञापन दिए जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. आजकल बड़े-बड़े औद्योगिक घराने शीर्ष के समाचार-पत्रों को विज्ञापन नहीं देते, क्योंकि वे उनके खिला़फ लिखते हैं. मेरी जानकारी के अनुसार, किसी अन्य देश में ऐसा नहीं होता है.

भारत में 1970 के दशक में इंदिरा गांधी डिफ्यूजन ऑफ प्रेस ऑनरशिप एक्ट नाम से एक विधेयक लाई थीं. यह विधेयक संसद में पेश तो हुआ, लेकिन पारित नहीं हुआ और क़ानून नहीं बन पाया. इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य यह था कि जो व्यक्ति समाचार-पत्र का मालिक है, वह किसी दूसरे उद्योग का मालिक नहीं हो सकता और जो किसी दूसरे उद्योग का मालिक है, वह समाचार-पत्र नहीं निकाल सकता है. औद्योगिक घरानों ने इसका विरोध किया और कहा कि यह प्रेस की स्वतंत्रता पर आक्रमण है, जबकि वास्तविकता यह नहीं थी. आज प्रेस के ऊपर हमला किसी तानाशाह द्वारा नहीं, बल्कि धन कुबेरों द्वारा किया जा रहा है. प्रेस को समाप्त करने के दो तरीक़े होते हैं. पहला यह है कि समाचार-पत्रों को प्रकाशित ही न होने दिया जाए. यह तरीक़ा तानाशाही वाले देशों में अपनाया जाता है. दूसरा तरीक़ा यह है कि प्रेस को पैसे से खरीद लो, ताकि वह सही विचार ही प्रस्तुत न कर सके. भारत में यही दूसरा तरीक़ा अपनाया जाता है. आजकल अगर कोई ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, बेरोज़गारों एवं अनुसूचित जाति के लोगों के लिए आवाज़ उठाता है, तो उसे मीडिया समाचार नहीं बनाता.

मुझे याद है कि जब मैं स्कूल और कॉलेज में था, तो समाचार-पत्र के संपादक और मालिक के बीच टकराहट होती रहती थी. हिंदुस्तान टाइम्स के मालिक बिड़ला थे और संपादक एस मुलगांवकर थे, टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक डालमिया एवं जैन थे और संपादक फ्रैंक मोरेस थे या फिर इंडियन एक्सप्रेस के मालिक राम नाथ गोयनका थे, जो अलग तरह के थे. उस समय बात कुछ और थी, लेकिन आज अधिकांश संपादक अपनी सुविधा का ख्याल पहले रखते हैं. अब यह बहुत कठिन सवाल है कि इस विकासशील समाज में हम इसे कैसे रोक सकते हैं? मैं सोचता हूं कि एक ऐसा क़ानून होना चाहिए, जिसके द्वारा इसे रोका जा सके. डिफ्यूजन ऑफ प्रेस ऑनरशिप एक्ट इसे रोकने का एक रास्ता हो सकता है.

पत्रकार यह तर्क देते हैं कि निरक्षर लोग संसद में जा रहे हैं. संसद लोगों का प्रतिनिधित्व करती है. मान लें, आप कहते हैं कि सांसद बनने के लिए स्नातक की डिग्री ज़रूरी हो. इसका मतलब यह है कि आप ज़्यादातर लोगों को इससे अलग कर रहे हैं, क्योंकि भारत के अधिकांश लोग गे—जुएट नहीं हैं. मज़ाक की बात तो यह है कि पत्रकार सांसद के लिए योग्यता निर्धारित करने की मांग करते हैं, लेकिन अपने लिए नहीं. मैंने बहुत सारे लोगों को देखा है, जो हिंदी या अंग्रेजी तो जानते हैं, लेकिन और कुछ नहीं के बराबर जानते हैं. आजकल के युवा पत्रकार यह ज़हमत नहीं उठाते कि पुस्तकालय में जाएं और इस बात की जानकारी लें कि जवाहर लाल नेहरू के समय में क्या हुआ था या फिर जब इंदिरा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री सदन में थे, तो क्या हुआ था? इसलिए भारत के पत्रकारों के स्तर में सुधार के लिए कुछ करने की आवश्यकता है. कैसे किया जाए, यह एक कठिन सवाल है.

सबसे पहले समस्या का अनुभव करना ज़रूरी है, उसके बाद ही उसका समाधान हो सकता है. आज भारतीय मीडिया के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह संकट के दौर से गुज़र रहा है. अधिकांश समाचार-पत्र कॉरपोरेट हाउसों के लिए काम कर रहे हैं. छोटे समाचार-पत्रों को दबा दिया जाता है, क्योंकि वे विज्ञापन नहीं ले पाते हैं. इसलिए सरकार को इन छोटे समाचार-पत्रों के लिए ज़रूर कुछ करना चाहिए, ताकि ये अपने पैरों पर खड़े हो सकें. या फिर डिफ्यूजन ऑफ प्रेस ऑनरशिप एक्ट जैसा क़ानून लाना चाहिए. क्या करना चाहिए, यह मैं नहीं जानता, लेकिन मैं इसे बहस का एक मुद्दा बनाना चाहूंगा.

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