वाम दलों की बड़ी उम्मीद

rushपहली बार मिलकर चुनाव लड़ रहे छह वामपंथी दलों भाकपा, माकपा, भाकपा (माले), फारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी एवं एसयूसीआई (सी) की स्थिति कुछ सीटों पर बेहतर दिख रही है. चुनावी दंगल में उतरने से पहले वाम दलों में काफी उलझन दिख रही थी, लेकिन अब स्थितियां काफी बदल गई हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को लग रहा था कि अन्य वाम दलों के साथ मिलकर लड़ने से वह कहीं शून्य पर न आउट हो जाए. इसे लेकर पार्टी की राज्य कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठकों में जमकर बहस हुई. राष्ट्रीय परिषद की बैठक तो पूरी तरह बिहार चुनाव पर केंद्रित रही.

जो नेता राष्ट्रीय परिषद की बैठक में यह मान रहे थे कि पार्टी बिहार में शून्य पर आउट हो जाएगी, अब वे भी मानने लगे हैं कि कुछ सीटों पर पार्टी अच्छी स्थिति में है. एक अ़खबार द्वारा पहले चरण की 49 में से 13 सीटों पर भाकपा को लड़ाई में दिखाने से पार्टी नेताओं में फुर्ती आ गई है. वे ज़ोर-शोर से चुनाव प्रचार में जुट गए हैं.

भाकपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में 56 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसे एकमात्र सीट बछवाड़ा में कामयाबी मिली थी. इस बार उसने 101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और पार्टी को क़रीब एक दर्जन सीटों पर जीत की उम्मीद दिख रही है.

भाकपा को बछवाड़ा, बखरी (सुरक्षित), सूर्यगढ़ा, गोह, गया शहर, बोधगया (सुरक्षित), बेलागंज, मीनापुर, नौतन, चनपटिया, केसरिया, मोतिहारी, सुगौली, नौतन, बेलसंड, सुरसंड, जाले, हरलाखी, विस्फी, खजौली, बेनीपट्टी, झंझारपुर, एवं रूपौली आदि विधानसभा क्षेत्रों से काफी उम्मीद है. इन विधानसभा क्षेत्रों में भाकपा कहीं सीधे, तो कहीं त्रिकोणीय लड़ाई में है.

माकपा के सभी बड़े नेता शुरू से ही बिहार विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ने की बात कर रहे थे. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी, पूर्व महासचिव प्रकाश करात एवं अन्य बड़े नेता जब-जब बिहार दौरे पर आए, तब-तब उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता वाम गठबंधन है. पार्टी ने पिछली बार 31 विधानसभा क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारे थे और एकमात्र सीट विभूतिपुर उसके हाथ से निकल गई थी.

विभूतिपुर में माकपा उम्मीदवार रामदेव वर्मा दूसरे स्थान पर रहे थे. पार्टी को इस बार विभूतिपुर, उजियारपुर, मोहिउद्दीन नगर, बेगूसराय, खगड़िया, लौकहा, मांझी एवं सुगौली आदि सीटों से काफी उम्मीद है. भाकपा (माले) नीतीश और भाजपा के खिला़फ शुरू से ही मोर्चा खोले थी.

पार्टी इस बार 96 सीटों पर किस्मत आजमा रही है. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य समेत सभी राष्ट्रीय नेता बिहार में मौजूद हैं और वे उम्मीदवारों के पक्ष में प्रतिदिन चुनावी सभाएं संबोधित कर रहे हैं.

भाकपा (माले) पिछले विधानसभा चुनाव में शून्य पर आउट हो गई थी, जबकि 2005 के विधानसभा चुनाव में उसे पांच सीटों पर कामयाबी मिली थी. इस बार पार्टी को ओबरा, काराकाट, अरवल, जहानाबाद, अरती, जीरादेई, दरौली (सुरक्षित), रघुनाथपुर, बलरामपुर आदि सीटों पर जीत की उम्मीद दिखाई दे रही है.

अगर वाम दलों की आंतरिक राजनीति को देखें, तो भाकपा और भाकपा (माले) के बीच बड़ी पार्टी कहलाने की होड़ मची है. यही वजह है कि क़रीब दो दर्जन सीटों पर वाम दलों के नेता एक-दूसरे के खिला़फ चुनाव लड़ रहे हैं.

यह खींचतान भाकपा, भाकपा (माले) एवं माकपा के राष्ट्रीय नेता भी खत्म नहीं करा सके. भाकपा के राष्ट्रीय महासचिव सुधाकर रेड्डी का मानना है कि बिहार की राजनीति में छह वाम दलों का एक वाम ब्लॉक बनाना ऐतिहासिक है.

इसमें भाकपा की महत्वपूर्ण भूमिका है. केंद्र में नरेंद्र मोदी और राज्य में नीतीश कुमार सरकार से बिहार के लोग ऊब चुके हैं. इन दोनों सरकारों ने राज्य की जनता, खासकर ग़रीबों एवं मेहनतकशों के लिए अब तक कुछ नहीं किया.

जो कुछ किया भी, उसका लाभ मुट्ठी भर बड़े पूंजीपतियों, मुना़फाखोरों, कालाबाज़ारी करने वालों और भ्रष्ट नेताओं ने उठाया. इसलिए भाजपा नीत एनडीए एवं जदयू नीत महा-गठबंधन का सही और बेहतर विकल्प वाम ब्लॉक होगा. उन्होंने कहा कि पूंजीवादी दल एवं उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए जातीय और सांप्रदायिक भावनाएं भड़का रहे हैं तथा पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं, जिसका म़ुकाबला वामपंथी दल संयुक्त अभियान चलाकर करेंगे.