दो महानायक

lalu, nitishबिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आठ नवंबर को सामने आए, जिन्होंने बहुत सारी चीजें सा़फ कीं. चुनाव परिणामों ने यह बताया कि जनता के सामने चाहे जितना भ्रम खड़ा किया जाए, जनता को चाहे जितना बहकाने की कोशिश की जाए, जनता बहकती नहीं है और बातों के बीच में से अर्थ समझ लेती है और उस अर्थ को समझ कर निर्णायक वोट देती है.

बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस के महा-गठबंधन को निर्णायक जीत मिली और दोे तिहाई से ज़्यादा सीटें उनके खाते में आ गईं. आठ नवंबर को टेलीविजन चैनल पर हुई चर्चा में हमने देखा कि भारतीय जनता पार्टी को अपनी हार स्वीकार करने में बहुत तकलीफ हो रही है.

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों को भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल पर दुर्भाग्यपूर्ण फैसला करार दिया. यह मानसिकता बताती है कि जनता के निर्णय के प्रति कैसे सम्मान कम होता है. बिहार का फैसला भारतीय जनता पार्टी के लिए तो दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है, पर देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, यह स़िर्फ भारतीय जनता पार्टी या उसके प्रवक्ता ही सोच सकते हैं.

वैसे पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा एवं संबित पात्रा सहित जो चेहरे टेलीविजन पर आते थे, उनका गुरूर, उनका अहंकार, उनका अभिमान और उनकी भाषा की कठोरता देखकर डर लगता था. शायद बिहार की जनता को भी यह डर लगा होगा कि भारतीय जनता पार्टी जनता को टेकन फॉर ग्रांटेड ले रही है.

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी की रणनीति को पूरी तरह बेनकाब भी कर दिया और ठुकरा भी दिया. भारतीय जनता पार्टी ने बिहार के नेताओं को दरकिनार करके पूरा चुनावी अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा सामने रखकर चलाया. उसे यह लगा कि जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के ऊपर भरोसा कर वैसा ही समर्थन देगी, जैसा उसने हरियाणा में दिया.

भारतीय जनता पार्टी यह भूल गई कि हरियाणा के साथ ही झारखंड का चुनाव हुआ, जहां उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला. उसे सहयोग से या जोड़-तोड़ करके सरकार बनानी पड़ी. भारतीय जनता पार्टी यह भी भूल गई कि दिल्ली में रहने वाले लोग सारे देश के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्होंने जब आम आदमी पार्टी की सरकार अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में बनवाई, तो वह बहुमत असामान्य बहुमत था.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को स़िर्फ तीन सीटें मिली थीं और उस हार के बाद भारतीय जनता पार्टी का यह कहना कि यह तो नगर निगम का चुनाव था, जिसमें जीत या हार का कोई मतलब नहीं होता, लोगों के फैसले के प्रति उसके असम्मान को दर्शाता है.

अब बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी को औसत रूप में वहीं पहुंचा दिया है, जहां वह दिल्ली विधानसभा चुनाव में थी. भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ग़लती इस पूरे चुनाव को नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश कुमार बना देना था.

उसे लगा कि अगर वह बिहार के किसी नेता को मुख्यमंत्री पद के रूप में सामने रखेगी, तो बिहार की जनता आसानी से नीतीश कुमार को जिता देगी, लेकिन वह भूल गई कि बिहार की जनता देश के उन लोगों में से है, जहां सबसे ज़्यादा राजनीतिक संवाद होते हैं.

देश के अधिकांश हिंदी-अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं का 50 प्रतिशत बिहार में बिकता है और बिहार में हर गली, नुक्कड़, चौराहे और चाय की दुकानों पर राजनीति को लेकर बहस होती है. भाजपा ने यह मान लिया कि नरेंद्र मोदी का चेहरा दिखाकर वह बिहार के लोगों के  वोट ले लेगी.

और, इस चुनाव की घोषणा से कुछ दिनों पहले जब नरेंद्र मोदी ने बिहार में एक लाख 70 हज़ार करोड़ रुपये के राहत पैकेज का ऐलान किया, तो कुछ इस अंदाज़ में किया, जैसे वह बिहार के लोगों को दान दे रहे हों और उन्हें लगा कि बिहार के लोग इस एक लाख 70 हज़ार करोड़ रुपये के झांसे में आ जाएंगे.

अगले ही दिन जब नीतीश कुमार का बयान अ़खबारों में आया कि यह एक लाख 70 हज़ार करोड़ रुपये का वायदा कितना खोखला है और इसमें उन सारी योजनाओं को भी शामिल किया गया है, जो बिहार में पहले से चल रही हैं. तब भी भारतीय जनता पार्टी को नहीं लगा कि इसका उसे नुक़सान होने वाला है. लेकिन, बिहार के लोगों की समझ में आ गया कि सच्चाई दोनों बयानों में किसके साथ है.

चुनाव शुरू हुए और बिहार के सारे लोग चुनाव संचालन से बाहर रहे. राजस्थान के एक व्यक्ति भूपेंद्र यादव को चुनाव प्रभारी बना दिया गया, जिन्होंने स्थानीय नेताओं के साथ अपनेपन की जगह बॉस की तरह व्यवहार करना शुरू किया.

प्रधानमंत्री की सभाओं में भीड़ लाने के लिए साधनों की बौछार कर दी गई. जब हमने कोशिश की, तो पता चला कि एक सभा आठ से दस करोड़ रुपये के बीच आंकी गई. कहां से आया यह पैसा? क्या यह पैसा व्हाइट मनी था? नहीं, यह पैसा व्हाइट मनी नहीं था, एकाउंटेड मनी नहीं था, बल्कि यह पैसा अन-एकाउंटेड मनी था.

अब तो लोग बता रहे हैं कि आने वाले लोगों को बहुत अच्छा खाना भी दिया गया. इसका मतलब यह कि प्रधानमंत्री की आंखों में खुद उनकी पार्टी ने धूल झोंकी और उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि ये जितने लोग आपको सुनने आ रहे हैं, ये आपके प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास से भरे हुए हैं और ये भारतीय जनता पार्टी को वोट देंगे.

प्रधानमंत्री ने हर सभा में कुछ ऐसा व्यवहार किया, जैसे वह इस देश के छत्रपति हों और बाकी सारे लोग भुनगे और मच्छर हों. प्रधानमंत्री की सभा में खुद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ, उसने पार्टी के कार्यकर्ताओं में क्षोभ पैदा किया. वे लोग प्रधानमंत्री द्वारा ज़्यादा सम्मान पाते देखे गए, जो उग्र भाषा, असंयमित भाषा और सत्य से परे बोलने वाली भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे.

भारतीय जनता पार्टी को वोट देने वाले वोटरों को भी इन सारे क्रियाकलापों की सच्चाई ने कहीं पसोपेश में डाल दिया. मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई मुद्दा ही नहीं थे, न उन्हें संबोधित किया गया, न उन्हें प्रधानमंत्री के मंच पर कहीं जगह मिली. और, जिस व्यक्ति को कहीं जगह मिली (शाहनवाज हुसैन को), वह भी अनाथ की तरह मंच पर खड़े दिखाई दिए.

इस चुनाव को भारतीय जनता पार्टी ने जैसे ही नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश कुमार में बदला, उसी दिन यह तय हो गया था कि बिहार चुनाव में अगर भारतीय जनता पार्टी जीतती है, तो वह निरंकुश हो जाएगी और अगर नीतीश कुमार जीतते हैं, तो देश को एक राजनीतिक विकल्प मिल जाएगा. और, इस तथ्य ने बिहार की जनता को खड़ा कर दिया. तिस पर प्रधानमंत्री के बयान, जैसे कि नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाना.

कुछ शब्दों का इस्तेमाल किसी भी राजनेता को बहुत सोच-समझ कर करना चाहिए, जैसे कि डीएनए. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि नीतीश की पैदाइश के बारे में आपको संदेह है कि उनके कौन पिता हैं, कौन माता हैं? यही भाव बिहार की जनता के बीच में गया और नीतीश ने उसे बिहारियों के आत्म-सम्मान के साथ जोड़ दिया.

इसकी लीपापोती के सिलसिले में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की सफाइयां आने लगीं कि नरेंद्र मोदी का मतलब नीतीश के पॉलिटिकल डीएनए से था. कई लोगों ने फिर डीएनए शब्द का इस्तेमाल शुरू किया.

भारतीय जनता पार्टी के सभी नेताओं द्वारा डीएनए शब्द का इस्तेमाल करने से बिहार की जनता को लगा कि यह तो अत्यंत असम्मानजनक भाषा है कि आप किसी की पैदाइश की सत्यता जानना चाहें. बिहार या देश में कहीं भी डीएनए की जांच कराने का मतलब पैदाइश की सत्यता की जांच से ही जोड़ा जाता है.

प्रधानमंत्री का यह कहना भी लोगों को नागवार गुज़रा कि लालू प्रसाद यादव अपनी बेटी को सेट करना चाहते हैं. ऐसी भाषा तो गिरिराज सिंह भी नहीं बोल रहे थे. लेकिन, प्रधानमंत्री ने इस भाषा का इस्तेमाल करके अपने सभी नेताओं को कुछ भी बोलने, कुछ भी माहौल बनाने की खुली छूट दे दी.

इस पर लालू यादव की बेटी मीसा ने यह कहा कि नरेंद्र मोदी तो गली के गुंडे की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो लोगों को लगा कि प्रधानमंत्री किसी की बेटी के ऊपर भी हमला कर सकता है, तो शायद उनका मन फैसला लेने लगा. इस चुनाव में जहां नरेंद्र मोदी ने अपने म़ुकाबले देश में नीतीश कुमार का चेहरा दे दिया, वहीं उन्होंने पहली बार राजनीतिक शालीनता की सीमा भी लांघ दी.

नरेंद्र मोदी ने बिहार चुनाव के दौरान 26 सभाएं कीं, उसके पहले भी चार सभाएं कीं और उनमें बड़े-बड़े दावे, बड़े-बड़े वायदे किए तथा अपनी शारीरिक भाषा के ज़रिये जनता में यह संदेश भेजा कि उनमें सहिष्णुता की भी कमी है, उनमें कहीं पर समझ की भी कमी है और उन्हें लोगों की इज्जत करनी नहीं आती. अब तक बिहार या देश के लोगों ने किसी भी प्रधानमंत्री को इस तरह की भाषा और शैली का इस्तेमाल करते हुए नहीं देखा.

लोकतांत्रिक ढंग से चुने हुए प्रधानमंत्री के बजाय किसी तानाशाह की तरह बोलने वाले प्रधानमंत्री का दर्शन लोगों को कहीं न कहीं चौंका गया. बटोर कर लाई गई भीड़ ताली बजा रही थी और प्रधानमंत्री को लग रहा था कि उनके वोटर उन्हें क्लीन स्वीप दे रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां-जहां गए,  उनमें से करीब आधे स्थानों पर उनके उम्मीदवार हार गए और यह चीज भारतीय जनता पार्टी को गंभीरता से सोचनी चाहिए कि क्यों वहां से उसका उम्मीदवार हारा, जहां पर उसकी अभूतपूर्व एक लाख से लेकर दस लाख लोगों तक की सभा हुई. यह आंकड़ा भारतीय जनता पार्टी के लोगों द्वारा बताई संख्या के आधार पर मैं कह रहा हूं.

इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बड़बोलेपन ने बिहार में सांप्रदायिक माहौल बनाने में योगदान किया. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का लगातार पटना के एक फाइव स्टार होटल में रहना, वहीं आना, वहीं से जाना जनता को यह संदेश दे गया कि उनके मन में पार्टी के स्थानीय नेताओं के लिए भी कोई इज्जत नहीं है.

और, फिर खबरें धीरे-धीरे कमरों से बाहर आने लगीं कि आज यह नेता डांटा गया, आज वह नेता डांटा गया. आज इससे सफाई मांगी गई और कल उससे सफाई मांगी गई. इन खबरों ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मनोबल लगभग तोड़ दिया.

अब भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता कह रहे हैं कि उनके कार्यकर्ता पूरे मन से चुनाव में नहीं लगे. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं या प्रवक्ताओं का यह कहना उन कार्यकर्ताओं का अपमान है, जिन्होंने जी-जान लगाकर बिहार के लोगों को भारतीय जनता पार्टी की तऱफ मोड़ने की कोशिश की.

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी की हार इसलिए नहीं हुई कि कार्यकर्ता चुनाव में नहीं लगे. भारतीय जनता पार्टी की हार इसलिए हुई कि कार्यकर्ताओं को पार्टी नेतृत्व अपने से बहुत दूर लगा. बिहार की जनता को यह लगा कि भारतीय जनता पार्टी न उन्हें विकास दे पाएगी, न रा़ेजगार दे पाएगी और न भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला पाएगी.

वजह, जहां पर इतना काला धन खर्च हो रहा हो, वहां लोगों को विश्वास दिलाना बहुत मुश्किल होता है कि चुनाव जीतने के बाद कोई भी पार्टी ईमानदारी के साथ उनके विकास का काम करेगी, क्योंकि लोगों को लगता है कि जो जितना ज़्यादा पैसा खर्च करता है, पहले वह उन पैसों की भरपाई उन्हीं को लूटकर करता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के फोटो पूरे बिहार में चुनाव जीतने का ब्रह्मास्त्र माने गए. दिल्ली में अधिकांश टेलीविजन चैनलों को प्रभावित किया गया. अधिकांश पत्रकारों से अपने पक्ष में लिखवाने की कोशिश की गई. मैं यह नहीं कहता कि इसमें पैसे का कोई रोल था, लेकिन इसमें संबंधों का रोल ज़रूर था.

नहीं तो क्यों ऐसा होता कि इतना बड़ा जनादेश आने वाला हो, दो तिहाई से ज़्यादा बहुमत से महा-गठबंधन जीतने वाला हो और किसी पत्रकार को इसकी हवा भी न लगे? सबसे महत्वपूर्ण काम चाणक्य ने किया, जिसने वोट पड़ने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को दो तिहाई से ज़्यादा बहुमत दिला दिया.

यह बताता है कि पूरा चुनाव कहीं न कहीं नकली अनुमानों और नकली परिणामों से भरा पड़ा है. चुनाव की घोषणा से पहले चौथी दुनिया ने एक सर्वे किया था, जिसे आज सारे राजनेताओं और पत्रकारों को पढ़ना चाहिए.

मैं जानता हूं कि वे नहीं पढ़ेंगे, क्योंकि वे अपनी असलियत शीशे में नहीं देखना चाहेंगे. हमारे उसी चुनाव सर्वेक्षण की नकल तीन दिनों के बाद होने वाले सभी सर्वेक्षणों ने की. लेकिन, उसके बाद जितने सर्वेक्षण आए, उन सबने अचानक अपने ही एक हफ्ते पहले किए गए सर्वे से उलट नतीजे दिखाने शुरू कर दिए. इसका सा़फ मतलब है कि उनके सर्वे के विज्ञान के ऊपर कुछ दूसरी चीजें भारी पड़ गईं.

मतदान के पहले दौर के बाद हमने चौथी दुनिया में यह लिखा कि नीतीश को इस चुनाव में बढ़त है, क्योंकि हमें ज़मीन पर सा़फ-सा़फ दिखाई दे रहा था कि नीतीश कुमार और उनका गठबंधन आगे बढ़ रहा है. वहीं दूसरे पत्रकारों को, वे चाहे प्रिंट के हों या टेलीविजन के, भारतीय जनता पार्टी बढ़ती दिखाई दे रही थी.

हमारे ऊपर आरोप लगने लगे कि हमें चुनाव की एक पैसे भर समझ नहीं है और हम यूं ही लिख रहे हैं. आज हम कह सकते हैं कि हम सही थे और बाकी सारे अ़खबार-टेलीविजन चैनल ग़लत थे, जिन्होंने नीतीश कुमार की बढ़त को नहीं भांपा.

एक्जिट पोल के बाद भी वे चैनल, जिन्होंने नीतीश कुमार की बढ़त को नहीं माना या नहीं जांचा, पत्रकारिता नहीं, बल्कि मन से कहीं न कहीं एक पार्टी विशेष का प्रचार कर रहे थे. हम यह बहुत अदब के साथ कह रहे हैं कि बिहार चुनाव ने जहां भारतीय जनता पार्टी की प्रचार शैली, चुनाव संयोजन और उसकी खामियों को पूरी तरह उजागर किया, वहीं संपूर्ण मीडिया जगत को भी नंगा करके रख दिया.

इस चुनाव में मोहन भागवत द्वारा दिए गए बयान कि आरक्षण के ऊपर फिर से विचार होना चाहिए, ने बिहार में बड़े पैमाने पर उन वर्गों, जो कमज़ोर हैं और आरक्षण की श्रेणी में आते हैं, को सोचने पर विवश कर दिया.

इस बयान ने नरेंद्र मोदी के अति पिछड़ा होने की घोषणा से उनके पक्ष में जाने वाले अति पिछड़ों को महा-गठबंधन की तऱफ भेज दिया. इतना ही नहीं, इसने दलितों को भी भारतीय जनता पार्टी से तोड़कर महा-गठबंधन के पास भेज दिया, क्योंकि दलितों को लगा कि भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आने के बाद उनका भी आरक्षण छीन लेगी.

मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि यह श्री मोहन भागवत का सोचा-समझा बयान था और इस बयान के बाद भी अगर कहीं भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला गठबंधन जीत जाता, तो अवश्य संपूर्ण आरक्षण के सिद्धांत पर विचार करने के लिए नई समिति बन जाती.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि भले उनकी जान चली जाए, वह आरक्षण नहीं जाने देंगे, वह ल़ड़ेंगे. जान जाने का सवाल ही नहीं था प्रधानमंत्री जी, आपको स़िर्फ एक बात कहनी थी कि हम मोहन भागवत जी के बयान से सहमत नहीं हैं.

वह वाक्य भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता ने नहीं कहा. इसकी जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नया भ्रम पैदा किया कि लालू यादव और नीतीश कुमार की योजना है कि वे पिछड़ों एवं दलितों के आरक्षण का पांच प्रतिशत हिस्सा मुसलमानों को दे दें.

बल्कि उन्होंने कुछ यूं कहा कि मुसलमानों को आरक्षण इन सारे तबकों से छीनकर दे दिया जाएगा. अगर लालू यादव और नीतीश कुमार सत्ता में आए, तो इसने यह बताया कि भारतीय जनता पार्टी के मन में मुसलमानों को लेकर बहुत बड़ा संदेह है. वह मुसलमानों को इस देश का नागरिक ही नहीं मानती.

अगर वह नागरिक मानती होती, तो प्रधानमंत्री अपने भाषण में कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों या मुसलमानों का जिक्र ज़रूर करते. इस पूरे चुनाव के दौरान उनके भाषण में मुसलमानों का जिक्र स़िर्फ एक बार तब आया, जब उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार पर आरोप लगाया कि वे दलितों-पिछड़ों के आरक्षण में कटौती करके उसे मुसलमानों को देना चाहते हैं.

बिहार चुनाव संपूर्ण देश के लिए आंख खोलने वाला चुनाव है. बिहार चुनाव यह बताता है कि स़िर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने या नरेंद्र मोदी एवं अरुण जेटली वाला मॉडल बताने से विकास नहीं होता.

हमारे देश में कितना पैसा एफडीआई में आया, कितना पैसा मेक इन इंडिया में आया, कौन-सी कंपनियां आईं, सफाई हुई या नहीं, जितनी योजनाएं नरेंद्र मोदी ने घोषित की थीं स्वच्छ भारत अभियान सहित, उनकी प्रगति क्या हुई आदि बातों ने बिहार के ग़रीबों को, मध्यम वर्ग को, यहां तक कि उच्च-मध्यम वर्ग को भी सशंकित कर दिया और उन्हें लगा कि अगर बिहार में भाजपा की सरकार बन गई, तो वह बड़े पुलों एवं बड़ी सड़कों की तो बात करेगी, लेकिन गांव, सड़क, किसानों की फसल, लड़कियों की शिक्षा की बात नहीं करेगी. बिहार में सड़कों का जाल नीतीश कुमार का बनाया हुआ है, उसे सुशील मोदी के खाते में डालने की भाजपा की कोशिश बिहार की जनता ने नकार दी.

लड़कियों को साइकिल देकर स्कूल भेजने की योजना लोगों को ज़्यादा समझ आई, न कि इसके म़ुकाबले हर छात्रा को स्कूटी और स्कूटी में पेट्रोल देने की बात. नीतीश कुमार ने बिहार को बिजली दी और वायदा किया कि हर गांव को आगे भी बिजली देंगे. लोगों ने उनके ऊपर ज़्यादा भरोसा किया, न कि प्रधानमंत्री के इस बयान पर कि बिहार के हर घर में अब तक रोशनी क्यों नहीं आई.

लोगों ने नीतीश कुमार की इस बात पर ज़्यादा भरोसा किया कि हम बिहार का विकास गांवों को आधार बनाकर, ग़रीबों को आधार बनाकर करेंगे. लोगों ने सोचा कि उस विकास में वे कहां होंगे, जहां स़िर्फ बिल्डर हैं, बड़े उद्योगपति हैं और पूंजीपति हैं. और, बिहार के लोगों ने एक सोचा-समझा निश्चित फैसला ले लिया.

देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था सवालिया दायरे में आ गई है. न अमीर खुश हैं, न छात्र खुश हैं, न नौजवान खुश हैं और भाजपा द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट पर चलाया हुआ घृणा का अभियान लोगों को डरा गया.

हम जब भी फेसबुक देखते हैं, ट्‌वीटर देखते हैं, तो उन पर जिस तरीके से नरेंद्र मोदी के पक्ष में, भाजपा के पक्ष में दूसरे लोगों को तबाह करने, काटने, मारने और गाली देने की एक बाढ़-सी आई हुई है, उसने भी बिहार के लोगों को डराया. स़िर्फ बिहार के लोगों को नहीं डराया, उसने देश के लोगों को डराया.

इसलिए देश के लोगों ने बिहार के इस फैसले के ऊपर उम्मीद ज़ाहिर की है और यह राय देनी शुरू की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं उनका मंत्रिमंडल अब ज़िम्मेदारी से काम करेगा और प्रधानमंत्री शायद अपने मंत्रिमंडल के लोगों को भी काम करने की ज़िम्मेदारी सौंपेंगेे, क्योंकि उनके उस मॉडल को बिहार के लोगों ने नकार दिया, जिसमें सचिव और प्रधानमंत्री के बीच में कोई नहीं.

भाजपा इन कमियों पर ग़ौर नहीं करेगी, ऐसा मुझे लगता है. भाजपा की सोच तब सामने आ गई, जब उसके प्रवक्ता ने कहा कि यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है. जनता का फैसला कभी दुर्भाग्यपूर्ण नहीं होता.

जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला लिया था, तब वह भी सही फैसला था और आज जब बिहार में उसने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया और प्रधानमंत्री के सारे वायदों, सारे दावों की अनदेखी कर दी, तो यह भी एक सही फैसला है. वरना ऐसा कैसे होता कि उन 14 या 16 जगहों से भाजपा के उम्मीदवार हार जाते, जहां-जहां प्रधानमंत्री ने सभाएं की थीं. अमित शाह का बिहार में ज़्यादा बने रहना इस चुनाव का दूसरा बड़ा ऩुकसान था.

अमित शाह की भाषा, उनकी बॉडी लैंग्वेज छोटे नरेंद्र मोदी की भाषा और बॉडी लैंग्वेज है. दोनों ने मिलकर बिहार के लोगों को डरा दिया, जिससे उन्हें लगा कि हमें ऐसी सरकार नहीं चाहिए, जो हमारी बात समझने की जगह हमें डांटे-डपटे, डंडा दिखाकर शांति सिखाए और कोई भी अब बिहार में सांप्रदायिक दंगा नहीं चाहता.

देश में अब कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं चाहता. न हिंदू चाहता है और न मुसलमान. मैं यहां श्री मोहन भागवत, श्री नरेंद्र मोदी, श्री अमित शाह के ध्यानार्थ एक बात लिख रहा हूं कि बिहार का फैसला मुसलमानों का फैसला नहीं है. बिहार का फैसला बिहार के हर वर्ग, हर जाति, हर संप्रदाय का फैसला है.

भाजपा के एक प्रवक्ता ने यह भी कहा कि 20 प्रतिशत मुसलमान चूंकि एकतऱफा महा-गठबंधन की तऱफ हो गए, इसलिए यह नतीजा आया. यह जनता द्वारा दिए गए फैसले का सांप्रदायिक स्पष्टीकरण है, सांप्रदायिक विश्लेषण है. मैं निवेदन करना चाहता हूं कि अगर ऐसा विश्लेषण भाजपा करेगी, तो उसे सारे देश में एक बड़े आंदोलन का सामना करना पड़ेगा. भाजपा को समझ लेना चाहिए कि कुछ नौजवानों द्वारा उसके पक्ष में उठाई जाने वाली आवाज़ देश के सभी नौजवानों या महिलाओं की आवाज़ नहीं है.

महिलाओं ने नीतीश कुुमार द्वारा दिए गए 50 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में वोट दिया, न कि नरेंद्र मोदी के भावनात्मक एवं अतार्किक विकास को. यह जीत बिहार की जनता की स्पष्ट जीत है और उसने नीतीश कुमार और लालू यादव के नेतृत्व में बने महा-गठबंधन को दो तिहाई बहुमत देकर एक नई राजनीतिक तस्वीर बना दी है.

ग़लती से सीख नहीं कार्रवाई की धमकी

बिहार विधानसभा चुनाव की शुरुआत से ही आरा से भाजपा सांसद आरके सिंह इस बात को उठाते रहे कि टिकट बंटवारे में गड़बड़ी हुई है. उन्होंने कहा था कि पार्टी ने वर्तमान विधायकों एवं जिताऊ उम्मीदवारों के बजाय अपराधियों को टिकट बेचे.

पैसे लेकर टिकट बांटने की बात भी उन्होंने कही, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. दूसरी तऱफ पटना साहिब से भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने महंगाई की बात की.

उन्होंने खुद को जानबूझ कर चुनाव प्रचार से दूर रखे जाने की भी बात कही, लेकिन उनकी बातों पर शीर्ष नेतृत्व ने ध्यान नहीं दिया. चुनाव परिणाम आने के बाद सिन्हा ने ट्‌वीट करके कहा कि बिहारी बनाम बाहरी का झगड़ा हमेशा के लिए खत्म हो गया है.

उन्होंने कहा कि पार्टी को हार के कारणों की पड़ताल करनी चाहिए. सिन्हा ने यह भी कहा था कि नीतीश कुमार देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री हैं, वह सिद्धांतवादी एवं अच्छे व्यक्ति हैं.

आरके सिंह ने भी कहा कि चुनाव नतीजों का विश्लेषण होना चाहिए और ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए. इसके बाद भाजपा महासचिव मुरलीधर राव ने कहा कि शत्रुघ्न सिन्हा और आरके सिंह के खिला़फ कार्रवाई की जानी चाहिए. राव ने कहा कि इन नेताओं ने पार्टी को क्या दिया, यह वे भी जानते हैं और हम भी.

ज़ाहिर है, ये दोनों नेता अपनी सा़फगोई की वजह से पार्टी की आंख की किरकिरी बन गए हैं. श्री सिन्हा और श्री सिंह ने जो बातें कही थीं, यदि उन पर भाजपा समय रहते विचार करती, तो शायद कुछ फायदा हो सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके विपरीत भाजपा खुद को आईना दिखाने और सच बताने वालों के खिला़फ कार्रवाई का डंडा चलाने की धमकी दे रही है.

पाकिस्तान, पटाखे, छोटा राजन जैसे चुनावी हथकंडे फेल

ग़लती से अगर बिहार में, ग़लती से भी भाजपा चुनाव हार गई, तो पटाखे पाकिस्तान में छूटेंगे. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार के चुनाव प्रचार में जब उक्त शब्द बोले थे, तब भले ही उनकी निगाहें पाकिस्तान पर रही होंगी, लेकिन निशाना बिहार के मतदाता थे.

यानी पाकिस्तान का भय दिखाकर पूरी तरह से धार्मिक गोलबंदी करने का प्रयास, जो सफल नहीं हुआ. इसी तरह बीच चुनाव में छोटा राजन को बाली से भारत लाकर मतदाताओं को अपने सख्त शासन-प्रशासन के संकेत देने के प्रयास हुए.

ऐसी भूमिका बांधी गई, मानो छोटा राजन के पकड़े जाते ही दाऊद इब्राहिम को पकड़ लिया जाएगा. इस सबका मकसद भी कहीं न कहीं मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को लुभाना था, लेकिन यह प्रयास भी भाजपा को बिहार चुनाव में करारी शिकस्त से बचा नहीं सका.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.