इस सरकारी दावे की हक़ीकत क्या है

clean indiaमानव संसाधन विकास मंत्रालय का दावा है कि उसने देश भर के सरकारी स्कूलों में शौचालय निर्माण का अपना लक्ष्य दो अक्टूबर, 2015 तक हासिल कर लिया है. मंत्रालय के मुताबिक, सौ फीसद लक्ष्य हासिल कर लिया गया है.

लेकिन, यह दावा कितना सही है? जब चौथी दुनिया संवाददाताओं ने बिहार, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के विभिन्न ज़िलों में इस दावे की जांच की, तो इसकी कलई खुलती नज़र आई. हमारी रिपोर्ट बताती है कि अव्वल तो कई स्कूलों में तो शौचालय नहीं हैं, जहां बने हैं उनमें से अधिकांश में दरवाजे नहीं हैं, कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है और जहां दरवाजे हैं, उनमें ताला लटक रहा है.

चौथी दुनिया संवाददाताओं ने यह भी पाया कि शौचालय निर्माण में जमकर धांधली हुई है. सरकार की ओर से शौचालय बनाने के लिए अच्छी-खासी धनराशि दी गई, निर्माण एजेंसी और ठेकेदारों ने बड़े पैमाने पर अनियमितताएं बरतीं.

कुछ निजी संस्थाओं की तऱफ से की गई स्वतंत्र जांच भी इन दावों की पोल खोलती है. मसलन, मुंबई स्थित संस्था इंडिया स्पेंड ने जब देश के कुछ स्कूलों का दौरा किया, तो पाया कि अधिकतर स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय की सुविधा का दावा सच नहीं है.

संस्था ने जब दिल्ली, सीतापुर (उत्तर प्रदेश), तुमकुर (कर्नाटक) एवं दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) के स्कूलों की जांच की, तो पाया कि जहां पहले से शौचालय हैं, वहां पानी की व्यवस्था नहीं है.

शौचालय गंदे पड़े हैं. इसलिए बच्चे उनका इस्तेमाल नहीं करते. शौचालय निर्माण योजना की स्थिति का अंदाज़ा स़िर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा सौ फीसद लक्ष्य पाने के दावे के ठीक छह दिनों बाद ही सरायकेला ज़िले के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय से 200 छात्राओं ने अपना नाम इसलिए कटा लिया, क्योंकि वहां पर्याप्त संख्या में शौचालय नहीं थे.

नियमानुसार हर 40 छात्र-छात्राओं पर एक शौचालय होना चाहिए. दिशा-निर्देशों के मुताबिक, विकलांग बच्चों के लिए पर्याप्त सुविधाओं वाला शौचालय अलग से होना चाहिए. लेकिन, ऐसी सुविधा शायद कहीं देखने को मिले.

शौचालय निर्माण कार्यक्रम में कॉरपोरेट घरानों ने भी कॉरपोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी (सीएसआर) के तहत काम किया है. बावजूद इसके अगर यह स्थिति है, तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकारी सहायता से बनने वाले शौचालयों की हालत क्या होगी. और तो और, इस योजना के तहत जो सरकारी आंकड़े जारी किए गए हैं, उनके मुताबिक, दिल्ली जैसे राज्य में एक भी शौचालय का निर्माण नहीं हुआ.

शायद दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नए शौचालयों की ज़रूरत नहीं थी या फिर इस दिशा में केंद्र एवं राज्य सरकार ने उदासीनता बरती. हालांकि, देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली के कई सरकारी स्कूलों में शौचालयों की हालत काफी खराब है.

मसलन, दिल्ली के संगम विहार स्थित एक बालिका विद्यालय के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने बायो टायलेट दिए थे, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, क्योंकि शुरुआती इस्तेमाल के बाद किसी ने उन्हें सा़फ करने की जहमत नहीं उठाई और अब उनसे इतनी बदबू आती है कि छात्राएं उनका इस्तेमाल नहीं कर पातीं.

पूर्वी चंपारण (बिहार) के 531 विद्यालय शौचालय विहीन
पूर्वी चंपारण ज़िले के 3,355 विद्यालयों में से केवल 2,824 विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था है. 531 विद्यालय ऐसे हैं, जहां आज भी शौचालय नहीं हैं. इनमें एक उच्च विद्यालय भी है. ज़िला मुख्यालय मोतिहारी स्थित धर्मसमाज उच्च विद्यालय में शौचालय नहीं है.

इससे सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि छात्र-छात्राओं को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा और इसे लेकर विभाग एवं प्रशासन कितना गंभीर है. ज़िले में 93 उच्च और 3,262 प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय हैं. ग़ौरतलब यह कि इनमें 530 विद्यालय भूमिहीन हैं, जिनके पास न तो भवन है और न शौचालय. हालांकि, उच्च विद्यालयों के पास अपने भवन एवं शौचालय हैं.

केवल धर्मसमाज चौक स्थित उच्च विद्यालय इससे वंचित है. उच्च विद्यालयों में शौचालय आदि की व्यवस्था राष्ट्रीय माध्यमिक योजना के अंतर्गत है, वहीं प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों की व्यवस्था सर्व शिक्षा अभियान के तहत. विद्यालयों को भवन, पेयजल एवं शौचालय आदि सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सर्व शिक्षा अभियान द्वारा 2011 में तेजी से काम शुरू किया गया. तब स्थितियां बहुत खराब थीं.

60 फीसद विद्यालयों के पास न तो भूमि थी और न भवन. ऐसे विद्यालयों की सूची बनाकर भूमि उपलब्ध कराने के लिए ज़िला प्रशासन से कहा गया, जबकि भवनों के लिए सरकार द्वारा धनराशि उपलब्ध कराई गई. सैकड़ों स्थानों पर भूमि हासिल कर भवन एवं शौचालय का निर्माण कराया गया. बड़ी संख्या में ऐसे विद्यालय भी थे, जहां भवन तो था, परंतु शौचालय नहीं थे. ऐसे विद्यालयों को चिन्हित कर शौचालयों का निर्माण कराया गया.

रामगढ़वा प्रखंड के 42, रक्सौल के 52, तुरकौलिया के 40, फेनहारा के 25, पताही के 39, ढाका के 96, बनकटवा के 21, पकड़ी दयाल के 31, केशरिया के 57, पहाड़पुर के 39 और कल्याणपुर के 20 विद्यालयों में शौचालय का निर्माण कराया गया, लेकिन अभी भी 531 विद्यालयों में शौचालय नहीं हैं. ज़िला शिक्षा पदाधिकारी कुमार सहजानंद का कहना है कि भूमि और भवन न होने के कारण इन विद्यालयों में शौचालय का अभाव है.

शौचालय की ज़रूरत और अहमियत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जिन विद्यालयों में शौचालय बनाए गए, वहां छात्रों, खासकर छात्राओं की संख्या में खासी वृद्धि हुई है. जिन विद्यालयों में शौचालय नहीं हैं, वहां आज भी छात्राएं जाने से कतराती हैं.

रखरखाव के कमी के चलते भी कई जगह शौचालयों का इस्तेमाल नहीं हो पाता. लगभग तीस ़फीसद विद्यालयों में शौचालय रखरखाव के अभाव में बेकार पड़े हैं. कहीं दरवाजा नहीं है, तो कहीं शौचालय गंदे होने के डर से बंद हैं. पानी की समुचित व्यवस्था न होने से भी शौचालय का इस्तेमाल बच्चे नहीं करते.

गया: शौचालय निर्माण में जमकर धांधली
स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय बनाने की योजना गया ज़िले में असफल हो गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर शुरू हुई इस योजना के तहत गया में अब तक मात्र दो सौ शौचालयों का निर्माण हुआ है. इसमें भी ठेका लेने वाली संस्था ने पेटी कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली छोटी कंपनियों एवं छोटे ठेकेदारों का भुगतान नहीं किया है.

मई 2015 तक गया के सभी सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए आवश्यकतानुसार अलग-अलग शौचालयों का निर्माण हो जाना चाहिए था, जुलाई 2015 तक काम होने के बाद मात्र दो सौ शौचालय बन सके. गया में शौचालय निर्माण का ठेका दिल्ली की आरईसी कंपनी ने लिया था, जो बिजली का काम करती है. उसने यह ठेका पीडीआईएल नामक कंपनी को स्थानांतरित कर दिया.

पीडीआईएल ने भी छोटे-छोटे ठेकेदारों को पेटी कांट्रैक्ट देकर क़रीब 50 शौचालयों का निर्माण कराया. एक शौचालय के लिए एक लाख बीस हज़ार रुपये की धनराशि तय की गई है, लेकिन गया में शौचालय निर्माण करने वाले एक पेटी कांट्रैक्टर मुरलीधर कंस्ट्रक्शन के लोगों ने बताया कि काम करा लेने के बाद पीडीआईएल ने प्रति शौचालय मात्र सत्तर हज़ार रुपये का भुगतान किया.

पचास हज़ार रुपये प्रति शौचालय किस मद में काट लिए गए, यह पीडीआईएल का कोई अधिकारी नहीं बता रहा है. दूसरी तऱफ यह भी पता चला है कि शौचालय निर्माण का ठेका लेने वाली मूल कंपनी आईईसी ने पीडीआईएल से पेटी कांट्रैक्ट खत्म कर किसी अन्य कंपनी को अपना ठेका स्थानांतरित कर दिया. उक्त नई कंपनी गया में अब तक 150 फाइबर शौचालयों का निर्माण करा चुकी है, जिसकी लागत प्रति शौचालय दो लाख पचीस हज़ार रुपये आ रही है.

पहले पक्का एवं छत वाला शौचालय मात्र एक लाख बीस हज़ार रुपये में बनता था, जो दरअसल पेटी ठेकेदारों द्वारा पचास हज़ार रुपये में बना दिया जाता था. अब फाइबर शौचालय बनने और लागत दोगुनी होने से सरकारी एजेंसी एवं ठेकेदारों के बीच घालमेल का संदेह लोगों द्वारा व्यक्त किया जा रहा है.

गया के 24 प्रखंडों के क़रीब तीन हज़ार से अधिक सरकारी स्कूलों में कम से कम पांच हज़ार शौचालयों का निर्माण होना है. लेकिन, ठेका आएदिन दूसरे के हाथों स्थानांतरित किए जाने से शौचालयों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. सच कहा जाए, तो स्वच्छ भारत अभियान के तहत सरकारी स्कूलों में शौचालय निर्माण की योजना गया में पूरी तरह असफल रही है.

सीतामढ़ी: ज़मीन के अभाव में नहीं बने 92 शौचालय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच के अनुरूप देश में स्वच्छता का वातावरण निर्मित नहीं हो पा रहा है. सड़क, रेलवे स्टेशन, बाज़ार से लेकर चौक-चौराहों तक अब भी गंदगी का अंबार नज़र आता है. मोदी ने स्वच्छता के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने की नीयत से प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत-स्वच्छ विद्यालय अभियान का श्रीगणेश किया था, जिसके तहत सीतामढ़ी को तक़रीबन चार करोड़ 29 लाख रुपये उपलब्ध कराए गए.

बिहार शिक्षा परियोजना की अभियंत्रण इकाई के अनुसार, सीतामढ़ी में 636 शौचालयों का निर्माण होना था, लेकिन अब तक 544 स्कूलों में ही शौचालय बन सके. 92 शौचालयों का निर्माण अभी बाकी है. शेष बचे शौचालयों के संबंध में बताया गया कि नवसृजित विद्यालयों के पास भूमि न होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका. क़रीब एक लाख 58 हज़ार रुपये प्रति की दर से बनने वाले उक्त शौचालयों का निर्माण कार्य कब तक पूरा हो पाएगा, फिलहाल कहना मुश्किल है.

उत्तराखंड की हालत बदतर
उत्तराखंड में शौचालय निर्माण के नाम पर जमकर धांधली हुई. कई स्कूलों में पुराने शौचालयों की रंगाई-पुताई करके खानापूर्ति कर दी गई. देहरादून अंतरराष्ट्रीय बस स्टैंड एवं मंडी समिति के मध्य स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय में दो सौ से अधिक छात्र पढ़ते हैं.

यह जनपद का सबसे पुराना विद्यालय है. यहां भी शौचालय के नाम पर खानापूर्ति की गई. इस विद्यालय से चार सौ मीटर की दूरी पर स्थित कन्या विद्यालय की हालत तो और भी बदतर मिली.

इस विद्यालय में बीस वर्ष पूर्व बने शौचालय की दीवार पर बापू के चश्मे का चित्र उतार कर अभियान की इतिश्री कर ली गई. उत्तरकाशी एवं चमोली के दर्जन भर से अधिक विद्यालयों की बदहाली सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है.
(बिहार से राकेश कुमार, वाल्मीकि कुमार एवं सुनील सौरभ, उत्तर प्रदेश से प्रभात रंजन दीन और उत्तराखंड से राजकुमार शर्मा की रिपोर्ट)