आखिर कौन कर रहा है नफरत की खेती

pacउत्तर प्रदेश में जिस तेजी से सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है, उसी तेजी से राजनीतिक टकराव भी बढ़ रहा है. इस तनाव और टकराव के अंतर्संबंध हैं. दादरी के बाद मैनपुरी, फिर कन्नौज, फिर कानपुर और उसके बाद तक़रीबन पूरे प्रदेश में जिस तरह सांप्रदायिक तनाव बढ़ा और हिंसा कीघटनाएं हुईं, उस पर ग़ौर करें, तो उसके पीछे राजनीतिक निहितार्थ सा़फ-सा़फ दिखाई पड़ेंगे.

केंद्र में जब तक कांग्रेस की सरकार रही, समाजवादी पार्टी उसका साथ देती रही, लेकिन आज कांग्रेस ही आरोप लगा रही है कि समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी मिलकर उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा रही हैं. दोनों ही पार्टियों को अलग-अलग नज़रिये से इसका फायदा नज़र आता है. वाराणसी के सांप्रदायिक तनाव के हवाले से कांग्रेस का कहना है कि हिंसा भड़काने में भाजपाइयों का हाथ था, लेकिन सपा सरकार ने कांग्रेस नेता अजय राय एवं पार्टी समर्थकों पर मुक़दमा ठोक दिया. यह सपा-भाजपा की मिलीभगत का उदाहरण है.

दूसरी तऱफ मायावती भी लगातार यह आरोप लगाती आ रही हैं कि उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव और फसाद की वारदातें सपा-भाजपा की मिलीभगत से हो रही हैं. दादरी कांड के बाद जिस तरह क्रमिक रूप से सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं बढ़ीं और दुर्गा पूजा एवं मुहर्रम तक आकर व्यापक शक्ल लेने लगीं, उससे सा़फ हुआ कि इसके पीछे राजनीतिक भागीदारी भले न हो, लेकिन राजनीतिक समझदारी ज़रूर है.

दादरी के बाद मुलायम सिंह के पुराने संसदीय क्षेत्र मैनपुरी और अखिलेश के पुराने संसदीय क्षेत्र कन्नौज में हिंसा भड़क उठी. मुलायम सिंह अभी हाल में यह कह चुके हैं कि मैनपुरी ही उनकी असली कर्मभूमि रही है. और, कन्नौज तो अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी पत्नी डिंपल यादव के कब्जे में है. मैनपुरी संसदीय सीट भी मुलायम सिंह के पौत्र तेज प्रताप यादव को उत्तराधिकार-उपहार में मिली है.

लिहाजा, इन क्षेत्रों में सांप्रदायिक उन्माद फैलना राजनीतिक दृष्टिकोण से गंभीर है. यादव विरासत के इन इलाकों में फैली यह सांप्रदायिक आग सुलगती हुई धीरे-धीरे प्रदेश के कई ज़िलों में फैल गई. प्रदेश में फैल रहा सांप्रदायिक तनाव कम करने और अपनी-अपनी कर्मभूमि में सौहार्द बनाए रखने का प्रयास करने के बजाय सपा के अलमबरदार लखनऊ में चिंतन बैठक में लगे रहे. चिंतन का विषय था, राज्यपाल राम नाईक से कैसे पार पाया जाए. राम नाईक सपा सरकार के अलोकतांत्रिक कृत्यों को बार-बार संविधान का लाल सिग्नल दिखा रहे हैं, इसलिए सपा ने उनके खिला़फ मोर्चा खोल दिया है.

सरकार की प्राथमिकता चुनाव के पहले प्रदेश में पूर्ण अराजकता का सृजन करना है, चाहे वह सांप्रदायिक मोर्चे पर हो या राजनीतिक मोर्चे पर. विधान परिषद में संदेहास्पद किस्म के लोगों को भेजने या अपनी जाति के विवादास्पद शख्स को लोकायुक्त बनाने की जिद अराजकता की ओर बढ़ रहे क़दमों का ही एक आयाम है, जिस पर राज्यपाल ने अड़ंगा लगा रखा है.

बहरहाल, दादरी की घटना पर देश भर में राजनीति तो खूब हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन की हनक के धराशायी होने पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी दादरी कांड के बाद प्रदेश की क़ानून व्यवस्था की समीक्षा करने की ज़रूरत नहीं समझी. जब सांप्रदायिक उन्माद विस्तार लेने लगा, तब पिछले दिनों (26 अक्टूबर को) मुख्यमंत्री ने क़ानून व्यवस्था की समीक्षा की और अधिकारियों को ज़रूरी निर्देश देकर छुट्टी कर ली. अंदर ही अंदर सुलग रहा तनाव दुर्गा पूजा और मुहर्रम के दौरान सतह पर आ गया.

यह कानपुर, बांदा, कन्नौज, सिद्धार्थ नगर, कुशी नगर, फतेहपुर, संत कबीर नगर होता हुआ कई अन्य ज़िलों में फैल गया. प्रदेश के क़रीब दर्जन भर ज़िले सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में हैं. सिद्धार्थ नगर और कन्नौज में दो-दो लोग मारे गए. कानपुर में तो पुलिस वालों पर ही खुलेआम गोलियां दागी गईं. दो पुलिस वालों को गोली लगी और दर्जनों लोग घायल हुए. कानपुर के फजलगंज, सीसामऊ, नौबस्ता एवं चमनगंज थाना क्षेत्रों में सांप्रदायिक झड़पों ने दंगे का रूप लेना शुरू कर दिया था. पीएसी समेत अर्द्धसैनिक बल उतारने के बाद स्थिति काबू में आ पाई.

दंगे फैलाने के पीछे के कुचक्र का एहसास करते चलें. कानपुर शहर में धार्मिक बैनर फाड़ने की घटना से तनाव की शुरुआत हुई. उसके बाद अ़फवाह फैली कि इसके विरोध में मुहर्रम का जुलूस रोका जाएगा. फिर क्या था, कानपुर में हिंसा शुरू हो गई. मारपीट, पथराव, फायरिंग और आगजनी की घटनाएं होती रहीं, लेकिन ज़िला पुलिस गलियों में घुसने का साहस नहीं बटोर पाई. शहर में धारा-144 लागू होने के बावजूद हालात बेकाबू थे.

चंद्रिका देवी इलाके में इंस्पेक्टर डीके सिंह एवं आरआई एमपी शर्मा दंगाइयों की गोली से जख्मी हुए, लेकिन पुलिस कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर पाई. कानपुर के डीएम कौशलराज शर्मा लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करने में ही पूरा ध्यान लगाए रह गए.

डिंपल यादव के संसदीय क्षेत्र कन्नौज में भी दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन को लेकर हिंसा भड़की और लगातार कई दिनों तक जारी रही. फायरिंग में युवक अपूर्व गुप्ता एवं महेश कुशवाहा की मौत के बाद हिंसा और तेजी से भड़की, जो फतेहपुर तक फैल गई. कर्फ्यू के बावजूद स्थिति नहीं सुधरी.

हालत इतनी खराब होने लगी कि सरकार को प्रदेश में हाई अलर्ट घोषित करना पड़ा. प्रमुख सचिव (गृह) देबाशीष पंडा और डीजीपी जगमोहन यादव को सीधे कमान संभालनी पड़ी. उपद्रवियों की हरकतों पर नियंत्रण न हो पाने के बाद कन्नौज शहर को आ़िखरकार बीएसएफ के हवाले करना पड़ा. कन्नौज में दुर्गा विसर्जन के दरम्यान लाखन तिराहे के पास यात्रा में शामिल युवकों के साथ मारपीट हुई. बताया गया कि विसर्जन यात्रा में शामिल महिलाओं के साथ अश्लील हरकतों का विरोध करने पर मारपीट की गई, जिसके बाद हिंसा भड़की.

फतेहपुर के सुल्तानपुर घोष थाना क्षेत्र के मंडवा गांव में देवी प्रतिमा जुलूस निकालने को लेकर दो गुटों के बीच बवाल हो गया. मुहर्रम और विसर्जन जुलूसों के आमने-सामने पहुंचने पर किसी ने पत्थरबाजी कर दी, जिसके बाद हिंसा भड़क गई. लोगों ने कुछ घरों और वाहनों में आग लगा दी. फायरिंग और पथराव में दर्जन भर लोग घायल हुए. सिद्धार्थ नगर के शोहरतगढ़ में मंदिर के सामने से ताजिया जुलूस निकालने के दौरान हिंसा भड़क गई.

उसके बाद कई दुकानों में तोड़फोड़ और आगजनी हुई. घटना में गंभीर रूप से घायल 60 वर्षीय सूर्य लाल अग्रहरि की अस्पताल में मौत हो गई. स्थानीय लोगों ने बताया कि हिंसा में जख्मी एक और व्यक्ति की बाद में मौत हो गई, लेकिन उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी. हिंसक वारदातों में दर्जनों लोग जख्मी हुए. कुशी नगर ज़िले के कसया इलाके में दुर्गा प्रतिमा पंडाल के सामने से ताजिया निकालने को लेकर विवाद हो गया.

रास्ता संकरा होने की वजह से दुर्गा प्रतिमा पंडाल कटवा कर जुलूस का रास्ता निकाला गया. हालांकि, प्रशासन ने पहले वहां से ताजिया निकालने की इजाजत नहीं दी थी. दोनों तऱफ से खूब पथराव हुआ, दर्जन भर से अधिक लोग घायल हुए.

पीएसी की तैनाती के बाद से स्थिति नियंत्रण में है. संत कबीर नगर ज़िले के खलीलाबाद में मुहर्रम का जुलूस मंदिर के रास्ते ले जाने को लेकर बवाल हुआ. भीड़ द्वारा पथराव करने से चार पुलिस वाले घायल हो गए. बांदा ज़िले के अतर्रा में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान प्रतिमा टूटने की वजह से बवाल हो गया.

पथराव में स्थानीय लोगों समेत सीओ अतर्रा और एसडीएम भी घायल हो गए. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी. उल्लेखनीय है कि नोएडा के दादरी इलाके में गोमांस को लेकर हुई हत्या और बवाल के बाद मुलायम सिंह के क्षेत्र मैनपुरी के करहल इलाके में भी गाय काटे जाने की अ़फवाह पर हिंसा फैल गई. पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं, पुलिस की जीप फूंक डाली गई. आ़िखरकार मैनपुरी में भी पीएसी तैनात करनी पड़ी.

ऐसे होती है क़ानून व्यवस्था की समीक्षा!

कई ज़िलों में सांप्रदायिक हिंसा और उन्माद फैलने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने क़ानून व्यवस्था की समीक्षा करने की ज़रूरत समझी. 26 अक्टूबर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आला अधिकारियों की बैठक बुलाई और समीक्षा के नाम पर औपचारिक निर्देश देकर चलते बने. राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं बताया कि क़ानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान क्या-क्या खामियां पाई गईं और उन्हें दुरुस्त करने के क्या उपाय किए गए.

मुख्यमंत्री ने स़िर्फ समाज में अव्यवस्था फैलाने वालों से सख्ती से निपटने के निर्देश देते हुए कहा कि क़ानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता है और इसके साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता. क़ानून व्यवस्था की समीक्षा के बाद जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार किस तरह ज़मीनी हक़ीकत से दूर केवल औपचारिक शब्दों का इस्तेमाल करती है, उसकी बानगी देखिए… राज्य सरकार अमन-चैन का माहौल कायम रखने के लिए कटिबद्ध है, ताकि प्रदेश का चतुर्दिक विकास किया जा सके.

सरकार ने पुलिस एवं प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को क़ानून व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त बनाए रखने के निर्देश पहले से ही दे रखे हैं. ऐसे में इन अधिकारियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने स्तर से प्रभावी कार्रवाई करें. उत्तर प्रदेश आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण प्रदेश है.

इसलिए यहां की घटनाओं पर लोगों की निगाह बनी रहती है. क़ानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण में पुलिस की प्रमुख भूमिका से अवगत होने के कारण राज्य सरकार पुलिस को सभी ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए लगातार कार्य कर रही है. रात्रिकालीन गश्ती व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त की जाए और शहरों के बाहरी इलाकों में गश्त में विशेष सावधानी बरती जाए.

भाजपा का बचाव, राज्यपाल पर निशाना

उत्तर प्रदेश की लगातार खराब होती क़ानून व्यवस्था की स्थिति से सख्ती से निपटने के बजाय समाजवादी पार्टी ने अपना निशाना केवल राज्यपाल राम नाईक पर साध रखा है. राज्यपाल ने सरकार के अलोकतांत्रिक कामकाज पर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करके सपा को नाराज़ कर दिया है. अयोग्य एवं विवादास्पद लोगों को विधान परिषद में मनोनीत करने का मसला हो या विवादास्पद व्यक्ति को लोकायुक्त बनाने का, राज्यपाल ने सरकार के रास्ते में संवैधानिक अड़चन लगा रखी है.

इससे बौखलाए सपा नेता प्रो. राम गोपाल यादव ने राज्यपाल के खिला़फ बयानबाजी करने में आजम खान को पीछे छोड़ दिया है. राम गोपाल ने कहा, राज्यपाल हर घटना पर बयानबाजी करते हैं. वह प्रदेश के गृह मंत्री बन गए हैं, वह मुख्यमंत्री से मुलाकात को भी उजागर कर देते हैं. राज्यपाल पद की गरिमा के विपरीत काम कर रहे हैं. राज्यपाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता बने घूम रहे हैं.

उन्हें केंद्र में मंत्री बना दिया जाए, तो बेहतर होगा, क्योंकि वह सरकार के खिला़फ रा़ेज बयान देते हैं. सांप्रदायिक हिंसा के बाद प्रदेश की क़ानून व्यवस्था पर उठने वाले सवालों पर राम गोपाल ने कहा, अगर 75 में से तीन ज़िलों में बवाल हुआ, तो क्या लॉ एंड ऑर्डर फेल हो गया? सरकार को बदनाम करने के लिए साज़िश हो रही है.
इस बयान के बरक्स ज़मीनी तथ्य यह है कि दादरी कांड के बाद दर्जन भर ज़िलों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुईं.

यदि सांप्रदायिक तनाव से ग्रस्त ज़िलों को भी जोड़ लें, तो यह संख्या और बढ़ जाती है. राज्यपाल पर प्रहार करने वाले राम गोपाल ने भाजपा के खिला़फ कोई टिप्पणी नहीं की. इस बारे में पूछने पर राम गोपाल बोले कि राज्यपाल की आलोचना पार्टी की ही आलोचना है. अभी कुछ ही दिनों पहले राम गोपाल ने राम नाईक के खिला़फ तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्यपाल को महामहिम कहने में भी उन्हें लज्जा आती है.

राम गोपाल के बयान पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताई है. पार्टी प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा कि सपा महासचिव राम गोपाल यादव प्रदेश की बदहाल क़ानून व्यवस्था पर राज्यपाल की टिप्पणी से नाराज़ हो जाते हैं, लेकिन सपा सरकार के मंत्रियों को कुछ नहीं कहते, जो बलात्कार के लिए मोबाइल को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. पाठक कहते हैं कि सपा अपनी नाकामी छिपाने के लिए राज्यपाल को ज़िम्मेदार ठहरा रही है.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...