भारतीय जनता पार्टी क्यों हारी

bjpजीत की खूबी यह है कि उसके कई प्रणेता एवं रचयिता होते हैं और हार का दुर्भाग्य यह है कि वह लावारिस होता है. बिहार की जनता ने अपने ़फैसले से यह तय कर दिया कि उसका नायक कौन है और बिहार की राजनीति में कौन यतीम हो गया. बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा. देश के राजनेता, राजनीतिक दल एवं बिहार के लोग इस चुनाव के महत्व से भलीभांति वाकिफ थे.

सबको यह भी पता था कि इस चुनाव से भारत की भविष्य की राजनीति तय होगी. बिहार की जनता का फैसला आ चुका है. उसने भारतीय जनता पार्टी को नकार दिया और अपने चहेते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फिर से सिंहासन पर बैठाने का फैसला किया. बिहार की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा करने के बजाय नीतीश कुमार के कामकाज पर मुहर लगाई.

अब सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी से ऐसी क्या चूक हुई, जिसकी वजह से लोगों ने उसे नकार दिया. बिहार विधानसभा चुनाव की शुरुआत से ही लोग नीतीश कुमार को सबसे बेहतर मुख्यमंत्री मान रहे थे.

लोग उनके कामकाज से खुश थे, साथ ही लालू यादव के साथ आने से यादवों एवं मुसलमानों का वोट भी लालू-नीतीश गठबंधन के साथ एकजुट होना तय था. क्या भारतीय जनता पार्टी को यह पता नहीं था कि चुनावी समीकरण लालू-नीतीश के पक्ष में है? आ़खिर भारतीय जनता पार्टी से क्या चूक हुई, इसे समझना ज़रूरी है.

बिहार में भारतीय जनता पार्टी अपने अहंकार, दिशाहीनता, सांप्रदायिकता, आर्थिक नीति और चुनाव प्रचार की वजह से डूब गई. लोकसभा चुनाव 2014 में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत हुई. लालू यादव एवं नीतीश कुमार ने उस हार से सबक लिया.

उन्हें समझ में आ गया कि अलग-अलग रहकर भाजपा को नहीं हराया जा सकता है. इसलिए कई सारी बाधाएं दरकिनार कर वे एकजुट हुए. भारतीय जनता पार्टी इस गठबंधन के वोट बैंक का तोड़ नहीं निकाल सकी. यही नहीं, भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार से लालू-नीतीश के महा-गठबंधन का वोट बैंक न स़िर्फ मजबूत किया, बल्कि उसमें इजाफा भी किया.

भारतीय जनता पार्टी न तो यादवों के वोटों में सेंध मार सकी और न कुर्मी-कुशवाहा वोटों को पाने में सफल रही. इसके अलावा उसने अपने बयानों से मुस्लिम मतदाताओं को पूरी तरह से महा-गठबंधन के पक्ष में कर दिया. भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों की सबसे बड़ी भूल यह रही कि वे बिहार की जटिल राजनीति समझ नहीं सके.

उन्हें लगा कि स़िर्फ पैकेज देकर, वायदे और विकास की बातें करके वे बिहार में चुनाव जीत जाएंगे. लेकिन, हक़ीक़त यह है कि बिहार के लोग जब वोट देते हैं, तो उनके दिमाग़ में कई तरह की बातें होती हैं. सामाजिक न्याय बिहार की राजनीति की सच्चाई है और भारतीय जनता पार्टी के पास सामाजिक न्याय के नाम पर जनता को देने के लिए कुछ नहीं था. यही वजह है कि लोगों ने विकास के महज वायदे को खारिज करते हुए सामाजिक न्याय की राजनीति को अपना आशीर्वाद दिया.

बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के विभिन्न कारणों में मोदी सरकार की आर्थिक नीति भी शामिल है. लोग केंद्र सरकार की आर्थिक नीति से निराश हैं. इसकी वजह यह है कि किसी भी नीति का फायदा ग़रीबों तक नहीं पहुंच रहा है. लोगों को लगता है कि केंद्र सरकार स़िर्फ अमीरों के लिए नीतियां बना रही है, चंद औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचाने का काम कर रही है और महंगाई रोकने में नाकाम रही है.

चुनाव के दौरान अरहर की दाल की क़ीमत 200 रुपये प्रति किलो पार कर गई. यह इस चुनाव का एक बड़ा मुद्दा था. भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों को यह बात समझ में नहीं आई कि बिहार में महिलाएं बड़ी संख्या में वोट देने बाहर इसलिए निकल रही हैं, क्योंकि वे महंगाई से परेशान हैं.

यही नहीं, नीतीश कुमार ने बिहार में महिलाओं, लड़कियों एवं छात्राओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं, जिसका फायदा महा-गठबंधन को उनके समर्थन के रूप में मिला. केंद्र सरकार की आर्थिक नीति और महंगाई का जनता पर क्या असर हो रहा है, भारतीय जनता पार्टी इसका सही आकलन नहीं कर सकी.

लोकसभा चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लोगों को काफी उम्मीदें एवं आशाएं थीं, लेकिन पिछले डेढ़ सालों में नरेंद्र मोदी पर से लोगों का भरोसा डिगा है. देश की जनता सरकार की ओर से ज़्यादा से ज़्यादा राहत मिलने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन ज़मीन पर कोई बदलाव होता नहीं दिखा. बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरह का कैंपेन भारतीय जनता पार्टी द्वारा किया गया, उसे दिशाहीन ही कहा जा सकता है.

भारतीय जनता पार्टी की तऱफ से ऐसे कई मुद्दों को हवा दी गई, जिनसे स़िर्फ ऩुकसान हुआ. सबसे बड़ा ऩुकसान आरक्षण के मुद्दे पर हुआ. मोहन भागवत का आरक्षण की समीक्षा वाला बयान आत्मघाती साबित हुआ. इस चुनाव में जीत-हार की चाबी अति पिछड़ा वर्ग के पास थी.

मोहन भागवत के बयान से अति पिछड़ा वर्ग महा-गठबंधन के पक्ष में चला गया. इसके अलावा दादरी एवं हरियाणा की घटनाओं और लेखकों, कलाकारों एवं फिल्म निर्माताओं के विरोध के चलते भी भारतीय जनता पार्टी के खिला़फ माहौल बना. ऐसी बातें हर चुनाव के दौरान होती हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इन मुद्दों को निपटाने के बजाय इन्हें और उलझा दिया.

इन मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बयान प्रतिक्रियावादी थे, जिन्हें बिहार की जनता ने खारिज कर दिया. भारतीय जनता पार्टी को यह समझना पड़ेगा कि मुसलमानों के खिला़फ बयान देकर, भावनाएं भड़का कर और हर मुद्दे पर पाकिस्तान का हवाला देकर आम जनता का समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता है.

ऐसे बयानों से भारतीय जनता पार्टी के कट्टर समर्थक तो खुश हो सकते हैं, लेकिन ऐसे बयानों से निष्पक्ष एवं संवेदनशील मतदाता दूर हो जाते हैं. भारतीय जनता पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव में इसलिए हारी, क्योंकि वह निष्पक्ष एवं संवेदनशील मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं कर सकी.

भारतीय जनता पार्टी की हार के कारणों में उसकी आंतरिक समस्याओं का भी योगदान रहा. इस चुनाव में बिहार के स्थानीय नेताओं की स्थिति निर्णायक के बजाय कार्यवाहक की हो गई. चुनाव का पूरा नियंत्रण अमित शाह के पास था. अमित शाह फैसला लेते थे और उसे लागू कराने की ज़िम्मेदारी भी दिल्ली से तैनात किए गए ग़ैर-बिहारी नेताओं की थी. स्थानीय नेताओं का रोल स़िर्फ आदेश पालक का था.

इस पहलू को नीतीश कुमार एवं लालू यादव ने बड़ी कुशलता से बाहरी और बिहारी का मुद्दा बना दिया. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की अंतर्कलह भी खुलकर सामने आ गई. चुनाव के दौरान अरुण शौरी एवं शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों को लालू-नीतीश गठबंधन मुद्दा बनाने में सफल रहा. भारतीय जनता पार्टी अपनी अंतर्कलह के चलते मुख्यमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं कर सकी.

पार्टी में ऐसे कई नेता थे, जो मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पाले हुए थे. ऐसी स्थिति में किसी का नाम घोषित करने का मतलब चुनाव से पहले ही आंतरिक लड़ाई को सार्वजनिक करना होता. लेकिन, नाम घोषित न करने से कहीं ज़्यादा ऩुकसान हुआ. एक तऱफ नीतीश कुमार थे, वहीं दूसरी तऱफ कोई नेता नहीं था.

जिस दिन नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी से अलग हुए, उसी दिन यह तय हो गया था कि बिहार में अगला चुनाव भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार के बीच होगा. भारतीय जनता पार्टी को नीतीश कुमार के म़ुकाबले एक नेता विकसित करना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चुनाव के समय जब मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का मुद्दा उठा, तो भारतीय जनता पार्टी उत्तरविहीन हो गई. इसी समस्या से भारतीय जनता पार्टी को देश के दूसरे राज्यों में भी जूझना पड़ेगा.

इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की तऱफ से जिन मुद्दों को प्रमुखता दी गई, उन्हें जनता ने नकार दिया. भारतीय जनता पार्टी ने जंगलराज को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था. मजेदार बात यह है कि बिहार के लिए जंगलराज वाकई में बड़ा मुद्दा था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी यह भूल गई कि जिस जंगलराज से बिहार की जनता परेशान थी, उस पर नीतीश कुमार ने ही नियंत्रण किया था.

बिहार की जनता ने यह महसूस किया कि नीतीश कुमार के शासन में जंगलराज का पूरी तरह से खात्मा हुआ था. भारतीय जनता पार्टी लालू यादव का डर दिखाकर वोट पाना चाहती थी, लेकिन उसकी यह रणनीति इसलिए असफल हो गई, क्योंकि लोगों को नीतीश कुमार के नेतृत्व पर ज़्यादा भरोसा था. भारतीय जनता पार्टी गोमांस का मुद्दा उछाल कर ़फायदा उठाना चाहती थी, लेकिन उसका यह दांव भी उल्टा पड़ गया.

भारतीय जनता पार्टी ने राम विलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और मांझी की पार्टियों को 80 सीटें देकर भी ग़लती की. भारतीय जनता पार्टी की यह सोच थी कि इससे उसके गठबंधन का जातीय समीकरण मजबूत हो जाएगा. नतीजों से यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इन पार्टियों के बीच वोटों का आदान-प्रदान नहीं हुआ.

भाजपा गठबंधन इन 80 सीटों में से स़िर्फ छह-सात सीटें जीत सका. इतना ही नहीं, सहयोगी पार्टियों के अंदर भी बगावत हुई और उनके नेताओं ने स्वतंत्र उम्मीदवार बनकर भाजपा को ऩुकसान पहुंचाया.

जिस तरह क्रिकेट में आ़िखरी गेंद तक जीत और हार का फैसला नहीं होता, वही हाल इस बार बिहार विधानसभा चुनाव का रहा. बिहार विधानसभा चुनाव की अनिश्चितता का आलम यह था कि किसी चुनावी सर्वे, एक्जिट पोल, राजनीतिक विशेषज्ञ और पत्रकार ने ऐसे नतीजे की कल्पना नहीं की थी.

भारतीय जनता पार्टी ने डेढ़ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार में सबसे ज़्यादा सीटें और सबसे ज़्यादा वोट पाकर सबको चौंका दिया था, लेकिन इस चुनाव में वह पूरी तरह से धराशायी हो गई. भारतीय जनता पार्टी ने जिस हिसाब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस्तेमाल अपने कैंपेन में किया, उससे यह चुनाव केंद्र सरकार के डेढ़ साल के कामकाज पर जनमत संग्रह बन गया. बिहार की जनता का फैसला मोदी सरकार के डेढ़ साल के कामकाज पर दिया गया फैसला है.

प्रजातंत्र में हर चुनाव राजनीतिक दलों और जनता को सबक देता है. बिहार विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए कई सबक लेकर आया है. आशा करनी चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी बिहार के चुनाव नतीजों और अपनी ग़लतियों का सही ढंग से विश्लेषण करेगी तथा उससे सबक लेगी.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.
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डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎