महिलाएं वोट देने में आगे, हिस्सेदारी में पीछे

biharबिहार की महिलाओं ने सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के मामले में हमेशा बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है. अगर इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव की बात करें, तो 2010 की तुलना में इस बार की मतदाता सूची में 50 लाख महिलाएं और शामिल हुई हैं और इस बार वोटिंग में भी बिहार की महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा वोटिंग की है, पर इन सबके बावजूद बिहार विधानसभा में पिछली बार के मुकाबले इस बार महिला उम्मीदवारों को टिकट देने में सभी राजनीतिक दलों ने कंजूसी दिखाई.

जहां पिछले विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या 14 प्रतिशत थी, वहीं इस बार घटकर 10 प्रतिशत रह गई है. वर्तमान विधानसभा में 14 फीसदी महिला विधायक हैं. वहीं इस बार प्रमुख दलों ने सिर्फ 10 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया है. अगर बिहार में राजनीतिक दलों के हिसाब से महिला उम्मीदवारों को देखें, तो एनडीए ने 23 और महागठबंधन के कोटे से 25 महिलाओं को टिकट मिला है.

एनडीए में भाजपा ने 160 में 14, हम ने 20 में से 4, लोजपा ने 32 में से 4 और रालोसपा ने अपने कोटे की 23 सीटों में से एक महिला को टिकट दिया है. वहीं महागठबंधन के कोटे में जदयू ने 101 में 10, राजद 101 में 10 और कांग्रेस ने 41 में पांच महिलाओं को टिकट दिया है. अभी तक सबसे अधिक हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (हम) ने 20 प्रतिशत और रालोसपा ने सबसे कम लगभग 4 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है.

अगर 2015 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों की बात करें, तो एनडीए की 23 महिला उम्मीदवारों में से मात्र चार को ही जीत हासिल हुई है, जिसमें बीजेपी की भगीरथी देवी, आशा देवी, गायत्री देवी और भाजपा की ही उम्मीदवार अरुणा देवी ने जीत दर्ज की है. महागठबंधन की महिला उम्मीदवारों की बात करें, तो उसने 25 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिए, जिनमें से 21 ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की है.

2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को महिलाओं का समर्थन मिला था और इस बार भी नीतीश की सत्ता में वापसी महिला मतदाताओं के अपार समर्थन के बिना संभव नहीं थी. पर सवाल एक बार फिर से वही उठता है कि इस बार विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी सभी राजनीतिक दलों के उन खोखले वादों की पोल खोलती है, जिनमें वे महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं.

अगर बिहार में महिलाओं की स्थिति और नीति नियामक संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व की बात करें, तो अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1952 से लेकर अब तक केवल 242 महिलाएं राज्य विधानसभा पहुंच सकीं. हर राजनीतिक दल ने महिला मतदाताओं एवं कार्यकर्ताओं की मदद ली, महिलाओं के अधिकारों की वकालत की, लेकिन टिकट देने में सबने उनकी अनदेखी की.

सबसे अधिक 34 महिलाएं वर्ष 1957 में राज्य विधानसभा पहुंची थीं. उस इतिहास को दोहराने में 53 वर्ष का समय लगा. दोबारा इतनी संख्या में महिलाओं का विधानसभा पहुंच पाना पिछले चुनाव यानी 2010 में संभव हो सका. हालांकि, महिला विधायकों की यह संख्या भी 2010 के विधासनभा की कुल सदस्य संख्या का महज 14 फीसदी है. वर्ष 2005 के चुनाव में 234 महिलाएं मैदान में थीं, लेकिन विधानसभा पहुंचने में केवल तीन को सफलता मिली. राज्य में महिला विधायकों की यह सबसे कम संख्या थी.

बिहार में महिलाओं को मताधिकार देने में भी बिहार पीछे था. बिहार विधान परिषद ने क़रीब आठ वर्षों के संघर्ष के बाद 1929 में यह अधिकार प्रदान किया, जबकि मुंबई एवं संयुक्त प्रांत में 1923, असम में 1924 और पश्चिम बंगाल में 1925 में ही महिलाओं को यह अधिकार मिल चुका था. हां, यह ज़रूर है कि बिहार में राबड़ी देवी के रूप में किसी महिला को पहली बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन वह भी किन परिस्थितियों में संभव हुआ, यह सभी जानते हैं.

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