ज़हीर ख़ान का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास क़ाबिलियत पर भारी चोटें

Zaheer Khanतेज गेंदबाज ज़हीर खान ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया. बाएं हाथ के इस तेज गेंदबाज़ ने लंबे समय तक भारतीय आक्रमण की बागडोर संभाली. वह पिछले कुछ समय से फिटनेस की समस्या से जूझ रहे थे. इस वजह से वह लगातार टीम इंडिया से बाहर रहे . खान ने आखिरी टेस्ट फरवरी, 2014 में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था.

वहीं आखिरी वनडे अगस्त, 2012 में श्रीलंका के खिलाफ पल्लीकल में खेला था. इसके बाद वह टीम इंडिया में वापसी नहीं कर सके. हालांकि इस बीच साल 2015 में उन्होंने आईपीएल में वापसी की, लेकिन उनकी गेंदबाजी में वह धार नहीं दिखी जिसके लिए वह जाने जाते हैं.

उन्होंने अपने करियर में टीम इंडिया की ओर से कुल 92 टेस्ट खेले और 311 विकेट हासिल किए, जबकि 200 वनडे मैचों में 282 विकेट हासिल किए. इसके अलावा 17 अंतरराष्ट्रीय टी-20 मैचों में 17 विकेट लिए. ज़हीर ने भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 610 विकेट चटकाए.

उन्होंने केन्या में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में अपना पहला एकदिवसीय मैच खेला था और बांग्लादेश के खिलाफ साल 2000 में अपने टेस्ट करियर की शुरूआत की थी. इसके बाद अगले 14 साल तक वह भारत के मुख्य गेंदबाज़ रहे. इस दौरान उन्होंने भारत को कई टेस्ट जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई.

भारतीय क्रिकेट टीम में न जाने कितने तेज़ गेंदबाज आए और गए, लेकिन उनमें से बहुत कम ही ऐसे हैं जिन्होंने लंबे समय तक देश की सेवा की और विश्व स्तर देश के साथ-साथ अपना नाम भी रोशन किया.

यदि कपिल देव भारत के सर्वकालिक महानतम तेज गेंदबाज हैं तो जहीर उनके बाद दूसरे पायदान पर हैं. ज़हीर ख़ान ने उस दौर में भारतीय गेंदबाज़ी की कमान थामी थी जब टीम में तेज गेंदबाजों के अंदर-बाहर जाने का दौर चल रहा था.

कोई भी गेंदबाज स्थाई तौर पर टीम में जगह बना पाने में कामयाब नहीं हो पा रहा था. व्यंकटेश प्रसाद जवागल श्रीनाथ और अजीत आगरकर जैसे गेंदबाजों के साथ वह खेले. आशीष नेहरा लेकिन धीरे-धीरे वह भारतीय गेंदबाजी की धुरि बन गए. विकेटों के मामले में ज़हीर भारत के चौथे सबसे सफल गेंदबाज हैं. वह टेस्ट मैचों में भारत के लिए दूसरे सबसे सफल तेज़ गेंदबाज हैं.

ज़हीर ख़ान के पास गेंद को दोनों ओर स्विंग कराने की काबीलियत थी. साथ ही उन्हें रिवर्स स्विंग कराने में महारत हासिल थी. उनकी यॉर्कर गेंदों का हर कोई कायल था. लंबे समय बाद भारत को एक ऐसा गेंदबाज मिला, जो उप-महाद्वीप की फ्लैट पिचों पर तेज गेंदबाजी का जादू दिखा रहा है. उनका हर तरह की गेंद में गज़ब का कंट्रोल था. उन्हें यॉर्कर फेंकने में महारथ हासिल थी.

जब उन्होंने अपने करियर की पहली प्रतियोगिता में अपने इस हथियार की बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया. तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने के बाद उनके खेल में साल-दर साल सुधार होता गया.

महाराष्ट्र के छोटे से शहर श्रीरामपुर के रहने वाले ज़हीर खान इंजीनियर बनना चाहते थे लेकिन उनके पिता ने कहा कि बेटा इंजीनियर तो बहुत हैं तुम तेज गेंदबाज ही बनो. इसके बाद वह मुंबई आए और मुंबई में जूनियर क्रिकेट खेली.

उनकी प्रतिभा को सबसे पहले एमआरएफ पेस फाउंडेशन के टीए शेखर ने पहचाना और उन्हें चेन्नई बुलाया. इसके बाद उनके करियर को पर लग गए.चेन्नई में शेखर ने उनकी गेंदबाजी को निखारा. इसके बाद भी जब कभी जहीर को जरूरत पड़ी उन्होंने उनका सहयोग किया.

महाराष्ट्र के अहमदनगर में जन्मे ज़हीर ख़ान की किस्मत 21 साल की उम्र में बदली, जब उन्हें पहली बार इंटरनेशनल टीम में शामिल करने के लिए नोटिस किया गया. 23 अप्रैल, 2000 को रणजी ट्रॉफी फाइनल मैच के आखिरी दिन जहीर ने बड़ौदा की तरफ से खेलते हुए 21 रन देकर 5 विकेट लिए और टीम को जीत दिलाई. उनके इस प्रदर्शन ने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा और उन्हें टीम इंडिया में शामिल कर लिया गया.

जहीर को गेंदबाजी के लंबे स्पेल करने में मज़ा आता था. उन्हें टेस्ट क्रिकेट और उसका माहौल पसंद था. एक तेज़ गेंदबाज के लिए अपने को हमेशा चुस्तदुरुस्त रखना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. ज़हीर खान इस चुनौती से पार नहीं पा सके. पहले तो जहीर की गेंदबाजी पर वजन बढ़ने का असर हुआ, इसके बाद चोटों ने उन्हें लगातार परेशान किया. वह टीम से बाहर हो गए. वापसी के लिए वह काउंटी क्रिकेट खेलने गए.

साल 2006 में का यह काउंटी सीजन उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ, इंग्लिश काउंटी वार्विकशायर के लिए खेलते हुए उन्होंने सबसे पहले अपना रन-अप छोटा किया और गति के साथ-साथ चालाकी से विकेट लेने में सफलता हासिल की. इंग्लैंड से वह एक चपल और चालाक गेंदबाज बनकर लौटे.

ज़हीर को यह मालूम था कि उनके सामने खड़े बल्लेबाज को किस तरह आउट किया जा सकता है. यह कला हर किसी में नहीं होती,इसके लिए आपका तकनीकि तौर पर दक्ष होना जरूरी है. एक गेंदबाज़ में विकेट लेने की कला होना बेहद आवश्यक होता है.

एक महान गेंदबाज की खासियत होती है कि वह ऐसा किस अंदाज में करता है. ज़हीर को यह बहुत अच्छे से मालूम था कि किस बललेबाज़ को किस जगह और कैसी गेंद फेंकनी है. उदाहरण के लिए जहीर खान ने दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज ग्रीह्म स्मिथ को 27 भिडंत में से 14 बार पैवेलियन वापस लौटाया.

आज लोग महेंद्र सिंह धोनी को छोटे शहर के बड़े सितारे के रूप में जानते हैं, लेकिन छोटे शहर का एक बड़ा सितारा ज़हीर थे, जिन्होंने विनम्र और संयमित रहते हुए, टीम इंडिया के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया. जिस भारतीय टीम को सौरव गांगुली ने खड़ा किया उसका बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा ज़हीर खान थे.

शायद ज़हीर को हमेशा 2003 के विश्वकप के फाइनल के पहले ओवर के लिए याद किया जाए, जिसमें गिलक्रिस्ट और हेडेन की जोड़ी ने उनकी लाइन-लेंथ बिगाड़ दी थी, उनकी वह आक्रामकता टीम के लिए घातक सिद्ध हुई थी और भारत विश्व चैंपियन बनते-बनते रह गया था. लेकिन 2011 के विश्वकप में उन्होंने जैसी गेंदबाजी की उसे प्रशंसक कभी भूल नहीं पायेंगे.

टीम इंडिया को विश्व विजेता बनाने में उनके 21 विकेटों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. वह कप्तान के गेंदबाज थे जब कभी कप्तान परेशानी में होते, तब वह गेंद जहीर के हाथों में थमा देते थे. जहीर ने भी अपने कप्तान को कभी निराश नहीं किया, उनकी ओवर दि विकेट से फेंकी अंदर आती यॉर्कर गेंदों को भुला पाना आसान नहीं होगा.

वह रिवर्स स्विंग की कला मे माहिर थे. अपनी रिवर्स स्विंग गेंदबाज़ी से वे अपने दौर के दिग्गज बल्लेबाज़ों को भी छकाने में कामयाब रहे. चोटों ने उनके करियर को समय से पहले खत्म कर दिया. बांय हाथ के सर्वश्रेष्ठ भारतीय तेज गेंदबाज के साथ-साथ विश्व के सर्वकालिक श्रेष्ठ गेंदबाज के रूप में उन्हें हमेशा याद किया जाएगा.