न्यायपालिका की आज़ादी से ज़्यादा जवाबदेही के ज़रूरत है

supreme courtक्या इस देश में गरीबों को अदालत से न्याय मिलना आसान है? इसका साधारण और सीधा जवाब है, नहीं. वजह साफ है कि देश की न्यायिक प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है या फिर इसे इतना उलझा दिया गया है कि लोग कोर्ट-कचहरी को न्याय का मंदिर नहीं बल्कि एक दलदल मानते हैं जिसमें कोई एक बार फंसा तो उसका निकलना मुश्किल हो जाता है. न्याय मिलने में देर तो होती ही है साथ ही यह महंगा भी है.

जो गरीब हैं वे कोर्ट कचहरी में होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकते हैं. यह कोई भ्रष्टाचार का मामला नहीं है बल्कि यही दस्तूर है, यही व्यवस्था है. इसका मतलब तो यह हुआ कि देश की 75 फीसदी आबादी जिनकी आय दो डॉलर प्रतिदिन से कम है, वह तो न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा ही नहीं सकता है. गरीब ही क्यों, अदालतों की व्यवस्था ऐसी है जो कि मध्यम वर्ग के लिए भी परेशानी का सबब है.

हक़ीकत तो यह है कि देश में कई लोगों ने कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसकर अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला. देश में शायद एक फीसदी लोग भी ऐसे नहीं हैं जो महंगे वकील की सेवा लेने की सामर्थ्य रखते हैं. मतलब यह कि देश में न्यायिक व्यवस्था गरीबों के लिए नहीं, बल्कि अमीरों के लिए है.

यही वजह है कि हमें एक तरफ सलमान ख़ान का उदाहरण देखने को मिलता है और दूसरी तरफ ऐसे हजारों लोगों की कहानी सुनने को मिलती है जो एक छोटे से जुर्म के आरोप में सालों से जेलों में बंद हैं और उन्हें जमानत तक नहीं मिल सकी. इसके अलावा न्यायिक व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार और अनैतिक क्रियाकलापों की खबरें भी आम हो गई हैं. अदालतों में पैसे का बोल-बाला है.

भ्रष्टाचार है. न्याय मिलने में देरी होती है. इसके अलावा भी न्यायिक व्यवस्था में कई खामियां और समस्याएं हैं जिन्हें अविलंब सुधारने की जरूरत है. न्यायपालिका को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में न्यायिक प्रक्रिया किस तरह जनता के लिए सुलभ, सरल, स्वतंत्र, निःशुल्क और शीघ्र उपलब्ध हो, लेकिन देश की सरकार और न्यायपालिका के बीच जजों की नियुक्तिके मसले पर महाभारत शुरू हो गई है.

यह विवाद तब शुरु हुआ जब जजों की नियुक्ति की नई व्यवस्था के लिए लाए गए 99वें संविधान संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बताकर निरस्त कर दिया. सुप्रीम कोर्ट की दलील यह है कि नई व्यवस्था न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विरुद्ध है. जो संविधान के बेसिक स्ट्रक्टर(आधारभूत ढांचे) के ख़िलाफ है इसलिए यह क़ानून असंवैधानिक है.

कोर्ट ने यह दलील दी है कि चूंकि, भारत में सिविल सोसाइटी का विकास नहीं हो पाया है इसलिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है. वर्तमान में जजों की नियुक्तिकॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है. इस कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के अलावा सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज होते हैं. जजों का यह पैनल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तिऔर ट्रांसफर की सिफारिशें करता है.

कॉलेजियम की सिफारिशों को मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. उनकी सहमति के बाद अंतिम फैसला लागू होता है. तकरीबन 20 सालों से कॉलेजियम सिस्टम के तहत जजों की नियुक्तिहो रही है.

इस सिस्टम को लागू करने के पीछे यह दलील थी कि जजों की नियुक्तिमें मुख्य न्यायाधीश की राय को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. इस सिस्टम में सरकार की भूमिका न के बराबर है. लेकिन इस प्रणाली पर निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे. मोदी सरकार ने सरकार बनाते ही राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तिआयोग की स्थापना की मुहिम तेज़ कर दी और इसके लिए क़ानून में संशोधन भी कर दिया.

नेशनल ज्यूडीशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (एनजेएसी) बिल (99वां संविधान संशोधन) के संसद में पास होने के बाद, उसे आधे से अधिक राज्यों की भी स्वीकृति भी मिल चुकी है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इस संवैधानिक संसोधन को असंवैधानिक करार देने से एक नई समस्या खड़ी हो गई. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सरकार तिलमिला उठी. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विवादों के घेरे में आ गया.

इस फैसले पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बिना किसी शक के बेसिक स्ट्रक्चर है, लेकिन उसके
अलावा भी संविधान के कई बेसिक स्ट्रक्चर हैं. जिन्हें इस फैसले में नजरअंदाज किया गया है. जटली के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने संविधान के एक बेसिक स्ट्रक्चर को बचाने के लिए पांच अन्य बेसिक स्ट्रक्चर को क्षति पहुंचाई है.

संसद के दोनों सदनों और 20 विधानसभाओं द्वारा पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तिआयोग(99वें संविधान संशोधन) विधेयक को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक बताना कोई सामान्य घटना नहीं है. यह न्यायपालिका और विधायिका में टकराव की स्थिति है.

यह स्थिति भारत के प्रजातंत्र के लिए हितकारी नहीं है. बड़े-बड़े क़ानूनविद बंटे हुए हैं. जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही बता रहे हैं उनका मानना है कि यदि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तिआयोग गठित हो जाता, तो इससे न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल असर पड़ता.

इससे जजों की नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ने की संभावना थी, क्योंकि इस आयोग का सचिवालय क़ानून मंत्रालय के अधीन काम करता. इससे सरकार के पक्ष में काम करनेवाले लोगों की जज के रूप में नियुक्तहोने की संभावना होती.

जजों की नियुक्ति का मामला हमेशा से विवादों में रहा है. पहले जजों की नियुक्तिसीधे सरकार करती थी और चीफ जस्टिस से इस मसले पर सिर्फ सलाह ली जाती थी. 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रणाली पर सवाल खड़ा किया. कोर्ट ने कहा कि संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अहम बताया गया है और जजों की नियुक्ति में सरकार का दखल उचित नहीं है. इसके बाद भारत में हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्तिके लिए कॉलेजियम प्रणाली बनी.

जजों का पैनल या कॉलेजियम जजों के नाम तय कर सरकार के पास भेजता है और सरकार को इसे मानना पड़ता है. सरकार सिर्फ इस प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकती है. लेकिन, यदि कॉलेजियम नियुक्ति पर सर्वसम्मत फैसला सुनाता है, तो सरकार इसके निर्णय को मानने के लिए बाध्य होती है. इस प्रणाली के तहत जजों की नियुक्तिके मामले में न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्रता है.

कई क़ानूनविद ऐसे भी हैं जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाखुश हैं. उनका कहना है कि दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में कॉलेजियम सिस्टम के जरिए जजों की नियुक्ति नहीं होती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही बताने वालों में भी ऐसे कई क़ानूनविद हैं जो जजों की नियुक्तिकी मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली को भी पारदर्शी नहीं मानते हैं और उसमें बदलाव चाहते हैं.

उनका मानना है कि इस प्रक्रिया के कारण जज अपने चहेतों को जज नियक्ुत करते हैं. इस प्रणाली में भी बदलाव की जरूरत है, क्योंकि जज ही जज की नियुक्तिनहीं कर सकते हैं. अब सवाल यह है कि क्या प्रजातंत्र में किसी संस्था का निरंकुश होना उचित है या नहीं. प्रजातंत्रिक व्यवस्था जनता द्वारा संचालित व्यवस्था है, इसके साथ ही यह एक जवाबदेह व्यवस्था है. इसमें हर संस्था का जवाबदेह होना लाज़मी है.

संविधान और स्वतंत्रता की आड़ में कोई संस्था या व्यक्ति यह नहीं कह सकता है कि वह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. यहां समझने वाली बात यह है कि प्रजातंत्र में जनता ही सर्वोच्च है,वही मालिक है. रही बात व्यवस्था या प्रणाली की तो वह समय, काल और जरूरत के हिसाब से बदली जा सकती है. लेकिन जब तक देश प्रजातंत्र है तब तक सभी सरकारी संस्थाओं को जनता के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा. चाहे वह विधायिका हो, कार्यपालिका हो या फिर न्यायपालिका. सबकी जवाबदेही है और यही प्रजातंत्र की मूल भावना है.

सुप्रीम कोर्ट का सरकार द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तिआयोग को असंवैधानिक करार दिया जाना कई सवाल खड़े करता है. जहां तक बात संविधान में जजों की नियुक्तिके प्रावधान की है तो आर्टिकल 124 में यह साफ लिखा है कि न्यायाधीशों की नियुक्तिराष्ट्रपति करेंगे और नियुक्तिसे पहले राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट की या वह जिनकी चाहेंगे उनकी राय लेंगे. संविधान ने जजों की नियुक्तिकी शक्ति सिर्फ राष्ट्रपति को दी है.

दूसरी बात यह कि, यदि सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी को असंवैधानिक करार दिया है, तो उसे यह भी बताना पड़ेगा कि सरकार का यह प्रस्ताव संविधान के किस अनुच्छेद के विरुद्ध है. सुप्रीम कोर्ट ने अगर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तिआयोग को असंवैधानिक करार दिया है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि संविधान किस अनुच्छेद, किस धारा में कॉलेजियम प्रणाली का उल्लेख है.

जिस संस्था का संस्थान में उल्लेख नहीं है वह व्यवस्था संवैधानिक कैसे हो सकती है? सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताना चाहिए था कि कॉलेजियम प्रणाली की निष्पक्षता और पार्दशिता को लेकर जो आरोप हैं उसका क्या हल है? कॉलेजियम प्रणाली पर उठी शंकाओं का क्या निदान है?

दुनिया के किसी भी देश में जज ही जजों की नियुक्ति नहीं करते हैं. यह सिर्फ भारत में होता है. फ्रांस में न्यायपालिका की आजादी पर कोई विवाद नहीं है. वहां न्यायपालिका को ज्यूडीशियल सर्विस के जरिए संचालित किया जाता है. फ्रांस का सिस्टम सबसे ज्यादा पारदर्शी, ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) और जवाबदेह है. इंग्लैंड में न्यायपालिका में कार्यरत लोगों के बीच से ही सरकार जजों का चुनाव करती है, लेकिन अमेरिका में कोई भी व्यक्तिजज बन सकता है, यह जरूरी नहीं कि उसके पास न्यायपालिका का कोई अनुभव हो.

दुनिया के किसी भी देश में जज स्वयं जजों की नियुक्तिनहीं करते हैं तो क्या उन सभी देशों में न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं है? यहां समझने वाली बात यह है कि कई सालों से ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस (अखिल भारतीय न्यायिक सेवा) के सृजन की मांग हो रही है. कई लोगों का मानना है कि न्यायपालिका में भारी बदलाव की जरूरत है. कई लोगों ने यह सुझाव भी दिया है कि ऑल इंडिया सर्विसेज की तर्ज़ पर न्यायपालिका के लिए भी ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस बने.

जजों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग(यूपीएससी) जैसी संस्था द्वारा हो. नियुक्तिकी शुरुआत एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश) से हो. चयनित व्यक्तिवहां से अपनी काबिलियत और वरीयता के आधार पर हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बनें. लेकिन इस सुझाव को हर बार न्यायपालिका की आजादी की दलील की आड़ में ताक पर रख दिया जाता है.

ऐसे सही बात तो यह है कि जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने के लिए एक स्वतंत्र आयोग का गठन हो, जो सरकार और जजों के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्तहो. जजों की नियुक्तिको पारदर्शी बनाने के लिए मानक तय किए जाने चाहिए. जिस तरह अखिल भारतीय सेवाओं (ऑल इंडिया सर्विसेज) के लिए प्रतियोगी परीक्षायें आयोजित होती हैं उसी तरह न्यायिक सेवाओं के लिए भी परीक्षा हो ताकि मेधावी छात्र-छात्राओं को मौक़ा मिल सके.

हक़ीकत यह है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि उसकी जवाबदेही तय नहीं हो, और जज ही जज की नियुक्ति करें. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सही मतलब न्याय की प्रक्रिया में जज स्वतंत्र हों, बिना किसी बाहरी प्रभाव के जज अपना फैसला दें, अदालतों में भ्रष्टाचार न हो. न्याय प्रक्रिया में पैसे और प्रभाव का खत्म होना ही सही आजादी है. पैसे लेकर काम करवाने और बड़े-बड़े वकीलों के प्रति पक्षपात बंद हो.

अमीर और ग़रीब के लिए अदालत समान भाव से फैसला सुनाए, यही न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आत्मा होनी चाहिए. जनता का न्यायिक प्रक्रिया के प्रति आदर और भरोसा मजबूत होना ही न्यायालय की सबसे बड़ी जीत है.

न्यायिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत है. न्यायिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की जरूरत है. जजों की नियुक्ति से ज्यादा देश के श्रम न्यायालय (लेबर कोर्ट) की दिशा और दशा बदलने को प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि जिला स्तर और उससे नीचे की न्यायिक व्यवस्था निराशाजनक है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎