आतंकवाद की नई चुनौती

jammuआज पूरा विश्व आतंकवाद से पीड़ित है. अलग-अलग देशों में आतंकवादी गतिविधियों के पनपने के अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर यह प्रतिशोध की भावना से शुरू होती है. बाहरी शक्तियों के समर्थन और धन की बदौलत ये आतंकवादी गतिविधियां किसी देश और सरकार के लिए भस्मासुर बन जाते हैं. विश्व के ऐसे कई देश हैं, जो निजी स्वार्थों की सिद्धि के लिए आतंकवादियों का साथ लेते रहे हैं. अमेरिका ने शासक बदलो की नीति चलाई, जिसके तहत इराक का युद्ध हुआ और सद्दाम को मौत के घाट उतारा गया.

सीरिया में भी अमेरिका उसी नीति पर चल रहा है और राष्ट्रपति असद की सरकार को अपदस्थ करना चाहता है. जब सीरिया में हिंसा भड़की तो अमेरिका ने पहले इन आतंकवादियों की सहायता की, इस उम्मीद में कि वे राष्ट्रपति असद की सरकार को अपदस्थ करने में सफल होंगे. धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो गया कि ये शक्तियां राष्ट्रपति असद से भी अधिक खतरनाक हैं. विडंबना देखिए कि आनेवाले समय में यही देश उन आतंकियों के हिंसक वारदातों के सबसे ज्यादा भुगतभोगी भी हुए और वही आतंकी उन देशों के लिए भस्मासुर बन गए. पाकिस्तान ने भी आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति का प्रमुख अंग बनाया.

जम्मू-कश्मीर हथियाने के मामले में हर ओर से जब उसके सारे प्रयास नाकाम हो गए तो उसने आतंकवाद का सहारा लिया और भारत के विरुद्ध अघोषित युद्ध शुरू किया. रूस को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने भी आतंकवादियों को साथ लिया, जो बाद में उसके गले की फांस बन गए. इन देशों की इन नीतियों का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे आतंकवाद विश्व भर में फैलकर 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती बन गया.

साल 2015 बीत चुका है. इस साल में दुनिया के कई देशों में आतंकवाद ने अपने पैर पसारे. चिंता की बात यह है कि आतंकवाद साल 2016 की शुरुआत में ही और भी विभत्स रूप में सामने आया है. अभी तक आतंकी शक्तियां अदृश्य होती थीं, उनका कोई निश्चित ठौर-ठिकाना नहीं होता था. वे छिपकर काम करती थीं. मारकर भाग जाना उनकी रणनीति थी. लेकिन आईएसआईएस के सामने आने के बाद आतंकवाद का रंग-रूप तथा रणनीति पूरी तरह से बदल गई है. आतंकवादियों का यह समूह अपने को स्टेट की संज्ञा देता है, यानी वह अब देशों पर कब्जा जमाकर उन पर शासन करना चाहता है.

तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन स्थापित किया था, लेकिन कभी उसने खुद को स्टेट नहीं घोषित किया.आतंकवादी अन्य देशों का शह पाकर सीरिया और इराक में खुले रूप से वहां की सरकारों को चुनौती दे रहे हैं. यही कारण है कि आईएस इन दोनों देशों को अपने कब्जे में लेने के बाद वह धीरे-धीरे दुनिया के अन्य देशों में भी अपना आधिपत्य जमाने का प्रयास कर रहा है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या यह आतंकी या आतंकी संगठन उन देशों की महत्वाकांक्षाओं के परिणाम हैं, जिन्होंने इन आतंकियों को अपने निजी स्वार्थों की सिद्धि में कभी प्रयोग किया था? क्या पूरा विश्व आज आतंकवादी गतिविधियों से परेशान है, इसलिए आज आतंकवाद के खिलाफ ये देश एकजुट हो चुके हैं या होने का प्रयास कर रहे हैं? क्या विश्व के अधिकांश देश आतंक से पीड़ित हैं? क्या विश्व अब आतंकवाद को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रहा है? पिछले कुछ महीनों से पश्चिमी देश आतंकवाद को लेकर हमलावर हैं.

यह हमला कभी वक्तव्यों से हो रहा है तो कभी घातक हथियारों से तो कभी उन आतंकवादियों को दुश्मन देश के खिलाफ सपोर्ट कर के. अमेरिका हो या ब्रिटेन या फिर फ्रांस या रूस, ये देश लगातार आईएसआईएस पर हमला कर रहे हैं. इन देशों का कहना है कि वे आतंकवाद को खत्म कर के ही सांस लेंगे. लेकिन ये देश सचमुच आतंकवाद को लेकर गंभीर हैं, इसे लेकर निष्कर्ष पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि आईएस जो हथियार अपनी लड़ाई में प्रयोग में ला रहा है, वे हथियार इन देशों में ही बने हुए हैं.

आतंकवादियों के हमले से भारत भी अन्य देशों की तरह ही परेशान है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरा भारत आतंकी वारदातों से भय के साये में है. आतंकवादी वारदातों में संसद भवन पर हमले का नाम सबसे ऊपर आता है. दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, अजमेर, जयपुर, मालेगांव, वाराणसी, हैदराबाद जैसे देश के विभिन्न शहरों में अनगिनत हमलों का दंश देश झेलता आ रहा है. पिछले दिनों भारत में पठानकोट हमला हुआ. भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हुए इस हमले के पाकिस्तान कनेक्शन के कुछ सबूत पाकिस्तान के हुक्मरानों को सौंपे.

पहली बार भारत के सबूतों पर पाकिस्तान भी एक्शन में दिखा और अपने यहां कुछ प्रमुख आतंकियों की गिरफ्तारियां कीं. एक बात यहां गौर करने लायक है, वह यह कि अक्सर यह सुनने में आता है कि आतंकवाद से भारत और पाकिस्तान दोनों देश प्रभावित हैं. सवाल यह उठता है कि क्या यह सत्य है. क्या सचमुच पाकिस्तान भी आतंकवाद से परेशान है? क्या अपनी परेशानी के कारण ही वह आतंकवाद को लेकर अपनी गंभीरता दिखा रहा है या यह सब अंतर्राष्ट्रीय दबावों का असर है? क्योंकि हाल ही में अमेरिका ने भी पाकिस्तान को लेकर सख्ती दिखाई है.

हमारे सामने एक नया सवाल यह है कि क्या जिस तरह से पिछले दिनों पूरा विश्व आतंकवाद के खिलाफ एकजुट दिखा, लगातार आतंकियों पर कार्रवाइयां हुईं और आज भी हो रही हैं, क्या उसकी प्रतिक्रिया में ही ये आतंकी एकजुट होकर आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं. कोई न कोई दिन ये आतंकवादी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे रहे हैं, क्योंकि पिछले एक महीना में आतंकवादियों ने जिस तरह से आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया है, वह तो इसी तरफ इशारा कर रहा है. और दूसरी बात यह कि हाल के दिनों में आतंकवादियों ने अपने समूह बनाने की तरफ भी इशारा किया है और कइयों ने ऐसे समूहों को अंजाम दे भी दिया है. हाल के दिनों में जो आतंकवादी घटनाएं घटी हैं, आइए हम उनपर एक नजर डालते हैं.

पिछले दिनों इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में कई जगह हमला हुआ. इन धमाकों में कम से कम छह लोग मारे गए हैं. हमला उस जगह हुआ, जहां बड़े शॉपिंग सेंटर, कई देशों के राजनयिक कार्यालय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर हैं. जिस थामरिन स्ट्रीट में हमला हुआ, वह स्थान संयुक्त राष्ट्र के दफ़्तर और दूतावासों के बेहद क़रीब है. साल 2009 में जकार्ता के रिट्ज और मैरियट होटल पर हुए बम धमाके के बाद जकार्ता में यह पहला बड़ा हमला है.

तुर्की में भी आतंकियों ने कार में बम धमाका किया है. यहां बम धमाके में 5 लोगों की मौत हो गयी है, जबकि 39 लोग घायल हो गये हैं. पाकिस्तान के क्वेटा के एक पोलियो सेंटर के पास यह बम धमाका हुआ है, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हो गए. कहा जा रहा है कि यह धमाका इसलिए हुआ, क्योंकि दहशत पैदा करने वाले नहीं चाहते कि पोलियो अभियान चलाया जाये.

आतंकियोें को शक है कि पोलियो कार्यकर्ता जासूस हैं.अफगानिस्तान के पूर्वी शहर जलालाबाद में पिछले दिनों भारतीय वाणिज्य दूतावास के पास एक बम धमाका हुआ. बम धमाका भारतीय वाणिज्य दूतावास से 200 मीटर दूर हुआ और इसमें कम से कम तीन पुलिसकर्मियों के मारे जाने की सूचना है. हालांकि इस धमाके में किसी भारतीय के हताहत होने की सूचना नहीं है.

इससे पहले तीन जनवरी को मजार ए शरीफ में आतंकियों ने भारतीय कांसुलेट में घुसने का प्रयास किया था. इन घटनाओं के अतिरिक्त फ्रांस की राजधानी पेरिस में आतंकी घटना हुई. साल खत्म होते-होते पेरिस ने एक और आतंकी हमला देखा, जिसने 130 से ज्यादा लोगों की जान ले ली. फ्रांस की राजधानी पेरिस में अज्ञात बंदूकधारियों ने व्यंग्य-पत्रिका शार्ली एब्दो के दफ्तर पर हमला किया था. इस हमले में 12 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

इस हमले में 9 पत्रकार और 2 पुलिसकर्मी भी मारे गए थे. शार्ली एब्दो पत्रिका के संपादक स्टीफन चारबोनियर की भी हमले में मौत हो गई थी. पत्रिका काफी समय से अपने कथित इस्लाम विरोधी कंटेंट की वजह से कट्टरपंथियों के निशाने पर थी. रशियन एयरलाइन मेट्रोजेट की उड़ान संख्या केजीएल 9268 मिस्र में क्रैश हो गई थी. विमान हादसे के कुछ घंटे बाद ही आईएसआईएस ने दावा किया कि रूस के यात्री विमान को उसी ने मार गिराया है. फ्रांस में 2015 में कुल छह हमले हुए.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यमन की लड़ाई में तकरीबन 5000 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लोग जख्मी हुए. हवाई हमला और बमबारी के चलते नागरिक अधिक हताहत हुए. इस संघर्ष के चलते 10,000 लोग अपने घरों को छोड़ कर चले गए. यमन में लगातार संकट बना रहा और सरकार समर्थित सैनिकों और हूती विद्रोहियों के बीच शुरू हुईं झड़पों में आम आदमी मारे गए.

जिन आतंकी हमलों के बारे में बताया गया, वे महज कुछ दिनों के अंदर हुए. सही मायने में देखा जाए तो हाल के दिनों में आतंकियों की एकजुटता पूरे विश्व के लिए एक चुनौती बन कर उभरी है. आतंकवादियों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना ही सबसे बेहतर विकल्प है, तभी इस चुनौती से हम पार पा सकते हैं. प

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