नर्क की तरह पसरते अतिक्रमणकारियों के ठेंगे पर प्रशासन : नदी-नालों और तालाबों पर बस रहे हैं लोग

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gonda-ke-yetihasik-ramllelaदेवीपाटन मण्डल का गोण्डा जिला अपने आप में अनूठा जिला है. नियम कानून यहां बौने दिखते हैं, अधिकारियों के चेहरे पर लाचारी झलकती है और अतिक्रमणकारियों का यहां बोलबाला है. यहां पर होने वाले निर्माण पर यदि गौर करें तो जानकर आश्चर्य होगा. पुराने और जर्जर जानलेवा हो चुके भवनों का यहां कोई पुरसानेहाल नहीं है. दूसरी तरफ आज भी बिना नक्शा पास कराए ही तमाम निर्माणाधीन भवनों के बारे में प्रशासनिक अधिकारी खोज-खबर लेना मुनासिब नहीं समझते हैं.

आलम यह है कि यहां नियम कानून को दरकिनार कर तमाम नई-नई कालोनियां बन गईं और ये कालोनियां बंजर भूमि, कृषि योग्य भूमि पर तो बसाई ही गईं साथ ही साथ नदी, तालाबों, नालों, शवदाह स्थल और मैदानों पर भी नए-नए आलीशान भवनों वाली कालोनियां शोभायमान हैं. अतिक्रमणकारियों ने प्रशासनिक प्रक्रिया को दरकिनार कर प्रशासन को बौना साबित कर यह निर्माण करा लिया है, जिसका विरोध करने का साहस किसी में नहीं है.

अतिक्रमणकारियों के इसी हौसले के चलते भले ही सरकारी कागजों में भूमि का स्वरूप कहीं नदी, नाला, तालाब, श्मशान तो कहीं चारागाह, पटरी और मैदान दर्ज हो, लेकिन मौके पर यह सब कुछ नहीं है, वहां लोग मकान बनाकर निवास कर रहे हैं. प्रबुद्ध वर्ग इसका कई बार विरोध भी कर चुका है और चुटकी लेते हुए उनसे यह सुना भी जा सकता है कि जिले में तमाम लोग नदी, नाला, तालाबों में रहते हैं.

भूमिधरी पर गौर करें, तो शहर में पालिका सबसे बड़ी भूमिधरी है, लेकिन अपनी भूमि के सुरक्षा के मामले में पालिका की एक दशक बाद भी कुम्भकर्णी नींद नहीं खुल पाई है. नजूल की भूमि का मालिक जिलाधिकारी होता है, लेकिन गोण्डा में नजूल की भूमि का मालिक अतिक्रमणकारी हो गए हैं, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है. यही हाल लोक निर्माण विभाग का भी है जिसको अपनी पटरियों की कोई चिंता नहीं है. तमाम स्थानों पर पटरियों पर पक्के मकान बना लिए गए हैं.

उदाहरण के लिए बादशाहबाग के निकट तमाम लोग पटरियों पर कब्जा कर रह रहे हैं और उन लोगों ने पुख्ता मकान बना लिए हैं. यही हाल गोण्डा-उतरौला मार्ग पर भी है. नवीन सब्जी मण्डी के सामने पटरियों पर तमाम अवैध निर्माण करा कर उससे अतिक्रमणकारी आय जुटाने में लगे हैं. नवीन गल्ला मंडी और शहर के पॉश इलाकों में भी अतिक्रमण का बोलबाला है, लेकिन न तो नगर प्रशासन और न ही लोक निर्माण विभाग इसे खाली कराने के प्रति संजीदा है. इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है.

नई कालोनियों पर गौर करें, तो बहराइच रोड स्थित मवैया तालाब, शहर के मध्य स्थित सगरा तालाब, आईटीआई के निकट स्थित विपता तालाब, शहर स्थित पाण्डेय तालाब, विष्णुपुरी कालोनी के निकट स्थित भुतहा तालाब समेत तमाम ऐसे तालाबों पर अतिक्रमण कर लिया गया या फिर उनको पाटकर उन पर नई-नई कालोनियां बस गईं. यहीं नहीं, जिले से गुजरने वाली टेढ़ी नदी पर भी भवनों का निर्माण कर लिया गया और अतिक्रमण का आलम यह है कि ऐतिहासिक नदी का अस्तित्व अतिक्रमणकारियों के चलते समाप्त होने के कगार पर है. जिलाधिकारी आवास के बगल में चंद मीटर की ही दूरी पर मण्डेनाला स्थित है जिस पर बहुत पुराना पुल बना हुआ है.

बसपा शासन में जहां मण्डेनाला के आंशिक भाग पर कब्जा कर कालोनी का निर्माण करा लिया गया वहीं शेष भाग पर अब अतिक्रमण कर लिया गया है. दिलचस्प बात तो यह है कि जिलाधिकारी अजय कुमार उपाध्याय समेत तमाम अधिकारी प्रतिदिन इसी रास्ते से होकर अपने कार्यालय और आवास जाते हैं, लेकिन इस वीभत्स अतिक्रमण के बारे में जानकारी लेने या कार्रवाई करने के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते. सब समय काट कर खिसक लेना चाहते हैं. और तो और यहां भवन नियमानुसार बन रहे हैं कि नहीं, इनका नक्शा पास है या नहीं इस पर भी किसी अधिकारी को जानकारी लेने की फिक्र नहीं है.

इससे राजस्व को भी भीषण नुकसान पहुंच रहा है, लेकिन सरकारी नुमाइंदों को ही इसकी चिंता नहीं है. भुतहा ताल के इर्द-गिर्द लोग शवों का अंतिम संस्कार करते थे, लेकिन आज उस भूमि पर भवनों का निर्माण हो चुका है और वहां पर शवों का अन्तिम संस्कार करने आने वाले लोगों को अन्यत्र भटकना पड़ता है. इस पर भी प्रशासन ने ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी. अजीबोगरीब बात यह है कि लाशों के संस्कार की जगह पर लोग रह रहे हैं और उन्हें भूत-प्रेत का कोई डर नहीं है, लेकिन प्रशासन को कार्रवाई करने में भूत-प्रेत का डर जरूर लगता है. इस डर के कारण प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई तो दूर इस मसले पर बोलने से भी कतराते हैं.

बयान देने में हर्ज क्या है
आए दिन गोण्डा शहर में अधिकारियों को अतिक्रमण का सामना करना पड़ता है, फिर भी वे उस पर कार्रवाई नहीं करते और अपना कार्यकाल पूरा करके चले जाते हैं. अतिक्रमण तो सबको दिखता है और उसी बीच से वे गुजरते और घूमते-फिरते भी हैं. लेकिन कार्रवाई करने को लेकर किसी भी अधिकारी में कोई चिंता नहीं है. इस चिंता के पीछे की वजह भ्रष्टाचार है, और कुछ नहीं. एक अधिकारी ऐसे भी मिले, जो इस मसले पर बयान देने को राजी हुए.

चलिए कोई अधिकारी कम से कम बयान देने पर तो राजी हुआ. अपर जिलाधिकारी त्रिलोकी सिंह कहते हैं कि कागजों पर दर्ज भूमि का प्रकार यदि मौके पर परिवर्तित हो गया है तो यह गलत है. माननीय न्यायालय और शासन स्तर से निर्देश है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाए. ऐसे स्थानों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाएगी. इसके लिए प्रशासन की जिम्मेदारी है और वह ऐसी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र भी है. कार्रवाई कब शुरू होगी, इस सवाल पर उन्होंने कोई स्पष्ट योजना नहीं बताई.

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