लोकतंत्र को तुम क्या जानो करन जौहर!

karanजयपुर के डिग्गी पैलेस में एक बार फिर से साहित्य का सबसे बड़ा मीना बाजार सजा. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस साल भी विवाद का धुआं उठाने की भरसक कोशिश की गई, लेकिन इस बार विवादों में वो तीव्रता देखने को नहीं मिली. बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जो असहिष्णुता नेपथ्य में चली गई थी, उसको एक बार फिर से हवा देने की कोशिश की गई. देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़े किए गए. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले ही दिन एक सत्र में फिल्मकार करन जौहर ने लेखिका शोभा डे के साथ बातचीत में देश के माहौल के बारे में टिप्पणी कर दी. अपनी जीवनी अनसुटेबल ब्यॉय पर बात करते हुए करन जौहर देश में असहिष्णुता का माहौल बताने वाले की फेहरिश्त में अपना नाम भी लिखवा दिया.

करन ने व्यंग्यात्मक लहजे में ये कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है. करन जौहर इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने यहां तक कह दिया कि लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है. करन के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है. करन ने उत्साह में यहां तक कह दिया कि उन्हें हमेशा ये लगता रहता है कि कोई नया एफआईआर उनके खिलाफ होने वाला है.

दरअसल, करन जौहर जब ये कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जोक है और लोकतंत्र मजाक तो वो खुद को एक्सपोज करते हैं. करन एक बेहतर फिल्मकार हैं, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि वो देश की राजनीति और लोकतंत्र को भी उतने ही बेहतर ढंग से समझ सकें. बहुधा ये माना जाता है कि कलाकार भावुक होता है, संभव है कि करन जौहर उसी भावुकता में बचकानी बातें कर रहे हों.

करन जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजाक बता रहे हैं, वही उनको कुछ भी बोलने की आजादी दे रहा है. इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है कि आप एक मंच पर सार्वजनिक तौर पर अपने देश के लोकतंत्र के बारे में उल्टी-सीधी बातें कर पाएं और फिर भी आप बगैर किसी विरोध आदि के वहां से निकल जाएं.

करन जौहर साहब आपको देश का लोकतंत्र मजाक लगता होगा, लेकिन उन लोगों से पूछिए, जो इस लोकतंत्र को जी रहे हैं या इस लोकतंत्र ने जिनको गुलामी के दलदल से बाहर निकालकर जीने का मौका दिया. उन लोगों से समझिए, जिनको इसी लोकतंत्र ने बेहतर जीवन जीने का माहौल दिया है और जीने की ताकत दी है.

मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होने वालों को हो सकता है कि देश का लोकतंत्र मजाक लगता हो, लेकिन उन करो़डों वंचितों-शोषितों से पूछिए कि उनके लिए लोकतंत्र के क्या मायने हैं. रही बात अभिव्यक्ति की, आजादी की, तो हमारी समझ में एक बात नहीं आती है कि जब इन फिल्मी कलाकारों की कोई किताब या फिल्म आती है, तभी असहिष्णुता और बोलने की आजादी जैसी बातें क्यों याद आती हैं. करन की जीवनी छपी तो उनको लोकतंत्र मजाक लगने लगा और अभिव्यक्ति की आजादी जोक. इसी तरह जब शाहरुख खान की फिल्म दिलवाले आने वाली थी, तब उनको देश का माहौल ठीक नहीं लगने लगा था.

आमिर खान की फिल्म दंगल के पहले तो उनकी पत्नी को इतना डर लगने लगा कि वो देश छोड़ने की बात करने लगीं. इन फिल्मी सितारों को लगता है कि विवाद उठाकर वो चर्चित हो जाएंगे और उसका सकारात्मक असर उनके प्रोड्क्ट पर पड़ेगा. शाहरुख को ये देश चाहे कितना भी असहिष्णु लगे, फिर भी उनकी फिल्म यहां करीब डेढ़ सौ करोड़ का बिजनेस करती है.

आमिर की पत्नी भले ही भारत छोड़कर जाने के बारे में बात करती हों, लेकिन उसी आमिर खान को देश की जनता बेइंतहां मोहब्बत करती है और उनकी फिल्म तीन सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का बिजनेस करती है. जब करन जौहर की जीवनी आई है, तो उनको भी लगा कि विवाद बगैर किताब हिट नहीं हो सकती है, लिहाजा उन्होंने राग असहिष्णुता छेड़ दिया. ये तो भविष्य के गर्भ में है कि इस विवाद से उनको किताब की बिक्री में कितना फायदा होता है. ये तो चलिए विवाद पैदा कर लाभ की अपेक्षा रखने वाले लोग हैं, लेकिन उनके साथ सियार की तरह सुर में सुर मिलाकार हुआ-हुआ करने वालों का क्या.

उनको न तो कोई फायदा होता है और न ही उन्हें कुछ हासिल होता है, बस थोड़ा प्रचार मिलता है. लेकिन इतने वर्षों से देश को आहत भावनाओं का गणतंत्र बताने वाले इन विद्वानों को यह नहीं समझ आ रहा है कि हमारे समाज का ताना बाना इतना मजबूत है कि एक दो छिटपुट घटनाओं से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है. लेकिन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कोई विवाद न हो यह अब संभव नहीं लगता है.

हाल के दिनों में ये देखने को मिला है कि लिटरेचर फेस्टिवल आदि में एक दो सत्रों में साहित्यिक विमर्श की बजाए विवाद पर ज्यादा जोर रहता है, सत्रों के विषय और वक्ताओं का चयन उसको ध्यान में रखकर किया जाता है. इन आयोजनों के कर्ताधर्ताओं को लगता है कि विवाद सफलता का इंस्टेंट मंत्र है. दिल्ली में हुए एक लिटरेचर फेस्टिवल में भी कई विवाद उठाने की कोशिश हुई थी.

कांग्रेस के नेता पी चिदंबरम ने सलमान रुश्दी की किताब पर भारत में लगे बैन को उचित नहीं माना था. जब उस किताब के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब चिदंबरम देश के आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री थे, तब उनके विचार सामने नहीं आए थे. प्रेमचंद ने कहा ही है कि सिर्फ मूर्ख और मृतक अपने विचार नहीं बदलते हैं.

लिहाजा, सबको विचार बदलने का हक है. इसी तरह से दलित चिंतक और विचारक कांचा इलैया ने भी कह दिया था कि सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो भारत भी पाकिस्तान की राह चलता और देश में लोकतंत्र अबतक खत्म हो गया होता. दरअसल, इस तरह के आयोजनों में कुछ भी कहने की छूट होती है.

जैसे कांचा इलैया ने तो यह भी कह दिया था कि सरदार पटेल यह नहीं चाहते थे कि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर भारतीय संविधान लिखें. इलैया के मुताबिक पटेल चाहते थे कि कोई व्यक्ति, जो मनुस्मृति को मानता हो, वही संविधान लिखे. कांचा इलैया के ऐसा कहने का आधार सिर्फ इतना था कि पटेल हिंदू महासभा के करीब थे. इन साहित्यिक आयोजनों को नजदीक से देखने वाले मेरे एक मित्र का मानना है कि लिटरेचर फेस्टिवल अब साहित्य के विमर्श का स्थान नहीं, बल्कि विवादों का अखाड़ा बन गया है.

बेंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल में भी यही हुआ था. वह आयोजन भी साहित्येत्तर कारणों से ही चर्चा में रहा. चर्चा में रहने की वजह से लिटरेचर फेस्टिवल का बाजार बनता है. बाजार बनता है तो उसमें प्रायोजक आते हैं, प्रायोजक आते हैं तो फिर मुनाफा होता है. मुनाफे की चाहत में कई आयोजकों को लगने लगा है कि विवाद के बगैर लोकप्रियता और फिर प्रायोजक मिलने में आसानी होती है. देश में होने वाले तमाम लिटरेचर फेस्टिवल के सामने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का ही उदाहरण होता है.

विवादों और जयपुर लिट फेस्ट का चोली-दामन का साथ रहा है. पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले आयोजित लिट फेस्ट में सलमान रुश्दी के जयपुर आने को लेकर जबरदस्त विरोध हुआ था और अंतिम समय में सलमान की भारत यात्रा रद्द हुई थी. दो साल पहले पूर्व पत्रकार और आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष और आशीष नंदी के बीच एक सत्र में दलितों पर की गई टिप्पणी को लेकर जमकर विवाद हुआ था. कई दिनों तक टेलीविजन चैनल पर घंटों बहस हुई थी. हर बार मामला कोर्ट कचहरी से लेकर थाने और धरना प्रदर्शन तक पहुंचा है.

आशुतोष और आशीष नंदी का विवाद तो सुप्रीम कोर्ट से निबटा. इन विवादों की वजह से ही जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पूरी दुनिया में चर्चित हुआ है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की आयोजक नमिता गोखले इस बात पर अफसोस करती हैं कि गंभीर विमर्श हमेशा से एक-दो विवादों के बीच दब जाता है. नमिता गोखले ने एक बार बातचीत में मुझसे कहा था कि लिट फेस्ट एक ऐसा मंच होना चाहिए, जहां साहित्य और उसकी समकालीन प्रवृत्तियों पर गंभीरता से विमर्श हो.

दुनियाभर के लेखक और विचारकों के बीच साहित्य पर चिंतन हो, जिसका फायदा पाठकों को मिल सके, लेकिन शायद उनको इस बात का एहसास नहीं है कि देश में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल विवादों को अपनी सफलता का मंत्र मानते हैं. हमारा मानना है कि विवादों से कोई आयोजन चर्चित तो हो सकता है, लेकिन उसकी प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है कि वहां गंभीर चिंतन और विमर्श हो.