मोदी का किसान

भला इससे बड़ा देशद्रोह और क्या होगा कि सरकार चलाने वाली पार्टी के नेता किसानों की आत्महत्या को फैशन करार देने लगें. भाजपा सांसद गोपाल शेट्टी के इस शर्मनाक बयान पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उसे पार्टी से निष्कासित करना तो दूर, उस तऱफ ध्यान तक नहीं दिया. वहीं दूसरी तऱफ भाजपा का किसान प्रेम अचानक जाग उठा है. विभिन्न राज्यों में उसकी किसान रैलियां हो रही हैं, नीतियों की घोषणाएं हो रही हैं. भाजपा का किसान प्रेम, किसान रैलियां एवं सरकारी योजनाएं आदि राहुल गांधी और विपक्ष के हमलों का राजनीतिक जवाब तो हो सकते हैं, लेकिन किसानों के  जीवन में खुशियां नहीं ला सकते. आज किसानों के  सामने जो यक्ष प्रश्न है, उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान भी नहीं जाता. किसानों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती खेती नहीं, पैदावार नहीं, बल्कि ज़िंदा रहने की जद्दोजहद है. सरकारों की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा यह है कि बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और उसके लिए कोई ज़िम्मेदार तक नहीं ठहराया जाता. यह कैसा देश है, जहां हजारों करोड़ रुपये का ऋृण लेने वाले लोग ऐशोआराम की ज़िंदगी जीते हैं, लेकिन स़िर्फ पचास हज़ार रुपये का ऋण लेने वाले किसान को आत्महत्या करनी पड़ती है. यदि सरकार को किसानों की जरा भी चिंता है, तो उनकी आत्महत्या के प्रति राज्य एवं ज़िला स्तर के अधिकारियों को जवाबदेह बनाना होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किसान प्रेम तब तक बेमानी है, जब तक देश का किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर है, दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर है, खेती छोड़ने के लिए मजबूर है और पलायन के लिए मजबूर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को लेकर कुछ नीतियों की घोषणा की है, जिन्हें समझना ज़रूरी है.

farmerसरकार बनने के 21 महीने बाद मध्य प्रदेश के सिहोर में एक किसान रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के लिए कुछ नीतियों की घोषणा की. इसमें उनकी नज़र किसानों की समस्याओं के समाधान से ज़्यादा राजनीति पर टिकी थी. उन्होंने पिछली सरकारों की कमियां गिनाईं, कृषि क्षेत्र में मध्य प्रदेश सरकार की सफलताएं गिनाईं और किसानों के लिए कई योजनाओं के बारे में खुलासा किया, जिनमें फसल बीमा योजना, सॉयल हेल्थकार्ड और जैविक खेती को ऐतिहासिक बताया गया. इसके अलावा उन्होंने कृषि को तकनीक और बाज़ार से जोड़ने की बात भी कही. बहरहाल, बजट आने वाला है. यह मोदी सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी है. इस बजट से यह तय होगा कि मोदी सरकार के एजेंडे में देश के ग़रीब और आत्महत्या को मजबूर किसान हैं अथवा नहीं? या फिर इस सरकार ने स़िर्फ और स़िर्फ कॉरपोरेट्‌स एवं उद्योगपतियों के लिए तिजोरी खोल रखी है.

भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह बात बेमानी है और स़िर्फ लेखों में लिखने की लाइन बन गई है. ऐसा इसलिए, क्योंकि कृषि सरकार की प्राथमिकता ही नहीं है.
नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था की यह कैसी मानसिकता है कि सरकार उद्योगपतियों के लिए तो तिजोरी खोल देती है, उनके ऋण मा़फ कर दिए जाते हैं. देश के जिस पैसे पर ग़रीबों और मजबूरों का हक़ है, उसे अमीरों में लुटा दिया जाता है. लेकिन, कृषि के लिए सरकार के पास न तो पैसा है, न कोई योजना है और न कोई संवेदनशीलता. किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं. आतंकवाद और आतंकी हमलों में मरने वाले लोगों की संख्या से कई गुना ज़्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही है.

मोदी सरकार के दो साल पूरे होने वाले हैं. इस दौरान कृषि को लेकर सरकार ने कुछ नहीं किया. ऐसी एक भी योजना या नीति सामने नहीं आई, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर होती. जो भी घोषणाएं हो रही हैं, वे सब हवा-हवाई हैं. उनसे किसानों के जीवन पर कोई ़फर्क़ नहीं पड़ने वाला. वजह सा़फ है कि किसान और उनकी समस्याएं सरकार की प्राथमिकता ही नहीं हैं. कृषि को लेकर सरकार स़िर्फ बयानबाजी कर रही है, झूठे दिलासे देती है. न तो कोई प्रयास हो रहा है और न इसकी कोई उम्मीद नज़र आ रही है.

प्रधानमंत्री ने किसान रैली में जो घोषणाएं की हैं, उसकी हकीक़त समझना ज़रूरी है. बीती 18 फरवरी को सिहोर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनकर ऐसा लगा, जैसे पीएचडी के छात्रों को एबीसीडी सिखाई जा रही हो. वह सॉयल हेल्थ कार्ड की बात कर रहे थे. तीन किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड दिया गया. उसे इस तरह पेश किया गया, जैसे स़िर्फ सॉयल हेल्थ कार्ड से क्रांतिकारी बदलाव आ जाएंगे. ग़ौरतलब है कि 1950 में जब पहली बार मिट्टी की जांच करने वाली तकनीकें विकसित हुईं, तब भी यही कहा गया था कि मिट्टी की जांच से पता चलेगा कि उसमें कैसे और कितना फर्टिलाइजर्स डाला जाए, जो उचित रहे.

अब 2016 में भी देश के प्रधानमंत्री वही बात कर रहे हैं. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार की सोच का कितना विकास हुआ है. सरकार की सोच पुरातन है. सरकार को कृषि की दुर्दशा का अंदाज़ा तक नहीं है, किसानों की मजबूरी की भनक तक नहीं है. कभी-कभी तो लगता है कि देश में किस प्रकार का प्रजातंत्र है, जिसमें 60 फीसद जनसंख्या की मूल समस्याओं से सरकार अवगत ही नहीं है.

हकीक़त यह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में 90 फीसद किसानों के लिए यह एक स्ट्रगलिंग प्री-ऑक्यूपेशन है. यह ऑक्यूपेशन नहीं है, लाइवलीहुड नहीं है, यह स्ट्रगलिंग प्री-ऑक्यूपेशन है. यानी यह किसानों की मजबूरी बन गई है. इसे ढोना है, इसलिए वह ढो रहा है. जवाहर लाल नेहरू सरकार के दौरान हुए ग्रीन रेवोल्यूशन (हरित क्रांति) के समय जैसी तत्परता और नवोन्मुखी पद्धति अपनाई गई थी, वह फिर दोबारा नहीं देखी गई. वैसा पिछले दस-बीस सालों में भी नहीं हुआ और कम से कम पिछले दो सालों में तो बिल्कुल नहीं.

यही वजह है कि देश में रा़ेजाना ढाई हज़ार किसान खेती छोड़ रहे हैं, बड़ी संख्या में किसानों का पलायन हो रहा है. देश में यह परिभाषा तक उपलब्ध नहीं है कि किसान कौन है. 2007 से 2012 के बीच क़रीब 3.2 करोड़ ग्रामीणों, खासकर किसानों ने शहरों की ओर पलायन किया. इनमें से काफी लोग तो अपनी ज़मीन और घर-बार बेचकर शहरों में आ बसे. इसकी मूल वजह यह है कि किसानों के लिए खेती अब फायदेमंद नहीं रही, इससे उनका घर तक नहीं चल पाता. सरकार के पास न तो भविष्य की योजना है और न भविष्य को ध्यान में रखते हुए कोई तैयारी करने की मंशा दिखती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिहोर की किसान रैली में फसल बीमा योजना को ऐतिहासिक बताया और उसे कुछ यूं पेश किया, जैसे उससे किसानों की सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. पहले जरा समझते हैं कि यह फसल बीमा योजना आ़िखर है क्या? क्या यह किसी समस्या का समाधान है या फिर भविष्य में होने वाली किसी संभावित समस्या के समाधान के लिए एक पूर्वोपाय है. फसल बीमा योजना कोई नई खोज नहीं है और न यह किसी समस्या का समाधान है. अगर फसल बीमा योजना को ही किसानों की समस्याओं का समाधान मान लिया गया, तो यह सबसे बड़ी ग़लती होगी. यही ग़लती पिछली कई सरकारें करती आई हैं. देश में हर व्यक्ति अपना, अपने सामान और घर-दुकान का बीमा कराता है.

खेत और फसल का भी बीमा होना चाहिए, यह तो साधारण-सी बात है. लेकिन, देश के राजनीतिक दल उल्टा काम करते हैं. सवाल यह है कि किसानों की समस्याओं का सरकार राजनीतिक हल ढूंढती है या फिर आर्थिक? और, यहीं पर किसानों के साथ धोखा हो जाता है. नव-उदारवादी व्यवस्था में यानी 1991 से लेकर 2016 तक यानी बीते 25 वर्षों में एग्रीकल्चर इंश्योरेंस की ज़रूरत को राजनीतिक चश्मे से देखा गया. यही काम मोदी सरकार भी कर रही है. यह सब जानते हैं कि खेती में जोखिम है. किसानों को सूखा, अतिवृष्टि और कीड़े-मकौड़ों के हमले का ़खतरा रहता है. अब सवाल है कि यह खतरा कितना बड़ा है, कितने लोग इससे प्रभावित होते हैं और इसका उपज पर कितना असर पड़ता है? पिछले सौ सालों पर अगर ग़ौर करें, तो इन सवालों के जवाबों का अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं है.

किसानों को ऩुकसान तीन तरीके से होता है. प्राकृतिक आपदा की वजह से पहला नुक़सान क्षेत्र को, दूसरा किसान को और तीसरा उत्पादन को होता है. जब कभी कोई आपदा आती है, तो इन्हीं तीनों स्तरों पर ऩुकसान होता है. सरकार इसका आर्थिक हल निकालने के बजाय राजनीतिक हल निकालती है. जब सरकार को लगता है कि लोग शोर मचाएंगे, आंदोलन करेंगे और विपक्षी दल मुद्दा बना देंगे. तो सरकार फटाफट इसका हल निकालती है कि किसानों की क्षति मुद्दा न बने, इसके लिए बीमा लागू कर दो. यानी किसानों का आंदोलन शांत करने के लिए एक झुनझुना चाहिए और उस झुनझुने का नाम बीमा है.

यह दु:खद स्थिति है. फसल बीमा को राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन की सुरक्षा के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा रहा है. पूरे देश को 300 मिलियन टन अनाज, दालों और तिलहन की ज़रूरत है. सवाल है कि क्या हमारी मौजूदा ज़मीन, पानी और जलवायु के भरोसे यह 300 मिलियन टन की ज़रूरत बिना किसी दिक्कत पूरी हो सकती है या नहीं? विशेषज्ञों का मानना है कि 290 मिलियन टन की सुरक्षा है, बाकी 10 मिलियन टन का जोखिम है. यानी यदि हमें इंश्योरेंस करना है, तो महज 10 मिलियन टन यानी तीन फीसद का ही करना है. कहने का मतलब यह कि पूरा शोर-शराबा महज तीन फीसद उपज के लिए मचाया जा रहा है.

ऐसा स़िर्फ अभी नहीं, बल्कि 1990 से लेकर आज तक छह-सात बार इस पर बुद्धि विलास हो चुका है. और, किसानों की जो असली समस्या है, उसे कार्पेट के नीचे छिपा दिया जाता है. इस तथाकथित ऐतिहासिक योजना का नतीजा क्या निकलता है? किसी को 10 रुपये, तो किसी को 150 और किसी को 200 रुपये मिल जाते हैं. ऐसी बीमा योजना किसानों की असल समस्याओं को पीठ दिखाने जैसी है. झुनझुना थमाने की नीति को ऐतिहासिक बताया जा रहा है. दरअसल, यह एक ऐतिहासिक झुनझुना है.

सिहोर की किसान महारैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम को पूर्ण रूप से जैविक बनाने का दावा किया. आइए, जरा इसकी हकीक़त समझते हैं. सरकार ने देश भर में जैविक कृषि के कार्यक्रम की बागडोर एक ऐसे अफसर को सौंपी, जो केमिकल फर्टिलाइजर्स के प्रोत्साहन के लिए ज़िम्मेदार था. फिर भी हमारे देश के किसान ऐसे हैं, जो न स़िर्फ परिश्रम करते हैं, बल्कि नए प्रयोग करने में भी पीछे नहीं रहते. मोरारका फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की बदौलत जैविक खेती में तेजी आई. लेकिन, इस अफसर के जाने के बाद एक भी ऐसा अफसर नहीं आया, जो जैविक खेती को लेकर प्रतिबद्ध हो. जो भी अफसर आया, वह जैविक खेती के बारे में कही-सुनी बातों पर विश्वास करने वाला ही आया.

सरकार ने ऐसे-ऐसे लोगों को जैविक खेती के काम में लगाया, जो यह मानते रहे कि अगर हर जगह जैविक खेती होगी, तो सब भूखे मर जाएंगे. जब सरकार स्वयं ऐसे नागमणि ढूंढकर उन्हें जैविक खेती के विकास और विस्तार की ज़िम्मेदारी सौंपेगी, तो स्थिति का अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है. नतीजा क्या हुआ? पिछले बजट में मोदी सरकार ने 300 करोड़ रुपये जैविक खेती के लिए आवंटित किए थे. बजट आने के एक महीने के अंदर यह सारा पैसा कृषि मंत्रालय को दे भी दिया गया. लेकिन, एक साल बीत गए और 30 करोड़ रुपये का भी इस्तेमाल नहीं हुआ. सारा पैसा ज्यों का त्यों पड़ा है. यह स्थिति हमारे देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और उसमें लगे रोग की परिचायक है.

हिंदुस्तान में नई सरकार चलाने का यह अजीबा़ेगरीब तरीका है. हर नई सरकार पिछली को खराब बताकर स्वयं को सही साबित करने में जुटी रहती है. यही नहीं, वह पिछली सरकार को मूर्ख साबित करने में लग जाती है. और, इसके पीछे देश की नौकरशाही का बड़ा हाथ है. कृषि क्षेत्र में अधिकारियों के साथ-साथ वैज्ञानिक कम्युनिटी भी सरकार के मुताबिक अपने विचार बदलती रहती है. अभी कृषि विज्ञान के हर केंद्र में हर व्यक्ति सॉयल हेल्थ कार्ड की बात कर रहा है. दरअसल, देश के सभी किसानों के सॉयल हेल्थ कार्ड 1955 में बन जाने चाहिए थे. लेकिन, आज अचानक सारे अफसर और वैज्ञानिक सॉयल हेल्थ कार्ड की बात क्यों कर रहे हैं? क्योंकि, कृषि मंत्री सॉयल हेल्थ कार्ड की बात कर रहे हैं, प्रधानमंत्री सॉयल हेल्थ कार्ड की बात कर रहे हैं.

कहने का मतलब यह कि वैज्ञानिक भी वही भाषा बोल रहे हैं, जो सरकार बोल रही है. यानी वैज्ञानिकों में भी सच कहने का साहस नहीं है. मोदी सरकार 2016 में 1950 की तकनीक और विज्ञान की बात कर रही है. इसका मतलब तो यह हुआ कि पिछले 65 सालों के दौरान हमारे यहां कृषि क्षेत्र में कोई वैज्ञानिक और तकनीकी विकास नहीं हुआ. अगर सरकार की यह सोच है, तो इसका मतलब है कि कृषि क्षेत्र समय के साथ आगे नहीं बढ़ रहा, बल्कि पीछे जा रहा है. विशेषज्ञों के रवैये का एक और उदाहरण जैविक खेती के विषय में मिलता है. मोदी सरकार के ज़िम्मेदार लोगों का मानना है कि अब तक देश में जिस तरीके से जैविक खेती हो रही है, वह ग़लत है.

सरकार जैविक खेती की एक नई परिभाषा गढ़ने वाली है. कृषि मंत्रालय के विशेषज्ञों की एक टास्क फोर्स बनाई गई, जिसने छह महीने लगाकर, आधी-अधूरी जानकारी और कही-सुनी पुरानी बातों को आधार बनाकर एक रिपोर्ट पेश की. यह रिपोर्ट भारत सरकार के योजना आयोग एवं कृषि मंत्रालय की 1990 और 1995 की रिपोट्‌र्स से भी ज़्यादा पुरानी लगती है. ऐसा लगता है कि शायद आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले सिपाहियों ने देश की कृषि नीति के दस्तावेज़ तैयार किए हों. दुनिया आगे जा रही है और देश का कृषि क्षेत्र पीछे जा रहा है. जब सोच ही धुंधली हो जाए, तो उससे बदतर स्थिति भला क्या हो सकती है.

पहले तो योजनाओं के क्रियान्वयन में समस्या होती थी, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में तो सोच पर सवाल उठने लगे हैं. इससे पहले भी देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे. मोदी सरकार को अगर लगता है कि वाजपेयी सरकार मूर्खतापूर्ण फैसले लेती थी, तो कोई बात नहीं. लेकिन, अगर उस सरकार ने देश की नदियों को जोड़ने की बात कही थी, तो उसके पीछे ज़रूर कोई आधार रहा होगा.

यूपीए सरकार ने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया था, लेकिन अब जब फिर से भाजपा की सरकार आई है, तो इस पर बात क्यों नहीं हो रही है? इस देश का सौभाग्य है कि हमारे किसान परिश्रमी हैं और वे विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश में अनाज की कमी नहीं होने देते. यह स्थिति तब है, जब देश में सुनिश्चित सिंचाई का अभाव है, पानी की कमी है. देश की स़िर्फ 30 फीसद कृषि सुनिश्चित सिंचाई पर निर्भर है, शेष 70 फीसद भगवान भरोसे चल रही है. दूसरी तऱफ हम नदियों का पानी समुद्र में बर्बाद होने देते हैं. ग़ौर करने वाली बात यह है कि स़िर्फ दो नदियों का पानी जोड़ने से उपज में तीन से पांच फीसद वृद्धि हो जाएगी.

अगर हम देश की सभी नदियों का पानी कच्ची नहर के ज़रिये जोड़ दें, तो पूरी दुनिया का पेट भर सकते हैं. यह ताकत हमारे किसानों में है. आज पूरे देश में औसतन प्रति हेक्टेयर 15 से 25 क्विंटल उपज होती है, जो सुनिश्चित सिंचाई होते ही 40 से 55 क्विंटल हो जाएगी. भारत में अनाज उत्पादन 300 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 550 से 600 मिलियन मीट्रिक टन हो जाएगा. जिस रास्ते से कच्ची नहर गुज़रेगी, उसके चारों तऱफ भूजल स्तर बढ़ जाएगा. लोगों को पेयजल मिलेगा और सिंचाई की व्यवस्था भी हो जाएगी. लेकिन, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही की वजह से यह प्रोजेक्ट लटका पड़ा है, क्योंकि अधिकारी चाहते हैं कि पक्की नहर बने. मतलब सा़फ है कि इससे बजट बढ़ जाएगा और अधिकारियों के कमीशन में इजा़फा होगा.

मोदी सरकार को समझना पड़ेगा कि जब तक पैदावार में वृद्धि नहीं होगी, जब तक सरप्लस पैदावार नहीं होगी, तब तक कृषि को उद्योग से नहीं जोड़ा जा सकता, तब तक रोज़गार देने वाला औद्योगिक विकास संभव नहीं है और तब तक कृषि एवं बाज़ार दो परस्पर विरोधी स्तंभ बने रहेंगे. मोदी सरकार के सामने 60 ़फीसद लोगों का भविष्य संवारने का एक ऐतिहासिक मौक़ा है. देखना यह है कि मोदी सरकार बजट 2016 में इस मा़ैके का फायदा उठाती है या फिर उस रास्ते को चुनती है, जैसा कि देश में अब तक होता आया है. मतलब यह कि बजट में विभिन्न मदों में धनराशि बढ़ा देने से कुछ नहीं होने वाला.

बजट में कृषि क्षेत्र की धनराशि बढ़ाकर ढिंढोरा पीटने का सरकारी दस्तूर फिर से दोहराया जाएगा. सरकार को इतनी-सी बात समझ में नहीं आई कि बिना दृष्टिकोण, बिना दूरदर्शिता और बिना संवेदनशीलता के कृषि क्षेत्र के लिए बनाई गई हर नीति नाकाम हो जाएगी. देश चलाने वालों ने आज तक अगले 20-30 साल आगे की ज़रूरतें ध्यान में रखकर योजना बनाने की कोई परंपरा ही नहीं रखी. सरकार अगर किसानों की समस्याएं दूर करना चाहती है, कृषि क्षेत्र को विकसित करना चाहती है, तो उसे कृषि को उद्योग, नई तकनीक, रा़ेजगार एवं ग्रामीण विकास से जोड़कर एक समग्र नीति बनानी होगी. कृषि को एक फायदेमंद पेशा बनाना होगा. जब तक यह नहीं होगा, तब तक पलायन जारी रहेगा. सरकार के माथे पर किसानों की आत्महत्या का कलंक लगता रहेगा. 

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎

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