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पाताल कोट के नन्हे जुगनू

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jugnuमध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले के तामिया ब्लॉक का पाताल कोट मानो धरती के गर्भ में समाया है. यह घाटी सदियों तक बाहरी दुनिया के लिए अनजान और अछूती बनी रही. पाताल कोट में 12 गांव हैं, गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोड़िया, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी. बाहरी दुनिया का यहां के लोगों से संपर्क हुए ज़्यादा समय नहीं हुआ है. इनमें से कई गांव ऐसे हैं, जहां आज भी पहुंचना बहुत मुश्किल है. ज़मीन से काफी नीचे और विशाल पहाड़ियों से घिरे होने के चलते इसके कई हिस्सों में सूरज की रोशनी भी देर से और कम पहुंचती है. मानसून में बादल पूरी घाटी को ढंक लेते हैं और तैरते हुए नज़र आते हैं.

सतपुड़ा की पहाड़ियों में क़रीब 1,700 फुट नीचे बसे ये गांव भले ही तिलिस्म का एहसास कराते हों, लेकिन यहां बसने वाले लोग हमारी और आपकी तरह ही हाड़-मांस के इंसान हैं. ये लोग भारिया एवं गौंड आदिवासी समुदाय के हैं, जो अभी भी हमारे पूर्वजों की तरह अपने आपको पूरी तरह प्रकृति से जोड़े हुए हैं. इन लोगों की ज़रूरतें सीमित हैं, प्राकृतिक संसाधनों के साथ इनका रिश्ता सह-अस्तित्व का है और अपनी संस्कृति, परंपरा, ज़िंदगी जीने एवं आपसी व्यवहार का तरीका भी पुरातन है, बिल्कुल सहज, सरल और निश्छल.

बाहरी दुनिया से संपर्क और सदियों से संजोकर रखी गई प्रकृति से छेड़छाड़ के चलते अब ये संकट में दिखाई दे रहे हैं. पाताल कोट को लेकर भले ही कई मिथक हों, लेकिन यहां की समस्याएं यथार्थ हैं. यहां भी विकास की कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन उनका लाभ ज़्यादातर लोगों तक नहीं पहुंच सका है. 2007 में यहां पहला आंगनबाड़ी केंद्र खुला था. मध्य प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित पाताल कोट विकास प्राधिकरण की वजह से यहां स्कूली शिक्षा एवं प्राथमिक चिकित्सा जैसी सेवाएं पहुंच गई हैं, लेकिन बाकी सुविधाओं से यहां के लोग वंचित हैं. गैलडुब्बा तक पक्की सड़क होने से आना-जाना आसान हो गया है, लेकिन बाकी क्षेत्र अभी भी कटे हुए हैं.

खेती भी परंपरागत और नए तरीकों के बीच उलझ कर रह गई है. लोग अपनी पुरानी फसलों से तक़रीबन हाथ धो चुके हैं, नई नगदी फसलों से भी कोई खास फायदा नज़र नहीं आ रहा है. पुराना खाद्य सुरक्षा तंत्र बिखरने का नतीजा यह है कि जानलेवा कुपोषण ने यहां अपने पैर पसार लिए हैं. क्षेत्र में पानी की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है. यहां पानी का एकमात्र स्रोत पहाड़ों से निकलने वाली जलधाराएं रही हैं. पहले उक्त जलधाराओं में वर्ष पर्यंत पानी रहता था, लेकिन अब वे ठंड में भी सूख जाती हैं. ऐसा जलवायु परिवर्तन और बाहरी हस्तक्षेप के चलते हुआ है.

पाताल कोट की जैविक विविधता, प्राकृतिक संसाधन एवं वन संपदा खतरे में हैं. यहां की दुर्लभ जड़ी-बूटियों का बड़ी बेरहमी से दोहन हो रहा है. अगर रोक नहीं लगी, तो पाताल कोट का उक्त बहुमूल्य खजाना खत्म हो जाएगा. स्वैच्छिक संस्था विज्ञान सभा 1997 से पाताल कोट में वैज्ञानिक चेतना, स्वास्थ्य, आजीविका एवं खेती आदि बिंदुओं पर काम कर रही है. संस्था के तामिया स्थित सेंटर के समन्वयक आरिफ खान के मुताबिक, विज्ञान सभा ने यहां आजीविका एवं स्वास्थ्य को लेकर काफी काम किया.

लोगों को वैज्ञानिक तरीके से शहद निकालने का प्रशिक्षण दिया गया और आवश्यक पोशाक उपलब्ध कराई गई. गैलडुब्बा सेंटर में शहद की हारवेस्टिंग के लिए मशीन लगाई गई है. वनोपज को लेकर भी लोगों को जानकारी दी गई कि उन्हें किस समय तोड़ना चाहिए, जिससे उनकी मेडिसिन वैल्यू खत्म न होने पाए. वनोपज बेचने में भी संस्था द्वारा सहयोग किया जाता है.

पिछले कुछ वर्षों से विज्ञान सभा द्वारा यूनिसेफ के सहयोग से बाल अभिव्यक्ति एवं सहभागिता को लेकर भी काम किया जा रहा है, जिसका मकसद बच्चों में आत्मविश्वास, कौशल, अभिव्यक्ति एवं शिक्षा को बढ़ावा देना और उन्हें एक मंच उपलब्ध कराना है, जहां वे अपने अनुभव-विचार सबके सामने रख सकें. इसके तहत चित्रकला, फोटोग्राफी, लेखन एवं विज्ञान से संबंधित प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं.

बच्चों की अभिव्यक्तियां बाल पत्रिका गुइयां में प्रकाशित भी की जाती हैं. कुछ समय पहले यहां ज्ञान-विज्ञान पोटली (पुस्तकालय) की शुरुआत की गई, जिससे बच्चों को किताबों एवं शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ा जा सके. पाताल कोट में इन सबका प्रभाव भी देखने को मिल रहा है. बकौल आरिफ, बच्चे पहले कुछ बोलने में झिझकते थे, लेकिन अब वे खुलकर बातचीत करने लगे हैं और अपने आसपास की समस्याएं पेंटिंग, फोटोग्राफी एवं लेखन के माध्यम से सामने लाने लगे हैं.
बच्चों की रचनात्मकता बढ़ी है, उनकी हिचक टूटी है और वे अपने अधिकारों के बारे में भी जान-समझ रहे हैं. पिछले दिनों विज्ञान सभा की एक फोटोग्राफी कार्यशाला के सिलसिले में पाताल कोट स्थित गैलडुब्बा गांव जाने का मौक़ा मिला.

उस दौरान 26 जनवरी भी थी. बच्चों के साथ बड़े-बुजुर्गों ने भी गणतंत्र दिवस बहुत उत्साह के साथ मनाया. बाद में पता चला कि क्षेत्र में 1997 से पहले स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस को लेकर कोई जागरूकता नहीं थी. जानकारी के अभाव में लोग इन राष्ट्रीय पर्वों से विमुख थे. गैलडुब्बा की फोटोग्राफी कार्यशाला का आयोजन पांच विद्यालयों ने संयुक्त रूप से किया था, जहां गणतंत्र दिवस मनाने के लिए पाताल कोट के विभिन्न गांवों के पुरुष, महिलाएं एवं बच्चे एकत्र हुए थे. इस दो दिवसीय आयोजन में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, खेल प्रतियोगिताएं हुईं.

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों-बड़ों की समान रूप से भागीदारी देखी गई. परंपरागत सामूहिक नृत्य के अलावा देश रंगीला एवं जलवा तेरा जलवा जैसे गीतों पर दी गई प्रस्तुतियों ने आयोजन में चार चांद लगा दिए. प्रत्येक प्रस्तुति के बाद मंच संचालक की ओर से पुरस्कार का ऐलान भी किया जा रहा था. गणतंत्र दिवस का यह Aअनोखा उत्सव देखना एक सुखद एहसास था. बच्चे घर, पहाड़, नदियों, पेड़-पौधों की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद करके बहुत खुश नज़र आ रहे थे. पाताल कोट के बच्चे भी जीवन के सपने देख रहे हैं.

वे डॉक्टर, नर्स, फोटोग्राफर, वैज्ञानिक, टीचर, इंजीनियर, चित्रकार वगैरह बनना चाहते हैं. ज़ाहिर है, ये सपने बड़े हैं, लेकिन बच्चे बाहरी दुनिया की भाषा और तौर-तरीकों से स्वयं को अभिव्यक्त करना सीख रहे हैं. वे चाहते हैं कि यहां के लोगों को जीवनयापन के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं. उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति में कहीं अवचेतन से यह भी निकल कर आ रहा है कि उनके पहाड़, जंगल, पेड़-पौधे एवं वनोपज सलामत रहें, जो उनकी धरोहर हैं. उम्मीद कर सकते हैं कि पाताल कोट के उक्त जुगनू आने वाले समय में घाटी समेत देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी चमक ज़रूर बिखेरेंगे.

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