लालू के सत्ता में लौटते ही फुलवरिया में लौटी खुशहाली

lalu-prasadगोपालगंज का  फुलवरिया गांव उस समय चर्चा में आया जब 1990 में बिहार के  मुख्यमंत्री के  पद पर लालू प्रसाद आसीन हुए.  मूूलभूत सुविधाओं से महरूम फुलवरिया गांव के  लोग आज अपने आपको खुशकिस्मत मानते हैं कि जिस गांव में जाने के लिए मात्र पगडंडी सड़कें थीं, वहीं गांव भी शहर कि तरह जगमगाने लगा. चौड़ी सड़कें, बड़ी-बड़ी इमारतें यह बताने के लिए तैयार हैं कि यह गांव लालू प्रसाद का है. 1990 से 1997 तक बिहार के  मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए लालू प्रसाद ने फुलवरिया को सड़क, बिजली, डाकघर, बैंक, अस्पताल, निबंधन कार्यालय, प्रखंड कार्यालय, थाना, मंदिर, स्कूल, हैलीपैड और रेलवे स्टेशन दिया. गांव के लोगों को लालू प्रसाद पर गर्व है. फुलवरिया गांव में 11 जून 1948 में जन्मे लालू प्रसाद का पुश्तैनी घर आज भी है, वहां मां मरझिया देवी की प्रतिमा लगी हुई है. लालू प्रसाद ने फुलवरिया के  विकास के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. फुलवरिया को प्रखण्ड का दर्जा दिलाकर यहां के लोगों को रोजगार के अवसर भी दिए गए. विभिन्न सरकारी कार्यालय होने के चलते अपने कार्य निष्पादन कराने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है. फुलवरिया गांव में दुकानें खुल गईं, बाजार लगने लगा. फुलवरिया निवासी उपेन्द्र यादव कहते हैं कि लालू प्रसाद के बिना फुलवरिया गांव के लोगों का जीवन अधूरा है. लालू की देन है कि हमारा गांव एक आधुनिक गांव बन गया. उनके कारण ही फुलवरिया गांव के  50 से अधिक युवक रेलवे में नौकरी कर रहे हैं. फिर भी इस गांव से बड़ी संख्या में लोग दूसरे प्रांतों में नौकरी करते हैं.

गांव के  सुदामा यादव कहते हैं कि लालू ने हमें नाम और प्रसिद्धि सहित सब कुछ दे दिया है. लालू प्रसाद के  भतीजा रामानंद यादव कहते हैं कि साहेब जब सत्ता में थे तो फुलवरिया को दुल्हन की तरह सजा कर रखा जाता था. लेकिन उनके सत्ता से हटते ही रेलवे स्टेशन क्या फुलवरिया गांव का विकास ठप पड़ गया था. लेकिन उनके सत्ता में आते ही फिर फुलवरिया में विकास की किरणें जगमगाने लगी हैं. टूटी सड़कें बनने लगी हैं, तेज प्रताप के स्वास्थ्य मंत्री बनते ही अस्पताल में दवा आना भी शुरू हो गई हैं, समय से डॉक्टर आने लगे हैं. अब यहां अधिकारियों का आना-जाना शुरू हो गया है. महागठबंधन के  सरकार में किंग मेकर के  रूप में उभरे लालू प्रसाद का दबदबा आज भी गोपालगंज में चलता है. डीएम से लेकर थानेदार तक की पोस्टिंग उनकी मर्जी से गोपालगंज में होती है. तेजस्वी और तेजप्रताप के पास अच्छे मंत्री पद होने से नेताओं का भी जमघट उनके पास लगा रहता है.

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हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप अपने गांव फुलवरिया आए थे. जहां अधिकारियों और नेताओं का जमघट लगा रहा. गांव के  लोग अब खुश हैं कि फिर से लालू प्रसाद की सत्ता लौट आई, इसी के साथ गांव के लोगों का भी विकास होगा. लालू प्रसाद के  जीवनी पर प्रकाश डाला जाए तो एक साधारण परिवार में जन्मे लालू प्रसाद यादव की राजनीति में प्रवेश भारतीय राजनीति में पहला कदम एक छात्र के  रूप में हुआ था. उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव लड़ा. लालू प्रसाद की शादी 1 जून 1973 को राबड़ी देवी के साथ हुई थी. लालू प्रसाद का राजनीतिक क्षेत्र गोपालगंज नहीं रहा, लेकिन उनका लगाव अपने गांव से हमेशा रहा. वह सारण निर्वाचन क्षेत्र से 1977 में पहली बार लोकसभा के  लिए चुने गए. 1980 से 1989 तक लगातार दो बार वह बिहार विधानसभा के सदस्य रहे. 1983 में वह विधानसभा में विपक्ष के  नेता चुने गए. वह बिहार के  मुख्यमंत्री पद पर 1990 से 1997 तक रहते हुए फुलवरिया का सरकारी योजनओं के  जरिए विकास करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. 2004 से 2009 तक रेल मंत्री रहे, लालू प्रसाद ने हथुआ से बथुआ तक बड़ी रेल लाईन परियोजना का चयन कर दो साल में रेल खंड पर सवारी गाड़ी चला दी. लालू प्रसाद ने रेल मंत्री के रूप में 2008 में एक रेलवे लिंक के  साथ अपनी पत्नी राबड़ी देवी के  गांव सेलारकला को भी रेलवे लिंक से जोड़ दिया. उस समय फुलवरिया रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के लिए हर तरह की सुख सुविधा उपलब्ध कराई गई थी. लालूप्रसाद के सत्ता से हटते ही जिस प्रकार उनको छोड़ दूसरे का दामन थाम लिया. उसी प्रकार फुलवारिया के विकास के  प्रति नेताओं और अधिकारियों का रुझान ख़त्म हो गया था.

 

 

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