संस्कृति सहेजने वाली भावना

cultureआपने यह तो सुना ही होगा कि बनारस का पान खाने से अक्ल का ताला खुल जाता है, लेकिन बनारस का यह मशहूर पान आखिर मिलता कहां है, यह पान बनता कैसे है और यह पान किस तरह बनारस की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा हो जाता है. डॉक्युमेंट्री फिल्मों की युवा निर्माता भावना रघुवंशी अपनी लघु फिल्म, पान-अ वे ऑफ लाइफ इन वाराणसी के जरिए ऐसे ही सवालों को ढूंढ़ने की कोशिश करती दिखती हैं. उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है. यहां की संस्कृति, खान-पान, बोल-चाल, मेल-जोल सबमें विविधता है. यहां के हर स्थान की अपनी अलग पहचान है. उत्तर प्रदेश की संस्कृति के कई ऐसे ही नायाब पहलुओं को सहेजने और फिल्मों के जरिए उसे लोगों को दिखाने का जज्बा है भावना रघुवंशी में. उनकी दो डॉक्युमेंट्री बनारस के खान और पान पर ही बनी है. बनारस के बारे में क्या खूब लिखा गया कि यह जगह नहीं बल्कि मनोदशा है. जहां खान, पान, भांग और स्नान ही पहचान है. उसी तरह राजधानी लखनऊ को शहर-ए-तहजीब कहा जाता है. लखनऊ की नज़ाकत के बारे में तो सबने सुना है लेकिन लखनऊ की हर गली अपने अंदर कला, संस्कृति और इतिहास का एक पन्ना छिपाए हुई है. भावना अपने कैमरे से उन्हीं पन्नों पर जमी धूल हटाने का काम कर रही हैं.

भावना ने अपनी डॉक्युमेंट्री पान-अ वे ऑफ लाइफ इन वाराणसी में दिखाया है कि पान किस तरह बनारस की संस्कृति में रचा बसा है. विश्वनाथ गली स्थित दीपक तांबूल भंडार बनारस की सबसे पुरानी पान की दुकान है. जहां के पान का अपना अनूठा स्वाद है. उस तरह बीएचयू के लंका स्थित केशव पान भंडार की भी अपनी विशिष्ट पहचान है. लोग यहां दूर दूर से पान खाने आते हैं. पान यहां सम्मान और व्यवहार का सूचक है. इसी तरह वाराणसी- द मेल्टिंग पॉट ऑफ फूड कल्चर में भावना ने बनारस के खान-पान की विविधता और विशिष्टता दिखाई है. बनारस के छोटी दिखने वाली पुरानी दुकानों में वो गज़ब का स्वाद है जो आज भी लाजवाब है. इन दुकानों में कचहरी बाजार स्थित राम भंडार है जो 1888 में शुरू हुई जहां लोग आज भी देसी घी में बनी कचौड़ी और जलेबी का नाश्ता करने आते हैं. बनारस के खाने में शुद्धता और स्वाद का बेजोड़ संगम है. ठंड में मिलने वाली मलइयो बनारस की विशिष्ट पहचान है. मार्कंडेय जी की दुकान में मिलने वाली मलइयो खाने के लिए आपको घंटों कतार में खड़ा होना पड़ता है. यदि आप दिसंबर और जनवरी के महीने में बनारस आते हैं तो मलइयो खाना न भूलें. ऐसी ही कहानी रामनगर स्थित शिवप्रसाद लस्सी भंडार और ब्लू लस्सी भंडार की भी है. जहां मिलने वाली दही रबड़ी वाली और फ्रूट लस्सी का अपना अनूठा स्वाद है.

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उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान के बारे में भावना कहती हैं कि आप किसी से उत्तर प्रदेश की कला-संस्कृति की बात कीजिए लेकिन लोगों के जहन में इसकी कोई साफ छवि उभरकर सामने नहीं आती है. चाहे बनारस हो, लखनऊ हो, आगरा हो या कोई और शहर इन शहरों की संस्कृति, कला, इतिहास और खान-पान के बारे में लोगों को मालूम ही नहीं है. जबकि दूसरे राज्यों के लोग अपने-अपने शहर, क्षेत्र-प्रदेश के खान-पान, संस्कृति और परिधान के बारे में जानते हैं और उस पर गर्व करते हैं. कभी-कभी लगता है कि हम नए आकाश ढूंढने के चक्कर में अपने घोसलों और अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं. ऐसे में आपके लिए अपनी पहचान को बनाए रखना मुश्किल हो गया. और इसी पहचान को बचाए रखने के लिए मैंने डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने की शुरूआत की है. पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में कई बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग हुई है, जिनकी कहानी की पृष्ठभूमि में भी उत्तर प्रदेश के छोटे शहर ही रहे हैं. इस बात से भावना बेहद उत्साहित हैं कि देर सबेर बॉलीवुड को उत्तर प्रदेश की सुध तो आई. लेकिन उनका मानना है कि इसमें भी एक दरार है, क्योंकि जो भी फिल्में यहां बन रही हैं, उनमें प्रदेश के रिप्रेजेंटेशन की जगह उसका कैरिकेचर लोगों के सामने पेश किया गया है. पान, बीड़ी, गाली-गलौज से हटकर उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ है. लोग उसके  बारे में जानना चाहते हैं, मैं उसी दिशा में काम कर रही हूं. भावना लोगों को एक कहानीकार और निर्देशक के रूप में प्रदेश की ऐसी कहानियां बताना चाहती हैं जो हटकर हों और उन विषयों में लोगों की दिलचस्पी हो. उनमें लोग अपना बचपन और अपने शहर को ढूंढ़ सकें. ऐसी कहानियां पूरे प्रदेश में भरी पड़ी हैं और उन्हें लोगों के सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं.

भावना कहती हैं कि ऐसा समय आ गया है जब देश का हर शहर शक्ल-सूरत में एक जैसा नज़र आता है. लोगों का पहनावा एक जैसा है, इमारतें एक जैसी हैं, ऐसे में हर शहर के सामने अपनी पारंपरिक पहचान को बनाए रखने का प्रश्न आ खड़ा हुआ है. आज बड़ी संख्या में लोग विदेशों में काम करते हैं और वहां अपने परिवार के साथ रहते हैं, ऐसे में वह अपनी जड़ों से कैसे जुड़े रह पाएंगे और आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे. अपनी जड़ों से दूर जाना अपने आपको न पहचान पाना. हम कौन हैं, हम कहां से आए हैं. इन सवालों के जवाब किसी न किसी को देने ही होंगे. ऐसे में भावना को लगा कि क्यों न मैं इन सवालों के जवाब तलाशूं. यही सवाल उन्हें दुनिया के सबसे पुराने शहर बनारस ले आए और उन्होंने यहीं से इन सवालों के जवाब तलाशने शुरू किए. वह कहती हैं कि बनारस के बहुत से ऐसे पहलू हैं जिन्हें लोगों के सामने लाना चाहिए. बनारस पर उनकी और भी कई डॉक्यूमेंट्री आने वाली हैं जिनपर अभी काम चल रहा है उनमें मुख्य रूप से बनारस का जीवन दर्शन नज़र आएगा. वह कहती हैं कि उस दर्शन के कई पहलुओं के पास पहुंची हूं और बहुत से पहलुओं तक पहुंचना अभी बाकी है.

लोकगीत हमारी संस्कृति का एक ऐसा अंग हैं, जिन्हें पर्व-त्यौहार और मनोरंजन के लिए गाया जाता है. उदाहरण के लिए आल्हा और फाग. लेकिन इनकी पहचान भी खत्म होती जा रही है. इनका दायरा गावों तक सीमित रह गया है. भावना कहती हैं कि लोकगीतों का आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इतना महत्व है कि लोग उन्हें सुनना पसंद करते हैं. बॉलीवुड म्यूजिक के अलावा भी देश में ऐसा संगीत है जिसे लोग बड़े चाव से सुनते हैं, वह कहती हैं कि हमारी पीढ़ी के भी बहुत से लोग बहुत सी चीजों से अनभिज्ञ हैं ऐसे में आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा? इन्हें सहेजने की जिम्मेदारी हमारी-आपकी है. पहले खेलकूद और पढ़ाई लिखाई में हमें इन चीजों के बारे में जानने का समय नहीं मिला, लेकिन अब लगता है कि इनकी जो वास्तविकता है और इसे लेकर लोगों का जो दृष्टिकोण है मैं उसे जानूं और लोगों को उससे रूबरू करवाऊं. उसे लेकर लोगों में जो पैशन है उसकी कहानियां बताऊं.

क्योंकि ये सभी जुड़कर उत्तर प्रदेश का चरित्र बनाते हैं. फिलहाल उन्होंने राज्य सरकार के पास वित्तीय मदद करने के लिए कोई प्रस्ताव नहीं भेजा है, वह मानती हैं कि यह अभी शुरुआत है. लोगों को उनका काम पसंद आ रहा है, लोग उनके  काम की प्रशंसा भी कर रहे हैं. जल्दी ही वह उत्तर प्रदेश सरकार के पास अच्छा प्रस्ताव लेकर जाने वाली हैं. उन्हें आशा है कि सरकार उनकी मदद करेगी, क्योंकि जब भी कोई आप अच्छा काम अच्छी नीयत और अच्छे विचार के साथ करते हैं तो आपको हर जगह लोगों की मदद मिलती है. बाकी खट्‌टे मीठे अनुभव तो होते हैं. अततः वह उत्तर प्रदेश को कैरीकेचर के दायरे से बाहर लाकर उसके असली रंग लोगों को दिखाना चाहती हैं और वह अपनी शुरुआती प्रयास में सफल भी हुई हैं.

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