चुनौतियां ही चुनौतियां

challenges-he-challengesबहुत पुराना शेर है और आपको जरूर याद होगा… ये इश्क नहीं आसां, बस इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है. सारे देश में और जो राजनीति में हैं, उनमें यह सिर्फ नीतीश कुमार के ऊपर, जिस लम्हा हम और आप बात कर रहे हैं, लागू होता है. नीतीश कुमार के कई सपने हैं. एक सपना देश के लोगों को जय प्रकाश नारायण की तरह व्यवस्था बदलने के लिए तैयार करना, बिहार को देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाना और तीसरा समाज में फैले हुए उन मूल्यों का विरोध करना, जिनका आमतौर पर विरोध करने का साहस लोग स्वयं नहीं कर पाते.

इन सारे सपनों को पूरा करने का मतलब है राजनीति में कुछ नए तत्वों का प्रवेश करवाना. खासकर एक ऐसा उदाहरण पेश करना, जो जय प्रकाश जी के बाद समाप्त हो गया था. गांधीजी स्वयं, जवाहर लाल जी भी उसके एक हिस्से थे, और जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने समाजसेवा व राजनीति में दखल रखते हुए लगातार सामाजिक काम किए, जिसे रचनात्मक काम कहते हैं. जयप्रकाश जी के बाद नानाजी देशमुख ने रचनात्मक कामों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और राजनीति से संन्यास लेने के बाद समाज के बीच काम करते हुए जितना रचनात्मक काम वह कर सकते थे, उन्होंने किए.

आज नीतीश कुमार आकंठ राजनीति में डूबे हुए हैं, बिहार के मुख्यमंत्री हैं, सत्ता के अंतरविरोध उनके दाएं-बांए घूम रहे हैं और इन अंतरविरोधों के बीच उन्होंने रचनात्मक काम की धारा को बढ़ाने का गुरुत्तर दायित्व अपने कंधों पर लिया है. बिहार में संपूर्ण शराबबंदी का फैसला एक बहुत मुश्किल फैसला था. पूरा तंत्र शराब से पैसे कमा रहा है और जब मैं तंत्र कहता हूं, तो उसका मतलब अधिकारी, कर्मचारी, मंत्री और छोटे-मोटे नेता, उसमें सब शामिल हैं.

यह फैसला जब नीतीश कुमार ने लिया होगा, मैं समझ सकता हूं चार हजार करोड़ के राजस्व का सीधा नुकसान और चार हजार करोड़ के राजस्व का वह नुकसान जो इसे कमाने के रास्ते में अधिकारियों की जेब में चला जाता है. हर शराब की दुकान पर टैक्स की चोरी होती है और वह चोरी उतनी ही होती है जितना टैक्स शराब की बिक्री से सरकार के खजाने में आता है.

नीतीश कुमार लगभग 11 साल भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे और अब उन्होंने जद (यू) का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही संघ मुक्त भारत का नारा दिया है. उन्होंने अपील की है कि गैर भाजपा दल आपस में मिल जाएं या मिलकर कोई मोर्चा बनाएं. क्योंकि उन्हें लगता है कि मौजूदा शासन जिसके प्रतीक नरेंद्र मोदी हैं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नीतियों को इस देश में प्राण-पण से लागू करने में जुटे हुए हैं. नीतीश कुमार का ये नारा नीतीश कुमार के लिए राजनीति की संभावनाएं तो खोलता है, लेकिन राजनीतिक परेशानियां भी पैदा करता है.

नीतीश कुमार के लिए पहली राजनीतिक परेशानी उनके राजनीतिक साथियों द्वारा खड़ी की जाएगी, बल्कि कुछ ने खड़ी करनी शुरू भी कर दी है, जिसके बारे में हम अभी बात करेंगे. पर, हम सबसे पहले बात करते हैं इस देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की और हम जैसे ही अल्पसंख्यक कहते हैं, हमारे सामने मुस्लिम समाज आ जाता है, मुस्लिम समाज का मनोविज्ञान है कि वह उससे दूर भागता है जो पहले भाजपा या जनसंघ के साथ रह चुका है. नीतीश का 11 साल का भाजपा का साथ मुसलमानों के मन में नीतीश कुमार को लेकर कोई संदेह नहीं पैदा कर सका. यह कमाल नीतीश कुमार बिहार में कर चुके हैं.

जब वो लालू यादव के खिलाफ बिहार में भाजपा के साथ अगुआ का रोल निभा रहे थे, तब पहली बार मुसलमानों के एक बड़े हिस्से ने लालू यादव के खिलाफ जाकर नीतीश कुमार को वोट दिया था और वो वोट नीतीश कुमार को भाजपा का अभिन्न अंग के रूप में देखे जाने के बाद भी मुसलमानों ने दिया था. इसका मतलब मुसलमानों ने नीतीश कुमार को सांप्रदायिक नहीं माना. और जब इस बार का विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें नरेंद्र मोदी ने अपने दुश्मन नंबर एक के रूप में बिहार के लोगों से कहा कि नीतीश कुमार को वोट न दें, तो लोगों ने नरेंद्र मोदी की अपील को मानने से इंकार कर दिया.

नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि या तो आप मुझे चुनें, अगर मेरी नीतियों में आपको भरोसा है, क्योंकि लोकसभा के लिए आप मुझे चुन चुके हैं या फिर नीतीश कुमार को चुनें. मेरी पार्टी अगर जीतती है तो बिहार का विकास होगा और नीतीश कुमार जीतते हैं तो बिहार में जंगल राज होगा. बिहार के लोगों ने नीतीश कुमार को चुना, नरेंद्र मोदी की पार्टी को नहीं चुना और मुसलमानों ने अपना संपूर्ण समर्थन नीतीश कुमार को दिया. अब जब नीतीश कुमार जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं तब उनके इस संघ मुक्त भारत के नारे का अंदर की राजनीतिक धारा में मुसलमानों ने सबसे ज्यादा स्वागत किया है.

इसलिए, नीतीश कुमार के पक्ष में राजनीति का पहला चरण गया है, जिसमें मुसलमान नीतीश कुमार के साथ जाते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन मुसलमानों का नीतीश के पक्ष में जाना समाजवादी पार्टी जिसके अगुआ मुलायम सिंह यादव हैं और कांग्रेस पार्टी के लिए कितना स्वागत योग्य होगा और इनका विरोध कहां से शुरू होगा, इस नारे ने नीतीश कुमार के सामने चुनौती के रूप में पेश कर दिया है.

बिहार चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने जी-जान लगाकर मुलायम सिंह के यहां कई बैठकें कर, अधिकांश गैर कांग्रेसी और गैर भाजपा दलों के लोगों को बैठा कर, जिसे जनता परिवार के रूप में कहा जाता है, सार्वजनिक रूप से मुलायम सिंह को अपना नेता मानने की और उन्हें नई बनने वाली एक पार्टी के अध्यक्ष के रूप में घोषणा कर दी थी. मुलायम सिंह की घोषणा वाली प्रेस कॉन्फे्रंस में सारे नेता शामिल थे, जिसकी मुख्य कमान नीतीश कुमार और लालू यादव ने संभाली थी और सार्वजनिक रूप से सबने मालाएं पहनाकर मुलायम सिंह को अपना नेता घोषित कर दिया था.

मुलायम सिंह खुश भी थे, लेकिन जैसे ही बिहार चुनाव की घोषणा हुई मुलायम सिंह अघोषित कारणों से रूठ गए. मुलायम सिंह ने बिहार चुनाव से पहले एक पार्टी बनाने के प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में डाल दिया, जबकि यह तय हुआ था कि बिहार चुनाव से पहले एक पार्टी बन जाएगी. मुलायम सिंह ने कहा कि बिहार चुनाव के बाद हम पार्टी की बात करेंगे. पहला झटका देेने के बाद मुलायम सिंह बिहार में चुनाव लड़ने की रणनीति बनाने लगे.

लोग उसके पीछे उनके भाई राम गोपाल यादव का हाथ देखने लगे, क्योंकि इस संपूर्ण प्रक्रिया में सिर्फ राम गोपाल यादव, जिनके ऊपर मुलायम सिंह दिल्ली की राजनीति में सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, इस सारी प्रक्रिया के शुरू से खिलाफ थे और उनका मानना था कि अगर एक पार्टी बन जाती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा, क्योंकि ये जितने भी सहयोगी दल हैं, उत्तर प्रदेश में हमसे सीटें मांगेंगे.

दूसरी तरफ नीतीश कुमार और लालू यादव, मुलायम सिंह को अध्यक्ष बनाने की सार्वजनकि घोषणा के बाद ये मान रहे थे कि जल्दी से जल्दी एक पार्टी बन जाएगी, जिसका नाम मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी होगा. उसका झंडा समाजवादी पार्टी का होगा, उसका निशान (चुनाव चिन्ह) समाजवादी पार्टी का होगा. एक तरह से सारे लोग समाजवादी पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार हो गए थे और उनका मानना था कि मुलायम सिंह अपनी कलम से बिहार चुनाव में सभी 200 उम्मीदवारों की टिकटें बांटेंगे, पर मुलायम सिंह के फैसले से सब धराशाई हो गया. चुनाव के दिनों को देखते हुए आपस में समझौता हुआ और सारी सीटें आरजेडी और जेडीयू के खाते में रहीं, जिसमें से 40 सीटें गठबंधन में शामिल तीसरी पार्टी कांग्रेस के लिए छोड़ दीं.

मुलायम सिंह ने बिहार में न केवल उम्मीदवार उतारे, बल्कि बिहार चुनाव में उन्होंने लालू-नीतीश गठबंधन का खुलकर विरोध भी किया और यहां तक कह दिया कि लालू यादव को भटका दिया गया है. नीतीश कुमार तो बीजेपी के साथ रहेंगे और उनके ऊपर विश्वास नहीं किया जा सकता है. ये बात न नीतीश कुमार को समझ में आई, न लालू यादव को समझ में आई, क्योंकि बिहार चुनाव की घोषणा होने से पहले तक लालू यादव ने व्यक्तिगत रूप से जाकर मुलायम सिंह से यह अनुरोध किया था कि अगर वो साथ नहीं देते, तो विरोध भी न करें, क्योंकि जहां एक तरफ नरेंद्र मोदी का विरोेध करना और बिहार में चुनाव जीतना इनका लक्ष्य था, वहीं लालू यादव अपनी बढ़ती उम्र के साथ अपने दोनों बेटों को राजनीति में स्थापित करना चाहते थे. मुलायम सिंह ने लालू यादव की बात नहीं सुनी.

अब जब नीतीश कुमार और लालू यादव का गठबंधन बिहार में सत्ता में है, तो लालू यादव की पहली घोषणा सामने आई है कि प्रधानमंत्री पद के लिए अगर नीतीश कुमार उम्मीदवार हैं, तो मैं उनका समर्थन करूंगा. नीतीश कुमार के सामने पहली चुनौती मुलायम सिंह के रूप में खड़ी है. मुलायम सिंह देश के अकेले नेता होते जिन्हें संपूर्ण विपक्ष प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करना चाहता था. अगर उन्होंने एक पार्टी बना ली होती, अगर उन्होंने किन्ही अंजान कारणों की वजह से बिहार में नीतीश कुमार का और लालू यादव का विरोध न किया होता, तो अपनी-अपनी शंकाओं के बावजूद श्री एच डी देवगौड़ा, श्री ओम प्रकाश चौटाला, श्री कमल मोरारका, श्री लालू यादव और श्री नीतीश कुमार इस विचार के थे कि मुलायम सिंह के नेतृत्व में अगला लोकसभा चुनाव लड़ेंगे और इन्हें प्रधानमंत्री बनाएंगे.

लेकिन इतिहास के अंतरविरोध और संभवत: प्रोफेसर रामगोपाल यादव की सलाह पर मुलायम सिंह ने इस सारे प्रयास को ध्वस्त कर दिया. उन्होंने बिहार चुनाव के बाद नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में सामान्य शिष्टाचार के तहत अपने पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के तौर पर भी पटना जाने से रोक दिया. अब तक बिहार चुनाव की घोषणा तक जो दो तीन बैठकें हुई थीं उनमें शिवपाल यादव मुलायम सिंह जी के प्रतिनिध के रूप शामिल हुए थे, लेकिन इस बार उन दोनों को जाने से रोक दिया.

मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश में दोबारा सामजवादी सरकार चाहते हैं, मायावती वहां खामोश बैठी हैं, भारतीय जनता पार्टी बुरी तरह सक्रिय है. मुलायम सिंह के सारे कदम उत्तर प्रदेश में लोगों को डरा रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि मुलायम सिंह के फैसलों की वजह से उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को मजबूती मिल सकती है. दूसरी तरफ मुलायम सिंह जी भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ अभियान छेड़ते हुए अभी तक नहीं दिखाई दे रहे हैं. यहीं पर नीतीश कुमार और मुलायम सिंह का पहला आमना सामना होने वाला है.

नीतीश कुमार ने बिहार में पूर्ण शराबबंदी घोषित की है और उन्हें बिहार में जिस तरह महिलाओं का राजनीतिक समर्थन मिला है और वो राजनीतिक रूप से जिस तरह से गोलबंद हुई हैं, उसने नीतीश कुमार का उत्साह बढ़ा दिया है. नीतीश कुमार के पास देशभर की महिलाओं के समर्थन की चिट्ठियों के अंबार लगे हुए हैं. महिलाओं के प्रतिनिधिमंडल उनसे पटना जाकर मिल रहे हैं. नीतीश कुमार ने सारे देश में मद्यनिषेध के पक्ष में शराबबंदी लागू करने के लिए अभियान चलाने का फैसला किया है, जिसकी शुरुआत वो 15 मई को लखनऊ से करने जा रहे हैं. मुलायम सिंह के लोग नीतीश कुमार के इस कदम को राजनीतिक कदम के रूप में देख रहे हैं और उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार की राजनीतिक पहल का प्रारंभ मान रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के वो सारे वर्ग, जिनमें मुख्यत: किसान हैं और जो अब तक मुलायम सिंह के समर्थक रहे हैं, वो अब नीतीश कुमार के समर्थन में खड़े हैं. नीतीश कुमार को मिल रहे समर्थन या मिलने वाले संभावित समर्थन के पक्ष में मुलायम सिंह का एक बयान काफी मदद कर रहा है. मुलायम सिंह ने ये कहा कि मैंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिराई और चंद्रशेखर की सरकार बनवाई. जब वीपी सिंह की सरकार गिरी थी उस समय वीपी सिंह की सरकार के गिरने के पीछे का सबसे बड़ा कारण उनका मंडल कमीशन लागू करना था. इस मंडल कमीशन ने सारे देश में, हिंदुस्तान के पूरे इतिहास में पहली बार पिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी दी. आज देश की बदली हुई राजनीति की जड़ में विश्वनाथ प्रताप सिंह का मंडल कमीशन लागू करने का फैसला था.

सारे पिछड़े वर्ग के बीच ये सवाल पूछा जा रहा है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजपूतों के लिए, सवर्णों के लिए, ब्राह्मणों के लिए, सवर्ण गरीबों के लिए कोई निर्णय लागू नहीं किया. उन्होंने तो पिछड़ों के पक्ष में निर्णय लागू किया, जिसने देश में मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, एचडी देवगौड़ा, उमा भारती जैसे पिछड़े नेताओं का नेतृत्व स्थापित कर दिया, तो उस नेता के खिलाफ मुलायम सिंह क्यों खड़े हुए, उसकी सरकार क्यों गिराई, जो देश मे मंडल मसीहा माना जाता है. पत्रकार के नाते मुझे लगता है कि मुलायम सिंह से चूक हुई है और मुलायम सिंह का ये कहना कि मैंने वीपी सिंह की सरकार गिरवाकर चंद्रशेखर की सरकार बनाई, यह संदेह पैदा करता है कि मुलायम सिंह मंडल कमीशन के पक्ष में थे भी या नहीं.

उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार के पास संपूर्ण पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधियों का आना जाना लगा है. उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा पिछड़े वर्ग का तबका कुर्मी, जो उत्तर प्रदेश में सबसे ताकतवर पिछड़े यादव समाज से कहीं कम नहीं है, बल्कि गावों में उनसे ज्यादा मजबूत है. कुर्मी समाज नीतीश कुमार के साथ खड़ा हो गया है. अगर नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज और मुस्लिम समाज को अपने साथ ले लेते हैं, तब ये स्थिति एक तरफ मुलायम सिंह जी के लिए और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के लिए परेशानी खड़ी कर देगी.

नीतीश कुमार के लिए दूसरी बड़ी चुनौती कर्नाटक में है. कर्नाटक में एचडी देवेगौड़ा आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी के विरोधी माने जाते हैं, लेकिन उनके पुत्र कुमार स्वामी भारतीय जनता पार्टी के समर्थक माने जाते हैं. मुझसे श्री देवेगौड़ा ने एक रहस्य खोला कि मैंने अपनी पत्नी के सामने अपने बेटों को बुलाया और मैंने उनसे साफ पूछा कि क्या मेरे जीवित रहते हुए आप भारतीय जनता पार्टी से कोई समझौता करेंगे. मेरे बेटों ने मुझे मेरी पत्नी के सामने आश्वस्त किया है कि आपके जिंदा रहते हुए हम भारतीय जनता पार्टी के साथ कोई चुनावी गठबंधन नहीं करेंगे और न ही उसके साथ जाएंगे, लेकिन कर्नाटक में देवेगौड़ा के समर्थक वर्ग और कांग्रेस समर्थक वर्ग में अंतरविरोध है. देवेगौड़ा के ही बनाए हुए सिद्धारमैया इस समय कांगे्रस पार्टी के मुख्यमंत्री हैं.

कुमार स्वामी को लगता है कि जब तक सिद्धारमैया नहीं हटते तब तक कांग्रेस के साथ उनका समझौता नहीं हो सकता. उनका ज्यादा आसानी के साथ समझौता भाजपा के साथ हो सकता है. प्रदेश भाजपा के नए अध्यक्ष बीएस येदुरप्पा के साथ ज्यादा आसानी के साथ समझौता हो सकता है. इस अंतरविरोध को दूर करना नीतीश कुमार के लिए बड़ा चैलेंज है. देवेगौड़ा केरल मेें एमपी वीरेंद्र कुमार के जनता दल यूनाइटेड में शामिल होने को बहुत गुस्से से देख रहे हैं. इसलिए केरल में भी यही चुनौती नीतीश कुमार के सामने है.

नीतीश कुमार के सामने तीसरी बड़ी चुनौती मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में पार्टी को खड़ा करना है और उन सारी ताकतों को अपने साथ समेटना है, जो पिछले दो सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निराश हुए या निराशा की तरफ बढ़ रही हैं. नीतीश कुमार के सामने यह चुनौती इसलिए है, क्योंकि अगर वह 2019 के चुनाव में विपक्ष के साझा प्रत्याशी बनते हैं, तो इन राज्यों में नीतीश कुमार के समर्थक तो हैं, लेकिन समर्थक संगठन नहीं हैं. यहां पर मुलायम सिंह यादव और मायावती मिलकर नीतीश कुमार को बहुत अच्छी तरह परेशान कर सकते हैं.

नीतीश कुमार के सामने आखिरी सबसे बड़ी चुनौती राहुल गांधी स्वयं हैं. नीतीश कुमार की अब तक की जो योजना समझ में आई है, वो यह कि नरेंद्र मोदी का विरोध करने के लिए या संघ मुक्त भारत के नारे को साकार करने के लिए उन्हें कांग्रेस के समर्थन की भी जरूरत होगी, क्योंकि कांग्रेस पुरानी पार्टी और उसके लोग अभी भी गांव-गांव में हैं. पर कांग्रेस की जिस तरह की निर्णय पद्धति है, उसमें कांग्रेस के लोग राहुल गांधी का इस्तेमाल करने की जगह उन्हें कन्फ्यूज करने में ज्यादा रुचि रखते हैं.

आज सारे देश में राहुल गांधी को खुद कांग्रेस के लोगों ने हंसी का पात्र बना डाला है, लेकिन नीतीश कुमार का मानना है कि वो राहुल गांधी के साथ देश में संघ मुक्त नारे की रणनीति बना सकते हैं. पर राहुल गांधी को उनके साथी समझा रहे हैं कि अगर आपने एक बार भी नीतीश कुमार का समर्थन किया, तो फिर आपके हाथ से भविष्य के प्रधानमंत्री पद की ओर जाने की उम्मीद नीतीश कुमार के साथ चली जाएगी. यह जो भविष्य का डर है, ये नीतीश कुमार को विपक्ष का सर्वमान्य उम्मीदवार बनने देगा या नहीं बनने देगा, यह बहुत बड़ा प्रश्न है.

नीतीश के लिए सबसे आसान हरियाणा है, जहां ओमप्रकाश चौटाला ने उनसे कह रखा है कि वे जब कहेंगे, तब वे उनके साथ आ जाएंगे. उनकी कोई शर्त भी नहीं है, पर चौटाला के मन में डर अवश्य है कि कहीं चौधरी अजीत सिंह उनके प्रदेश में हस्तक्षेप करना न शुरू कर दें. चौटाला और अजीत सिंह के बीच जाट नेतृत्व को लेकर अघोषित युद्ध चलता रहा है. हालांकि चौधरी चरण सिंह के समय चौधरी देवीलाल जी उनके साथ थे, पर चौधरी चरण सिंह के देहांत के बाद स्थितियां बदल गईं.
उत्तर प्रदेश में भी अजीत सिंह नीतीश के साथ किन शर्तों के साथ आएंगे, यह प्रश्न जिंदा है.

अफवाहें चारों तरफ हैं कि अजीत सिंह एक ओर कांग्रेस से बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भाजपा से. वे मायावती से भी बात करना चाहते हैं. उनके पुत्र जयंत चौधरी की रणनीति कुछ अलग दिखाई देती है. वे हर सभा में अपने को चौधरी चरण सिंह का पोता बताते हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति की इस पहेली को सुलझाना नीतीश कुमार के लिए थोड़ा मुश्किल होगा. उत्तर प्रदेश में ही पीस पार्टी नीतीश के साथ मिल कर चुनाव लड़ना चाहती है. बहुत सारी और छोटी पार्टियां हैं, जो नीतीश के साथ आना चाहती हैं, पर सबके साथ बड़े अंतरविरोध भी हैं. नीतीश की अपनी पार्टी का उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा समर्थक आधार नहीं है, पर अब सभी नेता अपने लिए अग्रिम पंक्ति में स्थान सुनिश्चित करना चाहते हैं. यह स्थिति वीपी सिंह के साथ भी थी और अब यही नीतीश के साथ भी है.

क्या नीतीश कुमार उड़ीसा में नवीन पटनायक, बंगाल में ममता बनर्जी, दक्षिण में के. चंद्रशेखर राव से कोई संवाद बना पाएंगे, क्योंकि नीतीश कुमार भी ऐसे लोगों से घिरे हुए हैं, जो किसी भी राजनीतिक फैसले में पहले अपना स्वार्थ देखते हैं. उन्हें देश में वैचारिक लड़ाई की जगह अपना स्थान पहले नजर आता है. और नीतीश कुमार की समझदारी के ऊपर विश्वास रखते हुए भी यह विश्वास नहीं होता कि वे ऐसे लोगों से फिलहाल मुक्ति पा सकेंगेे. और सबसे बड़ी बात कि नीतीश कुमार के पास देश की लड़ाई लड़ने के लिए धन नहीं है.

बिहार के मुख्यमंत्री होने के नाते वो धन के लिए कोई कोशिश करेंगे, इसका विश्वास भी नहीं है. क्योंकि नीतीश कुमार देश के उन चंद लोगों में हैं, जिन पर किसी भी तरह का कोई दाग नहीं है. देश के लोगों को उनमें तीन प्रधानमंत्रियों का सम्मिश्रण दिख रहा है, जिनमें वीपी सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी हैैं. इन तीनों की छवियां, तीनों की विचारधाराएं और तीनों के एक्शन कहीं न कहीं नीतीश कुमार में दिखाई देते हैं.

इसलिए नीतीश कुमार की ये रचनात्मक पहल कि सारे देश में वो शराबबंदी के लिए जाएंगे और हर जगह शराबबंदी के लिए आवाज उठाएंगे, उन्हें देश में मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक अनूठा राजनेता बनाती है. हालांकि, इस बात के खतरे हैं कि नीतीश कुमार के साथ के लोग उनके साथ रहते हुए उनके कदमों को कमजोर करें. इस बात की आशंका है कि सारे देश का शराब माफिया मिलकर नीतीश कुमार को बिहार में ही सत्ता से उतारने की पहल शुरू कर दे. और अगर उसके लिए उसे पांच हजार करोड़ भी खर्च करने पड़े तो वह ऐसा कर सकते हैं.

इसका मुकाबला करने का नीतीश कुमार के पास सिर्फ एक ही साधन है और वह है देश की जनता. देखते हैं कि नीतीश कुमार अपने सामने आने वाली इन चुनौतियों का कैसे सामना करते हैं हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी नीतीश कुमार को अपने लिए सबसे बड़ी चुनौती मान रहे हैं. इसीलिए वो नीतीश कुमार को राजनीतिक रूप से अनदेखा कर राहुल गांधी को अपना मुख्य विरोधी बता रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि वो राहुल गांधी को आसानी से गिरा सकते हैं. यही काम एक जमाने में इंदिरा गांधी ने किया था.

वो अपने सामने संघ को मुख्य विरोधी बनाती थीं, जबकि संघ उस समय राजनीतिक तौर पर कहीं मजबूत था ही नहीं और कदम भी नहीं उठा रहा था, जिसका इंदिरा जी को बहुत फायदा मिला. आज वही काम नरेंद्र मोदी कर रहे हैं. इसलिए नीतीश कुमार के सामने चुनौतियां इतनी गंभीर हैं कि उन चुनौतियों के भंवरजाल से नीतीश कुमार का निकलना एक राजनीतिक कौशल का उदाहरण होगा. पर देश के सामने एक नई राजनीतिक लड़ाई, जिसे हम देश में सालों बाद मुद्दे की लड़ाई के रूप में देखेंगे, सामने आने वाली है.

देखना है नीतीश कुमार को मुलायम सिंह यादव से कितनी चुनौती मिलती है और नरेंद्र मोदी नीतीश कुमार को घेरने के लिए उन्हीं के किन-किन साथियों के साथ हाथ मिलाते हैं. खेल मजेदार है. मीडिया पूरा नरेंद्र मोदी और मुलायम सिंह के साथ खड़ा है. नीतीश कुमार के विरोध में है. नीतीश कुमार भंवर से निकलेंगे या भंवर में लुप्त हो जाएंगे इसका बहुत बड़ा दारोमदार खुद नीतीश कुमार पर ही है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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