उम्मीद करिए कि एक बेहतर मानसून आए

wankhedeबॉम्बे हाईकोर्ट ने बीसीसीआई को आदेश दिया है कि वह महाराष्ट्र में खेले जाने वाले आईपीएल मैचों को किसी दूसरी जगह स्थानांतरित कर दे. मीडिया में महाराष्ट्र में मैच कराने की भी आलोचना हो रही और हाईकोर्ट द्वारा मैचों के स्थानांतरण के फैसले की भी खूब आलोचना हो रही है. लेकिन, सच्चाई यह है कि देश में फिलहाल गंभीर जल संकट बना हुआ है. महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र सूखे से बुरी तरह प्रभावित है. यह इस हिसाब-किताब का समय नहीं है कि मैचों के आयोजन में कितना पानी खर्च होगा या मैच न कराने से पानी की कितनी बचत होगी.

मुद्‌दा सांकेतिक है. यह ताकतवर और अमीर लोगों का एक भद्‌दा प्रदर्शन है. जैसे, उन्हें गरीबों की त्रासदी और तकलीफ से कोई सरोकार नहीं है. हाईकोर्ट ने आम जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए यह फैसला दिया है. इस फैसले पर यह सवाल नहीं खड़ा किया जाना चाहिए कि ऐसा करने से पानी की बचत होगी या नहीं होगी. दरअसल, यह पानी की मात्रा का सवाल नहीं है और सवाल यह भी नहीं है कि वह पानी लोगों के काम का है या नहीं. यह सवाल है सही और भद्र व्यवहार का.

मुझे लगता है कि बीसीसीआई को खुद ही जगह बदलने का प्रस्ताव देना चाहिए था. ऐसा करने के बजाए बीसीसीआई के सचिव ने एक सार्वजनिक बयान दिया. जिसमें उन्होंने कहा कि यह फैसला महाराष्ट्र सरकार को करना होगा क्योंकि यदि मैच दूसरी जगह चले जाते हैं तो महाराष्ट्र सरकार को कई सौ करोड़ रुपये का नुक़सान होगा. यह बहुत ही घटिया बयान है. बीसीसीआई जितनी जल्दी इस संबंध में सबक सीखेगी क्रिकेट के लिए उतना ही बेहतर होगा. पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को लेकर सख्त टिप्पणी की है. बीसीसीआई को अपना अहंकार त्याग देना चाहिए क्योंकि अहंकार लोकतंत्र में कहीं भी फिट नहीं बैठता.

दूसरी खबर रोहित वेमुला की मां और भाई द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने की है. यह एक ऐसा काम है जिसे अंबेडकर ने बहुत पहले किया था. अगर, हम हिंदू अपने अलग-अलग जातियों के भाईयों के साथ बेहतर बर्ताव नहीं करेंगे तो वे यही रास्ता अपनाएंगे. उनके बौद्ध धर्म अपनाने के बाद हम उनसे बेहतर बर्ताव करने लगेंगे क्योंकि वह दूसरा धर्म है. हिंदू समाज को आत्मचिंतन करना चाहिए. हमें पिछड़ी जातियों के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने, उन्हें ऊपर उठाने, पर्याप्त व उचित शिक्षा देने व समाज में सम्मान दिलाने के लिए कदम उठाने होंगे.

रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला बिल्कुल अलग मामला है, जिस पर केंद्र सरकार ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई. मैं उसकी मां के बौद्ध धर्म अपनाने के निर्णय से बिलकुल हैरान नहीं हूं. एक व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर रहा है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क इससे पड़ता है कि हम हिंदू समाज के लिए क्या कर रहे हैं. यह सरकार हिंदुत्व का अलमबरदार होने में गर्व महसूस करती है. आरएसएस उनका समर्थन कर रहा है, विश्व हिंदू परिषद उनका समर्थन कर रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू समाज के भीतर बहुत सारी कुरीतियां है.

उदाहरण के लिए छुआछूत, छोटी जाति के लोगों द्वारा ऐसे काम करना जिन्हें कोई नहीं करना चाहता, दहेज प्रथा आदि. हिंदू समाज में कम आमदनी वाले व्यक्ति समस्याओं से अधिक परेशान हैं. भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी संस्थाओं के लिए मुसलमानों और ईसाईयों की अनदेखी करने की बात तो समझ में आती है लेकिन उनका रचनात्मक योगदान तब माना जाएगा जब वे हिंदू समाज में सुधार के लिए काम करें, जिसकी फिलहाल सख्त जरूरत है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार इस पर गौर करेगी.

जैसा कि हमने पहले पानी के बारे में बात की, जल आयोग ने माना है कि देश में गंभीर जल संकट है. अगले दो महीने, जब तक मानसून नहीं आ जाता, बहुत कठिन हैं. लेकिन, इसमें कुछ किया नहीं जा सकता है, सिवाय इसके कि हम यह आशा करें कि इस वर्ष बेहतर मानसून आएगा. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार इस दिशा में सकारात्मक तरीके से काम करेगी.

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