केंद्र ने कहा पानी लो तो अखिलेश बोले बुंदेलखंड में बहुत पानी है! : प्यास पर पॉलिटिक्स घिनौनी

pani-ke-liye-dharnaउत्तर प्रदेश की सूखी जमीन पर नेताओं की शर्मो-हया पानी-पानी बुंदेलखंड में सुलग रही सियासी आग को केंद्र सरकार के पानी ने और बढ़ा दिया है. महोबा में वाटर एक्सप्रेस भेजे जाने को लेकर केंद्र और राज्य सरकार आमने-सामने है. दोनों तरफ से बेतुके बयान दिए जा रहे हैं और इनमें से कोई भी बैकफुट पर जाने को राजी नहीं है. जनता के हितों का ढिंढोरा पीट रही दोनों ही सरकारों ने प्यास को पॉलिटिक्स में बदलकर राजनीति की जो घिनौनी तस्वीर गढ़ी है, वह बेहद शर्मनाक है. शर्मनाक है केंद्र सरकार की वह पहल जो आधी-अधूरी की गई और शर्मनाक है राज्य सरकार का वह बयान जिनमें कहा गया कि बुंदेलखंड में पानी ही पानी है और इससे भी अधिक शर्मनाक है प्रशासन की वह रिपोर्ट जिसके आधार पर राज्य सरकार ऐसे गैर जिम्मेवाराना बयान दे रही है. जो प्रशासन संगीनों के साये में पानी बांट रहा हो, जिसकी नज़रों के सामने पानी के लिए अनशन और प्रदर्शन हो रहे हों और जिस प्रशासन ने पानी चोरी में खुद एक किसान को जेल भेज दिया हो, वह सरकार सब ठीक-ठाक होने का दावा करे तो इसे बेशर्मी नहीं तो क्या कहेंगे! फकत सियासत के लिए जनता के मौलिक अधिकारों, उनकी संवेदनाओं और संविधान प्रदत्त लोकतांत्रिक व्यवस्था से इस तरह का खिलवाड़ माफी के काबिल नहीं है.

जिस सूखे ने बुंदेलखंड को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया, आज वही सूखा यहां सियासत का जरिया बनाया जा रहा है. निरंतर हो रही किसानों की आत्महत्याओं, बढ़ते पलायन, भीषण विद्युत कटौती और बंजर हो चुकी कृषि भूमि जैसी समस्याओं से लापरवाह सियासतदान अब बुंदेलों की प्यास में राजनीतिक सफलता का जुगाड़ तलाश रहे हैं. यहां लोगों की संवेदनाओं को ताक पर रख सियासत का घिनौना खेल खेला जा रहा है. केंद्र सरकार वाटर ट्रेन भेजकर चुनावी वैतरणी पार करने की फिराक में है तो राज्य सरकार उसे रोक कर सत्ता वापसी का रास्ता टटोल रही है. इस सियासी नूराकुश्ती का अखाड़ा बन चुका बुंदेलखंड निरंतर बदहाली की तरफ अग्रसर है. उत्तर प्रदेश के इस सर्वाधिक पिछड़े क्षेत्र की दशा और उस पर होती पॉलिटिक्स का सच कितना घिनौना है, जानेंगे तो पैरों तले जमीन खिसक जाएगी. विगत पांच वर्षों से दैवीय आपदाओं का शिकार बुंदेलखंड नेताओं के लिए राजनीति की बिसात और प्रशासनिक अफसरों के लिए चारागाह बना हुआ है. व्यवस्था के यह दोनों अंग मिल बांटकर इस क्षेत्र को लूट रहे हैं. एक योजनाओं को तैयार करने के नाम पर तो दूसरा उन योजनाओं के कथित क्रियान्वयन की आड़ में सरकारी धन को ठिकाने लगा रहा है. खुले शब्दों में कहें कि बुंदेलखंड का सूखा नीति-निर्धारकों तथा प्रशासनिक तंत्र के लिए मोटी कमाई का जरिया बन गया है. पटरी से उतर चुकी यहां की व्यवस्था को पुनः बहाल करने का सिर्फ ढोंग रचाया जा रहा है. अगर ऐसा नहीं तो फिर पानी पर पॉलिटिक्स करने वाली राज्य सरकार को यहां की गंभीर समस्याएं नजर क्यों नहीं आ रहीं!

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बुंदेलखंड में पानी ही पानी है, जैसा हास्यास्पद बयान देने वाले सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री शिवपाल यादव को पानी नहीं केवल और केवल सियासत दिखती है. ऐसा भौंडा बयान देने से पहले महोबा जनपद के उन गांवों की तरफ एक नजर अवश्य दौड़ा लेनी चाहिए थी, जहां पुलिस की देख-रेख में पानी बांटा जा रहा है. कुछ बोलने से पहले उस एफआईआर पर भी गौर कर लेना चाहिए था, जो बीते दिनों पानी चोरी करने पर एक किसान के खिलाफ महोबा जल संस्थान द्वारा दर्ज कराई गई थी. केंद्र सरकार ने पानी की पेशकश क्या की महोबा डीएम से लेकर प्रमुख सचिव तक सब हालात काबू में बताने लगे. हद तो तब हो गई जब सूबे के मुखिया?अखिलेश यादव ने भी अपने मातहतों की उस रिपोर्ट को बिना जांचे परखे हरी झंडी दे दी. उन्होंने अपने मातहतों से यह भी नहीं पूछा कि जब महोबा में पानी का संकट नहीं है तो सैकड़ों टैंकर पानी प्रतिदिन कहां और क्यों बांटा जा रहा है! यदि सब ठीक-ठाक ही है तो फिर कबरई में हजारों लोग बाजार बंद कर धरने पर क्यों बैठने पर विवश हुए! मुख्यमंत्री अपनी अपाहिज मशीनरी से यह भी पूछ लेते कि जब महोबा में पर्याप्त पानी है तो हीरालाल यादव को पानी चुराने की क्या जरूरत थी कि उस पर मुकदमा दर्ज कराया गया! मुख्यमंत्री के सिपहसालार असल तस्वीर पर परदा डाल कर मुख्यमंत्री को दिखा रहे हैं और मुख्यमंत्री को वही देखना अच्छा भी लग रहा है. सच वह नहीं है जो प्रदेश सरकार की विकलांग मशीनरी पेश कर रही है. सच वह है जो बुंदेलखंड की चीख में सुनाई और दिखाई दे रहा है. सत्ता अलमबरदारों और सियासतदानों को इसे गौर से सुनना-समझना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि बुंदेलखंड के अभिशप्त लोग नेताओं के सत्ता-सुख और सत्ता की छीनझपट पर कहर बन कर टूटें. पानी और भूख पर सियासत नेताओं के बुरे दिन का मार्ग खोल रहा है.

पानी और अनाज के साथ बिजली की भी कटौती

पानी को राजनीति का हथियार बनाने वाले माननीयों और उनके इशारों पर नाचते प्रशासन को बुंदेलखंड में हो रही भीषण विद्युत कटौती नजर नहीं आती. विद्युत आपूर्ति के मामले में मुख्यमंत्री के आदेशों की खुलेआम खिल्ली उड़ाई जा रही है, यह मुख्यमंत्री को नहीं दिखता. महोबा में 22 घंटे विद्युत आपूर्ति के आदेश के बावजूद बमुश्किल कुछ घंटे ही बिजली दी जा रही है. अपनी दबंग और भ्रष्ट कार्यशैली के लिए मशहूर विद्युत विभाग का एक्सईएन नेकी राम किसी को भी ठेंगे पर रखने का दंभ भरता रहता है. जिलाधिकारी हों या फिर सत्ताधारी दल के स्थानीय नेता सब नेकी राम के ठेंगे पर ही रहते हैं. इस विभाग की मनमानी के खिलाफ बुंदेली समाज को धरने पर बैठे लगभग डेढ़ माह हो चला पर उनकी समस्याओं के निराकरण की बात तो छोड़ें, उनकी कोई बात भी नहीं सुन रहा. बुंदेलखंड में पानी की किल्लत पर केंद्र का ध्यान जाने का श्रेय यहां के बुद्धजीवी चौथी दुनिया को भी देते हैं. महोबा डीएवी इंटर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और वरिष्ठ समाजसेवी शिवकुमार गोस्वामी हों या कांग्रेस नेता और अधिवक्ता उमेश उपाध्याय या किसान नेता रामरतन गुरुदेव और हाजी हनीफ जैसे कई लोग यह कहते हैं कि यदि चौथी दुनिया ने बुंदेलखंड के सूखे को प्रमुखता से नहीं उठाया होता तो आज केंद्र सरकार नींद से नहीं जागती. बुंदेलखंड में समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय ज्यादातर समाजसेवियों का मत है कि नेताओं को प्यास पर राजनीति न कर उस समस्या के निराकरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. उधर, कबरई के लोग भी पानी की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं. पेयजल संकट से जूझ रहे कस्बा वासियों ने बीते आठ मई को पूरा बाजार बंद कर दिया और कबरई नगर पंचायत अध्यक्ष शिवपाल तिवारी की अगुवाई में धरने पर बैठ गए. देशभर में पत्थर उद्योग के लिए पहचाना जाने वाला कबरई आज जिले में सर्वाधिक प्यासा क्षेत्र है. यहां कई टैंकर लगाए गए हैं, लेकिन उनसे काम नहीं चल रहा. हाल ही में जल संस्थान और जल निगम के संयुक्त प्रयास पर तीन ट्यूब-वेल लगाए गए हैं और उनकी लाइन बिछाने का काम चल रहा है. जिला प्रशासन का दावा है कि प्रभावित क्षेत्रों में जलापूर्ति शीघ्र शुरू कर दी जाएगी. लेकिन स्थानीय लोग इस आश्‍वासन को झूठा बताते हैं.

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पानी की कहासुनी पर भतीजी को सूखे कुएं में फेंक दिया

प्रदेश के मुख्यमंत्री महोबा में पानी की कमी से इंकार करते हैं, मगर महोबा की असलियत यह है कि पेयजल के लिए लोग अनशन, धरना और प्रदर्शन से लेकर झगड़ा करने तक के लिए मजबूर हैं. यहीं नहीं पानी के लिए रिश्ते भी तार-तार हो रहे हैं. महोबा के थाना श्रीनगर अंतर्गत ग्राम पिपरामा़ङ्ग में घटित घटना पानी की समस्या की सच्ची तस्वीर दिखाती है. पिपरामाफ़ निवासी घनश्याम प्रजापति की आठ वर्षीया पुत्री क्रांति गांव में बने सरकारी हैंडपम्प में पानी भर रही थी तभी वहां घनश्याम का भाई किशन और उसकी पत्नी भी पानी भरने पहुंच गए. इन लोगों ने क्रांति की बाल्टी हटा कर अपनी बाल्टी लगा दी. क्रांति ने चाची से कहा कि वह पहले पानी भर ले, इस पर तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई. क्रांति ने जब यह कहा कि यह सरकारी हैंडपम्प है तो उसका चाचा किशन क्रांति को पास के सूखे कुएं में फेंकने की धमकी देने लगा. उसकी पत्नी ने क्रांति को कुएं में धकेल भी दिया. कुएं में गिरकर क्रांति बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो उसने चीख पुकार शुरू कर दी. कुएं से लड़की की आवाज सुनकर ग्रामीण इकट्ठा हो गए और उसे कुएं से निकाला. स्थानीय पुलिस को सूचना दी गई. क्रांति को पुलिस इलाज के लिए जिला अस्पताल लेकर आई. क्रांति को सीने और सिर में गंभीर चोटें आई हैं, लेकिन हत्या पर आमादा उसकी चाची और चाचा को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है.

पानी चोरी में जेल! फिर भी बहुत पानी है

महोबा जनपद मुख्यालय के बंधान वार्ड निवासी हीरालाल यादव जेल में हैं. उन पर जो आरोप हैं उसे सुनकर आप खुद समझ जाएंगे कि बुंदेलखंड में कहां और कितना सूखा है. छह मई को जल संस्थान के अवर अभियंता एसके वर्मा ने कोतवाली पुलिस को एक तहरीर दी जिसमें हीरालाल यादव को पानी चोर बताया गया. वर्मा का कथन था कि आरोपी ने वाटर सप्लाई लाइन के सेल्युज वॉल्व को ढीला कर पानी की चोरी की है. गौरतलब है कि तहरीर देने वाला यह वही विभाग है जिसके आला अफसर अपनी रिपोर्ट में पेयजल संकट से इंकार कर चुके हैं. अब सवाल यह उठता है कि जब शहर में पर्याप्त पानी है तो फिर हीरालाल यादव ने यह अपराध क्यों किया? इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि गंभीर से गंभीर मामलों पर कार्रवाई से कतराने वाली पुलिस ने आनन-फानन में जल संस्थान की तहरीर पर न केवल मुकदमा लिख लिया बल्कि बिना देरी किए आरोपी को जेल में भी ठूंस दिया. मानवीय पुलिस ने पानी चोर हीरालाल यादव पर लोक संपत्ति क्षति अधिनियम की धारा 430, 353 एवं 3/4 के तहत कार्रवाई की और संवेदनशील होने का बेहतर सबूत पेश किया.

हाथ में कटोरा, मदद का ढिंढोरा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि बुंदेलखंड में पानी पर्याप्त है. फिर पानी की व्यवस्था के लिए केंद्र से पैसा भी मांगते हैं. फिर यह भी कहते हैं कि बुंदेलखंड में उपलब्ध पर्याप्त पानी के वितरण के लिए 10 हजार टैंकर खरीदने हेतु केंद्र सरकार पैसा दे. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई तब मुख्यमंत्री ने सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल के लिए आवश्यक धनराशि शीघ्र अवमुक्त कराए जाने की मांग की थी. इसके बाद जब केंद्र ने ट्रेन से पानी भेजने का निर्णय लिया तो मुख्यमंत्री ने उसमें राजनीति घुसेड़ते हुए पानी लेने से मना कर दिया. जबकि इसके पहले मुख्यमंत्री ने सूखा मेमोरेंडम के तहत केंद्र से मांगी गई धनराशि का जिक्र करते हुए 1123.47 करोड़ रुपये मांगे थे. मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के समक्ष सीमित अनाज और सीमित चारे का भी रोना रोया था. लेकिन भूख और प्यास से किसानों की मौत या आत्महत्या की बात आती है तो मुख्यमंत्री समेत समस्त सरकार तरह-तरह के फर्जी दावे करने लगती है. मुख्यमंत्री ने केवल बुंदेलखंड के लिए सर्फेस स्त्रोत आधारित 24 पेयजल परियोजनाओं हेतु 1689.38 करोड़ रुपये मांगे. इसके अलावा सूखा प्रभावित जनपदों में नहरों से सम्बन्धित विभिन्न कार्यों के लिए भी केंद्र से रुपये मांगे गए. इसके पहले भी मुख्यमंत्री ने केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती से प्रदेश के पेयजल संकट से निपटने में मदद मांगी थी.

पैसा मांगते हैं, पर खर्च नहीं करते

विडंबना है कि सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों की राहत के लिए दी गई धनराशि किसानों को नहीं दी जा रही. प्रशासनिक अधिकारियों की प्राथमिकता में यह काम है ही नहीं. प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने आधिकारिक तौर पर यह माना है कि सूखा प्रभावित जनपदों में वितरित किए जाने के लिए सरकार ने 867 करोड़ रुपये दिए थे, लेकिन उसमें से केवल 52 करोड़ रुपये ही बांटे जा सके. प्रशासन की इस लापरवाही पर मुख्य सचिव ने गहरी नाराजगी भी जाहिर की है. लेकिन इस नाराजगी का प्रशासन तंत्र पर कोई असर नहीं. बुंदेलखंड के कई जिलों के जिलाधिकारियों ने यह भी शिकायत भेजी है कि जल निगम द्वारा अत्यंत धीमी गति से कार्य किया जा रहा है, जिसकी वजह से पेयजल समस्या से निपटने में मुश्किलें पेश आ रही हैं. सरकारी निर्देश है कि सूखे से प्रभावित प्रत्येक गांव में कम से कम एक तालाब पानी से अवश्य भरा हो, लेकिन प्रशासन को सरकार के इस निर्देश की कोई परवाह नहीं है.