सिंहस्थ में श्रद्धालुओं की कम आमद भी अलमबरदारों को कर रही चिंतित : अफरातफरी और अव्यवस्था का महाकुम्भ

Simhastha Kumbhमध्य प्रदेश शासन ने उज्जैन में प्रारंभ हुए सिंहस्थ पर करोड़ों रुपये खर्च तो कर दिए, परंतु पहले शाही स्नान के दिन ही भारी निराशा हाथ लगी. कहां सरकार प्रचार कर रही थी कि करोड़ों लोग सिंहस्थ में पहुंचेंगे और कहां पहले शाही स्नान में आंकड़ा पांच लाख को भी नहीं छू सका. प्रशासन और सरकार ने अपनी पूरी ताकत उज्जैन में झोंक दी, परंतु फिर भी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद नहीं हो सकीं. साधुओं से लेकर आने वाले श्रद्धालुओं तक में भारी असंतोष देखने को मिल रहा है. और तो और जिन दुकानदारों ने भारी भरकम रकम खर्च करके दुकानें लगाई हैं, उनके मन में भी भय व्याप्त हो गया है कि कहीं इस बार सारा मेला फ्लॉप न हो जाए.

सिंहस्थ प्रारंभ होने के पहले से ही उज्जैन में भारी अव्यवस्थाओं की खबरें सामने आ रही थीं, लेकिन सरकार ने अपने प्रचार के दम पर उन्हें दबा दिया. जैसे ही कुम्भ शुरू हुआ, फिर से परतें खुलने लगीं. सरकार की तरफ से उज्जैन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई थी, इसके बाद भी वहां व्यवस्थाओं के नाम पर सबसे अधिक शौचालय ही शौचालय दिखाई दे रहे थे, उनमें भी पानी की आपूर्ति नगर निगम नहीं कर पा रहा था. सड़कें बनाने का दावा तो बहुत किया गया था, लेकिन कुछ पुलों को छोड़कर उज्जैन में कोई नई सड़क नहीं दिखाई दी. पुरानी सड़कों की ही लीपापोती कर दी गई और मेला क्षेत्र में मिट्टी डालकर सड़कें बना दी गईं, जिनमें शुरुआती दौर में ही कीचड़ होने लगा. पूरे मेला क्षेत्र में शौचालय और पुलिस कर्मियों के अलावा और कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था.

एक बार मेला घूमने वालों के कपड़ों पर धूल की परत चढ़ती दिखाई दी. शाम के बाद तो आधे रास्ते बंद कर दिए जाते, ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों में से अधिकांश बाहरी होने के कारण वहां आने वालों को रास्ता तक नहीं बता पा रहे थे. अधिकांश लोग पुलिस व्यवस्था से त्रस्त नज़र आ रहे थे. रामघाट क्षेत्र प्रशासन के अधिकारियों की मौज का स्थल अधिक बना हुआ था. साधुओं के लिए तो पूरा कुम्भ भरा है, लेकिन इसका सही आनंद प्रशासनिक अधिकारी और उनके परिजन व रिश्तेदार ही उठा रहे थे. सामान्य व्यक्ति को तो भटकना ही पड़ रहा था. कोई रामघाट में स्नान करना चाहता था तो उसे भूखी माता मंदिर क्षेत्र में भेज दिया जा रहा था.

वीआईपी वाहनों के अलावा किसी को कोई सुविधा नहीं थी. प्रभारी मंत्री भूपेंद्र सिंह अपनी लाल बत्ती जलाकर सायरन बजाते हुए घूमने के अलावा कुछ कर नहीं पा रहे थे. उनके पास किसी समस्या का हल नहीं था. उनके जिम्मे शायद साधु-संतों के पंडालों में फीता काटने के अलावा जैसे कोई काम ही नहीं था. सुविधाओं या व्यवस्थाओं की बात करने पर वे अधिकारियों की ओर संकेत कर देते थे. साथ ही यह भी कहते सुने गए कि अब इतना बड़ा मेला है तो कुछ अव्यवस्थाएं तो होना स्वाभाविक है.

जैसा कि सिंहस्थ की तैयारी के पूर्व यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पिछले सिंहस्थ की तरह इस सिंहस्थ में साधुओं और प्रशासन के बीच कोई न कोई टकराव होगा, वह स्थिति सिंहस्थ के कुछ ही दिनों बाद सामने आ गई और यह साफ हो गया कि प्रशासनिक अधिकारियों और साधुओं में व्यवस्थाओं को लेकर अभी भी टकराव कायम है और इसको लेकर साधुओं में आक्रोश व्याप्त है. एक तरफ सरकार सिंहस्थ में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने का दावा कर रही थी, उसका वह दावा भी कुछ ही दिनों में हवा हवाई साबित होता नज़र आ रहा है.

कहने को तो सरकार और प्रशासन ने सिंहस्थ की सुरक्षा के लिए पूरे प्रदेश से बुलाए गए लगभग 25 हजार से अधिक पुलिस कर्मियों और अफसरों की तैनाती कर रखी है, लेकिन इसके बावजूद सुरक्षा की स्थिति यह है कि जनता की बात तो छोड़िए, साधु-संतों के डेरों में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं है. सिंहस्थ में जहां पुलिस सुरक्षा के नाम पर सक्रिय दिखाई दे रही है, वहीं चोर-लुटेरे भी साधुओं के डेरों से लूट और चोरी चपाटी करने में अपने हाथ की सफाई दिखा रहे हैं. सिंहस्थ के कुछ ही दिनों बाद सुरक्षा की जहां पोल खुली, वहीं पुलिस की सुरक्षा के नाम पर जो भय का वातावरण सिंहस्थ क्षेत्र में निर्मित किया गया उससे साधु-संतों में आक्रोश व्याप्त है. सिंहस्थ की सुरक्षा के लिए हजारों पुलिस जवान तैनात किए गए उसके बावजूद गत दिनों महंत विजयगिरि फौजी बाबा ने एक चोर को पकड़ा, लेकिन पुलिस ने उसे छोड़ दिया.

महंत वासुदेवानंद गिरि के डेरे से डेढ़ लाख रुपये और महंत रजनीशानंदगिरि के पंडाल से दो लाख रुपये की चोरी होने की घटनाएं घटित हुईं. वहीं महंत नरेन्द्र गिरि के यहां से साढ़े तीन लाख रुपये गायब होने की घटना बताई गई. चोरी की इन घटनाओं के साथ-साथ एक पंडाल में किसी ने जलता अखबार डाल दिया. आग बुझाने में वृंदावन के भरत गिरि के हाथ जल गए. कुल मिलाकर इन घटनाओं को देखते हुए यह साफ हो गया है कि सिंहस्थ में दिखावे के लिए पुलिस की भले ही व्यवस्था की गई हो, लेकिन यह स्पष्ट है. मेला क्षेत्र में चोर-लुटेरे और बदमाश सक्रिय हैं. सिंहस्थ प्रशासन ने पहले शाही स्नान के दौरान भारी भरकम पुलिस बल तैनात कर भय का वातावरण निर्मित किया था, जिसकी वजह से प्रथम शाही स्नान में दर्शनार्थी डुबकी नहीं लगा सके, इसको लेकर भी साधुओं में आक्रोश व्याप्त है. सवाल यह उठता है कि जब सिंहस्थ में आए साधु-संतों की सुरक्षा इतनी भारी भरकम पुलिस नहीं कर पा रही है तो मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की क्या स्थिति होगी.

सिंहस्थ के कुम्भ मेले में चोरी-चकारी और गाड़ियों की तोड़फोड़ जैसी घटनाओं से साधु-संत काफी नाराज़ हैं. साधुओं का गुस्सा इतने चरम पर पहुंच गया कि दत्त अखाड़ा क्षेत्र में उन्होंने चक्का जाम भी कर दिया और पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. साधुओं ने इस दौरान तलवार-भाले हवा में लहराए. जूना अखाड़े से जुड़े साधुओं के डेरे में शरारती तत्वों ने लगातार कई घटनाओं को अंजाम दिया. इसी दौरान एक साधु की कार पर गोली चलाई गई और प्रशासन इंकार करता रहा. सिंहस्थ के दौरान दत्त अखाड़ा स्थित गंगागिरि के आश्रम के संत तपस्वी गिरि पर एक युवक ने तलवार से हमला कर दिया. घटना के बाद घायल संत को जिला अस्पताल लाया गया. हालत बिगड़ने पर उन्हें इन्दौर रेफर कर दिया गया.

जानकारी के मुताबिक, भूखी माता मन्दिर के पास गुजरात के महेन्द्र गिरि का आश्रम है, वहां महेन्द्र गिरी के शिष्य तपस्वी गिरि पर अज्ञात आरोपी ने तलवार से वार कर दिया, पंडाल में तब चार-पांच सेवादार मौजूद थे, जबकि घटना के समय महेन्द्र गिरि पास के ही पंडाल में गए हुए थे, हमले के बाद तपस्वी को खून की उल्टी हुई, जब सेवादार वहां पहुंचे तो गिरि खून से लथपथ थे, गले में गंभीर चोट आ जाने की वजह से कुछ बोल नहीं सके, केवल इशारे में ही किसी मूंछ वाले का जिक्र उन्होंने किया. इस घटना से सवाल यह भी उठता है कि जब सिंहस्थ के अवसर पर उज्जैन में एक बड़ा अस्पताल तैयार किया गया और जिसको लेकर तमाम दावे किए गए तो जख्मी साधु को उपचार के लिए उज्जैन से इंदौर क्यों रैफर किया गया?

सिंहस्थ के प्रचार को लेकर सरकार सबसे ज्यादा सक्रिय और सतर्क रही है, लेकिन सिंहस्थ की व्यवस्थाओं को लेकर एक समय ऐसा भी आया, जब पत्रकारों ने ही मीडिया सेंटर के बाहर धरना दे दिया. पहले तो जनसंपर्क विभाग से भोपाल के पत्रकार ही नाराज थे, क्योंकि सिंहस्थ के पास बनाने को लेकर कथित रूप से पक्षपात किया गया. इसके बाद उज्जैन में जो मीडिया सेंटर बनाया गया, वह किसके लिए था, यही समझ में नहीं आया. वहां मीडिया वालों को कोई महत्व ही नहीं दिया जा रहा था. सूचनाएं देने के लिए कोई अधिकारी हर समय उपस्थित नहीं रहता था. जो मीडियाकर्मी वहां पहुंचे, उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया तो पत्रकारों में गुस्सा बढ़ गया. अनेक पत्रकार मीडिया सेंटर के बाहर धरने पर बैठ गए. बाद में कुछ अधिकारियों ने समझा-बुझाकर उन्हें शांत किया. लेकिन अभी भी मीडिया के लोगों में सरकार और प्रशासन के प्रति भारी नाराज़गी है.

हाईटेक सिंहस्थ का यह हाल!
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कार्यकाल किस्म-किस्म के प्रतिमान स्थापित करने का काल रहा है. व्यापमं और डीमैट घोटाला इसी शासनकाल की देन हैं. भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने का मामला हो या राज्य में अवैध कारोबारियों और अवैध उत्खनन करने वाले लोगों को संरक्षण देने का मामला, सबमें मध्य प्रदेश सरकार अग्रणी रही है. ठीक उसी तरह सिंहस्थ कुम्भ भी अराजक शासनिक-प्रशासनिक दुष्चक्र में फंस गया है. सिंहस्थ महाकुंभ मेला इस बार बिल्कुल नए कलेवर के साथ हाईटेक और ईको-फ्रेंडली व्यवस्था के रूप में प्रचारित होकर तो आया लेकिन वास्तविकता में यह कुछ और ही निकला. 22 अप्रैल को इसका शुभारंभ प्रथम शाही स्नान के साथ हुआ.

पहले शाही स्नान में जितने श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद की जा रही थी उससे बहुत कम संख्या में लोग आए और पहला शाही स्नान श्रद्धालुओं और धमार्थियों की दृष्टि से पूरी तरह असफल रहा. इसके पीछे क्या कारण हैं यह सरकार और मेला प्रबंधन जाने, लेकिन सोच का विषय यह है कि जिस सिंहस्थ की तैयारी के लिए करोड़ों रुपये प्रचार-प्रसार में फूंक दिए गए, करोड़ों रुपये के स्थाई और अस्थाई निर्माण कार्य कराए गए, नभ से लेकर थल तक सिंहस्थ का प्रचार इस तरह किया गया कि मानो कोई भव्य कॉर्पोरेट आयोजन हो रहा हो, लेकिन समय आने पर सब फिस्स हो गया. इस प्रचार के पीछे बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री के रणनीतिकारों की सिंहस्थ के बहाने शिवराज सिंह को नरेंद्र मोदी के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की परिकल्पना काम कर रही थी.

प्रचार में तो शिवराज सरकार सफल रही, लेकिन आस्थाओं और परम्पराओं के अनुरूप एक धार्मिक आयोजन के रूप में सिंहस्थ आम लोगों को नहीं खींच पाया. अब भीड़ जुटाने का अलग से जतन किया जा रहा है. आयोजन में सरकार द्वारा जिस तरह से पानी की तरह पैसा बहाया गया और जिस तरह के निर्माण कार्यों और व्यवस्था का सरकारी ब्यौरा आया, उसने सिंहस्थ के भ्रष्टाचार के महाकुम्भ की तरफ भी इशारा किया. सरकार ने साधु-संतों को भी खुश करने या अव्यवस्थाओं की
अनदेखी करने के लिए उन्हें उनके ओहदे के मुताबिक  दान-दक्षिणा पहले ही दे दी. स्वाभाविक है यह दक्षिणा भी करोड़ों में ही होगी.
-अवधेश पुरोहित

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *