राज्यों और केंद्र के चुनाव एक साथ क्यों नहीं हो सकते

parliamentनई दिल्ली (चौथी दुनिया, मेघनाद देसाई) : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र और राज्यों में एक साथ चुनाव करने के अपने पुराने सुझाव को एक बार फिर दोहराया है. दरअसल यह ऐसा सुझाव है जिसके क्रियान्वयन का समय आ गया है. इस पर विधायिका और सिविल सोसाइटी में गंभीर चर्चा होनी चाहिए. कांग्रेस के साथ परेशानी यह है कि वह अभी तक अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाई है. एक साथ चुनाव करवाने के विचार पर उसने एक बार फिर से उत्तराखंड के मुद्दे को उछाल दिया. अगर उत्तराखंड मामले से कोई नतीजा निकाला जा सकता है तो वह यह है कि भारतीय लोकतंत्र अब परिपक्व हो गया है. धारा-356 का इस्तेमाल जिस तरह नियमित रूप से इंदिरा गांधी करती थीं, अब वह राज्यों को मंज़ूर नहीं है क्योंकि अब राज्य लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए सदन को संभाल कर रखना चाहते हैं. बहरहाल नरेंद्र मोदी को इंदिरा गांधी के धारा-356 के इस्तेमाल के रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए चार टर्म के लिए प्रधानमंत्री बनना पड़ेगा.

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राज्यों और केंद्र में एक साथ चुनाव करने के प्रस्ताव में एक खूबी यह कि ऐसा करने से धारा-356 की वजह से पैदा हुई विसंगतियां दूर हो जाएंगी. जैसा कि मैंने हाल ही में कहा था कि केंद्र द्वारा राज्यों के फैसले को रद्द करने का विचार संघवाद (फेडरलिज़म) के सिद्धांत के विरुद्ध है. यदि केंद्र सरकार केंद्र में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं कर सकती, तो फिर राज्य इस बोझ को क्यों बर्दाश्त करें? एक साथ होने वाले चुनाव यह भी सुनिश्‍चित करेंगे कि केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार बराबर हैं. ऐसा करने पर राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव आएंगे और भारत की जनता को हमेशा चलने वाले चुनावों से निजात मिल जाएगी. और सरकारें अपना ध्यान नीति निर्धारण पर केंद्रित करेंगी.

लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है. भारत का लोकतंत्र ब्रिटिश संसद के मॉडल पर निर्मित हुआ है, जहां सरकारें अविश्‍वास मत से हटाई जा सकती हैं. इससे यह सुनिश्‍चित हो जाता है कि सरकार को संसद (जो जनता का प्रतिनिधित्व करती है) का समर्थन हासिल है या नहीं. यदि सरकार को संसद का समर्थन हासिल नहीं होता तो उसे सत्ता छोड़नी पड़ती है और नए चुनाव कराने होते हैं. केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ कराना तभी संभव है जब एक बार चुनी हुई सरकार कम से कम पांच वर्ष तक सत्ता में बनी रहे, चाहे उसे संसद/विधानसभा का समर्थन हासिल हो या नहीं, लेकिन ऐसा करना लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध लगेगा.

ब्रिटिश पार्लियामेंट ने कंजर्वेटिव पार्टी और लिबरल डेमोक्रेट्स की पिछली गठबंधन सरकार के कार्यकाल में एक क़ानून पारित किया था कि जो इसके लिए एक रास्ता पशस्त करता है. एक कम जनाधार वाली पार्टी की हैसियत से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी का राजनीतिक मामलों, खासतौर पर वोटिंग और लोकतांत्रिक प्रणाली में बदलाव को लेकर, उसका रवैया हमेशा से सख्त रहा है. लिहाज़ा वर्ष 2011 में जैसे ही गठबंधन सरकार सत्ता में आई ब्रिटिश संसद ने फिक्स्ड-टर्म पार्लियामेंट एक्ट-2011 पारित कर दिया. इस एक्ट ने यह निर्धारित कर दिया कि ब्रिटेन में हर पांच साल बाद मई महीने के पहले बृहस्पतिवार को चुनाव होंगे. सत्ता में बैठी सरकार को हटाकर नए चुनाव तभी करवाए जा सकते हैं जब संसद के दो तिहाई सदस्य (जिनमें अनुपस्थित सदस्य भी शामिल हैं) समय से पहले चुनाव कराने का प्रस्ताव पारित कर दें या इसी बहुमत से सरकार के विरुद्ध अविश्‍वास प्रस्ताव पारित कर दें. यदि पंद्रह दिन के अंदर सरकार इस प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से गिराने में नाकाम हो जाती है तो चुनाव में जाने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं बचता है. लिहाज़ा जब तक दो तिहाई सांसद नये चुनाव नहीं कराना चाहेंगे,  तब तक हर एक सरकार अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी. यह बहुत ही सख्त लेकिन तर्कसंगत क़ानून है.

भारतीय परिप्रेक्ष्य में दो तिहाई की बहुमत को संशोधित करके 60 प्रतिशत तक लाया जा सकता है. कहने का तात्पर्य यह है कि चुनी हुई सरकार को आसानी से बर्खास्त नहीं किया जाना चाहिए. यूनाइटेड किंगडम की यह नीति इस क्षेत्र की दूसरी संसदों पर लागू नहीं होती, क्योंकि वेस्टमिनिस्टर स्थित संसद के पास इसका अधिकार नहीं है. भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो धारा-356 की पुनर्समीक्षा कोई गलत बात नहीं होगी.

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