राजनीति

खनन के लिए खत्म होगी ग्राम सभा की सहमति!

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morga_gram_sabhaवीद पीपुल ऑफ इंडिया के मूल में पीपुल यानी जनता है. देश, व्यवस्था, संविधान सब कुछ जनता के लिए, जनता के द्वारा बनाई गई है. भारतीय लोकतंत्र का मूल भी यही है. ऐसे में, जब संविधान सम्मत संस्था ग्राम सभा की बात की जाती है तो इसकी स्थिति किसी भी सूरत में लोकसभा या विधानसभा से ऊपर है. इसलिए, क्योंकि यह कभी भंग न होने वाली संस्था है, जिसके सदस्यों का चुनाव नहीं होता बल्कि एक खास गांव के सभी मतदाता अपने-आप इसके सदस्य होते हैं. स्वशासन का इससे बेहतरीन उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता. संविधान से ग्राम सभा को अधिकार भी मिले हुए हैं. यह अधिकार कितने महत्वपूर्ण हैं, इसका अंदाजा नियामगिरी मामले में पूरे देश को हो चुका है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक ने नियामगिरी में वेदांता द्वारा खनन मामले में यह व्यवस्था दी कि संबंधित ग्राम सभा यह तय करें कि खनन हो या न हो. इसके बाद 12 ग्राम सभाओं ने जो फैसला दिया, वह पूरे देश के लिए नजीर बन गया. जाहिर है, कॉरपोरेट ताकतों और सरकार को भी यह एहसास हुआ कि ग्राम सभाएं उनके फैसलों के रास्ते में एक बड़ी रुकावट बन सकती हैं, इसलिए अब ऐसी चर्चा जारी है कि खनन के लिए क्यों नहीं ग्राम सभा की सहमति को ही समाप्त कर दिया जाए या फिर इसमें और अधिक ढील दे दी जाए. कुल मिला कर ऐसी आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में खनन के लिए ग्राम सभा की सहमति को खत्म किया जा सकता है या इस प्रावधान को कमजोर किया जा सकता है.

पिछले दिनों एनडीए सरकार के दो मंत्रालयों के बीच आधिकारिक पत्रों का आदान-प्रदान हुआ. पत्रों का यह आदान-प्रदान जनजातीय मामलों के मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के बीच हुआ. इन पत्रों से जाहिर होता है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता)अधिनियम, 2006 (एफआरए) के प्रावधानों से पीछा छुड़ाने का मन बना लिया है, ताकि वन क्षत्रों में निजी भूमिगत खनन की अनुमति दी जा सके. इन पत्रों का आदान-प्रदान जून 2015 और दिसंबर 2015 के बीच किया गया. ये पत्र वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में दोनों मंत्रालयों के बीच की रस्साकशी को जाहिर करते हैं. जबकि जन जातीय मामलों के मंत्रालय ने बार-बार अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि वनभूमि को औद्योगिक परियोजनाओं को आवंटित करने से पहले एफआरए के प्रावधानों के मुताबिक ग्राम सभा की सहमती लेनी आवश्यक है. वहीं ऐसा लगता है कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, सहमति के इस क्लॉज़ को हटाए जाने पर अड़ा हुआ है.

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ये पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के इस विचार की तरफ भी इशारा करते हैं कि एफआरए विकास परियोजनाओं में बाधक का काम कर रहा है. दोनों मंत्रालयों के बीच बहस की शुरुआत अप्रैल 2015 में शुरू हुई जब पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पीएमओ और कैबिनेट सचिवालय के निर्देशों के तहत एफआरए से सहमति के क्लॉज़ समाप्त करने का एकतरफा मसौदा तैयार किया. उसके बाद जन जातीय मामलों का मंत्रालय जो एफआरए को लागू करने का नोडल मंत्रालय है, ने इस ड्राफ्ट आदेश के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त की है और इस मसौदे को अवैध करार देते हुए इसे न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप की संज्ञा दी.

उसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने जन जातीय मामलों का मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के बीच चल रहे विवाद में हस्तक्षेप किया और मसौदे की समीक्षा के लिए कानून मंत्रालय की सलाह मांगी. बहरहाल, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जून से अगस्त महीने के दौरान कई बार कानून मंत्रालय से अपना रुख स्पष्ट करने का अनुरोध किया, लेकिन इसके बावजूद कानून मंत्रालय ने अपना रुख साफ नहीं किया. अख़बारों में छपी रिपोर्टों के मुताबिक 18 नवंबर 2015 कोे पर्यावरण मंत्रालय ने दोनों मंत्रालयों के सचिवों की बैठक बुलाई ताकि एफआरए के तहत खनन के लिए वनभूमि के इस्तेमाल के लिए पूर्व सहमति लेने की जरूरत न हो. हालांकि, इन मीटिंग्स के मिनट्‌स जिसे जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने तैयार किया है और जिस पर जनजातीय मामलों के मंत्रालय के उपसचिव रुपक चौधरी के हस्ताक्षर हैं. उसके मुताबिक, ग्राम सभा की सहमति को समाप्त करने को लेकर मंत्रालय ने आपत्ति दर्ज कराई है. यानी, जनजातीय मंत्रालय ग्राम सभा की सहमति को हटाने के पक्ष में नहीं है. हालांकि, अभी इस मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. सरकार इससे इंकार भी कर रही है. लेकिन, विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा पिछले कुछ समय में जिस तरह से ग्राम सभा की अनदेखी करने की कोशिशें हुई हैं, केंद्र सरकार भी खुद जिस प्रकार से यह मान रही है कि विकास की राह में कई क़ानून बाधा बने हुए हैं, तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में ग्राम सभा, वन अधिकार कानून, पर्यावरणीय मंजूरी से संबंधित क़ानूनों, खनन से जुड़े क़ानूनों को बदला जाए या कमजोर करने की कोशिश की जाए.

सबसे पहले दो-तीन घटनाओं पर गौर करना चाहिए, जिसकी वजह से सरकारों को लगता है कि ग्राम सभाएं क्यों उनके कथित विकास योजनाओं की राह में बाधा बन रही हैं. हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने सरगुजा जिले के घटबर्रा गांव में आदिवासियों के उनके पारंपरिक भूमि पर वन अधिकार को खत्म कर दिया है. यहां परसा इस्ट और केंटेे बेसन कोयला ब्लॉक राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और अदानी खनिज प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित किए गए हैं. 8 जनवरी 2016 को पारित एक आदेश में सरकार ने वन अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए गांव में आदिवासियों के समुदाय भूमि अधिकार रद्द कर दिए. सरकार के आदेश में कहा गया है कि ग्रामीण वन अधिकार क़ानून का उपयोग कर गांव पास के कोल ब्लॉक खनन नहीं होने दे रहे थे. जाहिर है, वन अधिकार क़ानून के तहत आदिवासियों को जो अधिकार प्राप्त हैं. यह उसका सीधा-सीधा उल्लंघन है. आदिवासियों की वनभूमि को ग्राम सभा के आदेश या फैसले से ही किसी और उपयोग में लाया जा सकता है.

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दूसरी खबर यह है कि ओडिशा सरकार ने बाक्साइट खनन के लिए वेदांता की तरफदारी करते हुए सर्वोच्च न्यायलय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत पारंपरिक वन्य भूमि पर खनन हो या नहीं, इस निर्णय का संवैधानिक अधिकार उस क्षेत्र के आदिवासियों को दिया गया था. सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ओडिशा सरकार ने कहा कि यदि सरकार को लगता है कि जनता के अधिकारों के साथ न्याय किया गया है तो खनन के लिए ग्राम सभाओं की अनुमति की आवश्यकता नहीं है. ओडिशा सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि लांजीगढ़ बॉक्साइट खनन को अस्वीकृति देने वाली ग्राम सभा के प्रस्ताव सदैव लागू नहीं रह सकते हैं. गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 2013 के फैसले में यह आदेश दिया था कि डोंगरिया कोंध, कुटिया कंधा और अन्य आदिवासी समुदाय की 12 ग्राम सभाएं यह तय करेंगी कि ओडिशा के नियामगिरी पर्वतों पर उनके धार्मिक तथा अन्य अधिकार हैं कि नहीं. नियामगिरी पर्वत की चोटी के नीचे लांजीगढ़ में बॉक्साइट के खनन से उनके धार्मिक अधिकार प्रभावित तो नहीं होते हैं. 12 की 12 ग्राम सभाओं ने वेदांता के खनन प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था.

छत्तीसगढ़ के सरगुजा के हसदेव अरण्य क्षेत्र की करीब 20 ग्राम सभाओं ने एक प्रस्ताव पारित कर यह साफ कर दिया था कि वे अपने क्षेत्र में होने वाले को ब्लॉक आवंटन और कोयला खनन का विरोध करेंगी. गौरतलब है कि पिछली बार जब कोयला ब्लॉक आवंटन हुआ था तब 218 कोल ब्लॉक में 30 फीसदी सिर्फ छत्तीसगढ़ में आवंटित हुए थे. छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कोरबा में फैले हसदेव अरण्य में करीब 30 कोल ब्लॉक हैं. इनमें तीन कोल ब्लॉक ऐसे थे, जहां अदानी की कंपनी ज्वाइंट वेंचर के तहत खनन का काम कर रही थी. नई प्रक्रिया के तहत फिर से कोल ब्लॉक आवंटन का काम हुआ, लेकिन, हसदेव अरण्य क्षेत्र के गांव वालों ने पहले से ही अपना विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया था. इस क्षेत्र में आने वाली करीब 20 ग्राम पंचायतों ने ग्राम सभा की बैठक कर एक प्रस्ताव पारित किया. इस प्रस्ताव में गांव वालों ने स्पष्ट रूप से इस क्षेत्र में खनन कार्य का विरोध किया. यहां के निवासियों का कहना है कि चूंकि हमारे क्षेत्र में पेसा एक्ट(पंचायत एक्सटेंशन टू शिड्यूल एरिया एक्ट. यह आदिवासी इलाकों को विशेषाधिकार देता है) लागू है, इसलिए किसी भी कोल ब्लॉक के लिए जमीन अधिग्रहण करने से पहले सरकार के लिए यहां की ग्राम सभाओं की अनुमति लेना आवश्यक है. हसदेव अरण्य क्षेत्र में भी पेसा कानून लागू है. ग्राम सभा के इस प्रस्ताव के मुताबिक़ कोल ब्लॉक के आवंटन से पर्यावरण प्रभावित होगा, आदिवासी विस्थापित होंगे. यह प्रस्ताव कहता है कि किसी भी खनन परियोजना के आवंटन या नीलामी से पहले ग्राम सभा से पूर्व सहमति प्राप्त लेनी जरूरी है.

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लोकसभा न विधानसभा, सबसे बड़ी ग्राम सभा

वन अधिकार क़ानून के तहत किसी भी वन भूमि को खनन के लिए देने से पहले ग्राम सभा की सहमति की आवश्यकता होती है. आईए, जानते हैं कि ग्राम सभा होती क्या है और इसके मायने क्या हैं? किसी ग्राम की मतदाता सूची में जो नाम दर्ज होते हैं उन व्यक्तियों को सामूहिक रूप से ग्राम सभा कहा जाता है. ग्राम सभा में 200 या उससे अधिक की जनसंख्या का होना आवश्यक है. ग्राम सभा की बैठक वर्ष में दो बार होनी आवश्यक है. इस बारे में सदस्यों को सूचना बैठक से 15 दिन पूर्व नोटिस से देनी होती है. ग्राम सभा की बैठक को बुलाने का अधिकार ग्राम प्रधान को है. वह किसी समय असामान्य बैठक का भी आयोजन कर सकता है. ज़िला पंचायत राज अधिकारी या क्षेत्र पंचायत द्वारा लिखित रूप से मांग करने पर अथवा ग्राम सभा के सदस्यों की मांग पर प्रधान द्वारा 30 दिनों के भीतर बैठक बुलाई जाएगी. यदि ग्राम प्रधान बैठक आयोजित नहीं करता है, तो यह बैठक उस तारीख़ के 60 दिनों के भीतर होगी, जिस तारीख़ को प्रधान से बैठक बुलाने की मांग की गई है. ग्राम सभा की बैठक के लिए कुल सदस्यों की संख्या 5वें भाग की उपस्थिति आवश्यक होती है. किंतु यदि गणपूर्ति (कोरम) के अभाव की वजह से बैठक न हो सके, तो इसके लिए दोबारा बैठक का आयोजन किया जा सकता है. दरबार बैठक के  लिए 5वें भाग की उपस्थिति आवश्यक नहीं होती है. प्रत्येक ग्राम सभा में एक अध्यक्ष होगा, जो ग्राम प्रधान, सरपंच अथवा मुखिया कहलाता है तथा कुछ अन्य सदस्य होंगे. ग्राम सभा में 1000 की आबादी तक 1 ग्राम पंचायत सदस्य (वार्ड सदस्य), 2000 की आबादी तक 11 सदस्य तथा 3000 की आबादी तक 15 सदस्य होंगे.

ग्राम सभा और वन अधिकार क़ानून

8 दिसंबर 2006 को सर्वसम्मति से अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) क़ानून 2006 पारित किया गया था. इस क़ानून के तहत किसी दावेदार को यह साबित करना है कि वह वनों में रहने वाले हैं और जीविकोपार्जन के लिए वनों तथा वनभूमि पर निर्भर हैं. दूसरा ये कि उन्हें यह साबित भी करना है कि उपर्युक्त स्थिति पिछले 75 साल से बनी हुई है और वे वनवासी अनुसूचित जनजाति के हैं. इस क़ानून के तहत तीन बुनियादी अधिकारों को मान्यता दी गई है. विभिन्न प्रकार की जमीन, जिसकी  निर्धारण की आधार तिथि 13 दिसंबर 2005 है. पारंपरिक रूप से लघु वनोत्पाद, जल निकायों, चरागाहों आदि का उपयोग कर रहा हो. क़ानून की धारा 6 के  अनुसार यह तय किया जाएगा कि किसे अधिकार मिले. सबसे पहले ग्राम सभा सिफारिश करेंगी कि कितने अरसे से कौन उस जमीन को जोत रहा है, किस तरह का वनोत्पाद वह लेता रहा है, आदि. यह जांच ग्राम सभा की वनाधिकार समिति करेगी, जिसके निष्कर्ष को ग्राम सभा पूरी तरह स्वीकार करेगी. इस क़ानून के तहत स्वीकृत जमीन न बेची जा सकेगी और न उसका अधिकार दूसरे को हस्तांतरित किया जा सकेगा.

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