जीवन का ज्ञान : अशोक

saraca-indica_flowersऔषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

वक्षः

श्वास- 65 मिग्रा अशोक बीज चूर्ण को पान के बीड़े में रखकर खिलाने से श्वास रोग में लाभ होता है.

उदर रोग :

वमन- अशोक के फूलों को जल में पीसकर स्तनों पर लेप कर दूध पिलाने से स्तनपाई बालक का वमन रुक जाता है.

रक्तातिसार- अशोक के 3-4 ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्तातिसार में लाभ होता है.

गुदा रोग :

रक्तार्श- अशोक की छाल का क्वाथ बनाकर 15-25 मिली मात्रा में पिलाने से रक्तार्शजन्य रक्तस्राव बन्द हो जाता है.

अशोक की छाल और इसके फूलों को बराबर की मात्रा में लेकर 10 ग्राम मात्रा को रात्रि में एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें. सुबह पानी छानकर पी लें. इसी प्रकार सुबह का भिगोया हुआ शाम को पी लें. इससे (खूनी बवासीर) में शीघ्र लाभ मिलता है.

वृक्कवस्ति रोग :

अकरी (पथरी)- अशोक के 1-2 ग्राम बीज को पानी में पीसकर दो चम्मच की मात्रा में पीने से अश्मरीजन्य शूल का शमन होता है.

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प्रजननसंस्थान रोग :

प्रदर- अशोक छाल चूर्ण  और मिश्री को समभाग खरल कर, 3 ग्राम की मात्रा में लेकर गोदुग्ध के साथ प्रातः शाम सेवन करने से श्वेत-प्रदर में लाभ होता है.

15-25 मिली अशोक छाल क्वाथ को दूध में मिलाकर पातः सायं पिलाने से श्वेत-प्रदर और रक्त-प्रदर में लाभ होता है.

अशोक के 2-3 ग्राम फूलों को जल में पीसकर पीलाने से रक्त प्रदर में लाभ होता है.

मासिकविकार- अशोक छाल का क्वाथ बनाकर 20-30 मिली मात्रा में पिलाने से मासिक विकारों का शमन होता है.

स्वप्नदोष- 20 ग्राम अशोक की छाल को यवकुट कर 250 मिली जल में पकाएं, 30 मिली शेष रहने पर इसमें 6 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है.

6-12 ग्राम अशोक घृत को गुनगुने दूध अथवा जल के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के प्रदर रोग, कुक्षिशूल, कटिशूल, योनिशूल, मंदाग्नि, अरुचि, पाण्डु, श्वास, कास आदि रोगों का शमन होता है तथा बल, वर्ण व आयु की वृद्धि होती है.

20-25 मिली अशोकारिष्ट को प्रतिदिन भोजन के बाद सेवन करने से रक्तप्रदर, ज्वर, रक्तपित्त, रक्तार्श, मंदाग्नि, अरोचक, प्रमेह, शोथ आदि रोगों में अतिशय लाभ होता है.

अस्थिसंधि रोग :

अस्थिभंग– 6 ग्राम अशोक छाल चूर्ण को दूध के साथ प्रातः सायं सेवन करने से तथा इसी का प्रलेप करने से टूटी हुई हड्‌डी जुड़ जाती है और वेदना का शमन होता है.

वातव्याधि- वातरोग में स्नेहविरेचनार्थ अशोकघृत का प्रयोग हितकर है.

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त्वचा रोगः

त्वचाविकार- अशोक छाल स्वरस में सरसों को पीसकर छाया में सुखा लें, तत्पश्चात्‌ जब उबटन लगाना हो तब सरसों को इसकी छाल के स्वरस में ही पीसकर त्वचा पर लगाएं. इससे त्वचा का रंग निखरता है.

मुहांसे- अशोक से निर्मित छाल क्वाथ को उबालकर गाढ़ा होने पर इसे ठण्डा करके, इसमें बराबर की मात्रा में सरसों का तैल मिला लें. इसे मुहांसों, फोड़ों तथा फुन्सियों पर लगाएं. नियमित प्रयोग करने से लाभ होगा.

व्रण- घृत, प्रियंगु, अशोक रोहिणी की त्वक्‌, त्रिफला, धातकी, लोध्र तथा सर्जरस को समान मात्रा में लेकर, सूक्ष्म चूर्ण कर, व्रण पर छिड़कने से शीघ्र व्रण का रोपण होता है.

सर्वशरीर रोग :

बुद्धिवर्धक- अशोक की छाल तथा ब्राह्मी चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर एक-एक चम्मच सुबह-शाम, एक-कप दूध के साथ नियमित रूप से कुछ माह तक सेवन करने से बुद्धि तीव्र होती है.

सर्वांग शूल- अशोक का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से वेदना का शमन होता है.

प्रयोज्यांग : त्वक्‌ पत्र, पुष्प तथा बीज.

मात्रा : त्वक्‌ क्वाथ 50 मिली. बीज चूर्ण

2-4 ग्राम. पुष्प चूर्ण 1-3 ग्राम.

नोट : काष्ठदारु की प्रायः अशोक वृक्ष के रूप में पहचान की जाती है, जो गलत है; वास्तविक अशोक य सीता अशोक होता है, जिसमें सिंदूरी या लाल वर्ण के पुष्प आते हैं तथा काष्ठदारु में पीताभ-हरित वर्ण के पुष्प आते हैं. काष्ठदारु वृक्ष की लम्बाई (15-20 मी तक) भी वास्तविक अशोक (6-9 मी तक) से अधिक होती है.

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