अशोक : जीवन का ज्ञान

ashoka1परिचय

यह भारतीय वनौषधियों में एक दिव्य रत्न है. भारतवर्ष में इसकी कीर्ति का गान बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है. श्री सीता माता जी को लंका में प्रायः एक वर्ष तक इसी वृक्ष के नीचे रावण ने रखा था. प्राचीनकाल में प्रसन्नता एवं शोक को दूर करने के लिए अशोक वाटिकाओं एवं उद्यानों का प्रयोग होता था और इसी आश्रय से इसके नाम शोकनाश, विशोक, अपशोक आदि रखे गए हैं. सनातनी वैदिक लोग तो इस पेड़ को पवित्र एवं आदरणीय मानते ही हैं, किन्तु बौद्ध भी इसे विशेष आदर की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि भगवान बुद्ध का जन्म अशोक वृक्ष के नीचे हुआ था. इसका सम्बन्ध कामदेव से भी है.

पुष्प धन्वा कामदेव के पंचपुष्प बाणों में अशोक पुष्प की भी गणना की गई है और इसके पर्यायवाची नामों में स्मराधिवास, नट आदि नाम भी सम्मिलित किए हैं. अशोक के वृक्ष भारतवर्ष में सर्वत्र बाग-बगीचों में तथा सड़कों के किनारे सुंदरता के लिए लगाए जाते हैं. भारत के हिमालयी क्षेत्रों तथा पश्चिमी प्रायद्वीप में 750 मी की उंचाई पर मुख्यतः पूर्वी बंगाल, बिहार, उत्तराखंड, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में साधारणतया नहरों के किनारे व सदाहरित वनों में पाया जाता है. मुख्यतया अशोक की दो प्रजातियां होती हैं, जिनका प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है.

बाह्य-स्वरूप

अशोक- यह लगभग नौ मी उंचा, मध्यमाकार का सुंदर सदाहरित, छायादार वृक्ष होता है. इसकी कांड एवं शाखाएं अनेक तथा फैली हुई होती हैं, छाल गहरे भूरे से धूसर वर्ण की होती है. औषधि रूप में पेड़ की छाल का ही अधिक प्रयोग किया जाता है. इसके पत्र 5-25 सेमी लंबे तथा नोंकदार होते हैं. कोमलावस्था में यह श्वेताभ लाल वर्ण के परंतु बाद में गहरे हरे रंग के हो जाते हैं. पत्रकों के किनारे किंचित लहरदार होते हैं. इसके पुष्प नारंगी अथवा नारंगी-पीत वर्ण के, सिंदूरी वर्ण में परिवर्तित, अनेक, अत्यधिक सुगन्धित, गुच्छों में, 7.5-10 सेमी व्यास के होते हैं. इसकी फली चपटी, कृष्ण वर्ण की, चर्मिल, 10-25 सेमी लंबी, 3.5-5 सेमी चौड़ी, दोनों ओर संकुचित, सिरायुक्त होती है. इसके बीज 4-8, 3.8 सेमी लम्बे,

2.5-3.7 सेमी व्यास के चपटे होते हैं. पेड़ के काण्डत्वक्‌ से श्वेत रस निकलता है, जो शीघ्र ही वायु में सूखकर लाल हो जाता है. यही अशोक का गोंद होता है. इसका पुष्पकाल मार्च से अप्रैल तक तथा फलकाल अगस्त से अक्टूबर तक होता है.

नकली अशोक- इसका सदाहरति, सीधा तथा सुन्दर 15-20 मी उंचा वृक्ष होता है. असली अशोक के समान इसकी शाखाएं सघन नहीं होती हैं. इसका कांड सीधा एवं चिकना होता है. इसकी छाल धूसर-भूरे वर्ण की तथा पतली होती है. नवीन शाखाएं पतली तथा अरोमश होती हैं. इसके पत्र चमकीले हरित वर्ण के, 12.5-20 सेमी लंबे एवं 2.5-5 सेमी चौड़े होते हैं. वृक्ष के काफी बड़े हो जाने पर कई वर्षों बाद वर्षाकाल में इसमें आम के बौर जैसे पुष्प लगते हैं. इसके पुष्प 2.5-3.8 सेमी व्यास के, सघन, पीताभ-हरित वर्ण के होते हैं. फल छोटे, अंडाकार, एक बीजी, हरे, पक्वावस्था में बैगनी वर्ण के तथा अरोमश होते हैं. इसका पुष्पकाल फरवरी से मई तक तथा फलकाल जुलाई से सितंबर तक होता है.

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

अशोक

  • अशोक लघु, रूक्ष, कसैला, चरपरा, विपाक में कटु और शीतल होता है. यह ग्राही, रक्त-संग्राहक, वेदना-स्थापक, वर्ण को उज्जवल करने वाला, हड्‌डी जोड़ने वाला, सुगन्धित, हृद्य, त्रिदोषहर, तृषा, दाह, कृमि, शोथ, गुल्म, शूल, उदर रोग, आधमान, विष, अर्श, रक्त-विकार, गर्भाशय की शिथिलता, सर्व प्रकार के प्रदर, ज्वर, संधिवातज पीड़ा और अपच आदि रोगों का नाशक है. इसका प्रयोग कष्टार्तव, रक्तपित्त, अश्मनी तथा मूत्रकृच्छ्र में करते हैं. अशोक की छाल कटु, तिक्त, ज्वर व तृषा नाशक, आंत्रसंकोचक, अपच की बीमारी को दूर करने वाली, रक्त-विकार, थकावट, शूल, अर्श इत्यादि रोगों में लाभदायक है. इसके अतिरिक्त पेट बढ़ने की बीमारी, अत्यधिक रक्तस्त्राव तथा गर्भाशयगत रक्तस्त्राव में उपयोगी है. इसकी छाल का स्वरस बहुत संकोचक एवं रक्तप्रदर शामक है.
  • अशोक के बीज मूत्रल होते हैं.
  • अशोक के पुष्प रक्तजप्रवाहिका नाशक होते हैं.
  • अशोक की कांडत्वक्‌ तिक्त, तीक्ष्ण, शैत्यकारक, स्तम्भक, विषघ्न, कृमिरोधी, विशोधक, मृदुकारी, अजीर्ण, तृष्णा, दाह, रक्तविकार, काण्ड-भग्न, उदररोग, अर्श, व्रण, श्रम तथा गर्भाशयगत रक्तस्त्राव स्तम्भक होती है       जारी…