विनाश की तरफ पानी के पदचिन्ह

1देश की 33 फीसदी  आबादी पानी के अभाव से त्रस्त है. अकेले महाराष्ट्र के करीब 20 हजार गांव सूखे की चपेट में हैं. बुंदेलखंड से लोगों का पलायन सिर्फ पानी की वजह से हो रहा है. देश के कई हिस्सों में बंदूकधारी पानी पर पहरा दे रहे हैं. मानसून के कमजोर होने से देश के 91 प्रमुख जलाशयों में महज 25 फीसदी पानी ही शेष रह गया है. ऐसे में, देश में पानी पर सिवाए मन की बात के और कोई चर्चा होती नहीं दिख रही है. मन की बात भी ऐसी जिसमें किसी मुक्कमल उपाय पर चर्चा की जगह पानी बचाने की सनातन नसीहत सुनने को मिली. अभी तक भारत समेत पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर काफी बहस होती रही है. प्रदूषण को कम करने के लिए कार्बन फुटप्रिंट की भी बात होती है. हर एक उत्पाद, हर एक कंपनी की जांच होती है कि वह कितना कार्बन उत्सर्जित करती है. वैश्विक प्रयासों की वजह से इस दिशा में प्रगति होती दिखी भी है.

लेकिन, अब दुनिया के सामने एक नई समस्या है, पानी की कमी. अगर, हम सिर्फ भारत की बात करें तो पिछले कुछ महीनों में ही यह देखने को मिला है कि देश के 13 राज्य भीषण सूखे  की चपेट में हैं. लातूर से लेकर बुंदेलखंड और गुजरात से लेकर तेलंगाना तक में इंसान तो इंसान, जानवर भी पानी की कमी से जूझ रहे हैं. ऐसे में, पानी को लेकर तमाम तरह के तर्क-कुतर्क दिए जा रहे हैं. कुछ लोग इस गंभीर समस्या को मानसून से जोड़कर देखते हैं, कुछ इसे भौगोलिक और पर्यावरणीय समस्या मानते हैं. मानवीय कारण पर चर्चा के मामले में सिर्फ इतना सुनने को मिलता है कि आम आदमी को पानी कम खर्च करना चाहिए, हिसाब से खर्च करना चाहिए.

लेकिन, कोई यह नहीं बताता कि पानी के खर्च को कम कैसे करें? कोई यह नहीं बताता कि एक किलो कपास या गन्ना उगाने में कितना पानी खर्च हो रहा है? कोई यह भी नहीं बताता कि कोल्ड ड्रिंक्स बनाने वाली कंपनियां या बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियां नदियों और ज़मीन का कितना पानी सोख रही हैं. कोई यह भी नहीं पूछता कि पिछले 25 सालों में विभिन्न राज्य सरकारों ने वर्षा के जल को संग्रहित करने के लिए कितने तलाब, कुएं, नहरें आदि खुदवाईं, कितनी योजनाएं बनाईं?

सबसे पहले हम एक डाटा देखते हैं. दो आकड़े हैं एक 1951 का और दूसरा 2001 का. भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता जहां 1951 में 14,180 लीटर थी, वह अब 5,120 लीटर हो गई है. यह भूमिगत जल का हिसाब है. ऐसा माना जा रहा है कि अगले दस सालों के बाद यानी साल 2025 तक यह उपलब्धता और घटकर करीब 3 हजार लीटर रह जाएगी, तो यह सवाल है कि फिर क्या होगा? और, 2025 या 2050 की बात भी रहने दें तो मौजूदा समय में ही देश के 13 राज्यों में पानी की जो हालत है, वह क्या कहानी कहती है, इसे हम सब देख और समझ रहे हैं. लेकिन, इस सब के लिए अगर हम सिर्फ मानसून को जिम्मेदार मानते हुए आंखें मूंदे रहें तो, फिर हमारी हालत भी उस शुतुरमुर्ग जैसी ही होगी जो शिकारी को सामने देखकर अपना सिर ज़मीन में घुसा लेता है और यह सोचता है कि शिकारी उसे नहीं देख रहा है.

इसलिए, यह जरूरी हो जाता है कि सरकार और नागरिक समाज ईमानदारी से पानी संकट पर एक राष्ट्रीय बहस करें और पानी की कमी से बचने के रास्ते तलाशें. इसी कड़ी में हम इस कवर स्टोरी में दो मुद्‌दों पर चर्चा कर रहे हैं. पहला वाटर फुटप्रिंट और दूसरा कोल्ड ड्रिंक्स समेत बोतलबन्द पानी के व्यापार पर. हम इस बहस के जरिए जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर हमारा पानी जा कहां रहा है और इस जल संकट के लिए मानवीय हस्तक्षेप कितना जिम्मेदार है और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है.

दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा क्या है, इसकी जानकारी के लिए दुनियाभर में कार्बन फुटप्रिंट का इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह, मानवीय हस्तक्षेप के कारण पानी की खपत कहां और कितनी हो रही है, इसे जानने के लिए आजकल एक नई अवधारणा प्रचलन में है, जिसका नाम है वाटर फुटप्रिंट. वाटर फुटप्रिंट बताता है कि आप अपनी जिन्दगी में हर दिन किन स्त्रोतों से कितनी मात्रा में पानी की खपत कर रहे हैं. आमतौर पर लोग यह मानते हैं कि पानी की कोई कमी नहीं है, इसलिए जितनी मर्जी हो, खपत कर सकते हैं. लेकिन, ऐसा है नहीं. हालांकि, दुनिया  के कुछ हिस्सों में जरूर पानी अधिक है, लेकिन पानी के इस्तेमाल के वक्त यह याद रखना चाहिए कि दुनिया के कई हिस्से ऐसे भी हैं, जहां पानी बिल्कुल ही नहीं या बिल्कुल ही कम है. बहरहाल, इस स्टोरी के जरिए हम पानी से संबंधित उन पहलुओं पर चर्चा करेंगे जिनपर या तो चर्चा ही नहीं होती. यदि होती भी है, तो उसकी जानकारी सीमित होती है. हम पानी से संबंधित, सत्य और संभावित खतरे के साथ ही समाधान पर भी बात करेंगे.

सबसे पहले हम कुछ पहलुओं को चिन्हित करते हैं. भारत पिछले कुछ सालों से पानी की भीषण कमी के दौर गुजर रहा है. आखिर, मानसून से संबंधित सवालों से अलग, पानी की इस कमी की वजह और क्या-क्या हैं. इसमें कृषि, बोतलबन्द पानी, पेय पदार्थों समेत पानी के घरेलू इस्तेमाल का कितना योगदान है? हम इस पर भी बात करेंगे कि जब हम सौ ग्राम चावल खाते हैं तो असल में हम उसके  साथ कितने पानी का उपभोग करते हैं या फिर जब हम एक जींस पहनते हैं या एक कप कॉफी पीते हैं या एक लीटर बोतलबंद पानी पीते हैं या एक बोतल कोल्ड ड्रिंक पीते हैं, तब हम कितने पानी की बर्बादी कर रहे होते हैं और इससे बचने के क्या रास्ते हो सकते हैं? हम इस पर भी बात करेंगे कि हमारी मौजूदा कृषि तकनीक कितनी गैरजिम्मेदारी के साथ भू-जल का दोहन कर रही है और इसमें किस तरह के बदलाव की जरूरत है? इसमें नागरिक समाज के साथ ही सरकारों की क्या भूमिका हो सकती है? और, अंत में यह भी कि कार्बन फुटप्रिंट की तर्ज पर वाटर फुटप्रिंट को अपनाकर कैसे हम इस दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध से बचा सकते हैं.

मिनरल वाटर, कोल्ड ड्रिंक और पानी

सबसे पहले हम बात करते हैं बोतलबन्द पानी की. पिछले बीस सालों में भारत में बोतलबंद पानी के व्यापार में जो तेज़ी और तरक्की आई है, वह आश्चर्यजनक है. क्या आपको पता है कि जब आप एक बोतल पानी खरीदकर पीते हैं, तब आप उस पानी को कितनी कीमत पर खरीदते हैं और इसके  साथ ही आप कितना पानी बर्बाद कर देते हैं. शायद, आपको यह डाटा देखकर भरोसा न हो. लेकिन यही सच है और यह सच ऐसा है जो हमें दिनों-दिन पानी के संकट की ओर धकेल रहा है. मसलन, एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में पांच लीटर पानी खर्च होता है. एक डाटा के मुताबिक दुनियाभर में साल 2004 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया था. भारत में भी इस प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी बहाया गया.

यह अकारण ही नहीं है कि बनारस से लेकर केरल के गांववाले इन बोतलबंद कंपनियों और कोला कंपनियों के ख़िलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. इन जगहों पर भूमिगत जल का जिस तरह  दोहन किया गया है, उससे वहां पर भू-जल स्तर काफी नीचे चला गया है. कैलिफोर्निया के पेसिफिक इंस्टीट्यूट का कहना है कि 2004 में अमेरिका में 26 अरब लीटर पानी की पैकिंग के लिए प्लास्टिक की बोतलों के निर्माण के लिए दो करोड़ बैरल तेल का इस्तेमाल किया गया. प्लास्टिक की बोतलें भी भू-जल को प्रदूषित करती है और ग्लोबल वार्मिंग का कारण भी बनती हैं. कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली कंपनियां भी बेतहाशा पानी का दोहन करती हैं. बोतलबंद पानी और पेय निर्माता कंपनियां एक हजार लीटर भूमिगत जल के बदले महज कुछ रुपये सरकार को देती हैं.

कृषि और पानी

आईए, सबसे पहले कुछ दिलचस्प लेकिन खतरनाक डेटा पर नज़र डालते हैं. कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां कुल पानी का करीब 90 फीसदी से अधिक का इस्तेमाल होता है जबकि  घरेलू  उपयोग में लगभग 5 फीसदी पानी ही खर्च होता है. इसके अलावा, भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए करीब 1700 लीटर (देखें बॅाक्स) पानी खर्च होता है. यानी, अगर हमारे परिवार में एक दिन एक किलो गेहूं की खपत होती है, तो हम उसके साथ करीब 1,700 लीटर पानी की भी खपत करते हैं. यहां तक कि आप जिस कम्प्यूटर, या कार का इस्तेमाल करते हैं या फिर जो जींस पैंट पहनते हैं, उसे बनाने में भी हजारों लीटर पानी की खपत होती है या फिर एक कप कॉफी के साथ हम असल में 140 लीटर पानी भी पीते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर. इसे आप आभासी खपत कह सकते हैं लेकिन यह खपत असली है. अब एक और तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है.

आज, मिस्र गेहूं का आयात करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, और चीन भी अब खाद्य उत्पादों का सबसे बड़ा आयातक देश बन गया है, जबकि दुनियाभर में इसका सामान बिकता है. सवाल यह है कि चीन या मिस्त्र ऐसा क्यों कर रहे हैं. जवाब बहुत ही साधारण है. इन दोनों देशों ने ऐसी सभी फसलों का उत्पादन बहुत कम कर दिया है, जिसमें पानी की खपत सबसे ज्यादा होती है. ये दोनों देश इस तथ्य के बावजूद ऐसा कर रहे हैं क्योंकि इनके पास फिलहाल पानी की कोई कमी नहीं है और इनके पास नील और ह्वांगहो जैसी नदियां भी हैं. दरअसल, ऐसा सिर्फ और सिर्फ पानी बचाने के लिए हो रहा है. यदि कोई देश पानी बचाने के लिए फसल ही न उगाए और उसकी जगह अनाज दूसरे देशों से आयात करे, तो इससे समझा जा सकता है कि जल संकट को लेकर दुनियां में क्या चल रहा है?

भारत के संदर्भ में देखें तो, इसका क्या मतलब है? इसे ऐसे समझ सकते हैं कि साल 2014-15 में भारत ने करीब 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया. अब 37 लाख टन बासमती चावल उगानेके लिए 10 ट्रिलियन लीटर पानी खर्च हुआ. इसे अब ऐसे भी बोल सकते हैं कि भारत ने 37 लाख टन बासमती चावल के साथ 10 ट्रिलियन लीटर पानी भी दूसरे देश में भेज दिया, जबकि पैसा सिर्फ चावल का मिला. यानी, जिस देश ने हमसे चावल खरीदा उसे चावल के साथ दस ट्रिलियन लीटर पानी मुफ्त में मिल गया या फिर कहें कि उसका इतना ही पानी बच गया. भारत हर साल विदेशों में अनाज बेच कर भारी मात्रा में पानी का आभासी निर्यात करता है. लब्बोलुबाव यह है कि पानी की स्थिति भयावह है. राज्यवार देखें कैसी स्थिति है. झारखंड में 10 साल में धरती का पानी खत्म हो जाएगा. जब झारखंड राज्य बना था तब वहां 75 हजार कुएं थे. अब सिर्फ 10 हजार कुओं में पानी बचा है.

भूगर्भ विभाग ने चेतावनी दे दी है कि महज 10 साल में जमीन के भीतर का पानी खत्म हो जाएगा. मध्यप्रदेश के 51 में से 40 जिले सूखाग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं. राजस्थान के 15 हजार गांव टैंकरों के सहारे चल रहे हैं. गुजरात में सौराष्ट्र के कई जिलों में सात से 13 दिन बाद पीने का पानी मिल रहा है. सब जानते हैं कि महाराष्ट्र के लातूर में ट्रेन से पानी पहुंचाया जा रहा है. छत्तीसगढ़ के 27 में से 25 जिले सूखाग्रस्त घोषित हैं. आंध्रप्रदेश में भूजल स्तर दो गुना से ज्यादा नीचे जा चुका है और आंध्र के बाद तेलंगाना में जलसंकट से सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं.

क्या कहती है राष्ट्रीय जल नीति 2012

कृषि क्षेत्र

  • पानी के उपयोग कुशलता (एफिशिएंसी) में सुधार.
  • वर्षा जल संचय (वाटर हार्वेस्टिंग) और वाटरशेड प्रबंधन तकनीक का उपयोग.
  • ऊर्जा आपूर्ति खासतौर पर पंप वाटर के लिए ऊर्जा सब्सिडी में कटौती.
  • डिफरेंशियल प्राइसिंग, पुरस्कार और दंड के प्रावधान को लागू करके भू-जल दोहन पर रोक.
  • राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना को लागू करना, जिसका मक़सद 175 खरब लीटर पानी हासिल करने के लिए 30 नदियों और नहरों को जोड़ना है.

औद्योगिक क्षेत्र

  • उद्योगों के गंदे पानी की रिसाइक्लिंग और प्रशोधन (ट्रीटमेंट) के लिए क़ानून और सब्सिडी के जरिया प्रोत्साहन.
  • वैसी तकनीक का प्रोत्साहन करना जिसमें पानी की खपत कम हो.

घरेलू क्षेत्र

  • शहरी क्षेत्र में अनिवार्य रूप से वर्षा जल संचय के लिए नीति बनाना.
  • जल के उचित उपयोग के लिए प्रचार-प्रसार  करना.
  • आम लोगों में जल संरक्षण के लिए जागरूकता पैदा करना.

हम न छोड़ें ऐसे निशान…

हर वस्तु के उत्पादन पर आभासी पानी की छाप होती है. इसे विज्ञान की भाषा में वर्चुअल वाटर फुट प्रिंट कहा जाता है. वर्चुअल वाटर वह पानी है जो किसी वस्तु को उगाने में, बनाने और उसके उत्पादन में लगता है. एक टन गेहूं उगाने में करीब एक हजार टन पानी खर्च होता है. आपने कभी सोचा है कि एक कप कॉफी पर कितना पानी खर्च हुआ होता है. आप हैरत करेंगे कि एक कप कॉपी पर 140 लीटर पानी खर्च होता है. किसी भी उत्पाद की खेती से लेकर उसकी प्रोसेसिंग और पैकेजिंग तक जो ढेर सारा पानी खर्च होता है, इसे ही वर्चुअल वाटर कहते हैं.

मांसाहारी खाद्य पदार्थों की तुलना में शाकाहारी खाद्य पदार्थों पर कम पानी लगता है. अगर आप मांसाहारी हैं तो पांच लीटर पानी खपत करेंगे, अगर शाकाहारी हैं तो सिर्फ ढाई लीटर. एक किलो मांस पैदा करने पर करीब 15,500 लीटर पानी खर्च होता है. इसी तरह औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में भी वर्चुअल वाटर सिद्धांत लागू होता है. वर्चुअल वाटर पर काम करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया है कि एशिया में रह रहा प्रत्येक व्यक्ति एक दिन में औसतन 1,400 लीटर आभासी पानी का इस्तेमाल करता है, जबकि यूरोप और अमेरिका में 4,000 लीटर.

पिछले कुछ वर्षों में वर्चुअल वाटर एक बड़ा मुद्दा बन गया है, लेकिन अब भी कई देशों की सरकारें इस मुद्दे को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं, भारत भी उनमें शामिल है. वर्चुअल वाटर फुट प्रिंट का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य नीति और शोध पर खासा प्रभाव डाल सकता है. भविष्य में यह सिद्धांत दुनियाभर में पानी के प्रबंधन को लेकर छिड़ी बहस को एक नई दिशा दे सकता है.

क्या है वाटर फुटप्रिंट

वाटर फुटप्रिंट शब्द सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में यह सवाल आता है कि  आखिर वाटर फुटप्रिंट है क्या? हमारे प्रतिदिन की दिनचर्या या उत्पादों में आभासी या छिपा जल शामिल होता है. उदाहरण के लिए, एक कप कॉफी के उत्पादन के लिए आभासी पानी की मात्रा 140 लीटर तक होती है. आपका वाटर  फुटप्रिंट केवल आपके द्वारा प्रयोग किए गए प्रत्यक्ष पानी (उदाहरण के लिए नहाने या धुलाई में) को ही नहीं दिखाते, बल्कि आपके द्वारा उपभोग किए गए आभासी पानी की मात्रा को भी दर्शाता है. लोग पीने, खाना पकाने और कपड़े धुलने के लिए पानी का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन, इससे अधिक पानी वे अनाज उपजाने, कपड़े का निर्माण करने, कार बनाने और कम्प्यूटर निर्माण में करते हैं. वाटर  फुटप्रिंट ऐसे ही हर एक उत्पाद और सेवा, जिसका हम उपभोग करते हैं, उसमें इस्तेमाल किए गए पानी की गणना करता है. वाटर फुटप्रिंट हमारे सामने कई सारे सवाल उठाता है.

जैसे, किसी कंपनी में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी का स्त्रोत क्या है? इन जल स्त्रोतों की रक्षा के क्या उपाय हैं? क्या हम वाटर  फुटप्रिंट घटाने के लिए कुछ कर सकते हैं? वाटर फुटप्रिंट के तीन घटक हैं. ग्रीन, ब्लू और ग्रे. एक साथ मिलकर ये घटक पानी के इस्तेमाल की असल तस्वीर दिखाते हैं. मसलन, इस्तेमाल किया गया पानी बारिश का पानी है, सतह का पानी है या भू-जल है. वाटर फुटप्रिंट किसी प्रक्रिया, कंपनी या क्षेत्र द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पानी की खपत और जल प्रदूषण को दर्शाता है. ग्रीन-वाटर  फुटप्रिंट मिट्टी की परत में छिपा पानी है, जिसका इस्तेमाल कृषि, हॉर्टीकल्चर या जंगल द्वारा होता है. ब्लू-वाटर फुटप्रिंट ग्राउंड वाटर है.

इसका इस्तेमाल कृषि, उद्योग और घरेलू काम में होता है. ग्रे-वाटर  फुटप्रिंट ताजा जल (फ्रेश वाटर) की वह मात्रा है जिसकी जरूरत प्रदूषकों को हटाकर जल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए होती है. वाटर  फुटप्रिंट का संबंध फ्रेश वाटर (ताजा जल) पर मानवीय प्रभाव और मानवीय इस्तेमाल से है. फुटप्रिंट के जरिए पानी की कमी और जल प्रदूषण जैसे मुद्दे को भी समझा जा सकता है. पानी का संकट आज वैश्विक अर्थव्यवस्था से भी संबंधित है. कई देशों ने तो अब अपने वाटर  फुटप्रिंट को कम करने के लिए ऐसे उत्पादों को दूसरे देश से मंगाना शुरु कर दिया है, जिसके  उत्पादन में पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है.

देवास में पानी की खेती

पहले मध्य प्रदेश के देवास जिले में भू-जल स्तर गिरकर 400 फीट से भी नीचे चला गया था. यहां के गोरबा गांव लोगों को पीने के लिए दूसरे गांव से पानी लाना पड़ता था. फसल की पैदावार प्रभावित हो गई थी. लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था. इस सूरत में, आईआईटी रूड़की से पासआउट उमाकांत उमराव 2006 में देवास जिले कलेक्टर बनकर आए थे. जिले में पानी की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने किसानों को अपने खेत के एक छोटे हिस्से में तालाब बनाने के लिए प्रोत्साहित किया. बैंक और सोसाइटी को उन्होंने किसानों को तालाब बनाने के लिए लोन देने के लिए भी राजी किया.

उनके  प्रयासों ने गोरबा गांव के 150 से ज्यादा किसानों ने अपने खेत में तालाब बनाए. खेत में तालाब बनाने के काम को पानी की खेती नाम दिया गया. किसानों को यह समझाया कि फसल से उन्हें लाभ होता है, वैसे ही पानी की खेती करने से भी उन्हें लाभ होगा. अब, हालत ये हैं कि यहां का हर किसान साल में दो फसल उगा रहा है. इसके  चलते गांव का हर परिवार अब संपन्न है. पंचायत में अभी 170 तालाब हैं और सभी में भरपूर पानी है.

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