ईसबगोल

isabgulऔषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

शिरो रोग :

  • शिरःशूल- ईसबगोल को यूकेलिप्टस के पत्तों के साथ पीसकर मस्तक पर लेप करने से शिरःशूल का शमन होता है.

कर्ण रोग :

  • कर्णशूल- ईसबगोल के 10 ग्राम लुआब में 10 मिली प्याज का रस मिलाकर गुनगुना करके 1-2 बूंद कान में डालने से कान की पीड़ा का शमन होता है.

मुख रोग :

  • मुखपाक- ईसबगोल के लुआब से कुल्ला करने से मुखपाक में लाभ होता है.
  • दंतपीड़ा- ईसबगोल को सिरके में भिगोकर, दांतों के नीचे दबाकर रखने से दंत पीड़ा का शमन होता है.

उदर रोग :

  • अतिसार- 2 चम्मच ईसबगोल की भूसी को दही के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से जीर्ण आमातिसार तथा रक्तातिसार में लाभ होता है.
  • ईसबगोल के बीजों को 1 लीटर पानी में उबालें, जब आधा पानी शेष रह जाए तो तीन खुराक बनाकर दिन में तीन बार देने से हर प्रकार की पेचिश, मरोड़, अतिसार इत्यादि में लाभ होता है.
  • ईसबगोल के बीजों को पानी में डालकर जब उनका लुआब बन जाता है तब इस लुआब में शक्कर डालकर पीने से अमीबिक पेचिश, जीर्ण आमातिसार, अतिसार, पतले अतिसार, उदरशूल आदि में लाभ होता है. बालकों के चिरकालीन अतिसार में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक है.
  • ईसबगोल के साबुत बीजों को या 10 ग्राम ईसबगोल भूसी को ठंडे जल के साथ सेवन या उनको थोड़े जल में भिगोकर फूल जाने पर सेवन करने से आंत्रशूल तथा शोथ का शमन होता है.
  • ईसबगोल के बीजों को भूनकर सेवन करने से भी अतिसार और आमातिसार का शमन होता है.
  • कब्ज- एक से दो चम्मच की मात्रा में ईसबगोल की भूसी को रात्रि में सोते समय गर्म दूध के साथ लेने से कब्ज दूर होती है.
  • ईसबगोल की भूसी व त्रिफला चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर लगभग तीन से पांच ग्राम तक रात्रि में गुनगुने जल के साथ सेवन करने से सुबह

मल साफ होता है. उदरशोथ व पित्त-कारकों में भी यह एक अनुभूत व निरापद प्रयोग है.

  • 100 ग्राम ईसबगोल की भूसी में 50-50 ग्राम सौंफ और मिश्री मिलाकर 2-3 चम्मच की मात्रा में दिन में 2-3 बार सेवन करने से अमीबिक पेचिश में लाभ होता है.

वृक्कवस्ति रोग :

  • मूत्र-विकार- चार चम्मच ईसबगोल भूसी को एक गिलास पानी में भिगो दें और थोड़ी देर बाद उसमें स्वादानुसार मिश्री डालकर पीने से मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्रदाह का शमन होता है.
  • एक ग्राम ईसबगोल की भूसी में 2 ग्राम शीतल मिर्च तथा 500 मिग्रा कलमी शोरा मिलाकर सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है.

अस्थिसंधि रोग :

  • गठिया- जोड़ों के दर्द में ईसबगोल की पुस्टिस बांधने से लाभ होता है.

जंगली ईसबगोल

नेत्र रोग :

  • नेत्र-विकार- जंगली ईसबगोल के पत्रों का क्वाथ बनाकर नेत्रों को धोने से दाह तथा कण्डु आदि नेत्र-विकारों का शमन होता है.

कर्ण रोग :

  • कर्णशूल- 1-2 बूंद जंगली ईसबगोल पत्र-स्वरस को कान में डालने से कर्णशूल का शमन होता है.

मुख रोग :

  • दन्तमूलशोथ- जंगली ईसबगोल के पत्तों को पीसकर उसमें मक्खन मिलाकर दांतों पर मलने से दंतमूल शोथ का शमन होता है.

उदर रोग :

  • अतिसार- 1-2 ग्राम जंगली अश्वगोल के बीज चूर्ण को सेवन करने से अतिसार तथा प्रवाहिका में लाभ होता है.

त्वचा रोग :

  • व्रण- जंगली ईसबगोल के पत्रों को पीसकर व्रण पर लगाने से, व्रण से होने वाले रक्स्त्राव का स्तम्भन होता है तथा व्रण का शीघ्र रोपण होता है.

विष चिकित्सा :

  • कीटदंश- अश्वगोल पत्र को पीसकर दंश स्थान पर लेप करने से कीटदंश-जन्य शोथ, दाह, वेदना आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है.

विषाक्तता :

  • जंगली ईसबगोल प्रत्यूर्जता, क्षोभक तथा त्वक्‌ विकार उत्पन्न करता है. इसे अति-मात्रा में सेवन करने से अल्परक्तचाप तथा मृदु विरेचक प्रभाव उत्पन्न होते हैं. इसका प्रयोग गर्भावस्था तथा स्तन-पान कराने वाली स्त्रियों को नहीं करना चाहिए.
  • ईसबगोल नाड़ी दौर्बल्यकारक एवं क्षुधानाशक है. यह औषधि प्रसूता के लिए हानिकारक है.

निवारणः सिकंज बीज एवं शहद.

प्रयोज्यांग : बीज एवं फल की भूसी.

मात्राः भूसी चूर्ण 5-10 ग्राम जल अथवा दुग्ध के साथ या चिकित्सक के परामर्शानुसार.

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