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स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही : अज्ञात बीमारी से मर रहे नौनिहाल

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bihar-healthस्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लाख दावे कर लिए जाएं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. कहने के लिए जिला मुख्यालय से लेकर गांवों तक अस्पतालों का जाल बिछा दिया गया है. इन अस्पतालों में कहीं डॉक्टर हैं तो दवा नहीं, दवा है तो डॉक्टर नहीं. और कहीं दवा और डॉक्टर दोनों हैं, लेकिन ये डॉक्टर न मानवता और न ही अपने चिकित्सकीय धर्म का पालन करते हैं. महादलित, अशिक्षित समाज के साथ ही बाढ़ प्रभावित इलाकों में स्थापित किए गए अस्पतालों की हालत खराब है. जिला मुख्यालय से दूर गावों में स्थापित अस्पतालों का ताला कब खुलता है और कब बंद होता है, शायद इसकी जानकारी विभागीय अधिकारियों को भी नहीं होगी. दरभंगा जिले का महादलित गांव कुबौल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रहा है. इस गांव में अज्ञात बीमारी की वजह से कई दर्जन बच्चों की मौत हो चुकी है और इन बच्चों की माताएं सरकार से इंसाफ की गुहार लगा रही हैं. राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यकारी निदेशक जितेंद्र श्रीवास्तव यह कहकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं कि मृत बच्चों के मामले की जांच चल रही है. उनका कहना है कि उपलब्ध कराए गए आंकड़ों की जांच से पता चला है कि अधिकतर पूराने मामले हैं और अज्ञात बीमारी से मरने वाले बच्चों की संख्या कम है. बावजूद इसके जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती इस बारे में कुछ जनाकारी देना संभव नहीं है. सवाल ये है कि जब स्वास्थ्य विभाग को इस बारे में जानकारी थी कि अज्ञात बीमारी की वजह से बच्चों की मौत हो रही है, तो इस मामले की जांच क्यों नहीं की गई? अज्ञात बीमारी की चपेट में आए महादलित बस्ती कुबौल को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों नहीं उपलब्ध कराई गईं?

इस बस्ती की फुलिया देवी, तारा देवी, यशोदा देवी, गुलबिया देवी, घुथरी देवी, जिंबो देवी और तुला देवी समेत अनेक महिलाएं चीख-चीख कर कह रही हैं कि बच्चों की मौत हो रही और स्वास्थ्य विभाग और सरकार सो रही है. इस गांव की लगभग 80 महिलाओं की गोंद सुनी हो चुकी है. अगर प्रसव के दौरान 17 बच्चों की मौत को दरकिनार कर दिया जाए, तो 24 बच्चों की मौत की वजह अज्ञात बीमारी और 32 बच्चों की मौत की वजह काला ज्वर बताया जा रहा है. टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोशल सांइसेज के द्वारा कहा जा रहा है कि प्रारंभिक तौर पर तेज बुखार की वजह से 15, निमोनिया से छह, चिकन पॉक्स से पांच, बॉडी इरैगुलैरिटी से 15 एवं तीन बच्चों की मौत सांप के काटने की वजह से हुई है. इस बस्ती के बच्चों में कुपोषण का पाया जाना आम बात है. बच्चों के जरूरत से अधिक बड़े सिर कुपोषण का प्रमाण है. ग्रामीण चिकित्सकों द्वारा बताया जा रहा है कि बच्चों में काला ज्वर और निमानिया का भी प्रकोप है. बीमारी की वजह इस बस्ती में गंदगी भी है, क्योंकि इस बस्ती में चारों तरफ गंदगी फैली हुई है. इस बस्ती में रह रहे लोगों का गरीबी की वजह से अपना और अपने बच्चों का भूख मिटाना भी मुश्किल हो गया है. सरकारी अनाज उनके भोजन का मुख्य साधन है. कुबौल गांव के नजदीक न ही कोई स्वास्थ्य केंद्र है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र. यहां के लोगों को इलाज के लिए पांच किलोमीटर दूर स्थिति स्वास्थ्य केंद्र पर जाना पड़ता है और वहां पहुंचने पर अधिकतर समय स्वास्थ्य केंद्र में ताला बंद मिलता है. इन लोगों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह निजी

अस्पताल में इलाज करा सकें. अगर परिवार में कोई बीमार पड़ जाता है, तो उसे वह पैसा न होने की वजह से अस्पताल नहीं ले जाते. अस्पताल उस स्थिति में ले जाते हैं जब तबीयत अधिक खराब हो जाती है. महादलितों की स्थिति क्या है इसकी जानकारी के लिए टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोशल साइंसेस की टीम ने एक सर्वे किया. टीम की सदस्य अतिशि मिश्रा का कहना था कि कुबौल गांव के सर्वे के दौरान यह तथ्य सामने आया कि गांव की कुल 130 महिलाओं में से 80 महिलाओं के बच्चों की किसी न किसी वजह से मौत हो चुकी है. स्थानीय स्वयंसेवी संस्था मिथिला ग्राम विकास परिषद के सचिव नारायणजी चौधरी द्वारा 2015 में उपलब्ध कराई गई सूची के आधार पर अतिशि मिश्रा का यह भी कहना था कि सर्वे की फाइनल रिपोर्ट आने के बाद कुछ और रहस्यों से पर्दा उठेगा. अगर महादलितों की स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो उनकी बच्चों की मौत का न केवल अंतहीन सिलसिला जारी रहेगा, बल्कि नीतीश सरकार का दामन भी दागदार होगा.

बाल विवाह के लिए भी चर्चित है कुबौलः दर्जनों महादलित बच्चों की मौत की गवाही दे रहे दरभंगा जिले का कुबौल गांव भले ही स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से अभी सुर्खियों में आया हो, लेकिन कुबौल बाल विवाह को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहता है. जो बच्चियां अपने पैरों पर ठीक से खड़ी नहीं हो सकतीं और न अपनी जिंदगी के बारे में कुछ सोच सकती हैं, उनकी कच्ची उम्र में ही शादी कर दी जाती है. अधितकतर बच्चियां शादी के बाद गर्भवती हो जाती हैं और प्रसव के दौरान उनकी और उनके बच्चे की मौत हो जाती है. अशिक्षा और गरीबी से लाचार महादलित परिवार अपनी बेटियों की महज 13 से 14 वर्ष की उम्र में ही शादी करने के लिए मजबूर हैं. समाजसेवी नंदकिशोर पांडेय का कहना है कि कुबौल गांव में प्रसव के दौरान कब किसकी मौत हो जाए, यह कहना कठिन है. प्रसव के दौरान जच्चे-बच्चे की मौत का मामला अक्सर सामने आता रहा है. लेकिन इस समय बच्चों की मौत की वजह चिंता का विषय है. उनका कहना है कि इस अशिक्षित समाज में जागरूकता फैला कर ही बाल विवाह और विभिन्न वजहों से हो रही बच्चों की मौत को रोका जा सकता है. विकलांगता भी इस गांव के लिए अभिशाप बन चुका है. इस महादलित बस्ती में किशोरावस्था आते-आते कई बच्चे विकलांग भी हो जाते हैं.

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Comments (1)

  1. नजर दूर करने तथा अमीर बनने के लिए रविवार की रात सोते समय गिलास में
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