तैयारी अधूरी बाढ़ मचाएगी तबाही

bihar-floodउत्तर बिहार से प्रवाहित होने वाली प्रमुख नदियों में गंगा, बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला, करेह व अघवारा समूह की नदियां ऐसी हैं जिसमें बाढ़ की सूचना मात्र से लोगों को भारी तबाही का डर सताने लगता है. लगभग डेढ़ दशक से बाढ़ की तबाही को लेकर लोग हमेशा परेशान रहते हैं. हर वर्ष बाढ़ की वजह से करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हो जाती है. लोगों के घर पानी में समा जाते हैं और लोग सड़कों पर रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं. अब सवाल यह उठता है कि आखिर नदियां क्यों घातक होती जा रही हैं? तटबंधों की स्थिति कैसी है? इन सवालों के जवाब भी जानना जरूरी है.

बाढ़ आते ही हर दिन बाढ़ से विनाशलीला की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनने लगती हैं. बाढ़ की तेज धारा में बहकर सैकड़ों लोग असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं. बाढ़ की वजह से भारी जान-मान माल का नुकसान होता है, लेकिन पीड़ितों को सरकारी घोषणाओं के अलावा कुछ भी नहीं मिलता. ऐसे हालात में लोगों का चिंतित होना जायज है. नदियों  द्वारा विकराल रूप धारण करने के लिए विशेषज्ञ सरकारी तंत्र को दोषी करार देते हैं. वजह यह है कि सरकारी स्तर पर नदियों को बांधने का कार्य किया गया है. नदियों के गर्भ में गाद जमा होने की वजह से उनकी गहराई कम होती जा रही है जिसकी वजह से बाढ़ के समय जब नदी में पानी बढ़ता है, तो जगह-जगह तटबंधों के टूटने का खतरा बढ़ जाता है. अगर कहीं तटबंध टूट गए तो संबंधित क्षेत्र में होने वाली तबाही को कोई रोक नहीं सकता.

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दूसरी ओर अब नदियों के गर्भ से निकलने वाली गादें किसानों के खेतों तक पहुंच नहीं पा रही हैं, जिसकी वजह से जमीन की उर्वरा शक्ति का ह्रास होता जा रहा है. नतीजतन ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था चौपट होने लगी है और किसानों का खेती से मोह भंग होने लगा है. वर्तमान में नेपाल से आने वाली कुछ नदियों को अगर छोड़ दिया जाए, तो शायद ही कोई ऐसी नदी है, जिसके गर्भ में सिल्ट न जमा हो. खासकर उत्तर बिहार में तबाही का पर्याय रही बागमती नदी को उदाहरण के तौर देखा जा सकता है. नेपाल से शिवहर होते हुए सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर जिले को पार कर दरभंगा की सीमा तक आने वाली यह नदी तबाही का दूसरा रूप है. अगर पिछले डेढ़ दशक के आंक़ड़ों को देखें, तो इस नदी ने शिवहर और सीतमढ़ी जिले के दर्जनों गांव का नक्शा बदल दिया है. वर्तमान में हाल यह है कि शिवहर जिले के डुब्बा घाट के समीप नदी के गर्भ में भी पानी सूखने लगा है. इसके बावजूद लोगों के मन में नदी के रौद्र रूप धारण करने का खौफ कायम है. वहीं दूसरी ओर नेपाल से आने वाली अघवारा समूह की हरदी, रातो, मरहा समेत अन्य नदियों में प्रति वर्ष आने वाली बाढ़ का खामियाजा सीतामढ़ी जिले के सुरसंड, सोनबरसा, पुपरी समेत कई प्रखंडों की जनता को भुगतना पड़ता है.

सुरसंड के श्रीखंड भिट्‌ठा गांव के आस-पास के लोगों को बाढ़ की वजह से हर वर्ष महीनों के लिए अपने घर को छोड़ना पड़ता है. बाढ़ की वजह यह है कि नेपाल सरकार ने अपनी रक्षा के लिए भारतीय सीमा से पहले बांध का निर्माण किया है, जिसकी वजह से नदियों में बाढ़ आने की वजह से बिहार में बाढ़ का पानी आते ही बेकाबू हो जाता है और भारतीय क्षेत्र के लिए काल का रूप ले लेता है. पहले से तैयारी न होने की वजह से जब तक सरकारी और प्रशासनिक स्तर बचाव कार्य शुरू किया जाता है, तब तक लोग अपने घर से बेघर हो जाते हैं. उसके बाद राजनीतिक दलों द्वारा राहत की राजनीति शुरू हो जाती है जो बाढ़ की समय अवधि तक जारी रहती है. बाढ़ समाप्त होने के बाद राजनीतिक दलों को कुछ याद नहीं रहता. जनता मदद का इंतजार करती रहती है कि कोई तो उनकी मदद करेगा. समस्तीपुर जिले में बुढ़ी गंडक में कई सालों से सीमित पानी आने की वजह से लोगों ने नदी के अंदर तक मकानों निर्माण करा लिया है जो आने वाले समय में तबाही का कारण बन सकता है. सीतामढ़ी में भी लक्ष्मणा नदी का  हाल यही है.

जहां तक तटबंधों के रख-रखाव का सवाल है तो प्रतिवर्ष तटबंधों की मजबूती और बेहतरी के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन यह करोड़ों रुपये तटबंधों के रख-रखाव के स्थान पर सरकारी तंत्र और ठेकेदारों की जेब में चले जाते हैं. तटबंधों का कभी भी पूरी तरह से मरम्मत नहीं कराया जाता है. शिवहर जिले के डुब्बा घाट के समीप कुछ खनन माफिया प्रशासन की मिलीभगत से बागमती नदी पर बने पुल के समीप तक मिट्‌टी की खुदाई कर रहे हैं. अगर बाढ़ आती है, तो पुल के क्षतिग्रस्त होने का भी डर है. लेकिन स्थानीय प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है.

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सीतामढ़ी जिले में जर्जर हो चुके बागमती नदी पर बने तटबंध की मरम्मत सरकारी मानकों की अनदेखी कर हो रही है, क्योंकि कई स्थानों पर तटबंध के समीप से ही मिट्‌टी काटकर बांध की मरम्मत की जा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार बांधों का मरम्मत करा रही है या उसे कमजोर कर टूटने का इंतजाम कर रही है.  कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो उत्तर बिहार के शिवहर, सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर समेत अन्य जिलों में बहने वाली नदियों की गहराई बहुत कम हो गई है जिसकी वजह से नदियों के गर्भ की जमीन दिखाई देने लगी है. अगर इन नदियों में बाढ़ आती है, तो तबाही होने से कोई नहीं रोक सकता. इसलिए समय रहते ही सरकार को इस समस्या का हल निकालना होगा जिससे लोगों को जान-माल का नुकसान न हो.