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खतरे में दूल्हे के बाज़ार का वज़ूद

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madhubaniमधुबनी जिले के सौराठ में दूल्हे का बाजार सजता है. यहां आप बिना दहेज के वर का चयन कर सकते हैं. समय के साथ इस बाजार का आकर्षण कम हो रहा है, लेकिन यह आज भी लोगों को अपने वजूद का अहसास करा रहा है. मिथिलांचल की इस अनोखी परंपरा को जीवित रखने के लिए आज भी कई लोग सक्रिय हैं. आधुनिकता का असर दूल्हे बाजार पर भी पड़ा है. आज यह बाजार अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है.

पुराने लोग बताते हैं कि कर्नाटक वंश में तिरहुत के शासक हरिसिंह देव ने 1296 से 1310 ई. के बीच मिथिला के कुल 14 स्थानों पर दूल्हा बाजार शुरू किया था. योग्य वंशावली विवाह सुविधा के लिए सौराठ, खामागढ़ी, परतापुर, शिवहर, गोविंदपुर, फतेपुर, सजहौल, सुखसैना, अखराही, हेमानगर, बलुआ, बरौली, समौल एवं सहसौल में बाजार लगते थे. लेकिन कालांतर में सभी विवाह बाजारों का वजूद मिट गया और एकमात्र मधुबनी जिले के सौराठ गांव के सभागाछी में लगने वाला विवाह बाजार आज भी अपनी पुरानी परंपरा को संजोये है. तत्कालीन विवाह प्रथा में वर व वधू पक्ष स्वयं दूल्हे की तलाश नहीं करते थे. घटकैती परंपरा के जरिए शादी के लिए जोड़ों की तलाश कर विवाह दान किया जाता था. बदलते परिवेश के साथ गांव की परंपराओं में भी बदलाव आया. लेकिन इसबीच अगर नहीं बदली तो सौराठ सभागाछी के दूल्हा बाजार की पुरानी संस्कृति.

उत्तर बिहार के सौराठ, खामागढ़ी, परतापुर, शिवहर, गोविंदपुर, फतेपुर, सजहौल, सुखसैना, अखराही, हेमानगर, बलुआ, बरौली, समौल एवं सहसौल जैसे प्रमुख गांवों को वंशावली जानने वाले महापंडितों के गांव के रूप में जाना जाता था. मधुबनी जिला मुख्यालय से महज छह किलोमीटर दूर सौराठ गांव के सभागाछी में हरेक साल ज्येष्ठ व आषाढ़ माह में दूल्हा बाजार लगता है. इस दूल्हा बाजार में कभी आईएएस और आईपीएस वरों की भी चट्टी बिछा करती थी. दहेज संस्कृति के बढ़ते कुप्रभाव ने धीरे धीरे सभागाछी वर तलाश परंपरा को भी डस लिया. मैथिल ब्राह्मणों की इस संस्कृति ने कर्ण कायस्थों को भी अपनी ओर आकर्षित किया. इस बाजार में जन्मपत्री व राशि फल के आधार पर लड़के व लड़कियों की कुंडली मिलाई जाती है. राशि का मिलान करने के बाद इन जोड़ों को पंजीकार अपनी पंजी में पंजीकृत करते हैं. पंजीकार शादी निश्चित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. स्थानीय लोगों ने बताया कि दरभंगा महाराजा ने सौराठ सभागाछी को 22 बीघा जमीन दान में दिया था. अब हालात ये हैं कि सभागाछी की इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल के पास कुछ अतिक्रमणकारियों ने कब्जा कर लिया है. कहा जाता है कि लगन के समय  सौराठ सभागाछी में पहले मिथिलंाचल के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों मैथिल ब्राह्मणों का जुटान होता था, लेकिन  वे दिन अब लद गए.

सौराठ सभागाछी के वंशावली अभिलेखागार में पंजीकृत पं. घनश्याम मिश्र की वंशावली से ही ज्ञात होता है कि मिथिला के कालीदास कविवर विद्यापति किस वंशज के हैं. उनके पैतृक परिवारों की वंशावली आज भी यहां पंजीकृत है. पं. पुरुषोत्तम ठाकुर कविवर विद्यापति के ही वंशज हैं.

प्रत्येक परिवारों के पूर्वजों की जानकारी अभिलेखागार में पंजीकृत पंजी से अब भी मिल जाती है. पंजीकार विनोद झा ने अपने पंजीकार पिता सह भविष्यवेत्ता स्व. हरेकृष्ण झा के बारे में बताया कि वे कहते थे कि केवल सौराठ गांव में 42 गौत्र व 7 मूल के मैथिल ब्राह्मण परिवार हैं. वंशावली पंजी से मैथिल ब्राह्मणों के 10 पीढ़ी तक की जानकारी मिलती है. सात पुश्त तक समगोत्री माना जाता है और वैसे रिश्तों में कोई संबंध की चर्चा तक नहीं होती है. पुराने पंजीकारों में स्व. विष्णुदत्त मिश्र, स्व. शिवदत्त मिश्र एवं उनके पुत्र शंकर कुमार मिश्र, सकरौनी निवासी मोहन मिश्र की अपनी ख्याति है. पंजीकार का कोई शुल्क नहीं होता है और लाभार्थी के स्वेच्छा पर ही शुल्क की राशि निर्भर करती है.

मिथिलांचल क्षेत्र राजा जनक की नगरी के रूप में भी प्रख्यात है. रामायण में सीता स्वयंवर से भी इस प्रथा की जानकारी मिलती है. यही वजह है कि मधुबनी के गांव सौराठ के सभागाछी में स्वयंवर की तरह ही दूल्हों का बाजार लगता है. वर की प्रतिभा व विलक्षण को आधार मानकर ही दहेज रहित विवाह के लिए वधू पक्ष चयन करते हैं.

मिथिलांचल के मैथिल ब्राह्मणों द्वारा पीढ़ियों से संरक्षित परंपरा व वर-वधू चयन के लिए ऐतिहासिक सौराठ सभा स्थल पर दहेज रहित दूल्हों के बाजार शुरू हैं. सौराठ सभा प्रवासी वर-वधू पक्ष के लोगों के लिए ठहरने व भोजन की व्यवस्था सौराठ सभा समिति की ओर से की जा रही है. अंतरराष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन के सचिव इन्द्रमोहन झा ने बताया कि मिथिलांचल के पूर्वी क्षेत्र सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार के वर-वधू पक्ष के मैथिल ब्राह्मणों को मोबाइल से संदेश भेजकर सभा में पहुंचने का आमंत्रण दिया गया है. इसके अलावा आसपास के गांव पंडोल, डीहरोज, कल्याणपुर, सरिसपाही, जमसम, हाटी, बटुरी, मेघौल, गंगौली आदि गांवों के लोगों को भी सभास्थल पर पहुंचने का आग्रह किया गया है.

सौराठ सभा समिति के सचिव डॉ. शेखर चन्द्र मिश्र ने बताया कि सभा स्थल पर प्रवासी वर-वधू पक्ष के लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो इसका पूरा ख्याल रखा जा रहा है. मधुबनी के प्रगतिशील विचारक संजय झा कहते हैं कि मैथिल ब्राह्मणों सहित ब्राह्मण समाज के लिए सौराठ सभा गाछी एक धरोहर है, जहां दहेज रहित विवाह की परंपरा रही है. सामाजिक विकृतियों की वजह से सभागाछी के महत्व में गिरावट आई है. उन्होंने कहा कि इस धरोहर को बचाने के लिए सभा के समय निश्चित रूप से यहां सभी ब्राह्मणों को आना चाहिए. स्थानीय लोग दूल्हा बाजार की परंपरा को जीवित रखने के लिए जी जान से जुटे हैं, ताकि सौराठ सभागाछी के प्रति खत्म हो रहे आकर्षण को जिंदा रखा जा सके.

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