ऐसे समझौते का क्या मतलब!

modiहाल में एक खबर सोशल मीडिया पर छाई रही कि केंद्र सरकार और नगा विद्रोही गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के बीच एक समझौता हुआ है. इसके तहत केंद्र सरकार ने नगालैंड के लिए अलग झंडा और अलग पासपोर्ट की मांग स्वीकार कर ली है. पूर्वोत्तर से इतर देश की मुख्य मीडिया में इस खबर को प्रमुखता नहीं दी गई. नतीजतन, इस मुद्दे पर एक सप्ताह तक अफवाहों का बाजार गर्म रहा. इसके बाद केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने एक ट्‌वीट कर इतना भर कहा कि यह खबर गलत है. ऐसी कोई भी मांग सरकार ने नहीं स्वीकार की है. लेकिन इन दौरान केंद्र सरकार की तरफ से ऐसा कोई आधिकारिक बयान (प्रेस रीलिज के तौर पर न कि ट्‌वीट के तौर पर) नहीं आया, जो इन अफवाहों पर विराम लगा सके. बहरहाल, हम यहां पूर्वोत्तर की मीडिया में छपी रिपोर्टों को देखकर यह जानने की कोशिश करते हैं कि दरअसल यह मामला है क्या और इसमें कितनी सच्चाई है?

पिछले 18 जून को पूर्वोत्तर के स्थानीय अखबारों में यह खबर छपी कि भारत सरकार ने नगाओं के लिए अलग पासपोर्ट और ध्वज की मंजूरी दे दी है. मणिपुर का एक स्थानीय अखबार द संगाई एक्सप्रेस ने यह छापा कि मणिपुर के फुंगरैतांग में एक सार्वजनिक बैठक में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के नेता आरएच राइजिंग ने घोषणा की कि नगाओं के लिए अलग पासपोर्ट और ध्वज की अनुमति अब केंद्र सरकार ने दे दी. दूसरी रिपोर्ट द नॉर्थ इस्ट टूडे में लिखा गया है कि भारत सरकार ने नगाओं के लिए अलग पासपार्ट और ध्वज के लिए मंजूरी दे दी है. हालांकि नगालैंड के स्थानीय अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्रों ने इस घटना को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया. स्थानीय अंग्रेजी दैनिक नगालैंड पेज की संपादक टी मोनालिसा का मानना है कि विभिन्न गुटों के कई नेता इस तरह की घोषणाएं समय-समय पर करते रहते हैं. हमारे लिए या स्थानीय लोगों के लिए यह एक बहुत बड़ी घोषणा नहीं है. उनका मानना है कि जबतक भारत सरकार इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं देती, तबतक विश्वास करना गलत है. उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों में आम राय है कि लोगों ने किसी भी गुट को आम लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जनादेश नहीं दिया है.

अब यह खबर सही है या गलत, यह एक अलग विषय है. लेकिन इन खबरों ने कहीं न कहीं समाज में एक अंतर्विरोध तो पैदा किया ही है. एक तरफ मणिपुर में हुई उस सार्वजनिक बैठक में एनएससीएन-आईएम के स्वघोषित गृह मंत्री ने बेझिझक ऐलान किया कि नगाओं के लिए केंद्र सरकार ने अलग पासपोर्ट और ध्वज की मंजूरी दी, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री इस बात से इंकार कर रहे हैं. यह बात आम लोगों में शक पैदा कराता है. अगस्त 2015 की शुरुआत में केंद्र और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (आईएम) के बीच बातचीत शुरू हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया था. लेकिन अब पूर्वोत्तर के कुछ समाचार पत्रों ने इस समझौते पर सवाल खड़े कर दिए. यह तो तय है कि नगालैंड में शांति समझौते के अनुसार नगा अपना अलग झंडा और पासपोर्ट की मांग रखेंगे. इस बात का खुलासा आश्चर्यजनक रूप से समझौता होने के लगभग एक साल बाद हुआ है और केंद्र सरकार ने भी इस पर चुप्पी साध ली है. मुख्यधारा की मीडिया ने भी इस पर कोई समाचार प्रकाशित नहीं किया, जबकि उत्तर पूर्व के स्थानीय समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है.

गौरतलब है कि एनएससीएन-आईएम नगा विद्रोहियों का सबसे बड़ा ग्रुप है, जिसका केंद्र सरकार के साथ संघर्ष विराम चल रहा है. इसी ग्रुप का दूसरा गुट एनएससीएन-के एसएस खपलांग के नेतृत्व में है, जो लगातार हिंसा का रास्ता अपनाए है. जून 2015 को मणिपुर में हुई मुठभेड़ में 18 जवान शहीद हुए थे. इसमेंें भी खपलांग का हाथ था. एनएससीएन-आईएम का मानना है कि नगाओं के लिए अलग ध्वज जरूर होना चाहिए. जम्मू-कश्मीर का अलग ध्वज हो सकता है, तो नगाओं के लिए क्यों नहीं?

इस युद्ध विराम समझौते की नींव 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल के कार्यकाल में पड़ी थी. केंद्र सरकार ने इस समझौते को एक ऐतिहासिक क़दम बताया है और मुइवा भी इससे खुश नज़र आ रहे हैं. मुइवा की मांग एक वृहत नगालैंड की है, जिसमें पड़ोसी राज्य मणिपुर के चार ज़िले, अरुणाचल प्रदेश के दो ज़िले और असम के दो पहाड़ी ज़िले भी शामिल हैं. इस मामले को लेकर तीनों राज्यों में विरोध के स्वर शुरू से उठते रहे हैं. केंद्र सरकार की तरफ से गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने स़िर्फ इतना बताया है कि इस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में पड़ोसी राज्यों का पूरा ख्याल रखा गया है.

एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मुइवा की ग्रेटर नगालैंड की मांग क्या पूरे नगा समुदाय की मांग है? क्या इससे सारे नगा खुश हैं? नगाओं में और भी कई सशस्त्र विद्रोही संगठन हैं. मुइवा का प्रमुख विरोधी गुट है, एनएससीएन (के), जिसकी कमान खपलांग के हाथ में है. इतना ही नहीं, एमएनपीएफ (मणिपुर नगा पीपुल्स फ्रंट), जिसकी सशस्त्र शाखा एमएनपीए (मणिपुर नगा पीपुल्स आर्मी) है, का मानना है कि इस समझौते के पीछे केंद्र सरकार का उद्देश्य एनएससीएन (आईएम) के दोनों नेताओं ईसाक चिसी और टीएच मुइवा की ढलती उम्र का ़फायदा उठाना भर हैै, यह जनता के हित में नहीं है और नगा जनता इन दोनों नेताओं से ऊपर है. एनएससीएन (आईएम) नगाओं का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं है. इन संगठन का कहना है कि छह दशकों से चला आ रहा नगाओं का संघर्ष केवल आर्थिक पैकेज या ग्रेटर ऑटोनोमी के लिए नहीं है. इस दौरान नगाओं ने बड़ी संख्या में अपनी जान गंवाई. इस समझौते के अंतिम रूप लेने से पहले आईएम के नेताओं को गंभीरता से सोचना चाहिए. बहरहाल, एनएससीएन (आईएम) और केंद्र सरकार के बीच जारी वार्ता तभी शांति वार्ता कहलाएगी, जब इसमें पड़ोसी राज्यों का समुचित ख्याल रखा जाएगा, अन्यथा आशंका है कि इस क्षेत्र में माहौल और बिगड़ सकता है. केंद्र सरकार को एक ऐसा रास्ता निकालना चाहिए, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

एनएससीएन-आईएम अध्यक्ष ईसाक चिसी सू का निधन

केंद्र सरकार से वार्ता कर रहे नगा विद्रोही गुट एनएससीएन-आईएम के अध्यक्ष ईसाक चिसी सू का निधन 28 जून को दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में ऑर्गन फेल्योर की वजह से हो गया. 87 वर्षीय ईसाक का पिछले एक साल से दिल्ली में इलाज चल रहा था. नगालैंड के जूनहेबोटो जिले में जन्मे ईसाक सूमी (नगा) आदिवासी थे. नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) और केंद्र सरकार के बीच हुए शिलांग समझौते के विरोध में ईसाक और मुइवा के साथ मिलकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (आईएम) 1980 में बना था. 1997 में एनएससीएन आईएम केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता शुरू हुआ था. इन 16 सालों में लगभग 80 बैठकें हो चुकी हैं. ईसाक

1950 में एनएनसी में शामिल हुए थे. 1980 में एनएनसी में रहते हुए कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य संभालते रहे. उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्‌वीट किया कि ईसाक को नगा शांति वार्ता में उनके ऐतिहासिक भूमिका के लिए याद किया जाएगा. वे नगा समुदाय की शांति चाहते थे. उनके निधन का असर नगा शांति वार्ता पर पड़ना तय है.

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