सियासत में उलझा टॉपर्स घोटाला

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bihar-toppersटॉपर्स घोटाला पर रोज नए-नए राज बेपर्दा हो रहे हैं. ये तथ्य मामले को कहां और किस दिशा में ले जाएंगे, कहना कठिन है. पुलिस की जांच बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. लालकेश्वर प्रसाद सिंह, वैशाली जिला के वीआर कॉलेज के प्राचार्य (कर्ता-धर्ता) अमित कुमार उर्फ बच्चा राय और जनता दल(यू) की नेता व पूर्व विधायक उषा सिन्हा तक आकर सिमट गई है. उषा सिन्हा डॉ. लालकेश्वर प्रसाद सिंह की पत्नी और मगध विश्वविद्यालय के गंगादेवी महिला कॉलेज की प्राचार्य हैं. लालकेश्वर और उनकी पत्नी ने इंटर परीक्षा को कामधेनु समझ कर जमकर दुहा. उषा सिन्हा नेे अपने कॉलेज परिसर और वहां के कर्मचारियों का भी इस मामले में भरपूर इस्तेमाल किया. इंटर टॉपर्स घोटाला को बेपर्दा और दोषियों को कानून के हवाले करने में बिहार पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने कुछ दिनों में काफी उपलब्धि हासिल की है. अब तक आधा दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इसमें घोटाला का सूत्रधार (मास्टर माइंड) बच्चा राय तो है ही, लालकेश्वर का मददगार पटना विश्वविद्यालय का तदर्थ शिक्षक अजित शक्तिमान, बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड का संदीप झा आदि भी शामिल है. उनसे पूछताछ में पुलिस को अहम जानकारी मिली है. जद(यू) संगठन की महत्वपूर्ण पदाधिकारी और दो बार विधायक रह चुकी उषा सिन्हा इस रैकेट को संचालित कर रही थी.

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लालकेश्वर-उषा के मददगारों के ठिकानों से जांच दल को काफी मात्रा में सादी और लिखित उत्तर पुस्तिकाएं और प्रमाण पत्र की सादी प्रतियां व अन्य कागजात मिले हैं. वहीं बच्चा राय के वीआर कॉलेज (किरतपुर, भगवानपुर, वैशाली) व अन्य ठिकानों से नकद पच्चीस लाख रुपए से अधिक मिला है. लेकिन, इस घोटाले का सूत्रधार लालकेश्वर, उसकी पत्नी उषा सिन्हा और इस प्रकरण में नामजद चार टॉपर्स भी अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. पुलिस का मानना है कि लालकेश्वर-उषा की गिरफ्तारी के बाद तफ्तीश को अंजाम तक पहुंचाना आसान हो जाएगा. देखना है कि अधिकतर मामलों की तरह इसमें भी आरोपी खुद ही अदालत में समर्पण करते हैं या पुलिस इन आरोपियों को पकड़ने में सफल होती है.

टॉपर्स घोटाला बिहार की इंटर शिक्षा की पुरानी कोढ़ की ताज़ा अभिव्यक्तिहै. इसका मवाद अब राजधानी में राजपथ पर फैलने लगा है. सूबे में इंटर शिक्षा के लिए 1980 में इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद की स्थापना की गई थी. यह संस्था इंटर कालेजों को मान्यता देने, पाठ्यक्रम तय करने के अलावा परीक्षा आयोजित करती रही. संस्था को मजबूत बनाने की जगह राजनेताओं-नौकरशाहों की जोड़ी ने इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया. बदनामी के बाद इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद की जिम्मेवारी भी बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को सौंप दी गई. राजनीति बदली और सूबे में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी. इस सरकार ने बिहार की वित्त-रहित शिक्षा नीति, जिसके तहत नए इंटर और डिग्री कॉलेजों को मान्यता और सम्बद्धता दी जाती रही, में बदलाव किया. निजी इंटर व सम्बद्ध डिग्री कॉलेजों को इंटर की परीक्षा के परिणामों के आधार पर अनुदान देने का फैसला लिया गया.

इसके पहले इन कॉलेजों को सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती थी. अनुदान मिलने के साथ इंटर शिक्षा-परीक्षा में शुरू से जारी माफियागिरी और मजबूत हुई. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अधिकारियों व राजनेताओं ने इसेे खूब खाद-पानी दिया. पिछले दस वर्षों में शायद ही कोई ऐसा साल रहा होगा, जब इंटर परीक्षा-फल में धांधली की खबर सुर्खियां न बनी हों. पिछले ग्यारह वर्षों में – अर्थात्‌ 2005 के बाद से- औपचारिक तौर पर पांच बार मेधा सूची बदली गई है. इंटर परीक्षा में टॉप पचहत्तर प्रतिशत से अधिक छात्र बिहार के ग्रामीण इलाकों के इन्हीं निजी व साधन-विहीन इंटर कॉलेजों के रहे हैं. टॉप छात्रों में अधिकतर की प्रतिभा’ रूबी राय और सौरभ श्रेष्ठ से बेहतर रही है, यह कहने में किसी को भी संकोच हो सकता है. मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, वैशाली, गोपालगंज, समस्तीपुर, बेगूसराय, भोजपुर, मुंगेर, कैमूर, नवादा आदि दर्जनों जिलों के ग्रामीण इलाकों के निजी इंटर कॉलेज और उनके संचालक इंटर के परीक्षा-परिणाम हर साल अपने मन माफिक जारी कराते रहे हैं. बिहार की राजधानी स्थित साइंस कॉलेज सहित तमाम सुविधा-सम्पन्न नामचीन कॉलेजों के छात्र इन बच्चा राय जैसों की जोड़-तोड़ के कारण दोयम श्रेणी के साबित होते रहे हैं. टॉप सौ छात्रों में नामचीन अंगीभूत कॉलेजों के छात्रों को शायद ही जगह मिलती रही है.

सुलझ नहीं रहा एसी डीसी बिल का विवाद

हालांकि, घोटाला केवल इसी साल नहीं हुआ है और इसके नायक बच्चा राय और लालकेश्वर ही नहीं हैं. इंटर के परीक्षा परिणाम को मैनेज कराने में माफिया नियंत्रित निजी इंटर-डिग्री कॉलेजों के अलावा कोचिंग संस्थानों की भी बड़ी भूमिका रहती है. राजधानी सहित सूबे के बड़े व प्रमंडलीय शहरों के कुछ कोचिंग संस्थानों के संचालक अपने इलाके के बच्चा राय से सीधे सम्पर्क में रहते हैं. ये कोचिंग संस्थान और इंटर कॉलेज छात्र से मनमाफिक परीक्षा परिणाम के लिए डील करते हैं. प्रथम श्रेणी के लिए प्रति छात्र साठ से सत्तर हजार रुपए तो द्वितीय श्रेणी के लिए तीस से चालीस हजार रुपए की रकम तय की जाती है. टॉप सौ में स्थान सुरक्षित कराने की दर प्रति छात्र लाख रुपए से ऊपर होती है. ऐसे परीक्षा-फल से इंटर कॉलेजों को ही लाभ नहीं होता, बल्कि कोचिंग संस्थानों में भी छात्रों की आमद बढ़ जाती है. इस जुगाड़ तकनीक के कारण बिहार के कुछ कोचिंग की कई शाखाएं संचालित होती हैं. प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण छात्रों की संख्या अधिक होने पर अनुदान की रकम में भारी इज़ाफा होना तय है. एक तीर से कई शिकार करते हैं ये कोचिंग संस्थान व इंटर कॉलेज के संचालक. निजी इंटर-डिग्री कॉलेज के संचालक,कोचिंग संस्थान, परीक्षा समिति के अधिकारियों का एक त्रिकोण राज्य के इंटर परीक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर बिहार की युवा प्रतिभाओं को निष्तेज कर रहा है.

सूबे के राजनेता बच्चा राय को पक्ष-विपक्ष की गोद में दिखाने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं, वे समस्या को लेकर गंभीर नहीं. शिक्षा पद्धति में सुधार के बजाय वे इस बात पर चर्चा में मशगूल हैं कि टॉपर्स घोटाले का सूत्रधार और वैशाली जिला के वीआर कॉलेज का प्राचार्य अमित कुमार उर्फ बच्चा राय किसका बच्चा’ है, किस राजनेता का करीबी है. सबसे पहले यह बात सामने आई कि यह शिक्षा माफिया राजद प्रमुख लालू प्रसाद का खास’ है. लालू प्रसाद के साथ उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई. यह भी खबर है कि गत विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद के बड़े पुत्र और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव की जीत सुनिश्चित कराने के लिए महुआ में वहां के स्थानीय शिक्षा माफिया की काट के लिए बच्चा राय का उपयोग किया गया.

यह भी खबर आई कि बच्चा राय ने तेजस्वी प्रसाद यादव के पक्ष में राधोपुर विधानसभा क्षेत्र में भी काम किया था. इन बातों पर राजनीति गरम हो रही थी और प्रतिपक्षी भाजपा नेता महागठबंधन से सवाल-जवाब कर रहे थे कि बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता वृषिण पटेल के साथ उसकी तस्वीरें अखबारों में छपी. इस पर चर्चा शुरू होने के पहले ही भाजपा के लोग काफी हमलावर हो गए. इन हमलों के बीच केन्द्रीय राज्य मंत्री गिरीराज प्रसाद सिंह और बच्चा राय के रिश्तों को लेकर उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट दिया और वह बिहार के अखबारों में खूब छपा. तेजस्वी के इस पोस्ट में बताया गया कि गिरीराज और बच्चा राय के व्यावसायिक हित जुड़े हैं, दोनों एक साथ मिल कर मेडिकल कॉलेज खोलना चाहते थे. इस पर अभी चर्चा गरम ही हो रही थी कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बच्चा राय की तस्वीर अखबारों में छपी. इस पर जनता दल(यू) के नेता सफाई दे रहे हैं कि यह तस्वीर एक शादी समारोह की है.

हिला आत्मविश्वावस समेटने की मायावी कोशिश

बिहार की ख्याति ज्ञान और मेधा की भूमि के तौर पर रही है. लेकिन हाल के दशकों में यह शिक्षा माफिया का क्रीड़ा-केन्द्र बन गया है. सूबे के वित्त रहित इंटर-डिग्री कॉलेजों के संचालकों की बड़ी जमात सूबे की राजनीति में सक्रिय है और चुनावों में वे दलों के अधिकृत उम्मीदवार होते हैं, जीत कर सदनों में जाते हैं. सूबे की राजनीति में शिक्षा माफिया की मजबूत पकड़ और सक्रियता का ही परिणाम है कि टॉपर्स घोटाला को इसी साल के परीक्षा परिणाम तक सीमित रखने की पूरी रणनीति अपनाई गई है. सच तो ये है कि बिहार के लाखों किशोरों और तरुणों के भविष्य से जुड़े इस सवाल को राजनीतिक दल आरोप- प्रत्यारोप के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देना चाहते.

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