कौन होगा रालोसपा का असली वारिस

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upendra-kushwaha-rlsp-kishaबात इतनी आगे निकल चुकी है कि अब वापस लौटनेे की गुंजाइश बेहद कम है. राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी यानि की रालोसपा के दोनों बड़े नेता खुलकर सियासी मैदान में ताल ठोक रहे हैं. वे यह साबित करने में लगे हैं कि लालू और नीतीश के विरोध में बनी इस पार्टी के असली वारिस वही हैं. दोनों के समर्थक नेता भी बयानबाजी पर उतर आए हैं. ऐसे हालात में यह तय करना मुश्किल है कि रालोसपा पर वास्तव में पहला हक किसका है? चौथी दुनिया ने अरुण की शह और उपेंद्र की मात नामक शीर्षक आलेख में पहले ही यह बात उजागर कर दी थी कि इन दोनों नेताओं की दोस्ती अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाली है. हालांकि उस समय दोनों  नेताओं ने यह कहकर सच्चाई से मुंह मोड़ लिया था कि अभी बात इतनी नहीं बिगड़ी है. लेकिन हालिया घटनाओं और बयानों से स्पष्ट है कि अब दोस्ताने में गहरी दरार पड़ चुकी है. दोनों बड़े नेताओं के रास्ते अलग-अलग हो चुके हैं. लेकिन अब सवाल यह है कि आखिर दोनों के लिए इसके बाद का रास्ता क्या होगा?

विधानसभा चुनाव के दौरान यह चर्चा गर्म रही कि टिकटों के बंटवारे को लेकर अरुण कुमार का खेमा नाराज है. अरुण कुमार जितनी हिस्सेदारी मांग रहे थे उतना उनको नहीं मिला. वहीं कुछ उम्मीदवारों को भी  टिकट बांट दिए गए, जिसे लेकर अरुण कुमार का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. अरुण खेमा बाजपट्‌टी से पंकज मिश्रा, रुन्नीसैदपुर से रेखा कुमारी, कुर्था से अशोक वर्मा, नालंदा से हिमांशु पटेल और जगदीशपुर से संजय वर्मा को टिकट दिए जाने के विरोध में था. उपेंद्र कुशवाहा के विरोधियों का कहना है कि जिन नेताओं को टिकट दिया गया है, उनका पार्टी के गठन में कोई योगदान नहीं है. समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर इन क्षेत्रों में ऐसे उम्मीदवारों को जनता पर थोप दिया गया इसलिए चुनाव में पार्टी की करारी हार हुई.

उपेंद्र कुशवाहा पर दूसरा आरोप है कि उन्होंने तथाकथित दागी उम्मीदवार प्रदीप मिश्रा को तवज्जो दी. इतना ही नहीं चुनाव के समय उनके साथ हेलिकॉप्टर पर भी घूमे. प्रदीप मिश्रा पर अरुण खेमा का आरोप है कि उसके संबंध हवाला कारोबारियों से हैं. वहीं प्रदीप मिश्रा इन आरोपों को बकवास बताकर खारिज करते हैं. उन्होंेने इस मामले में अरुण कुमार के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी किया है. तीसरा आरोप यह है कि उपेंद्र कुशवाहा ने शशिशंकर कुमार को अपना निजी सचिव बना रखा है. यही शख्स राजेश यादव के नाम से पार्टी का कोषाध्यक्ष भी है.

जहानाबाद सांसद डॉ. अरुण कुमार कहते हैं कि प्रदीप मिश्रा ने राहुल गांधी के पीए के नाम पर झारखंड के राज्यपाल को फोन किया था. इस मामले में वह जेल भी गया. प्रदीप के कहने पर ही चारा घोटाला के आरोपी डॉ. दीपक को पार्टी का झारखंड का अध्यक्ष बना दिया गया था. जब इसके लिए मोटी रकम लिए जाने की बात पार्टी में उठने लगी, तो दीपक के साले राजेश कुमार को अध्यक्ष बना दिया गया. डॉ. अरुण के मुताबिक उपेंद्र कुशवाहा ने राजेश यादव को पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया और यही व्यक्ति शिवशंकर कुमार के नाम से उनका सहायक निजी सचिव भी है. उपेंद्र ने प्रदीप और राजेश  यादव के साथ विदेश यात्रा भी की. इस विदेश यात्रा की जांच होनी चाहिए. यह भी जांच किया जाए कि इस हवाला कारोबारी से मिलकर उपेंद्र कहीं राष्ट्रीय हितों के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे हैं? वे कहते हैं कि इस बारे में प्रधानमंत्री और मानव संसाधन विकास मंत्री को पत्र लिखूंगा. उपेंद्र ने सीमा सक्सेना को राष्ट्रीय सचिव और अपना सलाहकार क्यों बनाया, इसकी भी जांच होनी चाहिए. मनोज लाल दास मनु का कहना है कि ऐन चुनाव से पहले सीमा सक्सेना की पार्टी में एंट्री होती है और उन्हें एक महत्वपूर्ण पद दे दिया जाता है. आखिर क्यों? जदयू के एक बड़े नेता से सीमा सक्सेना का क्या रिश्ता है, ये सभी जानते हैं. साफ है कि खुफियागिरी के इरादे से सीमा सक्सेना को पार्टी में लाया गया, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा.

इन आरोपों के जबाव में उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि मुझे झूठ और बेतुकी बातें रचने की कला नहीं आती है. मेरा चरित्र वैसा ही है, जैसा मैं जनता के बीच दिखता हूं. उन्होंने डॉ. अरुण के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि समय आने पर जवाब दूंगा. उन्होंने कहा कि क्या गरीब घर में पैदा हुआ व्यक्ति अपने पैसे से विदेश नहीं जा सकता है. अगर कोई विदेश ले जा रहा है, तो इसमें क्या अपराध है? मैंने सरकार या पद की ताकत से कभी अपने करीबी को मदद नहीं पहुंचाई है. गरीब घर का आदमी विदेश चला गया, अब यह किसी को बर्दाश्त नहीं हो रहा है, तो उसकी दवा मेरे पास नहीं है. कोई पीएम और प्रधानमंत्री को पत्र लिख रहा है, तो मुझे इसमें क्या आपत्ति हो सकती है. जांच कराना हो, करा लें. मेरा सबकुछ एक खुली किताब की तरह है. उन्होंने आगे कहा-सार्वजनिक जीवन जी रहे व्यक्ति से कई सारे लोग रोज मिलने आते हैं. अब जो उनसे मिलने आता है, तो क्या उससे उसका चरित्र प्रमाणपत्र चेक करके मिला जाता है? राजेश यादव कहते हैं कि दोनों जगह रहने में कोई असंवैधानिक बात नहीं है. बेवजह बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है. वे कहते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा की बेदाग छवि और उनके बढ़ते कद से घबराकर कुछ जनाधारविहीन नेता अनाप-शनाप आरोप लगा रहे हैं. उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में पार्टी पूरी तरह से एकजुट है और दिन-ब-दिन मजबूत हो रही है. लेकिन इतना साफ हो गया है कि अब वोट हमारा और राज तुम्हारा नहीं चलेगा. पार्टी के वरिष्ठ नेता रामबिहारी सिंह कहते हैं कि जिन उसूलों को लेकर पार्टी का गठन हुआ था, उन्हें और मजबूत करने की जरूरत है. आरोप-प्रत्यारोप से तो पार्टी कमजोर ही होगी. बिहार की जनता को पार्टी से बहुत उम्मीदें हैं. अगर पार्टी को मजबूत करने के लिए मेरी राजनीतिक कुर्बानी की जरूरत भी पड़ेगी, तो हंसते हुए देने को तैयार हूं.

अब स्पष्ट हो चला है कि इन हालातों में दोनों के बीच सुलह-सफाई की गुंजाइश काफी कम है. वहीं राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ये सभी आरोप-प्रत्यारोप बेवजह लगाए जा रहे हैं. असल कवायद तो पार्टी पर कब्जा करने की है. विधानसभा चुनाव तक तो किसी तरह दोनों नेताओं ने संयम बरता, लेकिन अब कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं है. राजनीति की बिसात पर मोहरे बिछ गए हैं और दोनों गुट के लोग चाल चलने में लगे हैं.

इतिहास के पन्नों को पलटें तो राज्य के क्षेत्रीय दलों में कभी नीति को लेकर मतभेद नहीं हुआ. 1990 के बाद जनता दल में कई विभाजन हुए. जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार इसी सवाल पर अलग हुए क्योंकि उन्हेें लालू प्रसाद का नेतृत्व मंजूर नहीं था. रामसुंदर दास से लालू प्रसाद का विवाद भी नेतृत्व के सवाल पर हुआ था. दल के प्रदेश अध्यक्ष के नाते दास की समझ थी कि पार्टी के मातहत सरकार रहे. उधर मुख्यमंत्री के नाते लालू प्रसाद समझ रहे थे कि सत्ता का दूसरा केंद्र बन जाने का असर सरकार के काम-काज पर पड़ेगा. बाद में तो लालू प्रसाद ने शरद यादव का नेतृत्व भी स्वीकार नहीं किया. जनता दल में एक और विभाजन हो गया. राजद के तौर पर नई पार्टी बनी. लोेजपा का गठन भी इसी प्रक्रिया के तहत हुआ. रामविलास पासवान भी किसी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे. रालोसपा, हम या पप्पू यादव की पार्टी के गठन में भी यही पक्ष प्रबल रहा है.

अब स्पष्ट है कि यह रास्ता विभाजन की तरफ ही जा रहा है. दोनों खेमों में तेज मोर्चाबंदी हो रही है. समर्थकों को अपने पाले में मजबूती से करने की कवायद जारी है. शक्ति परीक्षण के अभी कई दौर होने हैं. अरुण खेमा चाह रहा है कि एक बड़े सम्मेलन का आयोजन कर अपनी ताकत का अहसास कराया जाए. उसी दिन उपेंद्र कुशवाहा को राष्ट्र्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया जाए और उनकी जगह पर अरुण कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया जाए. इसके बाद चुनाव आयोग के पास रालोसपा के स्वामित्व का दावा ठोंका जाए. अरुण खेमे का दावा है कि रालोसपा के ज्यादातर फाउंडर मेंबर उनके साथ हैं, जबकि उपेंद्र कुशवाहा का खेमा चाहता है कि अब तस्वीर से परदा उठा दिया जाए. वोट हमारा और राज तुम्हारा की परंपरा से बाज आया जाए और पार्टी विरोधी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए. लड़ार्ई जारी है और अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस युद्ध में अंतिम तीर कौन चलाता है और रालोसपा का झंड़ा अपने नाम करता है.

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