हमें कश्मीरियों की बात ध्यान से सुननी चाहिए

santoshbhartiya-sirहमारे देश का राजनीतिक जगत या तो भ्रमित हो गया है या फिर असंवेदनशील हो गया है. कश्मीर में लोग असंतुष्ट हैं, सड़कों पर हैं, कर्फ्यू लगा हुआ है. सामान्य जनता के घरों में राशन, दूध व पानी की किल्लत हो गई है, लेकिन भारतीय राजनीतिक  परिदृश्य का कोई भी व्यक्ति कश्मीर जाने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है या कश्मीर नहीं जाना चाह रहा है. कश्मीर के अलावा सारे देश में ऐसा मानस विकसित हो गया है, मानो श्रीनगर में रहने वाले सारे लोग, दूसरे अर्थ में कश्मीर में रहने वाले लोग भारत विरोधी हैं और उनसे कोई बात नहीं करनी चाहिए. उनसे बात सिर्फ सेना के जरिए करनी चाहिए. सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चल रहा है जिसमें सेना के नाम से पोस्ट डाली जा रही है. नौजवान लड़कों के फोटो दिखाए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि ये सब आतंकवादी हैं और सेना ने उन सबको मारने की कसम खाई है. सारे देश में कश्मीर के खिला़फ अभियान चल रहा है और अ़फसोस की बात है कि भारत की सरकार इस अभियान को चलने दे रही है. उसके पास कोई जानकारी नहीं है कि कौन इस घृणा के अभियान को चला रहा है. उसके पास इस बात के लिए भी पहल करने का समय नहीं है कि भारत के राजनीतिक दलों के लोग कश्मीर जाएं, ठीक वैसे ही जैसे वो हैदराबाद जाते हैं, जैसे वो उत्तर प्रदेश जाते हैं, जैसे वो भारत के किसी भी प्रदेश में जाकर वहां के लोगों से बातचीत करते हैं.

क्या राजनीतिज्ञों से एक बड़ी चूक नहीं हो रही है कि वो कश्मीर की आवा़ज को नहीं सुनना चाहते जो आवा़ज किन्हीं परिस्थितियों के वशीभूत होकर सड़कों पर पत्थर चला रही है. क्या वो कश्मीर के हालात नहीं समझना चाहते? क्या वो कश्मीर के लोगों को ये भी नहीं बताना चाहते कि हम तुम्हारी तकली़फों को कम करने की कोशिश करेंगे? संसद भी खामोश है, सरकार भी ़खामोश है और राजनीतिक दल भी खामोश हैं.

ये स्थिति कश्मीर के सवाल को उलझा रही है. सालों से कश्मीरी जनता के मन में ये भावना भर गई है कि दिल्ली या भारत या इंडिया उनकी बात सुनना ही नहीं चाहता और तब कोई घटना हो जाती है, बुरहान वानी नाम का लड़का पुलिस की गोली से मर जाता है और उसकी शवयात्रा में 5 लाख लोग शामिल हो जाते हैं. बुरहान वानी को भारत के सोशल मीडिया ने एक बड़े मिलिटेंट के रूप में पेंट किया, कुछ टीवी चैनलों ने भी इस काम में हाथ बंटाया, कुछ नासमझ प्रिंट के पत्रकार भी इस शोर को बढ़ाने में शामिल हो गए, जबकि 15 साल की उम्र में बुरहान वानी ने फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी. वह देखने में खूबसूरत लड़का था. कश्मीर के नौजवानों में उसकी पोस्ट को लेकर आकर्षण पैदा हुआ और वो पोस्टर ब्वॉय माना गया. उसकी भाषा बड़ी आसानी से अलगाववाद की भाषा मान ली गई. कश्मीर में फेसबुक पर जो भी नौजवान हैं, उनकी पहचान बड़ी आसानी से की जा सकती है. प्रशासन चाहता तो उसे पकड़ कर जेल में डाल देता. लेकिन, कश्मीरियों का कहना है कि उसे गिरफ्तार कर गोली मारी गई. दूसरी तरफ प्रशासन का कहना है कि उसके हाथ में हथियार थे और वो आमने-सामने की लड़ाई में मारा गया. प्रशासन की इस बात पर कश्मीरियों को विश्वास नहीं है, शायद इसलिए उसकी शवयात्रा में 5 लाख लोग शामिल हुए.

और, यहीं पर हा़फिज़ सईद कूद पड़ता है, पाकिस्तान सरकार कूद पड़ती है और कश्मीर के सवाल को हाइजैक करने की कोशिश करती है. हा़िफ़ज सईद कश्मीर के सवाल पर पूरी दुनिया से करोड़ों-अरबों रुपए इकट्‌ठा करता है. वो अपनी संस्था जमात-उद-दावा भी चलाता है और भारत में भेजे जाने वाले दहशतगर्दों को रसद भी मुहैया कराता है. पाकिस्तान से जो खबरें आ रही हैं वो ये बताती हैं कि हा़फिज़ सईद आतंकवादी कैंप भी चलाता है. पर म़जे की बात है कि जब कश्मीर में शांति रहती है, तब हा़फिज़ सईद कुछ नहीं बोलता और जहां थोड़ी अशांति ऩजर आती है, वहां वह दुनिया के मुसलमानों को बताने की कोशिश करता है कि यह सब उसी की वजह से हुआ. जबकि, सच्चाई यह नहीं है. नवा़ज शरी़फ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं, अस्थिर हैं, उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. इतना ही नहीं, पाकिस्तान में सेना का सत्ता में दोबारा आने का डर है और इनसे लड़ने के लिए नवा़ज शरी़फ ने कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का राग छेड़ दिया है. इससे वे अपनी घरेलू समस्याओं का रु़ख मोड़ने में कामयाब होना चाहते हैं.

पर, इस सारी स्थिति से कश्मीर का सवाल एक भूल-भुलैया में फंसता जा रहा है. सारे देश को लगता है कि कश्मीर में चल रहा असंतोष पाकिस्तान और हा़फिज़ सईद की देन है. कश्मीर में हो रही पत्थरबा़जी हा़फिज़ सईद की मदद से हो रही है, जो बिल्कुल गलत है. पाकिस्तान कुछ पैसे भेज सकता है. हा़फिज़ सईद सिर्फबयानबा़जी के और कुछ नहीं कर सकता. कहीं भी कुछ हो और कोई खड़ा हो कर ये कह दे कि मैंने ये कराया है, वो सच नहीं माना जा सकता है. लेकिन, इन्हीं बातों से उनलोगों के हाथ में एक हथियार आ जाता है जो इस देश को हिंदू और मुसलमान में बांटना चाहते हैं. कश्मीर के बहाने हर मुसलमान को शक की हमारे देश का मीडिया, हमारे देश की संसद इतने नासमझ हैं कि हा़फिज़ सईद के बयान के आधार पर देश में अपनी रणनीति तय करते हैं. क्या हम इतने गैर जानकार हैं कि जो ये नहीं जानते कि कश्मीर के लोग क्या चाहते हैं या हा़फिज़ सईद जो बात बनावटी तौर पर बोलता है, उसे हम कश्मीर की आवा़ज समझ लेते हैं. यहीं पर हिंदुस्तान की नासमझी समझ में आती है. हमारी विदेश नीति, हमारी रक्षा नीति को कोई तीन आतंकी या कोई हा़फिज़ सईद जैसा आदमी इतना ज्यादा प्रभावित कर लेगा, इससे बड़ा दिमा़गी दिवालियापन का सबूत और क्या हो सकता है?

होना ये चाहिए कि हम हा़फिज़ को पूरी तौर पर एक ऐसे जोकर के रूप में दुनिया के सामने रखें, जो कश्मीर के लोगों के दर्द और आंसू के एव़ज में सारी दुनिया से पैसा जुटाता है. कश्मीर में पिछले 20 दिनों के तनाव में भी अरबों रुपए हा़फिज़ सईद के खाते में आए हैं, ऐसा मुझे हा़फिज़ सईद को जानने वाले एक दोस्त ने बताया. कश्मीर के लोगों के आंसू, दर्द और तकली़फ, जिसके लिए वे सड़कों पर पत्थर चला रहे हैं या आंदोलन कर रहे हैं, उसका कोई मोल हा़फिज़ सईद के लिए नहीं है. उसके लिए कश्मीर में होने वाली हर घटना, उसके लिए पैसा कमाने का एक बड़ा साधन है. और, नवा़ज शरी़फ जब बुरहान वानी की मौत को शहीद दिवस मनाने या काला दिवस मनाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो वो कश्मीर की लड़ाई को बर्बाद करते हैं. कश्मीर के लोगों की लड़ाई वही है, जो बंगाल, बिहार, ओडीशा के लोगों की लड़ाई है. भूख और बेरोजगारी के खिलाफ रास्ता तलाशने की लड़ाई है. कश्मीर की लड़ाई इससे अलग नहीं है. नवा़ज शरी़फ इस लड़ाई को तबाह और बर्बाद करना चाहते हैं और इसे सांप्रदायिक तनाव के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन, जब हमारे देश के राजनेता इस जाल में फंसते हैं, तब लगता है कि हा़फिज़ सईद और नवा़ज शरी़फ ज्यादा समझदार हैं, हमारे देश के नेता कम समझदार हैं. हम लोकतांत्रिक देश हैं, ताक़तवर देश हैं, तकनीकी रूप से आगे हैं, हमें पाकिस्तान और हा़फिज़ सईद जैसे लोगों की जालसा़जी में फंस कर उनके जाल में नहीं उलझ जाना चाहिए.

अब कश्मीर का हाल ये है कि कश्मीर में हुर्रियत का भी नियंत्रण खत्म हो रहा है. 27 जुलाई को हुर्रियत ने बयान दिया था कि दोपहर के बाद बंद वापस हो जाएगा और लोग अपने घरों के लिए सामान खरीद सकेंगे. सरकार ने भी कर्फ्यू में ढील दी. लेकिन, 18 से 20 साल के कुछ लड़के निकल आए. उन्होंने मोटरसाइकिल को चलने से रोक दिया. खुली दुकानों को बंद करा दिया और दोबारा कर्फ्यू लगवा दिया. प्रशासन को जितना समझदार होना चाहिए, उतनी समझदारी दिखाने में कमी कर रहा है. एक घटना कश्मीर में होती है तो वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सु़िर्खयां बनती है. और, कश्मीर में ये छोटी घटनाएं घटती रहें, इसके पीछे वहां की आंतरिक राजनीति भी है. कश्मीर की दो बड़ी पार्टियों में से एक बड़ी पार्टी के गढ़ में ज्यादा स्थिति खराब रही और एक पार्टी के गढ़ में स्थिति कम खराब रही. इस असंतोष को कश्मीर के लोग राजनेताओं के उस रणनीति के रूप में भी देखते हैं कि कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लग जाए. वास्तविकता ये है कि कश्मीर का नौजवान असंतुष्ट है, लेकिन किसी एकीकृत कमांड के तहत काम नहीं कर रहा है. कश्मीर में आज हुर्रियत भी बेबस है, सरकार भी बेबस है. वहां के आम आदमी भी बेबस हैं. बस, अगर कोई खुश है, तो वो लोग जो कश्मीर के इस असंतोष में अपनी राजनीति को सफल होता हुआ देख रहे हैं या फिर वो ता़कतें जो कश्मीर की इस स्थिति से सारी दुनिया से पैसा कमाने का एक जबरदस्त मौ़का हासिल कर चुकी हैं. मैं भारत के राजनेताओं से, संसद सदस्यों से, राजनीतिक पार्टियों से, और खास कर हिंदुस्तान की सिविल सोसायटी से ये अपील करना चाहूंगा कि बिना समय गंवाए उन्हें कश्मीर जाना चाहिए और कश्मीर के आम जन से बात करनी चाहिए और वो क्या कहते हैं, उसे ध्यान से सुनना चाहिए. ये इसलिए आवश्यक है क्योंकि पाकिस्तान में कोई नहीं मानता कि कश्मीर युद्ध के बल पर जीता जा सकता है. कश्मीर में भी ये कोई नहीं मानता कि कश्मीर पाकिस्तान में जा सकता है. बोलना एक बात है, वास्तविकता दूसरी बात है. इसीलिए, कश्मीर एक प्रयोगशाला है जहां के लोगों को मानसिक तौर पर देश के साथ कैसे खड़ा करें, इसका प्रयोग होना आवश्यक है. और उसका एक ही तरी़का मेरी समझ से ये है कि कश्मीर के लोगों से खुली बातचीत संसद को, राजनीतिज्ञों को करनी चाहिए और उन ता़कतों को रोकने की कोशिश करनी चाहिए, जो कश्मीर को हिंदुस्तान से अलग मानसिकता वाला राज्य दिखाने की कोशिश सोशल मीडिया पर कर रहे हैं.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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