कठिन डगर है भाजपा जिलाध्यक्षों की

nnबिहार विधानसभा चुनाव में हार से सबक लेते हुए भाजपा अब प्रदेश जिलाध्यक्ष के चुनाव में भी सतर्कता बरत रही है. पार्टी हित को सर्वोपरि मानते हुए पार्टी के अंदर जातीय वर्चस्व की राजनीति को किनारा करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है. हर जिले में पार्टी संगठन को मजबूत बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं. पार्टी में उभरे जातीय गुटबाजी पर रोक लगाने के प्रयास तेज किए गए हैं. इसके बावजूद नव निर्वाचित भाजपा जिलाध्यक्षों के लिए अपने कार्यकाल का निर्वहन एक चुनौती से कम नहीं है.

अब एक नजर भाजपा जिलाध्यक्ष चुनाव पर डालते हैं. बीते 21 जुलाई को शहर के रेडक्रॉस भवन के सभागार में संपन्न नामांकन प्रक्रिया के दौरान सीतामढ़ी जिले में भाजपा जिलाध्यक्ष पद के लिए कुल 14 नामांकन दाखिल किए गए थे. तब जिला चुनाव प्रभारी सह अत्यंत पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष प्रमोद चंद्रवंशी भी मौजूद थे. चंद्रवंशी की मौजूदगी में रीगा के पूर्व भाजपा विधायक मोतीलाल प्रसाद, डुमरा प्रखंड के पूर्व प्रमुख दिनकर पंडित, तत्कालीन जिलाध्यक्ष मनोज कुमार, मनीष कुमार व उमेशचंद्र झा समेत 14 पार्टी कार्यकर्ताओं ने नामांकन दाखिल किया था. जबकि इससे पूर्व शिवहर जिले में 6 जुलाई को जिला चुनाव प्रभारी सह विधान पार्षद अर्जुन सहनी की मौजूदगी में जिला अध्यक्ष डॉ. धर्मेंद्र किशोर मिश्र, जिला महामंत्री राम कृपाल शर्मा, युवा मोर्चा के क्षेत्रीय प्रभारी संजीव कुमार पांडेय, राजीव कुमार सिंह व दिनेश प्रसाद ने नामांकन दाखिल किया था. नामांकन प्रक्रिया के बाद जिला चुनाव प्रभारियों ने फैसला पार्टी के प्रदेश नेतृत्व के हवालेे कर दिया. तकरीबन एक माह बाद प्रदेश नेतृत्व ने नामांकन दाखिल करने वालों की कुंडली खंगालने के बाद जिलाध्यक्षों के नामों की घोषणा कर दी. इस बीच जिला पार्टी संगठन के कई नेता अपने चहेतों को उक्त पद पर बैठाने को लेकर कवायद करते रहे. परंतु प्रदेश नेतृत्व ने अबकी बार सभी के मंसूबों पर पानी फेरते हुए सीतामढ़ी व शिवहर जिले में पार्टी की कमान नये चेहरों के हवाले सौंप दी है. सीतामढ़ी जिले का कमान भूमिहार बिरादरी के सुबोध कुमार सिंह तो शिवहर में ब्राह्‌मण बिरादरी के संजीव कुमार पांडेय को दी गई है.

सीतामढ़ी जिले में सुबोध कुमार सिंह 10 वें भाजपा जिलाध्यक्ष के रूप में चुने गये हैं. अब तक के जातीय आंकड़ों पर गौर करें तो सीतामढ़ी जिला में भूमिहार बिरादरी को सर्वाधिक 4 बार जिलाध्यक्ष का पद संभालने का मौका मिला है, जबकि वैश्य को 2 एवं ब्राह्‌मण, दलित, यादव व राजपूत बिरादरी को एक-एक बार जिलाध्यक्ष का पद   मिला है. इनमें भूमिहार बिरादरी के जयंत प्रसाद सिंह उर्फ बड़कू बाबू, ललितेेश्वर प्रसाद सिंह व कृष्ण मोहन सिंह, राजपूत बिरादरी के प्रो. रामचंद्र प्रसाद सिंह, यादव बिरादरी के उपेंद्र शुक्ल, दलित से सोनूप राउत, ब्राह्‌मण से सुफल झा के अलावा वैश्य बिरादरी से रामा शंकर प्रसाद व मनोज कुमार भाजपा जिलाध्यक्ष रहे हैं. वहीं शिवहर जिला में संजीव कुमार पांडेय ने 8 वें जिलाध्यक्ष के रूप में पद संभाला है. बताया जाता है कि शिवहर जिले में जातीय आंकड़ों के अनुसार सर्वाधिक 5 बार राजपूत बिरादरी को जिलाध्यक्ष का पद संभालने का मौका मिला है. जबकि शेष कार्यकाल ब्राह्‌मणों का रहा है. इनमें राजपूत बिरादरी के जयराम सिंह, शशिभूषण प्रसाद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नीरज कुमार सिंह एवं ब्राह्‌मण बिरादरी के डॉ. धर्मेंद्र किशोर मिश्र रहे हैं. इनमें शशिभूषण सिंह व डॉ. धर्मेंद्र किशोर मिश्र को दो-दो बार मौका मिला है.

अब दोनों ही जिलों के नवनिर्वाचित जिलाध्यक्षों के संभावित चुनौतियों पर भी एक नजर डालते हैं. सीतामढ़ी में भाजपा समर्थित रालोसपा के टिकट पर चुनाव जीते सांसद राम कुमार शर्मा हैं, तो शिवहर में भाजपा की सांसद रमा देवी हैं. शिवहर में स्थानीय विधायक जद (यू) के हैं, तो सीतामढ़ी में भाजपा के दो विधायक हैं. चर्चा है कि सीतामढ़ी में पूर्व जिलाध्यक्ष रामाशंकर प्रसाद के कार्यकाल के बाद पार्टी संगठन जातीय दलदल में धंसने लगा. पार्टी के करीबी सूत्रों पर यकीन करें तो आलम यह है कि एक खास बिरादरी ने पार्टी संगठन को पूर्णत: अपनी जागीर बना ली है. जिला संगठन में वैसे लोगों को तरजीह दी जाने लगी है, जिन्हें  पार्टी संगठन से कोई खास लेना-देना नहीं रहा है. अब प्रदेश नेतृत्व ने अचानक पासा पलट दिया है. संभव है कि बहुतों को पार्टी नेतृत्व का फैसला सही नहीं लगे, ऐसे में नवनिर्वाचित अध्यक्ष को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. कमोबेश यही हाल शिवहर जिले का भी है. राजनीतिक जानकारोंें का मानना है कि दोनों ही जिले में नवनिर्वाचित अध्यक्षों को धैर्य व संयम के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं से तालमेल कर संगठन को मजबूत बनाने की दिशा में पहल करनी होगी. अगर उन्होंने जातीय दलदल से खुद को किनारा नहीं किया तो यह पार्टी संगठन के लिए घातक साबित हो सकता है. वहीं प्रदेश नेतृत्व को भी जिला संगठन पर पैनी नजर रखनी होगी. शहर में होर्डिंग व बैनर लगाने की जगह गांवों में जाकर कार्यकर्ताओं व आम जनता के बीच समय देना होगा. वैसे नवनिर्वाचित जिलाध्यक्ष पार्टी का झंडा किस ऊंचाई तक लहरा पाते हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं.

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