सामने आएंगे नालंदा भग्नावशेष के कई सच

s1प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का भग्नावशेष विश्व धरोहर में शामिल हो गया. गत दिनों टर्की की राजधानी इस्ताम्बूल में वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी की बैठक में इसकी घोषणा की गई. राज्य में बोधगया के महाबोधि मंदिर के बाद प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय दूसरा तथा देश का 33 वां विश्व धरोहर बना. अब इसके विकास, सुरक्षा व संरक्षण की जिम्मेदारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया तथा बिहार सरकार की होगी. प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का भग्नावशेष 14 हेक्टेयर में फैला है. कहा जाता है कि अब भी इस भग्नावशेष का पूरा हिस्सा सामने नहीं आया है. यहां तक की मुख्य प्रवेश द्वार का भी अभी तक पता नहीं चला है. अब उम्मीद बंधी है कि यह दुनिया इस धरोहर के कई अनजाने पहलुओं से भी रूबरू हो सकेगी.

वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल करने से पूर्व यूनेस्को की संस्था आयकोमास के एक्सपर्ट मो. मशाया मशूरी के नेतृत्व में 26 अगस्त 2015 को एक जांच दल ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर का निरीक्षण किया था. साथ ही इस खंडहर से जुड़े व्यक्तियों व समूहों से मिलकर इसके विभिन्न पहलुओं की विस्तृत जानकारी हासिल की थी. 27 अगस्त 2015 को जांच दल ने इस खंडहर के आस-पास अन्य पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक स्थलों का निरीक्षण किया था. इसी दिन राजगीर के अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन हॉल में खंडहर के आस-पास के ग्रामीणों, रिक्शा व तांगा चालकों, दुकानदारों व जनप्रतिनिधियों के साथ भी मो. मशाया मशूरी एवं एएसआई की टीम की बैठक हुई थी. जांच दल इस बात से प्रभावित था कि जिले के सभी लोग अपनी गौरवशाली विरासत को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कराने को लेकर उत्साहित थे. अंतत: यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी ने अपने 40 वें सेशन के दौरान प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल कर लिया.

नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था. बौद्ध धर्म के इस शिक्षा केंद्र में अन्य धर्मों व कई अन्य देशों के छात्र पढ़ते थे. वर्तमान बिहार राज्य में पटना से करीब 90 किलोेमीटर दक्षिण पूर्व और राजगीर से करीब 11 किमी उत्तर में नालंदा के एक गांव के पास अलेेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष, इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज करा देते हैं. अनेक प्राचीन अभिलेखों और सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है.

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में यहां अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष एक छात्र और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था. प्रसिद्ध बौद्ध सारीपुत्र का जन्म यहीं पर हुआ था. इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमार गुप्त प्रथम (450-470)  को प्राप्त है. गुप्त वंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासकों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा. इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला. स्थानीय शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला. यह विश्व का प्रथम पूर्णत: आवासीय विश्वविद्यालय था. इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब 10000 एवं अध्यापकों की संख्या 2000 थी. इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे. नालंदा के विशिष्ट शिक्षा प्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे. इस विश्वविद्यालय की नौवीं सदी से बारहवीं सदी तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति रही थी. अत्यंत सुनियोजित और विस्तृत क्षेत्र में बना यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भूत नमूना था. इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था, जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था. उतर से दक्षिण की ओर मठों की लंबी कतार थी और उनके सामने भव्य स्तूप और मंदिर थे. मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियां स्थापित थीं, जिनमें व्याख्यान हुआ करते थे. अभी तक खुदाई में 13 मठ मिले हैं, जबकि अभी कई और मठ मिलने की संभावना है.

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