भाजपा विकास के नारे के साथ सत्ता में आई थी

narendra-modiविदेश सचिव एस जयशंकर ने एक संसदीय समिति को बताया है कि पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक हुए हैं, लेकिन यह पहली बार है जब सरकार ने सार्वजनिक रूप से इसका खुलासा किया है. दरअसल यही सही तरीका है. संसदीय सवालों का जवाब देने में सच्चाई बरती जानी चाहिए और संसदीय समिति के समक्ष सही बयान देना चाहिए. मुझे यह जान कर ख़ुशी हुई है कि यह परंपरा जारी है और विदेश सचिव (जो भले ही मौजूदा सरकार को रिपोर्ट कर रहे हैं) ने दृढ़ता के साथ वही बात कही, जो सच है. राजनीतिक दल जो कहना चाहते हैं, वे कहने के लिए आज़ाद हैं, आखिरकार उन्हें राजनीति करनी है. यहां तक कि सत्ताधारी दल भी अपनी बात कहने के लिए आज़ाद हैं, जैसे ये प्रचारित करना कि पहली बार कोई मंत्रालय स्थापित किया गया है, इत्यादि. लेकिन इससे मुझे विश्‍वास होता है कि सिस्टम काम कर रहा है.

उत्तर प्रदेश में चुनाव आ रहे हैं और यह ज़ाहिर है कि भाजपा मिलिट्री कार्रवाई को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. राहुल गांधी ने इस पर कुछ कहा था, जिसकी भाषा ठीक नहीं थी. वह कहना यह चाहते थे कि सरकार सैनिकों की कार्रवाई पर राजनीति करना चाहती है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तीन दिन के बाद यह कह कर इसकी पुष्टि कर दी कि उत्तर प्रदेश चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक मुद्दा होगा. दरअसल राहुल गांधी और मोहन भागवत दोनों एक ही बात कह रहे हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है. सशस्त्र बलों पर इसका अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा. इससे बचा जाना चाहिए. अगर आप इसे इस्तेमाल करना ही चाहते हैं, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से होना चाहिए. जिस तरह से हो रहा है, कम से कम वैसा तो बिलकुल ही नहीं होना चाहिए. लेकिन मैं समझता हूं कि मतदाता अब होशियार हो गया है, वह जानता है कि सेना ऐसी संस्था है, जो किसी भी पार्टी की सरकार रहे, अपना काम करती रहती है. मुझे नहीं लगता है कि सर्जिकल स्ट्राइक से बहुत अधिक राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता है.

उसी तरह से राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है, जो हर चुनाव से पहले उठाया जाता है. भाजपा यह वादा कर रही है कि वह राम मंदिर बनाएगी. हालांकि वे जानते हैं कि कानूनी तौर पर यह संभव नहीं है, जबतक सुप्रीम कोर्ट इस पर आखिरी फैसला न दे दे. जहां तक राजनीति का सवाल है, तो राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है, जो हिन्दुओं को एकजुट करता है और एक यूफोरिया (उन्माद) पैदा करता है. लेकिन भाजपा को यह समझना चाहिए कि वे विकास के नारे के साथ सत्ता में आए थे. अगर वे सबका साथ, सबका विकास के नारे पर कायम रहते हैं तो उन्हें अधिक लाभ होगा. लेकिन बदकिस्मती से विकास की अपनी खास रफ़्तार होती है. ढाई साल का समय निकल चुका है. व्यक्तिगत तौर पर प्रधानमंत्री के बेहतर प्रयासों के बावजूद चीज़ों के बेहतर होने में समय लगेगा. बेशक चुनाव आते हैं और आएंगे. उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव उनके लिए महत्वपूर्ण है. बिहार हारने के बाद, यदि वे उत्तर प्रदेश भी हार जाते हैं, तो 2019 उनके लिए मुश्किल हो जाएगा. बेशक अखिलेश यादव विकास की बात कर रहे हैं और अपने कार्यकाल के आंकड़े जारी कर रहे हैं, लेकिन मैं नहीं समझता कि आम जनता इन बातों से बहुत अधिक प्रभावित होगी. आम जनता के लिए जीवनयापन की समस्या एक मुद्दा है. उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था ठीक नहीं है, जो अखिलेश के खिलाफ जाएगा, लेकिन भाजपा वह पार्टी नहीं है, जो इसका फायदा उठाएगी क्योंकि यदि मुसलमान मायावती के साथ चले गए, तो भाजपा को अधिक संघर्ष करना पड़ेगा.

एक और मुद्दा जो सामने आया है, वह यह कि पाकिस्तानी कलाकारों को यहां काम करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए, लोगों को उनका बहिष्कार करना चाहिए और उनकी फिल्मों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. महाराष्ट्र में एमएनएस कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर रही है. ये सब दुर्भाग्यपूर्ण है. सरकार को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के जरिए एक साफ़ रुख अपनाना चाहिए. यदि पाकिस्तान के कलाकारों को यहां काम करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी, तो सबसे पहले उनका वीजा रद्द किया जाना चाहिए. उसी तरह आप पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को यहां आने की अनुमति नहीं देते और जनता से कहते हैं कि उन्हें पाकिस्तान के क्रिकेट मैचों का बहिष्कार करना चाहिए. यह कैसे संभव है? पाकिस्तानी अभिनेता यहां आए, उन्होंने फिल्मों में अभिनय किया, पैसा लिया और अपने देश लौट गए. अब जिन गरीब भारतीय प्रोड्यूसरों ने अपना पैसा लगाया है, उनसे आप कह रहे हैं कि वे फिल्म रिलीज़ नहीं करें या लोगों से कह रहे हैं कि वे उन फिल्मों का बहिष्कार करें. यह बहुत अनुचित है. सरकार को इस संबंध में एक निर्णय लेना चाहिए. एक स्थिति पैदा करना और फिर बाद में उस स्थिति से भागना केवल प्रोड्यूसरों को मुश्किल में डालना है. यह कह कर कि पाकिस्तानी कलाकारों की फिल्में देखना देशभक्तिपूर्ण नहीं है, आप सिनेमा देखने वालों को असमंजस में डाल रहे हैं. मुझे लगता है कि यह चीज़ों को तूल देना है. कला को इससे अलग रखा जाना चाहिए. बहरहाल आप यह रुख अपना सकते हैं कि पाकिस्तानी कलाकारों के लिए कोई वीजा जारी नहीं होगा, तो उसके बाद कोई समस्या ही नहीं रहेगी. राजनीतिक हालात तो रोजाना बदलते हैं, बॉर्डर पर हालात रोजाना बदलते हैं. किसी फिल्म पर एक या दो साल की अवधि में काम पूरा होता है, ऐसे में उन राजनीतिक सीमा की स्थिति को उससे कैसे जोड़ा जा सकता है. मुझे लगता है कि सरकार को अपनी समझ का इस्तेमाल करते हुए इस मुद्दे पर अपना स्टैंड लेना चाहिए.

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