मीरवाइज़ मौ. उमर फारूक़ से Exclusive बातचीत : ये नाइंसा़फी बंद होनी चाहिए

श्रीनगर का चश्मेशाही कभी पर्यटकों का बड़ा आकर्षण हुआ करता था. आज यहां कोई नहीं जा सकता- केवल पुलिस के लोग दिखाई देते हैं, क्योंकि यहां के गेस्टहाउस में मीरवाइज़ मौलवी उमर फारूक़ क़ैद हैं. केवल सिपाही, जेल कर्मचारी और भालू यहां आते हैं. रात के सन्नाटे में चूहों की भागदौड़ लकड़ी की खूबसूरत छत को भूतिया आवाज़ में बदल देती है. सात दिन में एक बार स़िर्फ उनके घर के लोग मिलने आते हैं. पिछले दो महीने की जेल के दौरान सिर्फ संतोष भारतीय  एकमात्र ऐसे बाहरी व्यक्ति या पत्रकार थे, जो उनसे मिल पाए. स्मृति और लिखे गए नोट्‌स के आधार पर उनसे 106 दिनों की तन्हाई के बीच कश्मीर के हालात पर विस्तार से बात हुई, जो लोकतंत्र, इंसानियत और सपनों के टूटने के दर्द और ग़ुस्से के दस्तावेज़ हैं और सरकार के लिए एक चेतावनी भी… mirwaiz-umar-farooq

सवाल – कश्मीर की हालत की ख़बर आप अख़बारों से और टेलीविज़न से देखते होंगे. क्या लगता है आपको, कश्मीर क्यों उबल रहा है, क्या हो रहा है?

मीरवाइज़- देखिए, बुनियादी बात तो यह है कि आज 1947 के बाद से कश्मीरियों की पांचवीं नस्ल भी इस कनफ्लिक्ट का हिस्सा बन चुकी है. बदक़िस्मती की बात यह है कि हुकूमत-ए-हिंदुस्तान अभी तक इस बात को महसूस नहीं कर रही है. इस बात को एक्सेप्ट नहीं कर रही है कि कश्मीर का मसला न तो लॉ-एंड-ऑर्डर का मसला है और न तो यह सड़क, बिजली, पानी का मसला है और न ही ये इंतज़ामी, इलेक्शन और एडमिनिस्ट्रेशन का मसला है. ये एक सियासी मसला है. ये एक डिसप्यूट है. इसका एक पसेमंज़र है, इसका एक बैकग्राउंड है और जब तक उस पसेमंज़र को मद्देनज़र रखते हुए आगे नहीं चला जाएगा, हल तलाश नहीं किया जाएगा, तब तक इस क़िस्म की सिचुएशन होती रहेंगी. चाहे हम 1947 से लेकर आज तक की बात करें, मुख्तल़िफ दौर आए. ख़ास तौर पर अगर हम 10-20 सालों की बात करें तो 2008, 2010 और आज एक बार फिर, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस बार-बार ये कहती रही, बार-बार हमने ये कहा कि जब वाजपेयी साहब की हुकूमत बनी, कांग्रेस का यूपीए-1 आया, यूपीए-2 आया, हमने उनसे कहा कि भई, आप लोग जो ये तास्सुर दे रहे हैं कि कश्मीर में सबकुछ बेहतर है, सैलानी आ रहे हैं और लोग बड़े ख़ुशहाल हैं, ये एक मेन्युफैक्चर्ड ट्रूथ है या हम कहें कि मेन्युफैक्चर्ड हालात दिखाए जा रहे हैं. जबकि यहां की हक़ीक़त यह है कि ताक़त और तशद्दुद (हिंसा) के बल पर हमारी आवाज़ को दबाया जा रहा है. हालात ये हैं कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को जलसे-जुलूस तो दूर की बात है, यहां तो हमें अपनी आवाज़ उठाने का भी हक़नहीं है. यहां तो नमाज़-ए-जुमा पर पाबंदी है. यहां तो ईद छह साल से ठीक से नहीं मन पा रही है.

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मैं हुर्रियत के सदर की हैसियत से नहीं, बल्कि कश्मीरियों के मुसलमान रहनुमा की हैसियत से बात कहूंगा कि हमारे सियासी, इंसानी, समाजी हुक़ूक़ (अधिकार) तो दूर की बात है, हमारे तो मज़हबी हुक़ूक़ भी सल्ब (छीन) कर लिए गए हैं. जामा मस्जिद यहां की सबसे बड़ी इबादतगाह है, जहां पिछले 15 जुमा से नमाज़ की इजाज़त नहीं दी गई है. तो अमलन जम्मू कश्मीर को पुलिस स्टेट में तब्दील कर दिया गया है. ज़ाहिर सी बात है कि बुरहान वानी की शहादत के बाद ऐसा सिचुएशन आ गया है कि लावा उबल पड़ा. जब से मोदी सरकार दिल्ली में आई है और जो उनका एक रवैया रहा है, उससे कश्मीर के लोग ना़खुश हैं. जो पॉलिसी उन्होंने एडॉप्ट की कि पहले ये कहा गया कि यहां सैनिक कॉलोनी लाई जाएगी, फिर ये कहा गया कि यहां पर बांग्लादेशी रिफ्यूजियों को बसाया जाएगा. इसके बाद बीजेपी के लीडरशिप, सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर बाक़ियों ने कहा कि यहां आबादी का तनासुब तब्दील करने की ज़रूरत है. यहां पर रिटायर्ड फौजियों को बुलाने की ज़रूरत है. इसके बाद कश्मीरी पंडित की कॉलोनी के मामले में हुआ कि भई, यहां इजराइल के तर्ज़ पर सेपरेट कॉलोनी बसाई जाएगी. जबकि हुर्रियत ने हमेशा ये कहा है कि हम कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहते हैं, लेकिन अलग से नहीं. वे हमारे साथ रहें, जिस तरह से भाईचारा और आपस में हमारा एक रिश्ता था, उसे हम बिल्कुल क़ायम रखना चाहते हैं, रिवाइव करना चाहते हैं. लेकिन हुकूमत एक के बाद दूसरी ऐसी पॉलिसीज का एलान करती रही, जिसका सीधा इंप्रेशन कश्मीर के लोगों को ये गया कि उनके हुक़ूक़ आहिस्ता-आहिस्ता सल्ब किए जा रहे हैं. कश्मीरियों की जो शिनाख्त है, उनकी जो एक अपनी मुस्लिम शिनाख्त है, उसे आहिस्ता-आहिस्ता डाइल्यूट किया जा रहा है. ये सिलसिला चलता रहा है. हैरत की बात ये है कि पीडीपी, जिन्होंने उसके खिला़फ इलेक्शन लड़ा, उन्हीं के साथ हाथ मिलकर हुकूमत बना ली.

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जाहिर सी बात है कि अवाम में ग़ुस्सा रहा. अब कश्मीरी अवाम में लावा उबल पड़ा है. हालात ये हैं कि हर तऱफ कश्मीर के लोग ये कह रहे हैं कि ये कोई छोटी बात नहीं है. 106 दिन बीत गए हैं. पूरा कारोबार बंद है, लोग बंद हैं. आप देखिए, सबसे अहम बात ये है कि जो बदक़िस्मती से बार-बार हुर्रियत की लीडरशिप को टारगेट किया जा रहा है कि ये लोग जो कर रहे हैं, किसी मुल्क की इमा (इशारे) पर कर रहे हैं. पाकिस्तान की इमा पर कर रहे हैं. हम तो पिछले छह महीनों से घर में बंद हैं. चाहे गिलानी साहब हों, मैं हूं, यासीन हों या पूरी लीडरशिप. हमें तो बाहर जाने की इजाज़त नहीं है. हमें तो जलसे-जुलूस करने की इजाज़त नहीं है. अब इन्होंने सेमिनार तक पर पाबंदी लगा दी है. होटलों वग़ैरह में जब तक पुलिस इजाज़त नहीं देगी, आप सेमिनार तक नहीं कर सकते हैं. इन सारी सूरतेहाल में सबसे आसान बात हुकूमत और मीडिया के लिए यह हो जाती है कि जब वे कहते हैं कि कश्मीर में सब कुछ पाकिस्तान की शह पर हो रहा है और जब ये बात हिंदुस्तान के अवाम तक पहुंचती है, तब शायद वे इस बात पर यक़ीन कर लेते हैं. जब भी कोई बात पाकिस्तान से मनसूब होती है तो उनको दिखाया जाता है कि कश्मीर में जो हो रहा है, सारा पाकिस्तान कर रहा है. ये बहुत बड़ा अलमिया (त्रासदी) है. सबसे अहम बात यह है कि ये बात खुद हुकूमत-ए-हिंदुस्तान के लीडरशिप ने तस्लीम की थी. हैरत की बात यह है कि जिस बीजेपी की आज हुकूमत है, उन्हीं के लीडर अटल बिहारी वाजपेयी थे. मुझे याद है कि जब हम उनसे मिले तो उन्होंने बरमला इस बात का एतरा़फ किया. जब वो कश्मीर पहली बार आए तो, जिस तरह मोदी आए, मनमोहन सिंह साहब आए और कहा कि हम इकोनॉमिक पैकेजेज़ का एलान करते हैं. 80 हजार करोड़, 6 हजार करोड़, 120 हजार करोड़ वग़ैरह ये वो, पैकेजेज़ देंगे व नौकरियां देंगे वग़ैरह. लेकिन जब वाजपेयी आ़खिरी बार कश्मीर आए तो उन्होंने कहा कि हमें इस मसले को पॉलीटिकली हल करना है. हमें इस मामले को सुलझाना है.

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हमें याद है कि जब हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की बातचीत वाजपेयी साहब के साथ शुरू हुई, तब उन्होंने ये कहा कि हम इंसानियत की बुनियाद पर यहां बातचीत शुरू करेंगे. उन्होंने ये कहा कि इंसानियत आईन से बढ़कर है और आईन के दायरे में अगर हम हल नहीं निकाल सकते हैं तो इंसानियत के दायरे में बैठकर हम इसका हल निकालेंगे. उसके बाद हमसे बात हुई. हुर्रियत से बात हुई, पाकिस्तान से बात हुई, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को पाकिस्तान जाने की इजाज़त दी गयी. हम पाकिस्तान गये. हमने वहां मुशर्ऱफ से बात की. बातचीत के दो दौर चले. उसके बाद आगरा सम्मिट हुआ, बाक़ी चीज़ें भी हुईं. हम ये महसूस कर रहे थे कि बीजेपी हुकूमत शायद उसी पॉलिसी को आगे बढ़ाएगी. लेकिन ये तो बड़ा क्लियर था कि जो एक माहौल, जो उनकी पॉलिसी रही कि कश्मीर मामले को मिलिट्रली डील किया जाए, न कि सियासी तौर पर डील किया जाए. आज हालात ये हैं कि यहां पर लोग सड़कों पर बरमला एहतजाज (खुला प्रदर्शन) कर रहे हैं कि भाई इनफ इज इनफ. कब तक हमें इस मसले को दो साल, तीन साल, चार साल बाद उठाते रहना होगा और कहना होगा कि हमारे मसले हल करो. लेकिन इसको हमेशा डायवर्जन दिया जाता है.

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कभी ये कहा जाता है कि नौकरियां देंगे. कभी ये कहा जाता है कि मुलाजमत देंगे. अब ये सिलसिला चल रहा है, देखिए कितने अफसोस की बात है. इस सारी एजिटेशन में हम तो बंद रहे. 8 जुलाई से 26 अगस्त तक मैं तो घर में नज़रबंद रहा. 26 अगस्त से आज 21 अक्टूबर तक यहां पर मुझे क़ैद-ए-तन्हाई में रखा गया है. हम देख रहे हैं कि जिस तरह का रवैया अवाम के हवाले से रहा है इस हुकूमत का और बदक़िस्मती की बात है कि जो लोग अपने आप को अवामी नुमाइंदा कहते हैं और अवाम के साथ उनका जो तरीक़ा रहा है, गोलियां चलाना, पैलेट चलाना, अंधा करना और वो शक्लें, वो तस्वीरें, वो वीडियो, जो पूरी दुनिया देख रही है, हमारे लिए शर्म की बात है.

सवाल – आपका इशारा महबूबा जी की तरफ है?

मीरवाइज़ – बिल्कुल महबूबा जी की तऱफ है. उनकी हुकूमत की तऱफ है. एडमिनिस्ट्रेशन की तऱफ है. ये हुकूमत जो है, इसका कोई मोरल इख्तियार नहीं है अब हुकूमत करने का.

सवाल – इसके कैरेक्टिव मेजर्स क्या हो सकते हैं?

मीरवाइज़ – देखिए, इसका सबसे बड़ा कैरेक्टिव मेजर तो ये है कि ये ढकोसला जो इन्होंने (महबूबा मुफ्ती) शुरू कर दिया यहां पर कि हम यहां अमन, शांति और बेहतरी चाहते हैं. हम ये करेंगे, हम वो करेंगे. सबसे अहम मसला जो हमारा था, हमने इनसे कहा चाहे नेशनल कांफ्रेंस हो या पीडीपी हो, हमने, गिलानी साहब ने और यासीन साहब ने मुसतरका तौर पर जो उनसे कहा कि आप अगर वाक़ई कोई चीज़ करना चाहते हैं तो वो ये है कि आप बरमला इस बात का एतराफ कीजिए कि ये इंतज़ामी मामला नहीं है, बल्कि सियासी मामला है और दिल्ली में जाकर ये बात कहिए. उनको ये बात समझाइए. लेकिन बदक़िस्मती की बात ये है कि इक्तेदार (सत्ता) की हवस में वो फिर से डायवर्ज़न दे रहे हैं. फिर से ये कहा जा रहा है कि ऑर्केस्ट्रेटेड मामला है, स्पॉन्सर्ड मामला है, पैसे दिए जा रहे हैं, इसे गाइड किया जा रहा है, पूरी लीडरशिप बंद है. हमारे वर्कर्स बंद हैं, हमारी ऑर्गेनाइजेशन को बिल्कुल डिफंक्ट कर दिया गया है. कश्मीर की तारी़ख में पहली बार 6000 लोगों पर मुक़दमे दायर किए गए हैं. यहां करीब दस हज़ार नौजवान बंद हैं. पंद्रह हज़ार लोग जख्मी हैं. तो इन सारी सूरतेहाल का जबतक हुकूमत-ए-हिंदुस्तान, मैं आपसे बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ ये कहूंगा कि कश्मीर की हक़ीक़त ये है कि चाहे यहां नेशनल कॉन्फ्रेंस रही हो या पीडीपी रही हो, ये जमातें मुखौटा हैं. ये जमातें एक चेहरा हैं. लेकिन इनके पीछे जो हाथ है, वो नई दिल्ली है, वो सरकार है. और कोई भी सरकार यहां रही हो, चाहे महबूबा मुफ्ती साहिबा रही हों, मुफ्ती साहब रहे हों, उमर अब्दुुल्ला साहब रहे हों, फारूक़ अब्दुल्ला साहब रहे हों या शे़ख अब्दुल्ला साहब, तब से लेकर आज तक यहां दिल्ली सरकार चलाती है, वही फैसले करती है. ये तो एक मुखौटा हैं, तो इसलिए ये तआस्सुर देना कि फैसले ये कर रहे हैं और उनके पास फैसले की कोई अथॉरिटी है, तो हमें मालूम है कि उनके पास फैसले की कोई अथॉरिटी नहीं है.

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यही वजह है कि हम डायरेक्टली दिल्ली से कहते हैं, दिल्ली की हुकूमत से कहते हैं, कांग्रेस से कहते हैं, बीजेपी से कहते हैं, लेफ्ट से कहते हैं, जब पिछली बार दिल्ली से येचुरी साहब, ओवैसी साहब मिलने आये, तो दो मिनट में मैंने उनसे यही कहा कि भई देखिए, आप तो कुछ साल पहले भी आए थे. आपने कहा था कि हम बात करेंगे. आपने कहा था कि इनिशिएटिव लेंगे, लेकिन क्या हुआ उन रिपोट्‌र्स का, जो आप ही के इंटरलोक्यूटर ने दी थी? आप ही के जो बाक़ी लोग यहां पर आए, उन्होंने यहां पर बात की कि भई हम इनीशिएट करेंगे. हम मसले का हल ढूढेंगे. लेकिन मसला यह है कि जब कश्मीर में आग लगती है, तो आप दौड़े चले आते हैं. जब आपको लगता है कि हालात हमारे कंट्रोल में हैं और हमारी पुलिस, हमारी पैरामिलिट्री, हमारी आर्मी इस सिचुएशन में है कि कंट्रोल कर सकती है, तो आप सब भूल जाते हैं. उन्होंने खुद बरमला ये ऐतरा़फ किया. उन्होंने कहा कि हां, हमसे ग़लती हुई है और हक़ीक़त ये है कि अभी तो वे आए ही थे और वापस चले गए और शाम को राजनाथ सिंह ने बयान दिया कि खुद चले गए. हुर्रियत तो फिर सही थी न कि उनके (प्रतिनिधिमंडल) पास बात करने का कोई मैंडेट नहीं था. हम तो खुद कहते हैं कि सबसे ज्यादा अगर कोई तकली़फ में हैं, तो वो यहां के लोग हैं, सबसे ज्यादा मुश्किलात में यहां के लोग हैं, यहां की अवाम है. यहां की अवाम यह महसूस कर रही है कि जब तक हमारे असली प्रॉब्लम बिजली, सड़क, पानी, नौकरियां और सब्सिडियां, ठेके व एसपीओ लगवाना और फौज में भर्ती होना नहीं है, हमारा असल मामला है कि जो डिस्प्यूट है, उसे एड्रेस किया जाय और उसके दो ही बेहतरीन तरीक़े हैं. हुर्रियत ने भी कहा, या तो आप बैनुलअक़वामी क़रारदादें हैं, उन पर अमलदरामद करें या फिर जो फरीक़ैन हैं, हिंदुस्तान है, पाकिस्तान है और कश्मीर की अवाम है, उनके साथ बातचीत शुरू करें, बल्कि हमारा तो बरमला ये कहना है कि पूरा कश्मीर जो 14 अगस्त 1947 को था, जिसमें से पाकिस्तान के पास एक हिस्सा है, हिंदुस्तान के पास एक हिस्सा है, पूरा जम्मू कश्मीर मोतनाज़ा है. एक तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान बातचीत के लिए इनिशिएट करें और सभी कश्मीरियों को आपस में मिलने दें. आर-पार जो हमारे पांच खीत्ते हैं, जम्मू है, कश्मीर है, लद्दाख है, मुज़फ्फराबाद है, गिलगित-बलतिस्तान है, वहां के लोगों को मिलने दिया जाए, लीडरशिप को मिलने दिया जाए, बातचीत करने दिया जाए, ताकि हम इसका हल निकाल सकें. इस सूरते हाल में आप क्या कह सकते हैं, जब हिंदुस्तान ये कह रहा है कि ये कश्मीर तो है ही मेरा, गिलगित-बलतिस्तान भी हमारा है और बलूचिस्तान भी हमारा है.

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पाकिस्तान कह रहा है कि सारा हमारा ही शहरग है. जब तक कश्मीरियों की ़फरीक़ाना हैसियत को तस्लीम नहीं किया जाएगा और यह हमारे लिए सबसे अफसोस की बात है कि जो रवैया इस हुकूमत का रहा है, ये तो बिल्कुल उस रवैये के बरअक्स रहा है, जो वाजपेयी का रहा. हमारा मसला ये है कि भाई, ये वही हुकूमत है, जिन्होंने दो बार विदेश सचिवों की मुलाक़ात कैंसिल कर दी, क्योंकि उन्होंने कहा कि हम हुर्रियत से बात करेंगे. वे तो वाजपेयी के वक्त भी हुर्रियत से बात करते थे, कांग्रेस के वक्त भी करते थे. वाजपेयी ने तो हमें पासपोर्ट दिए और कहा कि आप पाकिस्तान से बात कीजिए, उनसे भी आप मुलाक़ात कीजिए. हम बस में मुज़फ्फराबाद गए और वहां हमने बातचीत की. हम ये महसूस करते हैं कि हुकूमत-ए-हिंदुस्तान को यह समझना है. ये ठीक है कि पिछले सौ दिनों का एक अनप्रेसिडेंटेड (विरोध कर) लोगों ने दिखा दिया है, एक बार फिर लोगों ने यह वाज़ेह कर दिया है, एक पैग़ाम दिया है कि ये आवाज़ खत्म नहीं होगी, ये आवाज़ दबेगी नहीं, चाहे आप कितना भी ज़ुल्म कर लें, तशद्दूद कर लें, कर्फ्यू लगा लें, सख्ती कर लें, बंदिशें कर लें, लीडरशिप को बंद कर दें. देखिए, लीडरशिप पिछले सौ दिनों से बंद है, कौन चला रहा है, अवाम चला रही है. हम तो कहीं नहीं हैं, पिछले सौ दिनों से तो मैंने किसी का चेहरा भी नहीं देखा. ज्यादा से ज्यादा फैमिली मेंबर्स आते हैं, न कोई सियासी वर्कर एलाउड है, न कोई पार्टी वर्कर एलाउड है, न कोई बात हम कर सकते हैं. हमें घरों में बंद कर दिया गया है, उसके बाद जेलों में बंद कर दिया. तो अगर ये स्पॉन्सर्ड तहरीक होती तो अब तक तो इसका दम निकल जाता. ये अवाम की तहरीक है. यह समझना चाहिए कि अवामी तहरीकों को ताक़त से, तशद्दुद से, पैसा से, कर्फ्यू से आप खत्म नहीं कर सकते. आपको इसे एड्रेस करना है, पॉलीटिकली एड्रेस करना है और हुर्रियत ने हमेशा उसे तरजीह दी है.

सवाल – पॅालीटिकली एड्रेस करने के लिए, चाहे यहां की सरकार हो या दिल्ली की सरकार हो, आप अवाम के लीडर हैं, मैं आपसे एक सवाल पूछूं कि इसका माहौल बनाने के लिए आपकी नज़र में क्या-क्या क़दम हैं? एक क़दम मुझे समझ में आता है कि आपको मिलने ही नहीं दे रहे हैं तो आप पॉलीटिकली एड्रेस कैसे करेंगे?

मीरवाइज़ – देखिए, सबसे बड़ा मामला यह है कि जब ऑल पार्टी डेलिगेशन आया, तो अगर वाकई हुकूमत सीरियस थी, ये तो मज़ाक़ था कि महबूबा मुफ्ती साहिबा हमें खत भेज रही हैं कि आप इनसे मिलिए और टाइम दीजिए और हमको जेल में बंद कर दिया. मैं यहां बंद था और मुझसे कहा जा रहा था कि आप अपना टाइम च्वाइस करिए. यह तो मज़ाक़ था कि आपने हुर्रियत को बंद कर दिया है, यासीन को बंद कर दिया है, मुझे बंद कर दिया है, गिलानी को बंद कर दिया है और आप इनसे कह रहे हैं कि इनसे मिलिए. अगर आप सीरियस थे तो हमें रिहा करते. मशविरा करते. बात करते. हो सकता है हम मिल लेते, अपनी बात कहते, लेकिन आप जो माहौल बना रहे हैं कि आपने हमारी आवाज़ को यहां बिल्कुल सल्ब कर दिया है, लोगों की आवाज़ को सल्ब कर दिया है, तो सबसे अहम मसला ये है कि जब तक पॉलीटिकल लीडरशिप को बात करने का मौक़ा नहीं दिया जाएगा, सबसे पहला मामला तो ये है कि आप जो ये जुल्म और तशद्दुद कर रहे हैं, ये हर दिन 50-60-100 बच्चों को उठाया जा रहा है. अभी मैं इंटरव्यू दे रहा हूं, एनडीटीवी देख रहा था कि बारामूला में बहुत बड़ा क्रैक डाउन शुरू कर दिया है. उन्होंने कहा कि वहां पर चीन के झंडे मिले हैं वगैरह, तो उसपर बड़ा हंगामा हो गया और पूरी पुलिस व आर्मी ने क्रैक डाउन शुरू कर दिया. जवानों को गिरफ्तार किया जा रहा है, गोलियां चलाई जा रही हैं. आज 15वां जुमा है, कल शाम को लोग वहां पर निकले, उन्होंने वहां पर धरना दिया कि भाई, हमें मस्जिद तो खोलने दो, उनपर फायर कर दिया, उनपर टीयर गैस चला दिया, आज अ़खबार में न्यूज़ है. आप पुरअमन तरीक़े से तो हमें अपनी बात कहने दो. अगर लोगों के जज्बात मजरूह हैं, अगर वे पुरअमन तरीक़े से अपनी बात कहना चाहते हैं, तो उन्हें इसका हक़ दीजिए. आज हम देख रहे हैं कि जेएनयू में लोग निकले हैं, बाक़ी जब निर्भया केस दिल्ली में हुआ, तो पूरी दिल्ली निकली सड़कों पर, उन्होंने अपनी बात कही. हम पर ये कदगन क्यों हैं, हम पुरअमन तौर पर क्यों कोई जलसा-जुलूस नहीं कर सकते. जब तक ऐसा माहौल नहीं होगा, तब तक हमें आपस में मिलने नहीं दिया जाएगा. उसके बाद ये तय किया जा सकता है कि क्या इक्दामात हो सकते हैं, क्या स्टेप्स हो सकते हैं, जिन्हें हुकूमत-ए-हिंदुस्तान उठाए. हुर्रियत ने तो बाज़ाब्ता ये कहा है कि अगर हुकूमत-ए-हिंदुस्तान कश्मीर के हल के लिए सीरियस है, तो हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ज़रूर उसका मुसबत जवाब देगी. लेकिन ये सीरियसनेस तो नहीं है कि आपने यहां पर लोगों के खिला़फ बिल्कुल मिलिट्री क्रैकडाउन शुरू कर दिया है.

जम्मू-कश्मीर को तीन हिस्सों में बांटना : आरएसएस का दीर्घकालिक एजेंडा है

सवाल – आपने जो एक बात कही कि नौजवान गिरफ्तार हो रहे हैं, वे लोग भी हैं जिनके एग्ज़ाम देने की बात की जा रही है. इनका कैसे एग्ज़ाम होगा, जेल में होगा, बाहर होगा, कैसे होगा?

मीरवाइज़ – ये तो मज़ाक़ है कि आप यहां पर जवानों को पकड़ रहे हैं, उनपर पीएसए लगा रहे हैं, उनको थानों में बंद कर रहे हैं, आपने हज़ारों की तादाद में नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया है और यहां से ब्लैकमेल कर रहे हैं एजूकेशन को. एजूकेशन के मसले पर इन्होंने इस वक्त बिल्कुल सियासत की है. वरना ये कोई बड़ा मसला नहीं है. हमने कहा था कि ठीक है, कुछ महीने बाद आप एग्ज़ाम ले सकते हैं, तब तक इन सबको रिहा कर दीजिए. रिहा करना तो दूर की बात है, ये तो और 25-50, सौ-सौ लोगों को हर दिन गिरफ्तार कर रहे हैं. अ़खबार भरे पड़े हैं. खुद पुलिस बयान दे रही है कि आज हमने यहां, इतने नौजवान गिरफ्तार किए. हम मानते हैं कि तालीम अहम है और कोई नहीं चाहता कि यहां के बच्चों का साल बरबाद हो और ऐसा नहीं होगा. लेकिन बच्चे खुद कह रहे हैं कि हम जाएं तो कहां जाएं, सड़कों पर पुलिस है, आर्मी है. कुछ अरसे पहले तो इन्होंने स्कूल ऑक्यूपाई कर लिए थे. जो बीएसएफ बाहर से आई, वे स्कूलों में ठहरी थी. एसपी स्कूल में, एसपी कॉलेज में, ये सारे कॉलेज उन्होंने ले लिए थे. तो ये एक तआस्सुर दे रहे हैं कि भाई देखिए, हम कितने सीरियस हैं और एजूकेशन को एक जरिया बनाकर वे लोगों के जज्बात से खेल रहे हैं. मेरा ये मशविरा हुकूमत को ये है कि हमारे लिए ये अहम नहीं है कि महबूबा साहिबा हैं या उमर अब्दुल्ला साहब हैं या कोई पीडीपी है या एनसी है. इन जमातों को यह सोचना है कि अगर वाक़ई इनमें कश्मीर के हवाले से जरा भी कोई एहसास है, दर्द है, जरा भी इस किस्म की जो वो ये दावा करते हैं कि हम अवाम के लोग हैं तो इसे रोकें. हक़ीक़त ये है कि अवाम ने इनकी पॉलिसीज को मुस्तरद कर दिया है. वो साउथ कश्मीर, जो कभी पीडीपी का गढ़ था, वहां आज पीडीपी तो दूर की बात है, कोई एमएलए जा भी नहीं सकता. ऐसे हालात हो गए हैं वहां पर. आज अवाम ये कह रही है कि भाई ये एक सराब है, एक धोखा है और हम चाहते हैं कि कश्मीर के सियासी मसले को अव्वलीन तरजीह दी जाए. हम ये भी समझते हैं कि कश्मीर का हल रातों-रात नहीं निकलेगा. एक प्रॉसेस की ज़रूरत है, एक प्रॉसेस इनीशिएट करना है, लेकिन उसके लिए सीरियसनेस और सिंसीएरिटी होनी चाहिए. हमें बड़े अ़फसोस के साथ ये कहना पड़ रहा है कि उरी के बाद, पाकिस्तान वग़ैरह में जो सर्जिकल स्ट्राइक की बात हो रही है, उससे कुछ हासिल नहीं होगा. ये ठीक है कि यूपी इलेक्शन है, पंजाब में इलेक्शन है, बीजेपी इससे सियासी फायदा निकालना चाहती हो, लेकिन मैं समझता हूं कि कश्मीर के मसले पर इलेक्शन या सियासत न तो यहां होनी चाहिए और न पाकिस्तान में होनी चाहिए. ये एक इंसानी मसला है, एक पॉलीटिकल मसला है. सबसे अहम मसला ये है कि आज आप यूरोप को देख लीजिए, जर्मनी को देख लीजिए, हम भी महसूस करते हैं कि हमारा भी वही हाल है. एक लकीर खींच दी गई है, आधे यहां हैं, आधे वहां हैं. मां-बेटा रिश्तेदार आधे यहां हैं, आधे वहां हैं. मैं अपनी बात कहूं तो मेरी आधी से ज्यादा फैमिली मुज़फ्फराबाद में है, पाकिस्तान में है, इस्लामाबाद में है, पिंडी में है. बहुत से ऐसे लोग हैं जिनसे मैं कभी नहीं मिला. पिछली बार जब मैं गया, तो कुछ रिश्तेदार ऐसे हैं, जिनसे पहली बार मेरी मुलाक़ात हुई. ऐसी हज़ारों फैमिली कश्मीर में हैं. यह इंसानियत के लिए एक बहुत बड़ा अलमिया है. मैं समझता हूं कि इसे भारत की सरकार हमेशा पाकिस्तान के ज़ाविए से देखती है. पाकिस्तान और नेशनलिज्म के दावे से देखती है, जबकि कश्मीर को देखिए. हक़ीक़त यह है कि भारत की अवाम को भी यह हक़ीक़त तस्लीम करनी है कि कश्मीर महाराष्ट्र नहीं है, कश्मीर पंजाब नहीं है, कश्मीर कोई और रियासत नहीं है. इसका एक बैकग्राउंड है और कश्मीर के लोगों की आवाज़ को वो नहीं समझेंगे, अगर कश्मीर के लोगों की आवाज़ को पाकिस्तान के इस डिस्कोर्स में दफ़न किया जाता है. इससेे बड़ी बदक़िस्मती कोई नहीं होगी कि इंडिया और पाकिस्तान के रिटोरिक में यहां की अवाम की आवाज़ को आप द़फन कर रहे हैं. यही वजह है कि (ईमानदारी की बात यह है) हम यह महसूस करते हैं कि एक आम हिन्दुस्तानी यहां के हालात से वाक़ि़फ नहीं है. यही वजह है कि वो उस दर्द को, उस कर्ब (पीड़ा) को महसूस नहीं करता. हम हैरान हैं कि वो उस पर बात क्यों नहीं करते कि क्या इस तरह दिल्ली में पैलेट चलाए जाएंगे मुंबई में चलाए जाएंगे, बच्चों की आंखें निकाली जाएंगी? मान लीजिए वो पत्थर ही फेंक रहे हैं तो उनपर पैलेट चलाना, अंधा करना इस पर हिंदुस्तान का ह्‌यूमनिस्टिक तबक़ा खामोश क्यों है? बॉलीवुड से लेकर क्रिकेट के खिलाड़ी हर इश्यू पर बात करते हैं हर मामले पर रोज़ ट्‌वीट करते हैं, लेकिन इस पर ख़ामोशी है, कोई बात ही नहीं कर रहा है. ये हमारे लिए एक अ़फसोसनाक बात है कि एक आम हिंदुस्तान का शहरी, कश्मीर की इस सिचुएशन से बिल्कुल कट गया है. उसको लगता है कि हमने कश्मीर को आर्मी के हवाले कर दिया है तो जिस तरह से वो डील करे तो वो उसेे ठीक समझते हैं. यह हमारे लिए कोफ्‌त (दुःख) की बात है.

कश्मीर का हल कश्मीर में है : दिल्ली या इस्लामाबाद में नहीं

सवाल- पहला हिस्सा तो डायलॉग के जल्द से जल्द शुरू होने का है लेकिन ये पिछले 100 दिनों में जो कश्मीर में हुआ उसमें सबसे बड़ी चीज़ ये नज़र आ रही है कि जो बच्चे जेल में बंद हैं और जिनका एक साल बेकार हो गया तो क्या उन्हें निकालने की बात आप लोग शर्त के रूप में क्यों नहीं रखते हैं?

मीरवाइज़ – देखिए, मसला स़िर्फ उनका नहीं है, जो जेल में हैं, मसला यह है कि पूरे कश्मीर को इन्होंने जेल खाने में तब्दील कर दिया है. यहां मिलिट्री सड़कों पर, शहरों में, गांवों में हर जगह है. पूरे साउथ कश्मीर को आर्मी के हवाले कर दिया गया है. तो इस जंगी माहौल में, ये एजूकेशन, तालीम और स्कूल तो मज़ाक़ लगता है. जब यहां लोगों की जान पर बन आई है तो सबसे पहले मसला यह है कि अगर हुकूमत सीरियस है और वह कुछ करना चाहती है, चाहे वह दिल्ली की सरकार हो या यहां की सरकार हो, तो उनको इस हक़ीक़त को तस्लीम करना है कि सबसे पहले ये मार-धाड़, क़त्लोग़ारतगरी और गिरफ्तारियां बंद होनी चाहिए.

सवाल- और पीएसए को भी देखना चाहिए?

मीरवाइज़ – बिल्कुल, ये तो सरासर काले क़वानीन का इतलाक़ किया जा रहा है. छोटे-छोटे बच्चों को पीएसए में बंद किया जा रहा है. आज भी अ़खबार में है कि दो कमसिन (छोटी उम्र) बच्चों पर पीएसए लगाया है. एमनेस्टी ने उस पर सवाल उठाया है. हर किसी को गिरफ्तार किया जा रहा है. मस्जिद के इमामों को गिरफ्तार किया जा रहा है. ह्यूमन राइट्‌स एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया जा रहा है. सियासी लीडरशिप तो दूर की बात है, आम लोगों को भी गिरफ्तार किया जा रहा है. उनका क़सूर क्या है? वे शायद ये बात कर रहे हैं कि जुल्म बंद करो. ये तो वही बात हुई कि वहां से गोलियां चलें और आप हमसे कहें कि यहां शोर भी नहीं करें. आप एहतेजाज भी नहीं करें. तो सबसे अहम मसला इस वक्त ये है कि पूरे जम्मू और कश्मीर को सीज़ कर दिया गया है. लोगों को ये हक़ दिया जाए कि पुरअमन (शांतिपूर्ण) एहतजाज करें और हुर्रियत नेताओं को रिहा किया जाए. हम बैठें, बात करें और देखें कि इस सिलसिले को कैसे हल किया जा सकता है?

10 अक्टूबर 1968 को जम्मू और कश्मीर स्टेट पीपुल्स कन्वेंशन में : जयप्रकाश नारायण का उद्घाटन भाषण

सवाल – उमर साहब, मैं यहां लोगों से मिला, जो घायल हैं, जिन परिवार के लोगों की जानें चली गई हैं, जिनकी आंखें चली गई हैं, उनका इलाज, उनका कंपनसेशन ये सब तो सरकार की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए.

मीरवाइज़ – सबसे अहम बात यह है कि यहां के लोग ये कह रहे हैं कि कंपनसेशन और इलाज तो दूर की बात है, पहले मामला यह है कि आप उनको सज़ा दें, जिन्होंने गोलियां चलाई हैं, जिन्होंने पैलेट चलाए हैं. आपने अ़खबार में पढ़ा होगा कि अभी तक तक़रीबन 96 ऑफिशियल डेथ्स हुई हैं, उनमें से सरकार ने कुल चार का एलान किया है कि हम उसे इन्वेस्टिगेट करेंगे, बाक़ी किस खाते में हैं? आप अवाम को क्या मैसेज दे रहे हैं? आप अवाम में ये मैसेज दे रहे हैं कि कश्मीरियों की जान की कोई क़ीमत नहीं है. तो ठीक है, हम मार कर फिर कंपनसेशन दे देंगे. अंधा कर के फिर इलाज करवा देंगे. सबसे पहले ये है कि एकाउंटेबिलीटी शुरू हो. जिन लोगों ने गोलियां चलाई हैं, पैलेट चलाए हैं, उनके खिला़फ कार्रवाई हो. उन सारे केसेज को रि-ओपन किया जाए, ताकि अवाम को लगे कि ये हुकूमत वाक़ई कुछ कर रही है. अभी तो अवाम को ये लग रहा है कि मुखौटा पीडीपी का है, पीछे से बीजेपी यह कह रही है कि हां जी, हमने आर्मी भेज दी है, अब आप ये करें. पीएसए लगाएं, लीडरशिप को बंद कर दें, हुर्रियत को बंद कर दें, नौजवानों को गिरफ्तार कर लें. राजनाथ सिंह साहब, जितेंद्र साहब (राज्य मंत्री, पीएमओ) वहां बयान दे रहे हैं और यहां कि हुकूमत बिल्कुल घुटने टेक चुकी है. हैरानी की बात यह है कि ये वही पीडीपी है जो कल तक सेल्फ-रूल (स्वशासन) कहा करती थी. उस सेल्फ-रूल को कहां द़फना दिया उन्होंने? सेल्फ-रूल तो दूर की बात है, अवाम के हुकूम तो दूर की बात है, उनकी ज़िंदगियां भी नहीं बचा पा रहे हैं. सबसे तकली़फदेह बात यह है कि सियासी तौर पर हममें इख्ताला़फ हो सकता है. हम आज़ादी की बात करते हैं, कोई सेल्फ-रूल की बात करता है, कोई ऑटोनॉमी की बात करता है, ठीक है, इस पर बातचीत हो सकती है, लेकिन इस पर कि आप अपने लोगों पर ज़ुल्म कर रहे हैं, ज्यादती कर रहे हैं, ये फ़ौरन रुकना चाहिए और एकाउंटेबिलिटी शुरू होनी चाहिए. अवाम के साथ सबसे पहले एकाउंटेबिलिटी तो चीफ मिनिस्टर की है. वो बताएं कि इन जानों के ज़ाया होने में उनका क्या रोल है? अगर वो अपने आपको बिल्कुल बेबस महसूस करती हैं तो उन्हें इक्तदार (सत्ता) छोड़ देनी चाहिए, ताकि लोगों को एक मैसेज जाए. अभी तो मैसेज ये जा रहा है कि यहां तो हुकूमत है, यहां तो सो कॉल्ड चुनी हुई सरकार है. तो ये सारा इन्हीं पर चढ़ेगा.

कश्मीर एक मानवीय समस्या है

सवाल – जो सियासी तौर पर लोग बंद हैं, जिसमें सबसे पहले हुर्रियत की टीम है, उनके लिए किस तरह की पहल होनी चाहिए और जम्मू-कश्मीर में पॉलीटिकल एक्टिविटीज़ को नॉर्मलाइज करने के लिए क्या होना चाहिए?

मीरवाइज़ – सबसे पहले तो अहम बात ये है कि मार-धाड़ का जो सिलसिला इन्होंने शुरू किया है, गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू किया है, पीएसए लगाने का शुरू किया है, हर जगह से उठा रहे हैं. इसको पहले वे बंद करें, इसे रोकें. दूसरे जो स्टूडेंट्स हैं, जो नौजवान हैं, जो जेलों में बंद हैं, उनको फ़ौरन रिहा किया जाए. बिल्कुल फ़ौरन रिहा किया जाए.

सवाल – और यह पीएसए जिनके ऊपर लगाया गया है, क्या उसे रिव्यू कर फौरन वापस लिया जाना चाहिए?

मीरवाइज़- देखिए, इन्होंने जो पीएसए है, आज उन्होंने बिल्कुल खुले तौर पर कर दिया है कि वो बने हुए डोज़ियर हैं. जिसका नाम आ रहा है, उसे पकड़ कर भेज रहे हैं. कठुआ भेज रहे हैं, कोट बलवाल भेज रहे हैं, जम्मू भेज रहे हैं, बाक़ी जगह भेज रहे हैं. तो ये तो हुकूमत की बिल्कुल ज्यादती है, जिस तरह से वे डील कर रहे हैं और इसे फ़ौरन रिवोक करना चाहिए. अभी तो सिचुएशन ये है कि करीब 100 लोग मारे गए, लोग उनके पास इज़हारे ताज़ियत के लिए भी नहीं जा पा रहे हैं, अभी लोग तो इज़हार-ए-ग़म भी नहीं कर पाए, क्योंकि यहां कर्फ्यू लगा रहा. हड़ताल रही, एहतजाज़ रहा. कम से कम लोगों को ये हक़ दें, अगर लोग पुरअमन तौर पर एहतजाज करना चाहते हैं. अपनी बात रखना चाहते हैं. मान लीजिए, एक लाख लोग लाल चौक की सड़कों पर चले गए. कम से कम शांतिपूर्ण तरीक़े से बैठे हैं, तो एक मैसेज जाएगा. अवाम की तऱफ से मैसेज जाएगा हिंदुस्तान, पाकिस्तान और आलमी बिरादरी की तऱफ. हम भी यही कहते हैं कि आ़खिरकार हमें ये मसला तो टेबल पर ही हल करना है, लेकिन उसके लिए भी आपको माहौल बनाना है. यहां पर आप कश्मीरियों को मार रहे हैं, उन पर गोलियां चला रहे हैं और यहां पीडीपी कह रही है कि हम तो कमिटेड हैं, पॅालीटिकल हल ढूंढ़ेंगे, बातचीत करेंगे. सबसे पहले जो आपके हाथ में है, उसे तो आप रोक नहीं पा रही हैं. जिसके लिए गवर्नमेंट जिम्मेदार है. उसके बाद कोई सिलसिला शुरू हो. हमारा तो ये मानना है कि ये बाईलेटरल मामला नहीं है कि दिल्ली और श्रीनगर बैठ कर फैसला कर लें या दिल्ली और इस्लामाबाद बैठ कर फैसला कर लें. इसमें आपको तीनों को शामिल करना है. ये कैसे होगा? तीनों को कैसे शामिल करेंगे? ये ठीक है कि भारत-पाकिस्तान स्टेट हैं, वे बातचीत की शुरुआत कर सकते हैं. मैं समझता हूं कि ये जो रेटोरिक है जंग का, वो बंद होना चाहिए. अब सीरियस कोशिश होनी चाहिए, बैक या फ्रंट चैनल से. एक दूसरे से बातचीत की जाए. हम भी ये चाहते हैं. कश्मीर के लोग तो इस बात के सबसे ज्यादा मुतमन्नी हैं, दोनों मुल्कों में दोस्ती हो, खैरसगाली हो. इन दोनों की दोस्ती से सबसे ज्यादा फायदा हमें है. अभी जो हालात हैं, इसमें आप देखें कि चाहे राजौरी में गोलीबारी हो रही हो या म़ुजफ्फराबाद में लोग मारे जा रहे हों, मारा तो कश्मीरी ही जा रहा है. इस तऱफ का या उस तऱफ का. इसलिए हम चाहते हैं कि फौरी तौर पर जंगबंदी हो और फौरी तौर पर बातचीत शुरू हो. फौरी तौर पर एक ऐसा मैकेनिज्म बनाया जाए, एक प्रोसेस शुरू किया जाए. हम समझते हैं कि इसमें वक्त लगेगा. लेकिन सबसे पहले हिंदुस्तान को और यहां की हुकूमत को शुरुआत करनी है. यहां और दिल्ली की हुकूमत अभी एक ही पार्टी की है. इसलिए, इनके लिए ये ज्यादा मुश्किल नहीं है. हमारे लिए तो हैरानी की बात है. पीडीपी कहती है कि हमारा एक एजेंडा है, हमारा एक व्यू है, हमारी एक उसूल है, हम सेल्फ-रूल की बात करते हैं. लेकिन, आज तो हमें ऐसा कहीं कुछ सुनाई नहीं दे रहा है. बुनियादी तौर पर या तो वो एक धोखा था या एक सराब (छलावा) था. मुझे याद है कि मुफ्ती साहब बड़े-बड़े बयान देते थे कि गोली से नहीं, बोली से हम काम करेंगे. हम हुर्रियत को पॅालीटिकल स्पेस देंगे. आपने देखा कि पॉलीटिकल स्पेस तो बहुत दूर की बात है, हमें तो नमाज़ तक की इजाज़त नहीं दी जा रही है.

सवाल- इंसानियत के नाते, इन सारी चीज़ों के साथ आपको क्या ये नहीं लगता कि कुछ लोग ऐसे हैं जो इन चीज़ों से सताए हुए हैं, जिनकी जान जा रही है. मैं घायलों की बात पर आता हूं या जो अंधे हो चुके हैं, या जिनके घर के लोग मर गए हैं, उनके लिए सरकार को आगे आ कर मदद देनी चाहिए. अगर लोगों का इलाज यहां नहीं हो पा रहा है, तो जहां इलाज हो, वहां ले जाएं.

मीरवाइज़- बिल्कुल. हम तो ये कहेंगे कि बाज़ाब्ता उनलोगों को कंपनसेशन मांगना चाहिए. उनको केस करना चाहिए कि भाई हमारे बच्चों की आंखें निकाल दी आप लोगों ने. हमारे बच्चों पर गोलियां चलाईं. ये तो इंटरनेशनल क्राइम है. पैलेट को लेकर इतना शोर था, फिर भी इसे बैन नहीं किया जा रहा है. राजनाथ सिंह साहब कह रहे हैं कि एक्स्ट्रीम ज़रूरत होगी तो हम ज़रूर इस्तेमाल करेंगे. आप पैलेट गन बैन करने के लिए तैयार नहीं हैं तो कश्मीर के मसले को, कश्मीरियों के जज्बात को, उनके दर्द को, उन पर मरहम रखने की बात तो सब फिर झूठ है, फरेब है.

सवाल – आपने अभी जितनी बातें कहीं, जिसमें बातचीत से लेकर किन लोगों के बीच बातचीत हो, गवर्नमेंट अपना कदम बढ़ाता हुआ दिखे, इसके लिए क्या आपको लगता है कि दो महीने-तीन महीने-चार महीने का लास्ट अल्टीमेटम आपलोग देना चाहेंगे सरकार को..

मीरवाइज़ – हम तो सबसे पहले सरकार से ये कह रहे हैं कि सबसे अहम मामला ये है कि ये जो उन्होंने मार-धाड़ की पॉलिसी शुरू कर दी है और गिरफ्तारियों का मामला शुरू किया है, इसको फौरन बंद करें. रिहा करें, जिन्हें गिरफ्तार किया है. उसके बाद लीडरशिप बैठेगी और फैसले लेगी कि आगे तहरीक को कैसे चलाना है.

सवाल – मान लीजिए कि दो-चार महीने में अगर ये नहीं करते हैं, तो क्या कंप्लीट सिविल ना़फरमानी, कंप्लीट नॉन-कोऑपरेशन की बात आपलोगों के दिमाग़ में है क्या?

मीरवाइज़ – देखिए, अभी तो हालात ये हैं कि हम एक दूसरे से बात भी नहीं कर पा रहे हैं. हम ये महसूस करते हैं कि जम्मू-कश्मीर की तहरीक का ये एक अहम मरहला (दौर) है. लोगों ने सौ दिन का जो अभूतपूर्व जज्बा दिखाया है, उसकी कोई मिसाल नहीं है. लोगों ने एक बहुत बड़ी मोरल विक्ट्री (नैतिक जीत) दिखा दी है. यहां के ट्रेडर ने, ट्रांसपोर्टर्स ने, मुलाज़िम ने, रेहड़ी वालों ने ये कह दिया है कि मैं अपनी रा़ेजी बंद कर दूंगा, अपनी नौकरी दांव पर लगा दूंगा, मज़दूरी बंद कर दूंगा, लेकिन मैं जुल्म और ज्यादती के खिला़फ आवाज़ उठाऊंगा. मैं समझता हूं कि ये क्लियर मैसेज कश्मीर से गया है. ये ठीक है कि भारत क्या करता है, क्या नहीं करता है, लेकिन मैसेज तो हमारा चला गया है. ये हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है. हां, हम यह भी कहते हैं कि ठीक है, ये एक मरहला है, इससे हम गुज़रेंगे और हमारी तहरीक चलती रहेगी. हमारी आवाज़ उठती रहेगी, जब तक हमारा मसला हल नहीं होगा. अगर हुकूमत-ए-हिंदुस्तान वाक़ई संजीदा है, कुछ करने के लिए, मसले को हल करने के लिए कमिटेड (प्रतिबद्ध) है, तो हमसे बात करे, पाकिस्तान से बात करे, उसका ज़रूर हम जवाब देंगे.

सवाल – तीन हिस्से हैं. आपकी उनके लिए क्या सलाह है या आपकी उनसे क्या उम्मीदें हैं? उन तीन के बारे में मैं आपकी राय जानना चाहूंगा. पहला तो जम्मू-कश्मीर सरकार, दूसरा भारत सरकार और तीसरा अवाम जो सिविल सोसायटी है इंडिया की.

मीरवाइज़ – जम्मू-कश्मीर सरकार से तो हमें मायूसी के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ. अभी हम चाहते हैं कि वो दिल्लीवालों को ये सा़फ तौर पर कहें कि भाई अगर आपको मार-धाड़ की पॉलिसी अख्तियार करनी है तो हम इसके साथ नहीं हैं, लेकिन वो उनके साथ शरीक हुए हैं. हाथ तो उन्हीं के इस्तेमाल हो रहे हैं और मार-धाड़ यहां पर हो रही है. सबसे पहले तो यही है कि ये ज़ुल्म-ज्यादती बंद हो. पैलेट बंद हो. अफसोस की बात ये है कि हर शाम हम मीडिया में देख रहे हैं कि भाई शीशे तोड़ रहे हैं, गाड़ियों को तोड़ रहे हैं, कश्मीरियों का नुक़सान कर रहे हैं. एक सज़ा दे रहे हैं हमें. जो लोग आवाज़ उठा रहे हैं, उनको सजा दी जा रही है. हुकूमत ये सब अपने लोगों के साथ कर रही है. ये सिलसिला पहले बंद होना चाहिए. जहां तक बात है भारत सरकार की, तो भारत सरकार से हम यही कहना चाहते हैं कि उन्हें इस बात को तस्लीम करना होगा.

सवाल – देखिए ये भी एक सच्चाई है कि बीजेपी की सरकार है, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं. ये भी सच्चाई है.

मीरवाइज़ – बिल्कुल ये सच्चाई है. नरेंद्र मोदी साहब से हम यही कहना चाहते हैं कि देखिए अगर आप ये महसूस करते हैं कि ताक़त से, फौज से, मिलिट्री अप्रोच से आप इसको हल कर सकते हैं तो आप ग़लत ख्याल में हैं. आप ही के दिग्गज नेता वाजपेयी साहब, वो इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि हम ताक़त से कश्मीर की अवाम को नहीं दबा सकते हैं. ये उस पॉलिसी को रिवाइव करें. पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू करें. कश्मीर के हवाले से कश्मीरियों से बातचीत शुरू करें. अगर वे कोई पॅाजिटिव कदम उठाते हैं तो हम उसका जवाब पॉजीटिव देंगे, गिलानी साहब और अन्य के साथ मशविरे के बाद. रही बात हिंदुस्तान के अवाम की, तो हम हिंदुस्तान के अवाम से, इंटेलीजेंशिया से, सिविल सोसायटी से यही कहना चाहते हैं कि आप कश्मीर को मुल्क की ज़ाविए (नज़रिए) से न देखें, इंसानी ज़ाविए से देखें. और इंसानी कद्रों को देखें. अगर यही बंबई में होता, दिल्ली में होता, कहीं और होता तो क्या वे इसी तरह खामोश बैठते? इतिहास में ये पहली बार है कि इस तरीक़े से बच्चों पर पैलेट चलाए गए हैं. उन्हें अंधा कर दिया गया. मान लिया कि ये लोग पत्थर चला रहे थे, तो क्या पत्थर का जवाब अंधा करना है, गोलियां चलाना है, लोगों को मारना है. हरियाणा में भी तो जाटों की तहरीक़ चली. उन्होंने तो एक दिन में अरबों-खरबों का नुक़सान कर दिया. उन पर तो पैलेट और गोलियां नहीं चलीं. गुजरात में पटेलों की तहरीक चली, उन पर तो पैलेट नहीं चला. लेेकिन, जब कश्मीरियों के साथ ऐसा किया जाता है तो पूरा हिंदुस्तान खामोश रहता है. मीडिया का एक तबक़ा, जिसमें आप जैसे लोग हैं, जो दर्दमंदी रखते हैं, बाकी अ़फसोस के साथ कहना पड़ता है कि जो मीडिया बात भी करता है तो साथ ही साथ बैलेंस करने पर लगा रहता है कि कहीं हमारा चैनल इसका शिकार न हो जाए. मैं ये समझता हूं कि भारत की अवाम को भी देखना चाहिए. हम भी इंटरनेशनल कम्युनिटी से अपील करते हैं, ओआईसी से कहते हैं, यूएन से कहते हैं, नैम से कहते हैं, हम हिंदुस्तान के अवाम से भी ये कहना चाहते हैं. वो तो एक स्टेक होल्डर है. भारत की सिविल सोसाइटी से हम कहना चाहते हैं. हम ये चाहते हैं कि वे यहां आएं, मिलें. जैसे आप आए, हमें बहुत खुशी हुई. आपका हमने देखा अ़खबारात में मीडिया में कि आप यहां आए. आपने खुद देखा कि यहां हालात क्या हैं और आप एक नजीर बन गए. हम कहते हैं कि स्टुडियो में बैठ कर जो लोग फतवे देते हैं और ये कहते हैं कि ये हो रहा है, वो हो रहा है, आप कश्मीर आएं, यहां के लोगों से मिलें, उनके दर्द को समझें. कश्मीर के लोग इससे ज्यादा ज़िंदा मिसाल क्या दे सकते हैं कि इस सब के बीच अमरनाथ यात्रा भी हुई, लोग भी आए, गैर मुस्लिम भी आए, उनके साथ बेहतर रवैया रहा इनलोगों का, कहीं-कहीं पर आर्मी के लोग फंस गए थे, उनकी मदद भी की. कश्मीरियों ने इंसानियत के नाते मदद की, उन्हें बचाया. यहां की क़यादत यह भी कह रही है कि उरी में आर्मी के जो लोग मर गए, उससे हमें खुशी नहीं है, दुख है. हम कोई क़त्लोग़ारत नहीं चाहते. लेकिन, जब कश्मीरी मारा जाता है, कश्मीर के जवान मारे जाते हैं, छोटे-छोटे बच्चे मारे जाते हैं, तब आप कहते हैं कि ये आतंकवादी हैं. इनको पैसा दिया जा रहा है. देखिए ये बहस तो चलती रहेगी. मैं ये कहना चाहता हूं कि अगर हिंदुस्तान के तहरीक-ए-आज़ादी में भगत सिंह को शहीद-ए-आज़म कहा जाता है. भगत सिंह ने भी तो एक अफसर को गोली मारी थी. अगर वो दहशतगर्द नहीं हैं, तो हमारे जो ये छोटे-छोटे बच्चे निकलते हैं, आज़ादी की बात करते हैं, ये दहशतगर्द कैसे हुए? मैं समझता हूं कि सारे मामले को सबसे पहले इंसानियत के ज़ाविए से देखने की ज़रूरत है. उसके बाद बिल्कुल आपका नज़रिया बदल जाएगा. आप हमारा मैसेज प्लीज ले जाएं. हम चाहते हैं कि भारत की सिविल सोसायटी, भारत के लोग, भारत की अवाम यहां आएं और खुद देखें. मैं ज़िम्मेदारी के साथ ये बात कह रहा हूं. मुझे वो वक्त भी याद है. 90 के दशक में मैं सोलह साल का था, जब मेरे वालिद की शहादत हुई. मैं मीरवाइज़ के मनसब पर गया. उसके बाद हुर्रियत बनी. मैं 18 साल का था, जब पहली बार हुर्रियत का चेयरमैन बना. तब भी हम तहरीक को देख रहे थे. तब हम आज़ादी की बात देख रहे थे, आज़ादी का जज्बा देख रहे थे. मुझे बड़े अ़फसोस के साथ ये कहना पड़ता है कि तब और आज में जो अंतर है वो ये है कि उस वक्त के जवानों में हिंदुस्तान के लिए ग़ुस्सा था, आज के जवानों में हिंदुस्तान के लिए ऩफरत है. मैं समझता हूं कि इसकी ज़िम्मेदार हुकूमत है. जो सरकारें यहां पर आई हैं, उसने ज़ुल्म-ज्यादती-नाइंसाफी की है. हम नहीं चाहते कि ऩफरत में कोई जिए. आज आप देखिए जिस तरह से सड़कों पर आपको जवान मिलेंगे. एक कॉमन सी बात है कि चीन से हमारा कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन कश्मीर में जब आप चीन का झंडा देखेंगे तो ये कश्मीर के लिए नहीं है, ये भारत को चिढ़ाने के लिए चीन का झंडा निकालते हैं कि हम चीन के साथ चले जाएंगे, लेकिन आपके साथ नहीं जाएंगे. आज पांचवीं नस्ल यहां तक पहुंच गई है. ये वो नस्ल है जिसने एक्टिवली बंदूक़ नहीं देखी है. लेकिन हमें बड़ी हैरानी हो रही है. ये अ़फसोस की बात है कि साउथ कश्मीर से खबर आ रही है कि सैकड़ों की तादाद में जवान चले गए हैं. लापता हैं. शायद उन्होंने बंदूक़ उठा ली है. हम ये नहीं चाहते. हम ये चाहते हैं कि पुरअमन (शांतिपूर्ण) तरीक़े से मसला हल हो. हुर्रियत तो इसलिए ही बनी थी जब मिलिटेंसी पीक पर थी, तब हुर्रियत हमने इसीलिए बनाई कि हम बंदूक़ के ज़रिए हल नहीं चाहते हैं. हम बातचीत के ज़रिए हल चाहते हैं. लेकिन, उस हुर्रियत को भी आपने बिल्कुल आइसोलेट (अलग-थलग) कर दिया. हमारी जब बात होती है तो हमें मीडिया पर ऐसे दिखाया जाता है कि हम कोई चोर-उचक्के या दहशतगर्द हैं. हमें बड़े अ़फसोस से कहना पड़ रहा है कि गिलानी साहब या मेरी तस्वीर दिखाते हैं और कहते हैं कि ये टेररिस्ट नंबर वन है, टू है. हम तो अमन की बात कर रहे हैं, मसाइल के हल की बात कर रहे हैं. मैं तो ये समझता हूं कि हुकूमत को ये भी देखना है कि जिस तरीक़े से वो यहां लीडरशिप को आइसोलेट कर रही है, उन्हें बंद कर रही है. उनको बिल्कुल अवाम में जाने का मौक़ा नहीं दे रही है, वो एक एनार्की पैदा कर रहे हैं, क्योंकि कल उनको सड़क पर डील करना होगा. कल उन जवानों से डील करना पड़ेगा. आज जब पूरी लीडरशिप को खत्म कर रहे हैं तो फिर तो आप एनार्की को इनवाइट कर रहे हैं. ये लाज़मी है कि आपको लीडरशिप को तो मानना ही पड़ेगा. जब हिंदुस्तान की तहरीक-ए-आज़ादी चली तब गांधी जी हों, नेहरू हों, जिन्ना हों, पटेल हों, बाक़ी लोग हों, ये क़ौम को डायरेक्शन दे रहे थे. मैं समझता हूं कि ये बड़ा अहम है कि इस पूरे मामले को एक सियासी अंदाज़ से देखा जाए और जैसा मैंने कहा कि इंसानी अंदाज़ से देखा जाए. हम चाहते हैं कि आप जैसे लोग आएं, बात करें, हक़ीक़त अवाम तक पहुंचाएं और ये कहें कि भाई ये नाइंसा़फी है और ये नाइंसा़फी बंद होनी चाहिए.

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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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