अधिकारियों की कमी से जूझ रहा आयकर विभाग

पहले से ही कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे आयकर विभाग के कंधे पर काला धन अप्रकटित विदेशी आय और आस्ति (कर अधिरोपण) क़ानून, 2015 का बोझ आ गया है. विभाग में वरिष्ठ अधिकारी न के बराबर हैं. इस क़ानून के लागू होने से पहले आयकर विभाग किसी तरह अपना काम चला रहा था.

ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि वह किस तरह इस चुनौती का सामना करता है. इस क़ानून को लागू करने के संबंध में भी कई सवाल खड़े हुए थे. दरअसल, नियम जितने सख्त होते हैं, छेड़छाड़ की आशंकाएं भी उतनी अधिक होती हैं.

काले धन पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाए गए इस क़ानून को लागू करने के लिए अधिक और सक्षम कार्यबल की आवश्यकता है. आयकर विभाग का कहना है कि इस क़ानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपी जाएगी और मुख्य रूप से संयुक्त आयुक्त स्तर के अधिकारियों को इस काम में लगाया जाएगा, ताकि जांच के दौरान आवश्यक एवं ठोस निर्णय लिए जा सकें.

जानकारी के अनुसार, देश भर में मुख्य आयुक्त के 60 से ज़्यादा पद रिक्त हैं. यही नहीं, संयुक्त आयुक्त के कुल 1,500 स्वीकृत पदों में से 80 ़फीसद पद रिक्त हैं. ऐसे में नया क़ानून लागू करने के लिए विभाग आवश्यक कार्यबल कहां से लाएगा, यह सबसे बड़ा सवाल है. विभागीय सूत्रों का कहना है कि 1982 बैच के आईआरएस अधिकारियों की प्रोन्नति के आदेश जारी न होने के कारण यह स्थिति पैदा हुई.

देश भर में मुख्य आयुक्तों के रिक्त पदों की संख्या देखते हुए अब 1983 बैच के अधिकारियों की प्रोन्नति की संभावनाएं बढ़ गई हैं. आयुक्त एवं अतिरिक्त आयुक्त स्तर पर भी अधिकारियों की कमी के चलते कामकाज प्रभावित हो रहा है. मौजूदा स्थितियों में सभी रिक्त पदों पर नियुक्तियां होने में तीन-चार महीने का समय लग सकता है.

मोदी सरकार ने गठन के बाद कालेधन के मुद्दे पर गंभीरता दिखाई है, लेकिन जिस महकमे को कालेधन पर रोक लगाने के लिए बने नए क़ानून को लागू करना है, उस महकमे को सुदृढ़ करने के लिए सरकार ने कोई प्रयास नहीं किए.

उदारहण के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों की संख्या और प्रमोशन को ही लें, सरकार को अधिकारियों कमी के बारे में पूरी जानकारी है बावजूद इसके अधिकारियों के प्रमोशन लंबे समय से अधर में लटके हैं.

काला धन क़ानून के तहत जांच प्रक्रिया को आयकर क़ानून की तुलना में तेज करना होगा. इसके लिए निश्चित तौर पर ज्यादा कार्यबल की आवश्यकता होगी. एक आकलन के मुताबिक आयकर विभाग में वर्तमान में अधिकारियों के जितने पद स्वीकृत हैं वे भी जरूरत के हिसाब से कम हैं.

गौरतलब है कि इस साल टैक्स रिटर्न जमा करने की तारीखों में कई बार बढ़ोत्तरी की जा चुकी है, सीधे तौर पर इसका प्रमुख कारण कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी है.

लोगों की बढ़ती आमदनी के बावजूद देश में आयकर चुकाने वालों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ रही है. हालांकि टैक्स जमा करने वालों की संख्या में हर वर्ष इज़ाफा हो रहा है.

ऐसे में सरकार को आयकर महकमे को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे. यदि ऐसा नहीं होगा तो सुशासन का दावा करने वाली मोदी सरकार कई मोर्चों पर असफल साबित होगी.

क्योंकि देश की योजनायें टैक्स कलेक्शन पर ही टिकी हैं, यदि यह काम प्रभावशाली तरीके से नहीं होगा तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और सरकार की योजनाओं पर पड़ेगा.

भारत में आयकरदाताओं की संख्या चार करोड़ से कम है, जो कुल आबादी का चार प्रतिशत भी नहीं है. इनमें भी तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या नौकरीपेशा लोगों की है, जिनकी आयकर कटौती वेतन स्रोत से अनिवार्य रूप से की जाती है. देश में सेवा क्षेत्र और स्वयं का कारोबार करने वाला एक ऐसा बड़ा वर्ग है, जो आयकर के दायरे से दूर है.

ऊंची विकास दर के साथ शहरीकरण की ऊंची वृद्धि दर के कारण देश में मध्यवर्ग की संख्या तेजी से बढ़ी है. नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि इस समय मध्यवर्ग के 17 करोड़ लोग पूरे देश में 46 फीसदी क्रेडिट कार्ड, 49 फीसदी कार, 52 फीसदी एसी तथा 53 फीसदी कंप्यूटर के मालिक हैं, पर इनमें से बड़ी संख्या में लोग आयकर नहीं देते.

विभिन्न श्रेणी के दुकानदार अच्छी आय होते हुए भी आयकर देने से बचते हैं, आयकर देने को वे अपना कर्तव्य नहीं मानते. विभिन्न प्रकार के दुकानदारों, उद्यमियों और सेवा प्रदाताओं में से नए आयकरदाता खोजकर कर आधार बढ़ाया जा सकता है, इसके लिए आयकर के दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने के लिए आयकर विभाग ने एक नया अभियान शुरू किया है.

इस अभियान के तहत उसने मौजूदा वित्तवर्ष में एक करोड़ नए लोगों से कर वसूलने के लिए क्षेत्रवार लक्ष्य तय किया गए हैं. मसलन, अलग अलग राज्यों के लिए अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं.

अच्छी आय होने के बावजूद आयकर का भुगतान न करने वाले लोगों की पहचान करने से लेकर उनसे जुर्माना वसूलने तक का काम वर्तमान में उपलब्ध कार्यबल के भरोसे नहीं किया जा सकता और न ही देश से कालेधन को बाहर जाने से रोका जा सकता है.

इसलिए सरकार को वरीयता के आधार पर आयकर विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी को अविंलब पूरा करना चाहिए. केवल आयकर विभाग ही ऐसा विभाग नहीं है जिसमें कर्मचारियों की कमी है. सीबीआई की हाल भी कुछ ऐसी ही है.

ये दोनों विभाग देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कदम से कदम मिलाकर चलते हैं, यदि इस तरह के प्रमुख विभाग कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी से जूझेंगे तो मोदी सरकार के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के वादे खोखले साबित होंगे.