बलूचिस्तािन : भारत की मदद से निर्वासित सरकार बनाएंगे

बलूच लीडर नायला क़दीर बलोच पिछले दिनों भारत यात्रा पर थीं. इस दौरान दिल्ली में चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने उनसे बलूचिस्तान आंदोलन से जुड़े हर एक पहलू पर विस्तार से बातचीत की. नायला क़दीर बलोच  ने इस इंटरव्यू में कश्मीर से लेकर बलूचिस्तान, पाकिस्तान और अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में बेबाकी से अपनी बातें रखीं…

baluchistanकश्मीर को लेकर कुछ कहना चाहेंगी?

पहले यह तय करना होगा कि कश्मीर की जो पहचान है, वह धार्मिक है या राष्ट्रीय है. अगर धार्मिक है यानी मुसलमान को यह चााहिए, मुसलमान को वह चााहिए, तो मुसलमान तो पूरी दुनिया में रहते हैं और हिंदुस्तान में दुनिया भर से ज्यादा मुसलमान रहते हैं. जितने टुकड़ों में आप मुसलमानों को काटोगे, वे उतने ही माइनॉरिटी में होते चले जाएंगे. पाकिस्तान जब भारत से अलग हुआ, तो सिर्फ अंग्रेज़ों को ख़ुश करने के लिए और अंग्रेज़ों का प्रॉक्सी बनने के लिए उन्होंने अपनी भारत मां से ग़द्दारी की.

हम कश्मीरी लोगों के हक़ के हिमायती हैं. हम ऐसा नहीं कह सकते कि हमें अपना हक़ चााहिए और कश्मीरी को हक़ नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन क्या कश्मीर कभी एक अलग मुल्क था. हिंदुस्तान में जो विविधता है, क़ौमों की, ज़ुबानों की और जो 50 से ज्यादा स्टेट्स रही हैं यहां, वे सभी हिंदुस्तान का हिस्सा रही हैं. कश्मीर अगर अपनी भारतीय पहचान और कश्मीरी पहचान दोनों को रखे, तो इस स्थिति में कश्मीरी, चीन और पाकिस्तान का शिकार बनने से बच सकते हैं.

अगर वे यह समझते हैं कि उनकी पहचान मुस्लिम की है, तो जो हिंदू कश्मीरी हैं, वे कहां जाएं? अगर वे समझते हैं कि मुस्लिम पहचान के आधार पर मुल्क बना सकते हैं, तो इसका अनुभव पाकिस्तान ने किया और यह नाकाम अनुभव रहा है.

सबसे पहले पूरे उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम के नाम पर जो बंटवारा हुआ, वह बंगाल का हुआ. बंगाल ने उसके क्या परिणाम देखे, सब जानते हैं. पहले अंगे्रज़ों ने उसके दो टुकड़े किए, फिर पाकिस्तान के अत्याचार में पाकिस्तानी सैनिकों के हाथों 30 लाख लोग मारे गए. एक लाख औरतें रेप के कारण प्रेग्नेंट हुईं. 30 लाख बंगालियों के बाद 40 लाख अफ़ग़ान, पाकिस्तानी सैनिकों ने मारे. इसके अलावा अफ़ग़ानी महिलाओं का रेप, उनका ट्रेड, ये सब कुछ हुआ. जितनी पुरातत्व संपदा थी अफ़ग़ानिस्तान में, वह सब पाकिस्तानी लूट कर ले गए और बेचे, कुछ भी नहीं छोड़ा.

अब तक वे अफ़ग़ानिस्तान को जीने नहीं दे रहे, तो क्या अफ़ग़ान मुसलमान नहीं हैं. आज बलोचों पर जो अत्याचार पाकिस्तान कर रहा है, तो क्या बलोच मुसलमान नहीं हैं. इस पूरे उपमहाद्वीप में सबसे पहले यदि कोई मुसलमान था, तो वे बलोच थे. तो आप उन बलोचों को मार रहे हो, जिनसे आपने इस्लाम सीखा था. इतने सब के बाद भी क्या कश्मीरियों को पाकिस्तान पर विश्‍वास करना चाहिए?

मैं एक बहुत ही सीरियस एडवाइज़ यह दूंगी कि पाकिस्तान को कश्मीर, कश्मीरियों के इस्लाम या कश्मीरियों के इंसान होने से कोई मतलब नहीं है. पाकिस्तान को कश्मीर का पानी चााहिए. उसे कश्मीर की स्ट्रैटेजिक पोज़िशन चाहिए और यह सब पाकिस्तान से ज्यादा चीन को चाहिए. आज जो पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर का हाल है, क्या वह आज़ाद है, क्या वहां पर लोगों पर अत्याचार नहीं हो रहे हैं? क्या वहां पर पाकिस्तान ने मिलिटेंट, आत्मघाती हमलावर और धार्मिक कट्टरवादी नहीं भर दिए हैं? क्या वहां पर पाकिस्तानी आर्मी की मौजूदगी नहीं है? कश्मीर, गिलगित और बलतिस्तान में आज सिर्फ पाकिस्तान आर्मी ही नहीं, चीन की आर्मी भी मौजूद है.

कश्मीरियों को यह देखना चाहिए कि वे अपनी आज़ादी किससे मांग रहे हैं, पाकिस्तान से, हिंदुस्तान से या चीन से. यूएन का डिक्लेरेशन था कि जनमत संग्रह से पहले कश्मीर को मिलिट्री फ्री किया जाएगा, लेकिन पाकिस्तान ने तो उसको मिलिटराइज़ कर दिया. कश्मीरी यह देखें कि वे किस खेल का हिस्सा बन रहे हैं? मैं भारत सरकार से भी कहना चाहूंगी कि कश्मीरियों को और स्पेस दें. अगर ये गुमराह हैं या किसी ग़लतफ़हमी के शिकार हैं या ज़ुल्म के शिकार हैं, तो आप इन्हें गले लगाएं, इनके मसले हल करें. जिस तरह से आप सब भारत पर हक़ रखते हैं, कश्मीरियों का भी उसी तरह से भारत पर हक़ है.

कश्मीरियों से मैं यह कहूंगी कि आप पाकिस्तान के हाथों गुमराह मत हों. पाकिस्तान का इस्लाम से उतना ही ताल्लुक़ है, जितना कि किसी क़साई का बकरी से, क्योंकि जितने मुसलमान दुनिया में पाकिस्तान ने मारे हैं, उतने किसी ने नहीं मारे. बंगाल, अफ़ग़ानिस्तान, बलूचिस्तान या फिलिस्तीन में जितनी मुसलमान औरतों का पाकिस्तान ने रेप किया है और जितनी लूट-मार मुसलमानों के संसाधनों की की है और किसी ने नहीं की. ये इतिहास कश्मीरियों के सामने है, वे इसे देख लें और इसके बाद भी अगर वे पाकिस्तान पर यक़ीन करना चाहते हैं, तो करें.

अपने बारे में बताइए. कहां पैदा हुईं, मां-बाप, भाई-बहन के बारे में बताइए. आम बलोच औरतें तो राजनीति में नहीं आतीं, फिर आप कैसे आईं?

मेरा ताल्लुक़ बुनियादी तौर पर एक उच्च शैक्षिक परिवार से है. मेरे फादर और मेरे अंकल बलूचिस्तान के मूवमेंट में शामिल रहे हैं. वे दोनों स्वतंत्र बलूचिस्तान को बनाने के बाकू में हुए साइंटिफिक फैसले के बाद से एक्टिव थे. बलोच स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन (बीएसओ) की बुनियाद रखने और नेशनल अवामी पार्टी को बनाने में मेरी फैमिली का रोल रहा है.

मैं जब पैदा हुई, उस वक्त जंग का माहौल था और मिलिट्री ऑपरेशंस जारी थे. जब मुझे कुछ होश हुआ, उस वक्त भुट्टो का मिलिट्री ऑपरेशन चल रहा था. चारों तरफ आग, धुआं और बारूद था. जो फ्रीडम फाइटर्स थे, वे अक्सर मेरे घर आया करते थे. बीएसओ के लोगों को बेड़ियां और जंज़ीरें पहना कर कोर्ट में लाया जाता था. मेरे पापा वकील हैं, वे उनका केस फ्री में लड़ते थे, उन्हें लीगल एड देते थे. नेशनल अवामी पार्टी के नेता जैसे ख़ैर बख्श मरी, गुल ख़ान नसीर, उन्खा साहब, बाबू सोरिस, मीर अब्दुल अजील कुर्द जैसों की लीगल सपोर्ट मेरे फादर और अंकल के ऑफिस से ही होती थी.

बचपन से ही मैं एक ऐसे माहौल में पली-बढ़ी, जो बलोच नेशनलिज्म का गढ़ था. भले ही उस समय मुझे उन सबकी बातें समझ में नहीं आती थीं, लेकिन उस समय से ही मेरे अंदर बहुत गहरा जज्बा था. वे लोग भी मुझे एक छोटे बच्चे की तरह नहीं, बल्कि एक साथी की तरह डील करते थे. मेरी वालदा भी बहुत स्ट्रॉन्ग थीं, वे वूमेन राइट्स के लिए काम करती थीं. शायद वह स्ट्रॉन्गनेस हमारी जीन में ही है.

बचपन से ही मेरे फादर और मेरी मदर ने मुझे बहुत प्राइड स्ट्रेंथ और कॉन्फीडेंस दिया. पहला जो गर्ल्स ऑर्गनाइजेशन बना बलोच स्टूडेंट का, वह मैंने ही अपने स्कूल में बनाया. उस समय मैं पांचवीं में पढ़ती थी. बीएसओ बलोचों के लिए एक एसेट है. यह एक ऐसी संस्था है हमारे पास, जो हमारे यूथ की ट्रेनिंग करता है, हमें हमारी हिस्ट्री बताता है, हमें ऑर्गनाइज़ेशन बनाना बताता है. हमें बीएसओ के माध्यम से वो सारी ट्रेनिंग दी जाती है, जो हमें अपनी राष्ट्रीय भावना और बलोच पहचान के साथ जोड़े रखती है.

जब मैं कॉलेज में पहुंची, तो पोएट्री भी करती थी, लिखती भी थी. उस वक्त हमीद बलोच हमारे बीएसओ के लीडर थे. उस समय ज़िया-उल-हक़ का मार्शल लॉ था और हमीद बलोच को डेथ सेंटेंस सुनाई गई. उन लोगों की कोशिश थी कि हमीद बलोच को एक क़ातिल के तौर पर पेश किया जाय. हालांकि उनकोे कोर्ट ने बरी कर दिया था, उन्होंने किसी का मर्डर नहीं किया था. जिसके मर्डर का उनपर इल्ज़ाम था, वह आदमी ख़ुद कोर्ट में आकर बोल चुका था कि मैं तो ज़िंदा हूं, लेकिन वे कैसे भी हमीद को फांसी देना चाहते थे. उस समय इन सबके ख़िलाफ़ एक अजीब तरह की ख़ामोशी थी.

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उस ख़ामोशी को भी मैंने तोड़ा. हमारा गर्ल्स कॉलेज क्वेटा कैंट के अंदर था. वहां पर हमने बीएसओ का अपना यूनिट स्ट्रॉन्ग किया था. हम कॉलेज की दीवारें फांद कर बीएसओ के जलसे-जुलूसों में जाया करते थे. हमने उस समय क्लासेज़ का बायकॉट किया. हम गर्ल्स कॉलेज से सड़कों पर बाहर आ गए. हमने प्रोटेस्ट किया और हमीद बलोच को एक नेशनल हीरो के तौर पर पेश किया, जिन्हें वे लोग क्रिमिनलाइज़ करना चाहते थे. उस वक्त बूलान मेडिकल कॉलेज में बीएसओ के बॉयज़ की मीटिंग हो रही थी.

उसमें लोगों को शांत करने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन जब उन्हें यह खबर मिली कि गर्ल्स कॉलेज सड़कों पर आ गई हैं, तो वे लोग भी बाहर आकर प्रोटेस्ट करने लगे. उसके बाद हमीद बलोच के समर्थन में ऐसा प्रोटेस्ट फैला कि उसे कंट्रोल करना मुश्किल हो गया. हमीद को तो हम बचा नहीं सके, उसे उन लोगों ने फांसी दे दी, लेकिन जो वह डिज़र्व करता था, जो हीरो की सलामी और सैल्यूट वह डिज़र्व करता था, वो हमने उसे दिया. उसके बाद मुझे गर्ल्स कॉलेज से निकाल दिया गया. मेरी पढ़ाई बहुत डिस्टर्ब हुई.

मैं जब यूनिवर्सिटी में आई, उस समय भी मैं बीएसओ की लीडर थी. हमने उस समय वूमेन एक्टिविज़म भी शुरू कर दिया था. उस वक्त मेरा ज्यादा विरोध ऑनर किलिंग के ख़िलाफ़ था. उसे स्याहकारी भी कहा जाता था. उसे रोकने के लिए हमने मुहिम चलाई. मेरे जो साथी थे, वे मेरी उस मुहिम से परेशान हो गए, क्योंकि उस वक्त तक यह टेरर था कि अच्छी लड़कियां स्याहकारी का लफ्ज़ अपने मुंह से नहीं निकालती थीं. हमने इसका विरोध किया और कहा कि हमें इसलिए यह लफ्ज़ नहीं बोलने दिया जाता, ताकि इसका टेरर क़ायम रहे. हम इसे इतना बोलेंगे, इतना बोलेंगे कि इसका टेरर तोड़ दें.

उस मूवमेंट में मैंने पॉलीटिकल पार्टीज़ और धार्मिक नेताओं के साथ लॉबिंग की. बलूचिस्तान के हाईकोर्ट से ‘नो मोर क्राइम ऑफ पैशन’ का निर्णय आया. उसमें कहा गया कि इसे मर्डर की तरह डील किया जाएगा. इसे लागू कराने और इसके समर्थक औरतों और मर्दों को भी बचाने के लिए हमने प्रयास किया. इस मुद्दे को हमने यूएन में भी पहुंचाया. वहां हमने मांग की कि इसे प्रायोरिटी इश्यू में रखा जाय और इसे औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा के रूप में देखा जाय. इसमें हम कामयाब भी हुए.

1995 में बीजिंग में, जो फोर्थ वर्ल्ड वूमेन कॉन्फ्रेंस हुई थी, उसमें भी हमने इस मुद्दे को उठाया. वो एक महीने की कॉन्फ्रेंस थी और उसमें पूरी दुनिया से 40 हजार औरतें जमा हुई थीं. उसमें इसपर बात हुई कि पूरी दुनिया में महिलाओं की जो समस्याएं हैं, उनका समाधान कैसे किया जाए? उसमें हर रीजन के अपने-अपने कैंप्स थे. एक साउथ एशियन कैंप भी था, जिसमें भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, सऊदी अरब सभी के कैंप्स थे, लेकिन बलूचिस्तान का कैंप नहीं था. यह देखकर मुझे बहुत धक्का लगा कि इसमें मेरा मुल्क क्यों नहीं. मैं उसी वक्त वापस होटल गई और अपना सब सामान लाकर मैंने बलूचिस्तान का कैंप लगा दिया. यह देखकर पाकिस्तानी औरतें ग़ुस्सा हो गईं.

उन्होंने पाकिस्तानी कपड़े पहने हुए थे. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हें तो पाकिस्तानी कपड़े पहनने चााहिए. मैंने कहा कि नहीं, मैं तो बलोच हूं. वे मुझसे लड़ने-भिड़ने पर आ गईं. उसी वक्त वसीमा किरमानी आईं, जो वहां डांस के ज़रिए एक्टिविज़म करती हैं. उन्होंने कहा, देखो, हम सब मोहनजोदाड़ो की तहज़ीब के लोग हैं और हम सबको एक होना चाहिए. तुम भी आ जाओ और पाकिस्तान के साथ एक स्टॉल कर लो, बलूचिस्तान का कैंप छोड़ दो. मैंने कहा कि अगर मोहनजोदाड़ो की तहजीब है, तो उससे 7000 साल पहले की तो मेरगढ़ की तहज़ीब है.

मैं अपनी मेरगढ़ की तहज़ीब पर खड़ी हूं. मोहनजोदाड़ो तो मेरगढ़ की ग्रैंड डॉटर है. अगर यही करना है, आपको तहज़ीब की बुनियाद पर ही रहना है, तो फिर आपने पाकिस्तान का कैंप क्यों लगाया है, आप भारत के कैंप में शामिल हो जाइए. मैंने अपना कैंप बनाए रखा. उस वक्त हमारी जो यह इंडिपेंडेंस मूवमेंट है, वह नहीं थी. उस समय पाकिस्तान की पूरी सिविल सोसायटी मेरे ख़िलाफ़ हो गई. वे ख़ुद को लिबरल कहते हैं, फेमिनिस्ट कहते हैं, लेकिन बलूचिस्तान को स्वतंत्र देखना नहीं चाहते.

पाकिस्तान की सिविल सोसायटी कभी भी हमारे साथ नहीं खड़ी हुई. इसका कारण ये है कि वे भी हिस्सेदार हैं, पाकिस्तानी आर्मी की उस लूट-मार में, जो वे बलूचिस्तान में करते हैं. जब पाकिस्तान आर्मी बलूचिस्तान से गैस लूट कर ले जाती है, या सोना लूट कर ले जाती है, उसमें सब हिस्सेदार होते हैं. अगर ये उसमें हिस्सेदार नहीं हैं, तो ऐलान करें ना कि बलोचों के ख़ून की क़ीमत पर ये जो ब्लड गैस आ रही है, इसे हम इस्तेमाल नहीं करेंगे.

लेकिन ये ऐसा नहीं करेंगे. ये चाहते हैं कि बलोच लुटते रहें और हम फैशन करके दुनिया के सामने फेमिनिस्ट बनी रहें. एक ज़बीन महमूद हैं, जिनको हम कह सकते हैं कि उन्होंने जुर्रत की और बलोच मिसिंग पर्संस के ऊपर स्टैंड लिया और एक प्रोग्राम किया. लेकिन उसके बाद आईएसआई ने उनका मर्डर कर दिया.

मेरा जो लाइफस्टाइल है, वो बलोच राइट्स रहा है. मैं यूनिवर्सिटी में गई, तो उस समय जो बलोच लड़कियां वहां पढ़ती थीं, वो पाकिस्तानी ड्रेस पहनती थीं, बलोच ड्रेस नहीं पहनती थीं. हमने बलोच ड्रेसेज़ पहननी शुरू की. यूनिवर्सिटी के साथ-साथ, ऑफिसेज़ में, प्रजेंटेशंस में या दुनिया में जहां कहीं भी गईं, बलोच ड्रेसेज़ में ही गईं. हमारा बलोच ड्रेस, ख़ुद हमारा एक झंडा है. हम जहां कहीं भी जाएं, साथ में बलूचिस्तान की पहचान होनी चाहिए. हमारी आज़ादी की लड़ाई 2000 के बाद शुरू हुई. हमारी इस लड़ाई में, जो हमारा हीरो था, है और रहेगा, वह है, बालाच मरी.

फ्रीडम के लिए बालाच के ऐलान ने हमें भी जगाया. उसके ऐलान में इतनी जुर्रत थी और इतनी ईमानदारी थी कि हम सब उठ खड़े हुए. हम सबके अंदर भी आज़ादी के लिए लड़ने की चाह थी, लेकिन हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करना है, कैसे करना है. बालाच की बातों से हमें समझ में आया कि अगर हम नहीं उठे, तो इतिहास में दफ़न हो जाएंगे. अब जिस तरह से हमपर अत्याचार हो रहा है, जो ग्वादर मेगा प्रोजेक्ट के बाद से और बढ़ा है, हमें इसके ख़िलाफ़ होना पड़ेगा, वरना हम ख़त्म हो जाएंगे.

बालाच जंग लड़ते हुए सरलट के क़रीब शहीद हो गए. उनकी कमी पूरी नहीं हो पाएगी, लेेकिन हम समझते हैं कि हर बलोच जो फ्रीडम फाइटर है, वह बालाच ही है. मेरा प्लान है कि बालाच के नाम पर हम एक फिल्म बनाएं. पिछली बार जब मैं अप्रैल 2016 में भारत आई थी, तो मुंबई के कई फिल्म प्रोड्यूसर्स से मैंने बात की थी. उस फिल्म का नाम ‘बालाच’ होगा, लेकिन फिल्म का हीरो सिर्फ बालाच नहीं है, बल्कि हमारी जो मूवमेंट है, वह हीरो है. अभी मेरा प्लान है गुजरात जाने का, गुजरात के बाद मुंबई जाने का, तो हो सकता है कि हम उस फिल्म को लॉन्च करें.

अभी कुल मिलाकर आप दुनिया से क्या उम्मीद कर रही हैं? भारत के अलावा कौन से देश हैं, जो बलोचों के सपोर्ट में आए हैं भारत के अलावा बांग्लादेश हमारे समर्थन में आया है. अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति ने हमारा समर्थन किया है, लेकिन अभी तक वहां की मौजूदा सरकार ने कुछ ऐलान नहीं किया है. मैंने काबुल में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, वहां रहने वाले 4 मिलियन बलोचों के संगठन के जो हेड हैं, रिटायर्ड जनरल करीम ब्राहवी, वे मेरे साथ थे. साथ ही अफ़ग़ानिस्तान के यूथ लीडर्स भी हमारे साथ थे. उन सबने सपोर्ट किया बलूचिस्तान की स्वतंत्र सरकार के मुद्दे का.

हमने अफ़ग़ानिस्तान की सरकार से रिक्वेस्ट की कि जिस तरह से भारत की सरकार ने और भारत के पीएम नरेंद्र मोदी जी ने बलोचों के समर्थन में आवाज़ उठाई है, वैसे ही अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को भी हमारे लिए आवाज़ उठानी चाहिए. हमें सार्क के और देशों से भी समर्थन की उम्मीद है. यूरोप के देशों, अमेरिका, और अरब देशों से भी हम समर्थन की मांग कर रहे हैं. यूएन में भी हमारे नुमाइंदे हैं.

बाक़ी सब जगहों पर कांग्रेस मैन हैं, पार्लियामेंटेरियंस हैं. सरकार के अंदर ऐसे लोग हैं, जो हमारे साथ हमदर्दी रखते हैं या हमारे समर्थन में खुलकर बोलते हैं, लेकिन अभी तक भारत और बांग्लादेश के अलावा किसी भी स्टेट की तरफ से हमारे समर्थन का डिसीज़न नहीं आया है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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