कादर खान, आचार्य बालकृष्ण और स्वामी रामदेव

santosh-bhartiyaक़ादर खान 78 वर्ष के हो गए. क़ादर खान हिंदुस्तान के उन चंद अभिनेताओं में हैं, जिन्होंने कॉमेडी रोल शानदार तरीके से निभाए. उन्होंने चरित्र अभिनेता के तौर पर अपनी खास पहचान बनाई और वह फिल्मों में विलेन भी रहे. क़ादर खान ने चार सौ से ज़्यादा फिल्मों की पटकथा लिखी, संवाद लिखे और उन्होंने छह सौ से ज़्यादा फिल्मों में काम किया. क़ादर खान अपने आप में एक्ंटिग का स्कूल हैं. क़ादर खान की फिल्में देखकर आज के बहुत सारे अभिनेता अपनी अभिनय शैली विकसित करते हैं.

क़ादर खान ने फिल्म होगया दिमाग़ का दही के ज़रिये दस वर्षों के बाद फिल्मों में वापसी की. क़ादर ख़ान ने दस वर्ष पहले फिल्में इसलिए छोड़ दी थीं, क्योंकि उन्हें लगता था कि वह टाइप्ड हो गए हैं. उन्हें प्रकाश मेहरा एवं मनमोहन देसाई जैसे फिल्मकारों ने न केवल गढ़ा, बल्कि उनकी प्रतिभा भी निखारी.

इन दोनों महान निर्माता-निर्देशकों के जाने के बाद क़ादर ख़ान जीवनयापन के लिए अवश्य फिल्मों में काम करते रहे, लेकिन उनका मन अपने काम से कभी भरा नहीं. क़ादर ख़ान को दक्षिण के निर्माताओं ने भी अपनी फिल्मों में सबसे ज़्यादा जगह दी और दक्षिण में बनने वाली सभी हिंदी फिल्मों के वह अभिन्न अंग हुआ करते थे.

क़ादर ख़ान ने अमिताभ बच्चन, गोविंदा एवं जॉनी लीवर को कॉमेडी के ऐसे टिप्स दिए, जो उनकी ज़िंदगी और उनके अभिनय में सौ प्रतिशत मील के पत्थर बन गए. क़ादर ख़ान साहब का ख़ुद का मानना है कि उन्हें और असरानी को मिलाकर कॉमेडी की जिस विधा का जन्म होता है, वही असल कॉमेडी है.

वह द्वइर्थी भौंड़े संवादों को पसंद नहीं करते, वह उछल-कूद कर लोगों को हंसाना सही नहीं मानते. बल्कि उनका मानना है कि कॉमेडी ऐसी होनी चाहिए, जिसके संवाद, व्यंग्य और रोल अदा करने वाले कलाकार का चेहरा देखकर लोग हंस पड़ें. इसीलिए आज के कॉमिक रोल करने वाले अभिनेताओं की वह आलोचना नहीं करते, लेकिन उन्हें इस बात का दु:ख अवश्य होता है कि अब कॉमेडी अपने शास्त्रीय स्वरूप में हमारे सामने नहीं आ पा रही है.

कादर ख़ान साहब ज़िंदगी के दस वर्षों तक कॉमेडी फिल्मों से दूर रहने के बाद जब वापस आए, तो उनके सामने अनुभवों का एक ख़जाना था. लोगों ने मान लिया कि क़ादर खान ख़त्म हो गए हैं और उन्होंने क़ादर ख़ान से बातचीत करना बंद कर दिया. शायद यह दुनिया का दस्तूर है. जब आदमी अपने शिखर पर नहीं होता है, प्रसिद्धि से नीचे हट जाता है, चाहे वह नीचे हटना उसका खुद का चुना हुआ क्यों न हो, लोग उसके पास नहीं जाते.

यह चलन हर जगह है, लेकिन फिल्मी दुनिया में यह चलन बेरहमी की हद तक है. जो लोग क़ादर ख़ान की प्रसिद्धि के शिखर के समय उनकी एक नज़र के लिए तरस जाते थे और जिन्होंने क़ादर ख़ान की वजह से अपनी ज़िंदगी में सफलताएं देखीं, वही लोग क़ादर ख़ान से काफी बुरी तरह मुंह मोड़ गए. यह दर्द क़ादर ख़ान साहब के मन में बसा हुआ है. बीमारी के दिनों में उन्हें स़िर्फ अमिताभ बच्चन कभी-कभी फोन करके उनका हाल-चाल पूछ लेते थे.

फिल्मों की दुनिया या कला की दुनिया ऐसी है, जिसमें माना जाता है कि संवेदनशीलता होती है, पर यह संवेदनशीलता नकली होती है. इसीलिए जब कोई प्रसिद्धि के शिखर से हटता है, तब उसे पता चलता है कि वह किन बेरहम लोगों के बीच काम करता रहा है. अभिनेता रहमान इसके दूसरे उदाहरण हैं, अभिनेत्री विमी इसकी तीसरी उदाहरण हैं और ऐसे उदाहरणों की श्र्ृंखला भरी पड़ी है.

साधना हमारे बीच में हैं, अमिता हमारे बीच में हैं, नंदा गुमनामी के अंधेरे में चली गईं और जो पुराने अभिनेता-अभिनेत्री दृश्य से हट गए, न फिल्मी मीडिया ने और न फिल्मों में उनके साथ काम करने वाले लोगों ने कभी उनकी सुधि ली. क़ादर ख़ान साहब कई वर्षों से बीमार हैं. उनके दिमाग़ में घुस गया कि अब उनका रोल इस दुनिया में ख़त्म हो गया है.

वह एक बड़े नामी अस्पताल में इलाज कराने के लिए गए, जहां नर्स ने उन्हें नीचे गिरा दिया, जिससे उनके घुटनों में चोट आ गई और वह व्हील चेयर पर आ गए. उन्हें लगा कि उनकी ज़िंदगी अब ख़त्म होने वाली है, तो वह व्हील चेयर पर ही हज कर आए और अपने में सिमट गए. ऐसे समय में फिल्म होगया दिमाग़ का दही के निर्माताओं ने उन्हें निराशा के इस भंवर से निकालने का फैसला किया. सारी दुनिया में उनका इलाज हुआ, उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ.

लेकिन जब पतंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण से संपर्क किया गया, तो आचार्य बालकृष्ण ने बांहें पसार कर क़ादर खान साहब के स्वागत की बात कही और उन्होंने क़ादर खान साहब को पतंजलि योगपीठ में आने, रहने और इलाज कराने का आमंत्रण दिया.

क़ादर ख़ान साहब 14 अक्टूबर को पतंजलि योगपीठ गए और बाबा रामदेव ने ट्‌वीट किया कि क़ादर ख़ान साहब हमारे यहां आए हैं और हमें उन्हें ठीक करने की ज़िम्मेदारी दी गई है.

उन्होंने उसी ट्‌वीट में आशा प्रकट की कि क़ादर खान साहब निश्चित रूप से ठीक हो जाएंगे. ये लाइनें मैं दशहरे के दिन लिख रहा हूं और यही क़ादर ़खान के जन्म का दिन भी है, 22 अक्टूबर. मैं पतंजलि योगपीठ में क़ादर ख़ान साहब के जन्मदिन के अवसर पर उन्हें बधाई देने गया था. क़ादर ख़ान साहब ने हाथ पकड़ कर जिस भावुकता के साथ बातें कीं, उसे देखकर मुझे लगा कि चमत्कार क्या होता है.

अगर इसे देखना हो, तो क़ादर ख़ान साहब को देखना चाहिए. वह क़ादर ख़ान साहब, जो फुस-फुसा कर बात करते थे, जिनकी आवाज़ गायब हो गई थी. आचार्य बालकृष्ण जी ने जब पहली बार क़ादर ख़ान साहब को देखा था, वह 14 अक्टूबर का दिन था. उस दिन क़ादर ख़ान साहब ने पहली इच्छा व्यक्त की थी कि क्या आप मेरी आवाज़ वापस दे सकते हैं?

मैं उस समय वहां मौजूद था और आचार्य बालकृष्ण ने कहा, अवश्य. और, आज 22 अक्टूबर को क़ादर ख़ान साहब की आवाज़ वापस लौट चुकी है. क़ादर ख़ान साहब व्हील चेयर से हिल भी नहीं पाते थे, लेकिन आज हमने देखा कि उन्होंने अपने सहयोगी पंकज का हाथ पकड़ कर आसानी से अपने क़दम बढ़ाए.

पहली बार क़ादर ख़ान साहब के मन में यह विश्वास पैदा हुआ कि मुझे जीना है और अभी फिल्में करनी हैं और उन्होंने यह भी कहा कि उनका बचा हुआ जीवन वह आचार्य बालकृष्ण और स्वामी रामदेव को समर्पित करते हैं.

यह इलाज का चमत्कार है, यह योग का चमत्कार है, आयुर्वेद का चमत्कार है या आचार्य बालकृष्ण की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति का चमत्कार है, पता नहीं, लेकिन क़ादर ख़ान साहब निराशा के भंवर से बाहर निकल आए हैं.

क़ादर खान साहब विश्वास और अविश्वास के बीच में झूलते हुए पतंजलि आए थे और 27 अक्टूबर को जब वह मुंबई के लिए निकले, तो आशा से ओतप्रोत एक अलग इंसान दिखे. क़ादर ख़ान साहब को कला की दुनिया में वापस भेजने के लिए आचार्य बालकृष्ण और स्वामी रामदेव को जितनी बधाई दी जाए, कम है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.