फीका रहा नवाज़ शरीफ का अमेरिका दौरा

americaपाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ का अमेरिका दौरा पाकिस्तान के लिए कई लिहाज़ से महत्वपूर्ण था. हालांकि अमेरिकी विशेषज्ञों ने इस दौरे को लेकर कोई बहुत उत्साह नहीं ज़ाहिर किया, लेकिन फिर भी कुछ समीक्षक इसे बहुत महत्व दे रहे थे. पाकिस्तान में भी इस यात्रा से बहुत उम्मीदें थीं. पिछले एक दशक से पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में काफी खटास पैदा हुआ है.

9/11 के न्यूयॉर्क के आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान अमेरिका के साथ आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल तो हुआ, लेकिन तालिबान के खिलाफ कार्रवाई में उसकी भूमिका अमेरिका की नज़र में हमेशा संदिग्ध रही.

बाद में पाकिस्तान के कबायली इलाकों में अमेरिकी ड्रोन हमलों, सलाला चेक पोस्ट पर अमेरिकी हमले, जिसमें पाकिस्तानी फौज के कम से कम 25 जवान मारे गए, ओसामा बिन लादेन की एबटाबाद में मौजूदगी और अमेरिकी खुफिया फौजी करवाई में उसकी मौत ने दोनों देशों के बीच सर्द पड़ रहे रिश्तों को अपने निचले स्तर पर पहुंचा दिया.

पाकिस्तान की आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई की गंभीरता की कलई पूर्व राष्ट्रपति और फौजी शासक परवेज़ मुशर्रफ ने खोल दी. उन्होंने अपने एक हालिया बयान में कहा कि ओसामा बिन लादेन उनका हीरो है और पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा को प्रशिक्षण दिया है.

बहरहाल, अमेरिका को यह मालूम है कि पाकिस्तान में सिविलियन हुकूमत की कोई खास अहमियत नहीं होती. खास तौर पर जिन मामलों में फौज और आईएसआई प्रत्यक्ष रूप से शामिल हों.

इसीलिए नवाज़ शरीफ के अमेरिका पहुंचने पर जिस तरह की गर्मजोशी की लोग उम्मीद लगाए बैठे थे, वह देखने को नहीं मिली. इसके उलट पाकिस्तानी मीडिया ने नवाज़ शरीफ की अमेरिकी यात्रा के दौरान उनकी जो आवाभगत हुई उसको लेकर खुल कर मजाक उड़ाया. पाकिस्तानी उर्दू न्यूज़ चैनल ने नवाज़ शरीफ के एयरपोर्ट पर स्वागत को शर्मनाक करार दिया.

हालिया दिनों में जब भी कोई पाकिस्तानी राष्ट्राध्यक्ष अमेरिका के दौरे पर गया है, तो उसके स्वागत की तुलना 1960 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा पाकिस्तान के फौजी तानाशाह अयूब खान के स्वागत से की जाती है, जिसमें एयरपोर्ट पर ही उन्हें रेड कारपेट वेलकम दिया गया था. लेकिन ऐसे लोगों को यह नहीं मालूम कि अयूब खान का ज़माना शीतयुद्ध का ज़माना था और अमेरिका दक्षिण एशिया में सोवियत संघ के प्रभाव को कम करना चाहता था.

शीतयुद्ध के ज़माने से आज तक गंगा से बहुत पानी बह चूका है. लेकिन ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के निति निर्धारक और मीडिया अभी भी उसी पुरानी विदेश नीति की सोच पर काम कर रहे हैं. इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की साख को न सिर्फ बट्टा लगा है, बल्कि आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान बिलकुल अलग-थलग पड़ गया है.

नवाज़ शरीफ की मौजूदा यात्रा के दौरान एक दिलचस्प बात यह भी हुई कि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने पाकिस्तानी पत्रकारों के विरोध के बीच नवाज़ शरीफ को पत्रकारों से खचा-खच भरे प्रेस कांफ्रेंस के दौरान आतंकवाद के मुद्दे पर खरी खोटी सुनाई.

अमेरिकी विदेश मंत्री ने साझा प्रेस कांफ्रेंस में नवाज़ शरीफ से लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया. एक पाकिस्तानी पत्रकार सामी अब्राहम के मुताबिक जॉन केरी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को उनका नाम नवाज़ लेकर मुख़ातिब किया. हालांकि पाकिस्तान में इस दौरे को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है.

पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक और एकेडमिक अकबर अहमद ने पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों के मुश्किल दौर की पृष्ठभूमि में इस यात्रा को कामयाब यात्रा करार दिया.

उनके मुताबिक नवाज़ शरीफ ने अमेरिकी रक्षा मंत्री से मुलाक़ात की, पेंटागन में गए, राष्ट्रपति ओबामा से उनकी लंबी बातचीत हुई, जिसमें बहुत से सांकेतिक भाव भी व्यक्त किए गए, जैसे नवाज़ शरीफ ने ओबमा की मां की वह तस्वीरें भेंट की जो उस ज़माने की थीं, जब वह पाकिस्तान में एक सहायता कर्मी थीं.

पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल तलत मसूद भी इस दौरे को कामयाब दौरा करार देते हैं. हालांकि पाकिस्तानी विपक्ष ने इस दौरे को आड़े हाथों लेते हुए नवाज़ शरीफ पर भारत-पाकिस्तान मामले में पाकिस्तानी पक्ष को मजबूती से नहीं रखने का आरोप लगाया.

बहरहाल, कुल मिलाकर देखा जाए, तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच बैठक के बाद जो साझा बयान जारी किया गया उसमें आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता, परमाणु सुरक्षा, तालिबान का मसला, व्यापार और निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, शामिल थे. लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए, तो नवाज़ शरीफ कोई बड़ी चीज़ लेकर अमेरिका से वापस नहीं आए.

सबसे पहले, तो उन्हें सिविल न्यूक्लियर सहयोग के मुद्दे पर नाकामी हाथ लगी, जिसके लिए पाकिस्तान वर्षों से कोशिशें कर रहा है. पाकिस्तान यह चाहता था कि अमेरिका सिविल न्यूक्लियर सहयोग के लिए अपनी भारत के साथ 123 समझौते की तरह पाकिस्तान के साथ भी सिविल न्यूक्लियर सहयोग पर समझौता करे. अमेरिका यह भी चाहता है कि पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर हथियारों के ज़खीरे में कमी लाए.

ओबामा-शरीफ के साझा बयान में जो भारत के सरोकार वाले मुद्दे हैं, उनमें अमेरिका ने पाकिस्तान के उर्जा आपूर्ति की कोशिशों में दियामर-भाषा बांध परियोजना में पाकिस्तान की मदद का आश्वासन दिया है. यह प्रोजेक्ट पाक-अधिकृत कश्मीर में है. भारत इस प्रोजेक्ट पर अपनी आपत्ति जताता रहा है.

साझा बयान में पाकिस्तान से आतंकवाद खासतौर पर हक्कानी नेटवर्क और लश्कर-ए-तैयबा पर कार्रवाई करने और तालिबान को अफगानिस्तान सरकार के साथ सीधी बातचीत के टेबल पर लाने में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है, जिसके लिए राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान की तारीफ की है. तालिबान के साथ
बातचीत की प्रकिया में भारत को शामिल नहीं किया गया है. साझा बयान में भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों पर भी जोर दिया गया.

लशकर-ए-तैयबा के विरुद्ध करवाई की मांग भारत बहुत दिनों से कर रहा है. हालांकि साझा बयान में पाकिस्तान ने लश्कर और उसे जुड़े आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिलाया है, उसकी आतंकवाद विरोधी नीति पर किसी को भरोसा नहीं है. पाकिस्तान हमेशा अपने वादों से मुकरता रहा है.

जहां तक नवाज़ शरीफ के अमेरिका दौरे का सवाल है, तो जैसा की ऊपर ज़िक्र किया जा चूका है कि अमेरिका यह भली भांति जानता है कि आंतरिक सुरक्षा, न्यूक्लियर मुद्दा, आतंकवाद, विदेश नीति का निर्धारण फौज करती है.

बहुत सारे मामलों में नवाज़ शरीफ का आश्वासन कोई खास महत्व नहीं रखता और असल मुद्दे पर बात पाकिस्तान सेना के अध्यक्ष जनरल राहील शरीफ के प्रस्तावित अमेरिका दौरे पर होगी.

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