खइबे तबे न वोटवा देबे

voteबिहार में महीनों बिना लग्न के ही रोज़ भोज-भात की महफिल नेताओं के घरों में सजती रही. विधानसभा चुनाव 2015 का नज़ारा किसी महोत्सव से कम नहीं था. पार्टी दफ्तर हो या चुनाव क्षेत्र, हर जगह त्योहार जैसा माहौल देखने को मिला.

चुनाव की घोषणा होते ही सभी पार्टियों के कार्यालयों में बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे. उनके खान-पान की बेहतर व्यवस्था स़िर्फ पार्टी दफ्तर में नहीं थी, बल्कि चुनाव क्षेत्र के हर प्रखंड में दिन होली, रात दीवाली जैसा नज़ारा था.

वोट कैसे मिले और लोगों का विश्वास कैसे हासिल किया जाए, इसके लिए तरह-तरह के प्रयास होते दिखे. बिहार में चुनाव का माहौल किसी शादी-विवाह से कम नहीं होता. यानी सुबह से लेकर देर रात तक स्वादिष्ट व्यंजनों की भरमार.

कौन कितना बेहतर भोज देगा, इसकी भी प्रतिस्पर्द्धा देखने को मिली. कौन कितने ज़्यादा व्यंजन खिला रहा है और कितनी बार, ये सब बातें चुनाव पर असर डालती हैं.

चुनाव की घोषणा होते ही राजधानी पटना सहित सूबे के विभिन्न ज़िलों में स्थित विभिन्न पार्टियों के दफ्तरों में कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगने लगा. कार्यकर्ताओं के आने-जाने, खाने-पीने और उनकी सुविधा-असुविधा का पूरा ख्याल रखा गया.

प्रत्याशियों के नाम की घोषणा के साथ ही शुरू हो गया भोज का दौर, जो मतदान के दिन तक जारी रहा. प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में भोज के ज़रिये प्रचार में चार से पांच लाख रुपये का खर्च आता है. कहां और कैसे हो रही है चुनावी भोज की तैयारी, यह जानने के लिए दौरा करते समय कई बातें सामने आईं.

कहीं शाकाहारी भोज, तो कहीं मांसाहारी और कहीं दोनों तरह की व्यवस्था. शाकाहारी में भी कहीं लाल किला चावल, तो कहीं बासमती की खुशबू. स़िर्फ खाने का नहीं, पीने का भी पूरा इंतजाम. शराब का हर ब्रांड मौजूद, देशी लें चाहे अंग्रेजी.

एक कार्यकर्ता ने बताया कि अगर शराब की व्यवस्था नहीं होगी, तो लोग खाने नहीं आएंगे. भोज के मेन्यू में भी इस बार खासा बदलाव दिखा. बासमती चावल, अरहर की दाल, घी, फूलगोभी की सब्जी, चटनी, पापड़, तरह-तरह के पकौड़े. सुबह पूरी-सब्जी के साथ दही और रसगुल्ले. अरे खइबे तबे न वोटवो देबे, जे जेतना अच्छा खिलैते ओकरे वोट परते जैसी बातें जगह-जगह सुनाई पड़ीं. मंदा पड़ा धंधा भी भोज की बहार के चलते खूब कमाई करता रहा.

सब्जी विक्रेता मनोज ने कहा कि सब्जियों की मांग इतनी थी कि दाम चढ़ाकर बेचने पर भी माल कम पड़ जाता था. फूलगोभी एवं टमाटर की मांग सबसे ज़्यादा रही. प्याज महंगा होने के बावजूद जमकर बिका. कई जगहों पर तो पेटी ठेकेदारों को सारी व्यवस्था सौंप दी गई. महिलाओं ने कहा कि घर में खाना बनाने का मा़ैका नहीं मिला, रा़ेज भा़ेज का मजा.

सुनीता कहती हैं कि घर के पुरुष एवं बच्चे तो भोज में चले जाते थे, लेकिन महिलाएं नहीं, क्योंकि यह अच्छा नहीं लगता. लोग महिलाओं के लिए खाना घर भिजवा देते थे, जैसा कि शादी-विवाह में होता है.

खान-पान की व्यवस्था उन जगहों पर ज़्यादा दिखी, जहां किसी जाति विशेष की आबादी अधिक थी. जाति विशेष के मतदाताओं को लुभाने का कोई भी मौक़ा नेताओं-कार्यकर्ताओं ने नहीं छोड़ा. कई जगह तो चेहरा देखकर खिलाया गया.

यानी जिसके घर में अधिक वोट थे, उसकी खातिरदारी जमकर हुई. नमक का फर्ज चुकाना है, नेता जी को जिताना है, यह नारा सुनने में अटपटा ज़रूर लग रहा होगा, लेकिन ऐसे नारे हर भोज में सुनने को मिले. कभी मुखिया जी का भोज, तो कभी जाति विशेष के छोटे नेताओं द्वारा खान-पान की व्यवस्था.

जिसके पास जितने अधिक वोट, उसकी तऱफ से भोज. खाना-पीना हो जाने के बाद नमक का वास्ता. संजीव यादव ने टिप्पणी की कि हर नेता खाना खिलाकर वोट पाने की चाहत रखता है और वोट किसी एक को देना है. ऐसे में नमक हलाली कैसे संभव है? कई लोगों ने कहा कि भोज देकर कोई वोट नहीं खरीद सकता. जो बेहतर उम्मीदवार होगा, उसी को जिताएंगे.

अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए कार्यकर्ताओं-सहयोगियों की सुबह बहुत जल्दी हो जाती थी और रात की तो बात न करें. अपनी बात रखने के लिए लोगों को एकत्र करना भी एक चुनौती होती है और भोज एवं खान-पान का इंतजाम इस चुनौती से निपटने का एक आसान तरीका है. भोज के बहाने प्रत्याशियों ने मतदाताओं के सामने अपनी बात रखी.

छोटे या टिकट पाने में नाकाम रहे नेताओं ने भोज के सहारे अपने लिए आगे की रणनीति तैयार कर ली. भोज आयोजन को लेकर ऐसे नेताओं की दिलचस्पी देखने लायक थी. और, खाने वालों को खाने का बहाना चाहिए था, सो आज यहां भोज, तो कल वहां.

यही नहीं, श्राद्ध का भोज भी दोबारा किया गया. जाने ऐसे कितने बहाने खाने और खिलाने के निकाले गए. मकसद सबका एक रहा, मतदाताओं को लुभाना. देखना दिलचस्प होगा कि किसका भोज कारगर साबित हुआ और कौन मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहा.