जंग से मसाइल पैदा होते हैं हल नहीं

चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने हुर्रियत के वरिष्ठ नेता प्रो. अब्दुल ग़नी बट से कश्मीर मसले पर विस्तृत बातचीत की.

gani-batसवाल- प्रोफेसर साहब, कश्मीर जहां आज खड़ा हुआ है, ऐसा लगता है कि दो दीवारें खड़ी हैं, जिनमें कोई सुराख़ नज़र नहीं आ रहा है. इनमें सुराख़ करने का क्या तरीक़ा है और आज के हालात से निकलने का क्या रास्ता है?

पहली बात तो ये है कि कश्मीर को जुनूबी एशियाई ख़ीत्ते से अलहदा ना समझा जाए. इसको जुनूबी एशियाई ख़ीत्ते का एक हिस्सा तस्लीम किया जाए और जब से हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों जौहरी हथियार बनाने में कामयाब हो गए हैं, जब से ये जौहरी ममलिकतें बन कर के उभरी हैं, जब से कश्मीर का मसला जैसे जुनूबी एशियाई ख़ित्तेे के मुस्तक़बिल के साथ जुड़ा दिखाई देने लगा है, जुड़ा हुआ है. इसलिए जब आप कश्मीर की बात करेंगे तो दरहक़ीक़त आप हिंदुस्तान की बात करते हैं, पाकिस्तान की बात करते हैं, बल्कि पूरे जुनूबी एशियाई ख़ित्ते की बात करते हैं. इसलिए हमें दिन को दिन कहना पड़ेगा और रात को रात. हम एक ऐसे मरहले पर पहुंचे हैं, जहां हमें दानिशमंदी के साथ भी, दूरंदेशी के साथ भी, और सबसे बड़ी बात ये है कि हक़ीक़तपसंदी के साथ भी आगे बढ़ने का फैसला करना पड़ेगा. इसलिए कश्मीर में जो आप देख रहे हैं, शोरिश (हंगामा) है. इस शोरिश को भी समझना पड़ेगा. इसमें जो अनासिर हैं, उनको भी देखना पड़ेगा और फिर आगे बढ़ने के लिए दिल को बड़ा भी करना पड़ेगा. सबका भला चाहना होगा. भला आपका भी हो, मेरा भी हो, सबका हो. भला हिंदुस्तान का भी हो, पाकिस्तान का भी हो, कश्मीरियों का हो और कश्मीर में जितने भी ख़ित्ते हैं, उन सबका भला हो. अगर इस सोच के साथ आगे बढ़ा जाए. मुझे अपना वजूद आप में दिखाई दे और आपको अपना वजूद मुझमें दिखाई दे, तो फिर ये मसले बिल्कुल आराम के साथ हल हो सकते हैं.

इनका हल निकाला जा सकता है. हल कैसे निकाला जाए? हल के लिए देखें, पहली बात तो पहले की जाए. जंग से मसाइल पैदा होते हैं और जन्म लेते हैं, हल नहीं होते हैं. इसलिए जंग को आप छोड़ दें. जंग नहीं करेंगे. हिंदुस्तान वाले, पाकिस्तान वाले जंग नहीं करेंगे. कश्मीर वाले बिल्कुल ही जंग नहीं करेंगे. वो जंग कर ही नहीं सकते. कश्मीर के रगो-पै में जंग है ही नहीं, कश्मीर की सोच में जंग नहीं है, अमल में जंग नहीं है. कश्मीरियों पर जब कोई नारवा, कोई ग़ैर-हक़ीक़ी सूरत-ए-हाल ठूंसी जाती है, तो वे उसका मुक़ाबला करने के लिए मैदान में आते हैं ज़रूर, ये बात है, लेकिन वो जंग के इरादे से नहीं आते हैं. वो इस इरादे से, इस अज्म से आते हैं कि हम इन मसाइल का हल निकालें. कैसे निकालें, जंग से नहीं, हठधर्मी से नहीं, बल्कि बातचीत के माहौल में ख़ुशअसलुबी के साथ, दानिशमंदी के साथ, दूरंदेशी के साथ और हक़ीक़तपसंदी के साथ आगे बढ़ा जाए. मुझे इस सिलसिले में कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि कश्मीर में आप जहां भी जाएंगे, जिन लोगों से भी बात करेंगे, वो आपसे ये बात ज़रूर करेंगे कि कुछ ना कुछ तो करिए, या कुछ ना कुछ तो जो है, ये कुछ ना कुछ तो करिए, इसके मायने ये हुए कि रास्ता ढूंढिए और जो भी रास्ता आप मशावरत के साथ एक दूसरे से मिल बैठ के ढूंढ़ निकालते हैं, उस पे हम सब चलेंगे, तो इसलिए मैं ये समझता हूं, जंग नहीं, बल्कि बातचीत होनी चाहिए. बातचीत कहां हो?

मेरा ये ख्याल है कि हम जिस मोड़ पर हैं, तारीख़ के जिस मोड़ पर हैं, उस मोड़ पर आकर के मैं ये समझता हूं कि तर्जीही बुनियादों पर इन्हें प्रिफरेंसेज जो हैं, उनको देखना पड़ेगा. वो प्रिफरेंसेज तर्जीहात क्या हैं? तर्जीहात ये हैं कि पहले मरहले पे बातचीत हिंदुस्तान और पाकिस्तान के साथ शुरू हो. उसका इंपैक्ट जो है, उसका असर जो है, वह पूरी रियासत की सोच पर पड़ता है. उसका असर पूरी रियासत के अमल पर पड़ता है. उसका असर पूरी रियासत के लोगों की हिकमत-ए-अमली यानी स्ट्रैटेजी पर पड़ता है. इसलिए अगर बातचीत वहां हो जाती है, तो यहां आपको अमन लौटते दिखाई देगा. यहां आपको सलामती के माहौल में घूमने-फिरने का शौक़ उभरता दिखाई देगा. यहां आपको मिल-बैठ के सोचने का मौका मयस्सर होता दिखाई देगा. सब चीज़ें होंगी, तो मेरी राय में पहले मरहले पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू हो. दूसरे मरहले पर निकलना है अगर, तो दूसरे मरहले पर जब ये बातचीत शुरू होगी, इंडिया और पाकिस्तान के बीच में, तो आई ट्रस्ट, द आइस मस्ट ब्रेक. ये जो यख (बर्फ) है, जमा हुआ ये जो ब़र्फ है, पिघलना शुरू हो जाएगा.

सवाल- तो बातचीत का कोर सबजेक्ट, पूरा कश्मीर होगा या केवल श्रीनगर होगा?

जब मैं कश्मीर की बात करता हूं, मैं पूरे कश्मीर की बात करता हूं. श्रीनगर तो एक शहर है कश्मीर का. कश्मीर के मायने, मैंने पहले कहा कि पूरा जुनूबी एशियाई ख़ित्ता है. ये जब जुनूबी एशियाई ख़ित्ता हो तो पूरा कश्मीर है और जब हिंदुस्तान भी हो, पाकिस्तान भी हो, पूरा ख़ित्ता है. और जब हम हिंदुस्तान का, पाकिस्तान का, दोनों का भला चाहते हैं, पूरे ख़ित्ते का भला चाहते हैं, तो उसमें पूरा कश्मीर आ जाता है. तो दूसरी बात जो मैं आपके साथ करना चाहता हूं, वो ये है.

सवाल- पर इसका माहौल कैसे बनेगा?

हां, यही तो मैं कह रहा हूं. अब बातचीत की बात पर पूरा हिंदुस्तान-पाकिस्तान उसके बाद कश्मीरियों के हर ख़ित्ते के लोगों को इसमें शामिल किया जाए. कैसे शामिल किया जाए? मैं हवा में किले बनाने का क़ायल नहीं हूं. एक तिकोनी तर्ज़ का निज़ाम पैदा किया जाए. ट्राइंग्यूलर, इसके मायने ये कि हिंदुस्तान के साथ कश्मीर वाला बात करेगा. पाकिस्तान के साथ भी बात करेगा. वो प्रो-फ्रीडम लोग हों, या प्रो-इंडिया हों या प्रो-पाकिस्तान हों, जो भी हों, लेकिन एक ट्राइंग्यूलर फ्रेमवर्क में इनको बातचीत के लिए तैयार किया जाए. ये हो सकता है, ये कोई ऐसी बात नहीं है. इन कश्मीरियों को बातचीत में शामिल करने के लिए लाज़िम है, देखें कि यहां जो रास्ते हैं, उस कश्मीर के, इस कश्मीर के, ये खुल जाएं. यहां जो तिजारत हो, वह फले-फूले और दोनों के दरमियान शुरू हो. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लिए भी रास्ते खोले जाएं और बंदिशें ता़ेड़ी जाएं और फिर माहौल को पैदा करने के लिए जब हम एक-दूसरे से मिलेंगे, पंजाबी, पंजाबी से मिलता है तो वो पंजाबी हो जाता है, ना हिंदुस्तानी रहता है, ना पाकिस्तानी रहता है.

सिंधी गुजराती या सिंधी राजस्थानी मिलें, तो वो अपनी उसी बोली के हो जाते हैं और उस गोली से डरते हैं, जिस गोली का शिकार हम आजकल हो रहे हैं और बंटवारे के नतीजे में मैं नहीं कहूंगा क्योंकि एक तारीख़ी चीज़ है, हो चुकी है, बल्कि एक तारीख़ी अल्मिए के तौर पर, जिसे आप सबकॉन्टिनेंटल आयरेनी कहते हैं. उसके नतीजे में हम एक-दूसरे से बिछड़ गए हैैं-दूर हो गए हैं. इसको इससे निजात पाना है. इससे निजात पाने के लिए ज़रूरी है कि रास्तों को खोला जाय और रास्तों को खोलने के साथ-साथ बुद्धि के दरीचों को खोला जाय, यानी आपकी जो अक्ल है, उसकी खिड़कियों को खोलना पड़ेगा. हवाओं को आने दीजिए, तब्दीली के हवाओं को अपने दिमाग़ में समोने के लिए आप कोशिश करें. तो ये दूसरी बात हुई. एक माहौल पैदा हो जाएगा. तीसरी बात, जो है वह मोस्ट इंपॉर्टेंट है, अगेन.

अब आप देख लीजिए, आपका ब्रिक्स हो गया, ब्रिक्स कॉन्फ्रेंस, आपने देखा है, तेवर भी आपने देखे होंगे, तेवर भी आपने परखे होंगे. नई सफबंदियां शुरू हो रही है दुनिया में. अब ये युनिपोलर वाली बात नहीं है कि आप अमेरिका के हो जाएं, मैं अमेरिका का हो जाऊं तो बस अमेरिका महाराजा है. अमेरिका महाराज नहीं है, अमेरिका आप जैसा है, मुझ जैसा है. लाइक इंडिया, लाइक पाकिस्तान, लाइक रशिया, लाइक चाइना यानी जैसे चीन है, जैसे रूस है, जैसे हिंदुस्तान है, जैसे पाकिस्तान है, वैसे अमेरिका भी एक है. वो युनिपोलर वाली बात, वो एक आंख वाली बात ख़त्म. आपने डॉलर देखा होगा. डॉलर पर जो निशानी है न, वो एक आंख की निशानी है, आपने देखा है, वो एक आंख वाली बात ख़त्म है. अब दो आंख की, आपको दोनों आंखों को मिलाकर देखना होगा. आपको ये हक़ीक़त तस्लीम करना पड़ेगा, वो ये है. रशिया इज ग्रोइंग लाइक चाइना. अब चीन तो पहले ही ग्रो हो चुका है. अब रशिया भी ग्रो हो गया है. रूस ने आंखों में आंखें डाल कर अमेरिका से कहा, ईरान के मसले को आप एक आंख से न देखें. हमारी भी आंखें हैं, आपने देखा होगा. जब न्यूक्लियाई तनाज़ा खड़ा हो गया था उसमें. जी, एक आंख से नहीं, तो फिर पांच जमा हो गए, पांच मुल्क जमा हो गए, हल निकल आया. दोनों के मोफ़ाद में हल निकल आया. फिर आप चलेंगे कहीं और. झगड़े जो हैं, हमारी इस दुनिया में हैं. उसमें रूस जो है, वह चीन की पॉलिसी पर चल रहा है. रूस और चीन के तेवर एक जैसे हैं.

रूस और चीन के निशाने एक जैसे हैं. रूस और चीन के इरादे एक जैसे हैं और वो समझते हैं आप, वो इरादे क्या हैं. अब उन चीज़ों को देख कर के मुझे यूं दिखाई देता है कि हमारा जो आने वाला कल है, वो इस हक़ीक़त से जुड़ चुका है कि दिन को दिन कहा जाए और रात को रात कहा जाए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान लड़ाई नहीं लड़ सकते. उस लड़ाई में उनका ख़ात्मा होगा. नहीं, फिर क्या करना है? उनको भाइयों की तरह रहने का सलीक़ा सीखना पड़ेगा. एक-दूसरे का मददगार, मोआविन बनना पड़ेगा. सपोर्ट. इंडिया शुड बी सपोर्टिंग पाकिस्तान एंड पाकिस्तान शुड बी सपोर्टिंग इंडिया. और ये कैसे होगा? ये तो तभी होगा, जब हमारे दरमियान झगड़े ख़त्म हों. इन झगड़ों को ख़त्म कैसे किया जाए. उन झगड़ों में झगड़ों की मां जो है, वह कश्मीर है. अब इसको आप क्यों नहीं मानते? ये आज का झगड़ा नहीं है. आप तो तीन-चार जंगें लड़ चुके हैं. और पिछले कई सालों से, 26-27 सालों से जंग ही जंग है. भले ही फौजें ना लड़ रही हों, बाज़ाब्ता तौर पर एलान के बाद जंग ना लड़ रहे हों, लेकिन जंग हो रही है. सरहदों पर जंग चल रही है, कश्मीर की गलियों-कूचों में जंग हो रही है. सोच में जंग है, इरादों में जंग है, उठने-बैठने में जंग है, तिजारत में जंग है, रास्तों पर जंग है.

तो इस जंग का ख़ात्मा करने के लिए हम मिल बैठेंगे. आप भी, मैं भी, वो बड़े लोग भी. तो देखेंगे आप और मैं, हम अपनी तरफ़ से कोई चीज़ पेश करेंगे. जरा इसको देखें, ये आपके लिए ठीक है. नुस्ख़ा पेश होगा. आप करेंगे. आप अख़बार में हैं. आप घूमते हैं, आप फिरते हैं, तो आप मेरे से बात करते हैं, मैं आपको एक ख़ाका देता हूं. ख़ाका ये है जी, संतोष भाई ख़ाका ये है, इस ख़ाके पर चलिए और देखिए कि अमन लौटता है कि नहीं, लौटता है और देखिए ख़ुशहाली आती है कि नहीं आती है और देखिए कि इस ख़ित्ते के सब लोग सुकून के साथ और ख़ुशहाली के साथ आगे बढ़ते हैं कि नहीं बढ़ते हैं. अब मैंने कहा था आपसे कि ‘पीस ऐट हार्ट एंड पीस ऐट होम.’ ये एक बहुत बड़ा मकाम है, जिसको पाना होगा. बहुत बड़ी मंज़िल है, जहां तक जाना होगा और आप जब जाएंगे, वहां तो उधर जाकर आपको यह दिखाई देगा कि ये पाकिस्तान वाला मेरा भाई है. वो पाकिस्तान वाले को दिखाई देगा कि ये मेरा भाई है. कश्मीर वाला ये आवाज़ दे कि दोनों मेरे भाई हैं. हिंदुस्तान वाला मेरा भाई है, पाकिस्तान वाला मेरा भाई है. इस माहौल को… मेरा ख्याल है कि कई लोग ये कहेंगे कि आइडियलिज्म है. लेकिन इस आइडियलिज्म को रियलिज्म में बदलने के लिए आपको ये बातें भी सुननी होंगी और ये ताने भी सहने होंगे. आगे बढ़ना है तो फिर ये ताने सुनने होंगे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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