जब आशा को यह कहकर मना कर दिया कि उनमें स्टार मटेरियल नहीं है

Share Article

asha-parekhआशा पारेख को बचपन से ही डांस का शौक था. पड़ोस के घर में संगीत बजता, तो घर में उनके पैर थिरकने लगते थे. बाद में मां ने कथक नर्तक मोहनलाल पाण्डे से प्रशिक्षण दिलवाया. बड़ी होने पर वे पण्डित गोपीकृष्ण तथा पण्डित बिरजू महाराज से भरत नाट्यम में कुशलता प्राप्त कीं. अपनी नृत्यकला को आशा ने जन-जन तक फैलाने के लिए हेमा मालिनी एवं वैजयंती माला की तरह नृत्य-नाटिकाएं चोला देवी एवं अनारकली तैयार की और उनके स्टेज शो पूरी दुनिया में प्रस्तुत किए.

उन्हें इस बात का गर्व है कि अमेरिका के लिंकन-थिएटर में भारत की ओर से पहली बार नृत्य की प्रस्तुति दी थीं. स्कूल के एक कार्यक्रम में फिल्कार बिमल राय ने आशा को फिल्म बाप-बेटी में एक छोटी भूमिका दी थी, लेकिन फिल्मकार विजय भट्ट ने अपनी फिल्म गूंज उठी शहनाई में आशा को यह कहकर मना कर दिया कि उनमें स्टार मटेरियल नहीं है.

आशा के करियर को संवारने-निखारने का काम डायरेक्टर नासिर हुसैन ने किया. वे उनकी लाइफ में एक तरह से गॉड फादर की तरह आए. वह उन दिनों शशधर मुखर्जी की फिल्म दिल दे के  देखो  के लिए नई तारिका की तलाश में थे. जिस दिन बात फाइनल हुई, उस दिन आशा का सत्रहवां जन्मदिन था. यह फिल्म जन्मदिन का गिफ्ट बनकर उनके  जीवन में आई.

1959 से लेकर 1971 तक यानी कि दिल दे के देखो से लेकर कारवां फिल्म तक नासिर हुसैन गीत-संगीत से भरपूर रोमांटिक लाइट मूड की फिल्में बनाते रहे और आशा ने उनकी फिल्मों में मस्ती के साथ काम किया. नासिर हुसैन के अलावा दूसरे बैनर्स में काम करने से आशा की इमेज बदलने लगी. उन्हें सीरियसली लिया जाने लगा. राज खोसला निर्देशित मैं तुलसी तेरे आंगन की, दो बदन और चिराग, शक्ति सामंत की कटी पतंग ने उन्हें गंभीर भूमिकाएं करने तथा अभिनय प्रतिभा दिखाने के अवसर प्रदान किए.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *