उत्तराखंड की राजनीति में भी सरगर्मी तेज : हरदा को घेर रहे नर और कंकाल

ukदेश के कुछ कॉरपोरेट घरानों ने हरदा को निपटाने के लिए भाजपा से सुपारी ले रखी है. मुख्यमंत्री हरीश रावत उत्तराखंड में हरदा के नाम से जाने जाते हैं. कुछ कारपोरेट घरानों कें हाथ में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चाभी है, जिससे वे अभी से सर्वे को आधार बना कर हरदा के हार की भविष्यवाणी करने लगे हैं. उत्तराखंड में चुनाव का बिगुल बजने में अभी देरी होने के बावजूद राजनीतिक तपिश तेज है. भाजपा, हिमालय पर कमल खिलाने के लिए बेताब है. हरीश रावत का सीधा मुकाबला नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से है. कांग्रेस ने हरीश रावत के राजनीतिक कौशल को देखते हुए उन्हें मोदी के मुकाबले के लिए पूरी छूट दे रखी है. हालांकि हरीश रावत को इस चुनाव में कांग्रेस के 10 विभीषणों समेत भाजपा का मुकालबा करना है.

उत्तराखंड में कांग्रेस का परचम लहराने वाले हरीश रावत को मिली शानदार लेकिन कठिन सफलता ने उन्हें शक्तिमान बना दिया है. भाजपा के दिग्गज नेता उन्हें हराने के लिए सब तरह की रणनीति अपना रहे हैं. कांग्रेस के दस दिग्गजों के जरिए रावत सरकार गिराने की कोशिश उसका एक अध्याय है. सर्वोच्च न्यायालय को भी भाजपा का यह खेल पसंद नहीं आया और अदालत के आदेश से सूबे में हरदा की शानदार ताजपोशी हुई. उत्तराखंड की 70 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने से वंचित रही भाजपा अंतरकलह की शिकार है. भाजपा को बढ़त दिलाने वाले जनरल भुवन चंद्र खंडूरी को भितरघात करके बुरी तरह से हरा दिया गया था.

उधर, केदारनाथ घाटी में नर कंकालों की बड़ी तादाद में बरामदगी ने भी पर्वतीय प्रदेश की सियासी आग भड़का दी है. केदारनाथ हादसे के तीन वर्ष बाद त्रासदी वाले क्षेत्र से मिल रहे नर कंकालों ने हरीश सरकार को सांसत में डाल दिया है. भाजपा को प्रहार करने का मौका मिल गया है. केदारनाथ धाम में 16-17 जून 2013 को मची तबाही के निशान आज तक दिखाई दे रहे हैं. हादसे के वक्त जिस तरह की लापरवाही तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार ने बरती थी, आज उसी का नतीजा बेनकाब होकर सामने आ रहा है. लेकिन समय बदल चुका है. विजय बहुगुणा भाजपा में शामिल हो चुके हैं. विजय बहुगुणा सरकार की गैर जिम्मेदारी के कारण ही हरीश रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी. हरदा के समर्थक तब उनकी ताजपोशी को केदारनाथ बाबा की कृपा बता रहे थे. केदार घाटी क्षेत्र में मिले नर कंकालों के कारण हरीश सरकार कठघरे में आ गई है. नर-कंकाल प्रसंग ने चुनाव के समय भाजपा को रावत सरकार की बाजी पलटने का जैसे मौका थमा दिया है. कल तक जो लोग हरदा के लिए बाबा की कृपा बता रहे थे, वही अब इसे उनकी सरकार की घोर लापरवाही एवं जनभावना पर खरा न उतरना बता रहे हैं. लोग यहां तक कहने लगे हैं कि हरदा के राजनीतिक पतन का कारण भी केदारनाथ प्रसंग ही बनेगा. भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि प्रदेश सरकार परम्पराओं के विरुद्ध केदार घाटी में रावण का पुतला दहन कर सकती है, लेकिन केदारनाथ आपदा के दिवंगतों की अत्येष्टि करना उसकी प्राथमिकता में नहीं है. अभी तक क्षेत्र में नर कंकालों का मिलना सरकार की नाकामी और असंवेदनशीलता दर्शाता है. मुख्यमंत्री अगर हिटो केदार अभियान के बजाय ढूंढ़ो नर कंकाल अभियान चलाते तो अनेक दिवंगतों की अंतिम क्रिया सम्मानपूर्वक हो सकती थी. टूटे भवनों के भीतर आज भी सैकड़ों नर कंकाल हैं, ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च कर सांस्कृतिक संध्या का आयोजन यह बताता है कि सरकार असलियत में जनता की संवेदनाओं के साथ है या वोट जुटाने के कुचक्र के साथ. सरकार ने आपदा के बाद सम्पूर्ण क्षेत्र में स्थानीय नागरिकों के आवागमन पर भी रोक लगा दी थी, जिसे निशंक ने केदारनाथ की यात्रा पर जाकर तोड़ा. निशंक ने कहा कि सरकार जितना ध्यान केदारनाथ के पुनर्निर्माण पर लगा रही है, उतना ही ध्यान नर कंकालों को ढूंढ़ने में लगाती तो आज यह नौबत नहीं आती. केदारधाम में आई दैवी आपदा की राह से सत्ता तक पहुंचने वाले मुख्यमंत्री हरदा को केदार क्षेत्र में मिले नर कंकालों ने वाकई हिला कर रख दिया है. सरकार इस बात को लेकर निरूत्तर हो गई है कि केदारधाम से नर कंकालों को साफ किए बिना ही सजाने संवारने का काम किस हड़बड़ी में किया गया. नर कंकाल मिलने की घटना को भाजपा आगामी चुनाव में हरदा सरकार की नकामी का मुद्दा और इसे भ्रष्टाचार से जुड़ा मसला बता कर विरोध की तैयारी में जुट गई है.

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