केजरीवाल के 7 चुनावी मंत्र

Punjabआम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने बहुत ही कम समय में देश के राजनैतिक बिसात पर एक सफल और विशिष्ट भूमिका तैयार कर ली है. 2015 में दिल्ली की 2 करोड़ जनता को लुभाकर 70 में से 67 सीटें जीत लेना उनकी बड़ी उब्लब्धि थी. हालांकि जिस तरह वे और उनके विधायक लगातार विवादों में फंस रहे हैं, उससे दिल्ली का विकास जरूर बाधित हो रहा है.

इस कारण आम आदमी पार्टी की किरकिरी हो रही है. केजरीवाल ने गत महीनों में दिल्ली का उत्तरदायित्व उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सौंप दिया है. वे अपना अधिकतर समय पंजाब के विधानसभा चुनाव की तैयारी करने में लगा रहे हैं. ज्ञात हो कि आम आदमी पार्टी पंजाब और गोवा में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है.

रोचक बात यह है कि इन दोनों राज्यों में आम आदमी पार्टी की जीत की संभावना से अभी इनकार नहीं किया जा सकता है. भाजपा और कांग्रेस पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व भी आम आदमी पार्टी के इन राज्यों में बढ़ते हुए कद पर नजर रखे हैं. आखिर केजरीवाल के चुनावी मंत्र क्या हैं? जनता की ऐसी कौन सी नब्ज़ पर हाथ रखे हैं, जिसे थामे वे अपनी पार्टी को दिन प्रतिदिन आगे बढ़ा रहे हैं.

सर्वप्रथम, केजरीवाल की रणनीति उन राज्यों में चुनाव लड़ने की है, जिनमें भाजपा और कांग्रेस के बीच द्विध्रुवी संघर्ष रहता है. यह केजरीवाल का पहला चुनावी मंत्र है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की फरवरी 2015 में अभूतपूर्व जीत का सबसे बड़ा कारण इसी तथ्य को माना जा सकता है. ऐसे राज्यों में जनता के पास कोई तीसरा मजबूत विकल्प नहीं होता है.

इन राज्यों में बारी-बारी से या तो भाजपा की सरकार बनती रही है या कांग्रेस की. ऐसा हर 5-10 साल में होता रहता है. राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड आदि राज्य ऐसे उदाहरण हैं. वर्ष 2012 में पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल, जो भाजपा की लंबे समय से सहयोगी पार्टी रही है, को राज्य में बहुमत मिला और अकाली दल-भाजपा ने कुल 117 में से 68 सीटों पर बहुमत हासिल किया. कांग्रेस को सिर्फ 46 सीटें ही मिलीं.

जहां अकाली दल-भाजपा का मत प्रतिशत लगभग 42 प्रतिशत था वही कांग्रेस को 40 प्रतिशत मत मिले थे. परंतु 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बढ़-चढ़कर अपने उम्मीदवार उतारे. देश के तमाम हिस्सों में तो आम आदमी पार्टी के अधिकतर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी, पर पंजाब में अप्रत्याशित रूप से केजरीवाल को सफलता मिली.

आप को पंजाब लोकसभा चुनाव में 24.4 प्रतिशत मत मिले, जहां कांग्रेस का मत प्रतिशत 12.5 प्रतिशत, अकाली दल का 7.5 प्रतिशत और भाजपा का 1.5 प्रतिशत गिरा. गौरतलब है कि आप को जो वोट पंजाब में मिले, वो इन्हीं पार्टियों के वोट बैंक में सेंध लगाने से मिले. लोक सभा में 4 सीटें जीतने के बाद केजरीवाल का मनोबल काफी ऊंचा हो गया और अब 2017 में आम आदमी पार्टी पंजाब के सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है.

गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में यूं तो कांग्रेस पार्टी सक्रिय है, परंतु पिछले तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा को लगातार बढ़त मिली है. पंजाब और गोवा के बाद केजरीवाल की मंशा इन्हीं राज्यों में पैर पसारने की है.

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इस तरह के राज्यों की जनता को लुभाना केजरीवाल के लिए आसान होता है, क्योंकि जनता एक नए बदलाव के लिए तैयार रहती है. पंजाब में किसानों के पुराने ऋण माफ कराने, शराब और ड्रग माफिया से आज़ादी और करदाताओं के बोझ को हल्का करने का वादा इसी लोक-लुभावन रणनीति के तहत आप पार्टी कर रही है.

केजरीवाल का दूसरा मंत्र मोदी की नीतियों का हर संभव विरोध करना है. विपक्षी पार्टियों के अनुसार मीडिया में बने रहने के लिए केजरीवाल के लिये यह सबसे आसान तरीका है. नरेंद्र मोदी ने विमुद्रीकरण नीति से राजनैतिक पार्टियों की सारी गोटियों को तितर-बितर कर दिया है.

विमुद्रीकरण नीति का समाघात काले धन पर कितना असरदार होगा या गरीबों को मूलभूत सुविधाएं दिलाने में कितना कारगर होगा, यह अभी विवेचना का विषय है. इसके लिए 30 दिसंबर तक का हमें इंतज़ार करना चाहिए. केजरीवाल का तीसरा चुनावी मंत्र उनका अपना एक अलग सामाजिक-आर्थिक वर्ग उत्कीर्ण करना है.

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की नब्ज़ पर उनकी अच्छी पकड़ है. रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे व्यापारी, रोजाना दिहाड़ी पर काम करने वाले मज़दूर और कारीगर पूरे जोर-शोर से उनकी पार्टी को वोट करते हैं. यही कारण है कि 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में 77 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं और 57 प्रतिशत सिख मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया.

उनका चौथा, पांचवां और छठा मंत्र मुफ्त चीजें बांटना, बड़े-बड़े वादे करना और सत्तारूढ़ सरकार के नेताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार का आरोप लगाना है. केजरीवाल की इन तीनों दक्षताओं पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. केजरीवाल के ये तीनों मंत्र कट-पेस्ट फॉर्मूले की तरह काम करते हैं.

जिस तरह दिल्ली में उन्होंने मुफ्त बिजली, पानी और इंटरनेट देने का वादा किया, उसी तरह पंजाब में भी किसानों के पुराने कर्जे मा़फ करने का वादा जोर-शोर से किया जा रहा है. हालांकि, किसानों के लिए सर छोटू राम एक्ट, 1934 को फिर से अधिनियमित करने का प्लान केजरीवाल की एक अच्छी पहल है, जिसके तहत ब्याज की राशि कभी भी मूल क़र्ज़ से ज़्यादा नहीं हो सकती.

ये काफी फिक्र की बात है कि पंजाब के 85 प्रतिशत किसान क़र्ज़ में डूबे हैं और राज्य में किसानों पर करीबन 70,000 करोड़ का क़र्ज़ है. कुल क़र्ज़ की राशि में से 13,000 करोड़ की राशि निजी सूदखोरों की है, जो ब्याज समय पर नहीं मिलने पर बाहुबल का इस्तेमाल कर किसानों की ज़मीन आसानी से हड़प सकते हैं. पंजाब में प्रत्येक छोटे किसान पर करीब पौने तीन लाख रुपये का क़र्ज़ है और मध्यवर्गीय किसानों पर साढ़े पांच लाख रुपये का क़र्ज़ है.

जिस तरह दिल्ली में केजरीवाल ने शीला दीक्षित के ऊपर आरोप लगाए या फिर अरुण जेटली पर डीडीसीए में हो रहे भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए, उसी तरह अब पंजाब में भी अकाली दल नेता मजीठिया और उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर भी आरोप लगाए जा रहे हैं. उन्हें जेल भेजने की घोषणा प्रत्येक भाषण में की जा रही है.

यही केजरीवाल का कट-पेस्ट फार्मूला है, जिसका इस्तेमाल वे पंजाब विधानसभा चुनाव में कर रहे हैं. केजरीवाल का सातवां मंत्र उनकी संगठन क्षमता है. 2014 में आप ने पूरे देश में 432 उम्मीदवार खड़े किये थे. उम्मीदवारों की यह संख्या भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों से भी ज़्यादा थी.

लोकसभा चुनाव में बुरी तरह विफल होने के बाद केजरीवाल को समझ में आ गया कि केवल मीडिया में हवा बनाकर चुनाव नहीं जीता जा सकता. चुनाव जीतने के लिए एक मजबूत राजनैतिक संगठन का होना ज़रूरी है.

पंजाब-जोड़ो अभियान के तहत आप ने पंजाब में लगभग दस लाख लोगों को पार्टी की मेंबरशिप दी है. लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में आप के मेंबर्स की संख्या सिर्फ कुछ हज़ार थी. आज पंजाब के सभी 22 जिलों में, प्रत्येक बूथ लेवल पर केजरीवाल अपने कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने में सफल रहे हैं.

आप की राज्य इकाई के संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर के निष्कासन के बाद से ही आप की पंजाब में जीत की संभावनाओं पर तीन महीनों से प्रश्नचिन्ह लग रहा है. यूथ मेनिफेस्टो में अपने चुनाव चिन्ह झाड़ू को गोल्डन टेम्पल के साथ-साथ छाप देना भी पंजाब के लोगों को उचित नहीं लगा. इससे पार्टी की पंजाब में बढ़ती लोकप्रियता को ज़ोरदार धक्का लगा.

श्री हरमिंदर साहिब के इस अपमान के लिए केजरीवाल ने प्रायश्चित भी किया और मंदिर परिसर में कप-प्लेट धोए. आप जिस तरह से भाजपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य और प्रसिद्ध क्रिकेटर नवजोत सिद्धू को पार्टी में शामिल करने में विफल रही, वह कहीं न कहीं पंजाब में पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा लिए गए लचर फैसलों को दर्शाता है.

इन खामियों के बाद भी पिछले सप्ताह भटिंडा और मुक्तसर जिले में आप की रैलियों में लोगों ने काफी रुचि दिखाई और अच्छी-खासी भीड़ जुटी. इन रैलियों में केजरीवाल ने पंजाब की जनता को अपने पुराने अंदाज़ में कहा कि यदि नए नोट कांग्रेस या अकाली दल दें, तो नोट ले लेना पर वोट आप पार्टी को ही करना.

पंजाब चुनाव के बाद हमें साफ-साफ पता चल जाएगा कि दिल्ली की जीत महज़ एक राजनीतिक संयोग था या फिर एक सोची-समझी कूटनीति. अगले 100 दिनों में पंजाब की राजनीति में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

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