अर्जुन का पेड है कुछ खास, जानिए इसके आयुर्वेदीय गुण

Arjunपरिचय

पहाड़ी क्षेत्रों में नदी, नालों के किनारे 18-25 मी तक ऊंचे पंक्तिबद्ध हरे पल्लवों के वल्कल ओढ़े अर्जुन के वृक्ष ऐसे लगते हैं. अर्जुन का वृक्ष जंगलों में पाया जाता है. इस पेड़ का अर्जुन नामकरण केवल स्वच्छ श्वेत वर्ण के आधार पर किया गया है.

बाह्या-स्वरुप

यह अत्यन्त सूक्ष्म हरित तथा श्वेत वर्ण की आभा से युक्त व पुष्पदंड के चारों ओर लगे होते हैं. इसके फल कमरख जैसे 5 या 7 उठी हुई धारियों से युक्त होते हैं.

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

  • इसका सार एड्रियामायसिन प्रेरित क्षति से डी.एन.ए की सुरक्षा करता है.
  • इसका अनॉक्सीकारक जलीय-सार अर्बुदजननरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है.

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

कर्ण रोग:

कर्णशूल-3-4 बूंद अर्जुन पत्र-स्वरस को कान में डालने से कर्णशूल का शमन होता है.

मुख रोग:

  • मुखपाक- अर्जुन मूल चूर्ण में मीठा तैल मिलाकर मुंह के अंदर लगाकर गुनगुने पानी का कुल्ला करने से मुखपाक में लाभ होता है.

वक्ष रोग:

क्षयजकास- अर्जुन छाल के चूर्ण में वासा पत्र स्वरस की सात भावना देकर, 2-3 ग्राम की मात्रा लेकर, शहद मिश्री या गोघृत के साथ चटाने से क्षयज कास (जिसमें कफ में खून आता हो) में लाभ होता है.

हृदय रोग:

  • हृदय की सामान्य धड़कन जब 72 से बढ़कर 150 से ऊपर रहने लगे तो एक गिलास टमाटर के रस में 1 चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने से शीघ्र ही लाभ होता है.
  • अर्जुन छाल चूर्ण दूध, मिश्री और मधु मिलाकर चटाने से हृदयरोगों में लाभ होता है.
  • 6-10 ग्राम अर्जुन छाल चूर्ण में गुड़ मिलाकर दूध के साथ पकाकर छानकर पिलाने से हृदय का शमन होता है.
  • यह उच्च रक्तचाप में लाभप्रद है. उच्च रक्तचाप के कारण यदि हृदय में शोथ (सूजन)उत्पन्न हो गई हो तो उसको भी दूर करता है.

उदर रोग:

  • उदावर्त्त- 20 मिली अर्जुन छाल क्वाथ का नियमित सेवन करने से उदावर्त्त में लाभ होता है.
  • अर्जुन की पत्ती, बेल की पत्ती, जामुन की पत्ती, मृणाली, कृष्णा, श्रीपर्णी की पत्ती, मेहंदी की पत्ती और धाय की पत्ती, इन सभी पत्तियों के स्वरस से अलग- अलग खड़ यूषों का घी, अम्ल तथा लवण मिलाकर निर्माण करें. ये सभी खडयूष परम संग्राहिक होते हैं.

वृक्कवस्ति रोग:

  • प्रमेह- अर्जुन की छाल, नीम की छाल, आमलकी छाल, हल्दी तथा नीलकमल के समभाग चूर्ण 20 ग्राम को 400 मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष बचाकर, 10-20 मिली क्वाथ में
  • मधु मिलाकर नित्य प्रात: सायं करने से पित्तज-प्रमेह में लाभ होता है.
  • शुक्रमेह- अर्जुन की छाल या श्वेत चंदन से निर्मित 10-20 मिली क्वाथ को  नियमित प्रात: सायं पिलाने से शुक्रमेह में लाभ होता है.

प्रजननसंस्थान रोग:

  • रक्तप्रदर- 1 चम्मच अर्जुन छाल चूर्ण को 1 दूध में उबालकर पकाएं, आधा शेष रहने पर थोड़ी मात्रा में मिश्री मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करें.इसके सेवन से रक्तप्रदर में लाभ होता है.

अस्थिसंधि रोग:

  • अर्जुन त्वक से सिद्ध 20-40 मिली क्षीरपाक में 5 ग्राम घी एवं मिलाकर पीने से अस्थि भंग में लाभ होता है.
  • समभाग अर्जुन त्वक तथा लाक्षा चूर्ण (2-4 ग्राम) में गुग्गुलु तथा घी मिलाकर सेवन करने से तथा भोजन में घी तथा दूध का प्रयोग करने से शीघ्र भग्न संधान होता है.
  • भग्न के उपरांत 2-4 ग्राम अर्जुन त्वक चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से अस्थियों को बल मिलता है.

त्वचा रोग:

  • कुष्ठ- अर्जुन छाल को एक चम्मच चूर्ण को जल के साथ सेवन करने से एवं इसकी छाल को जल में घिसकर त्वचा पर लेप करने से कुष्ठ में लाभ होता है.
  • अर्जुन छाल को यवकुट कर क्वाथ बनाकर व्रणों को धोने से लाभ होता है.
  • 1 चम्मच अर्जुन मूल चूर्ण को दूध के साथ सेवन करने से घृष्ट व्रण में लाभ होता है.
  • व्यंग- अर्जुन त्वक से बनाए कल्क का व्यंग पर लेप करने से लाभ होता है.

सर्वशरीर रोग:

  • बादी के रोग- अर्जुन मूल छाल चूर्ण और गंगरेन मूल छाल चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर 2-2 ग्राम की मात्रा में नियमित प्रात: सायं दूध के साथ सेवन करने से शूल तथा शोथ का शमन होता है.
  • ज्वर- 20 मिली अर्जुन छाल क्वाथ को पिलाने से ज्वर में लाभ होता है.
  • 1 चम्मच अर्जुन छाल चूर्ण को गुड़ के साथ सेवन करने से जीर्ण ज्वर का शमन होता है.
  • क्षेय रोग-अर्जुन त्वक नागबला तथा केवांच बीज चूर्ण (2-4 ग्राम) में मधु, घी मिश्री मिलाकर दूध के साथ पीने से क्षय, कासादि रोगों का शीघ्र

 प्रयोज्यांग: काण्डत्वक, मूल, पत्र तथा फल

मात्रा: चूर्ण 2-4 ग्राम स्वरस 5-10 मिली. क्वाथ 20-40 मिली. चिकित्सक के परामर्शानुसार