झारखंड : आधी आबादी निरक्षर, पर स्टेट को कैशलेस करने की कवायद

jharkhand cmझारखंड में यह चर्चा आम है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास वही करते हैं, जो केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जब देश को कैशलेस बनाने की बात कही, तो मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पूरे राज्य को कैशलेस बनाने की घोषणा कर दी.

मुख्यमंत्री ने अपने अधिकारियों से बिना मंथन किए घोषणा तो कर दी, पर शायद उन्हें यह पता नहीं कि आखिर यह राज्य इस सिस्टम को अपनाने लायक है भी या नहीं? झारखंड की आधी आबादी निरक्षर है और लगभग 46 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने को मजबूर है.

आधी आबादी दो जून की रोटी के लिए भी मोहताज है, तो आखिर उनकी ऊंगलियों पर बैंक कैसे होगा. वैसे मुख्यमंत्री ने यह घोषणा जरूर की है कि पांच हजार तक के मोबाइल और स्वाइप मशीन वैट फ्री होंगे, लेकिन कितने लोगों के पास पांच हजार रुपए की मोबाइल रखने की क्षमता है.

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने आगे निकलने की होड़ में इस योजना का शुभारंभ रांची के समीप नगड़ी प्रखंड से पूरे ताम-झाम के साथ किया. मुख्यमंत्री ने कहा कि अब लोगों के हाथों में ही बैंक और उनका बटुआ रहेगा, पूरे राज्य को एक साल के अंदर कैशलेस कर दिया जाएगा. अब लोगों को न बैंक के बाहर कतार लगानी पड़ेगी और न ही जेबों में नकद रखने की जरूरत होगी. मुख्यमंत्री ने दावा किया कि इस माह के अंत तक राज्य के सभी जिलों के एक-एक प्रखंड को कैशलेस बनाया जाएगा.

उनके मातहत अधिकारी राज्य की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा एवं वित्त सचिव अमित खरे भी जोर-शोर से यह दावा करने में लगे हैं कि राज्य को जल्द ही कैशलेस बनाया जाएगा. इसके लिए मोबाइल नेटवर्किंग कंपनियों से अपनी इंटरनेट और ब्रॉडबैंड सुविधाओं को तेजी से बढ़ाने का निर्देश दिया गया है, साथ ही पढ़े-लिखे युवाओं से यह अनुरोध किया जा रहा है कि वे अपने आसपास के दस लोगों को इस सिस्टम की जानकारी देकर उन्हें प्रशिक्षित करें.

मुख्यमंत्री दास इस बात का भी दावा कर रहे हैं कि झारखंड देश का पहला कैशलेस स्टेट बनेगा और काला धन एवं भ्रष्टाचार में लिप्त रहने वाले अधिकारियों एवं नेताओं पर नकेल कसेगा. इससे भ्रष्टाचार पर बहुत हद तक काबू पाया जा सकेगा.

सरकारी भुगतान भी ई-पेमेंट के माध्यम से होगा और साथ ही सरकारी विभागों को भी पेपरलेस बनाकर भ्रष्टाचार मुक्त राज्य बनाया जाएगा. पर आखिर यह योजना सफल कैसे होगी, इस पर न तो मुख्यमंत्री का ध्यान है और न ही राज्य के वरीय अधिकारियों का. राज्य में बुनियादी सुविधाएं बिजली, पानी, सड़क एवं शौचालय का अभाव है. ग्रामीण इलाकों में आज भी 41 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे हैं.

साढ़े तीन करोड़ की आबादी में से 1 करोड़ 87 लाख लोग निरक्षर हैं, जबकि सातवीं पास की आबादी ही ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है. शहरी क्षेत्रों में भी 57 लाख लोग निरक्षर हैं. कुपोषण, गरीबी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण लोग साक्षर नहीं हो पाए हैं. दो जून की रोटी के लिए आधी आबादी तरसती है, ऐसे में कैशलेस व्यवस्था बहाल करना राज्य सरकार के लिए एक चुनौती से कम नहीं है.

कैशलेस व्यवस्था पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था है, इसके लिए एंड्रायड फोन के उपयोग की जानकारी जरूरी है. इसके लिए व्यापक पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है, वहीं लोगों को शिक्षित और जागरूक होना अधिक जरूरी है. राज्य के उग्रवाद प्रभावित जिलों में बैंकों की शाखाओं के साथ ही मोबाइल कंपनियों के टावर भी कम हैं, ऐसे में मोबाइल नेटवर्क भी उन जगहों पर हमेशा बाधित रहता है.

ई-वॉलेट एवं अन्य तरह के कैशलेस भुगतान के लिए स्मार्ट फोन या कंप्यूटर होना जरूरी है, तभी कोई भुगतान हो सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में 80 प्रतिशत आबादी एवं शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत से अधिक लोगों के पास न तो एंड्रायड फोन है, और न ही कंप्यूटर. ऐसे में इस व्यवस्था का बहाल होना दूर की कौड़ी ही साबित होगा.राज्य में बेहतर इंटरनेट कनेक्शन और बिजली का भी अभाव है.

राज्य के 4459 पंचायतों में ब्रॉडबैंड की सुविधा है ही नहीं. राज्य के 32 हजार गांवों में से 21 हजार में अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी है, जबकि बैंकों की 70 प्रतिशत शाखा गांवों में ही है. राज्य में विभिन्न बैंकों की 2900 शाखाएं हैं. ऐसे में राज्य सरकार कैशलेस सिस्टम कैसे और किस तरह से लागू करेगी, यह सोचने की बात है. राज्य के अग्रणी बैंक बैंक ऑफ इंडिया के आंचलिक प्रबंधक शंकर प्रसाद भी कनेक्टिविटी की समस्या को विकराल बताते हैं.

उन्होंने कहा कि इस वजह से बैंक ऑफ इंडिया की 30 प्रतिशत शाखाओं में हमेशा काम बाधित रहता है. उनका मानना है कि कैशलेस झारखंड का सपना बगैर बेहतर इंटरनेट कनेक्शन के संभव नहीं है. व्यवसायी वर्ग का भी मानना है कि अधिकतर व्यापारी वर्ग को इस सिस्टम को समझने में समय लगेगा. इससे व्यापार के प्रभावित होने की आशंका है. प्रसिद्ध व्यवसायी अरुण सर्राफ का मानना है कि 50 प्रतिशत व्यवसाय घट गया है. इसमें और कमी होने की आशंका है.

झारखंड बनेगा देश का पहला कैशलेस स्टेट: मुख्यमंत्री
रखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास वादे और घोषणाओं में हमेशा सबसे आगे रहते हैं. इस बार भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कैशलेस सिस्टम की घोषणा करते ही मुख्यमंत्री दास इस होड़ में सबसे आगे निकल गये हैं. मुख्यमंत्री ने राज्य को कैशलेस बनाने के लिए मुहिम छेड़ दी है. मुख्यमंत्री ने यह दावा किया है कि झारखंड देश का पहला कैशलेस स्टेट बनेगा, इस योजना की शुरुआत हो गई है.

दिसम्बर 2016 के अंत तक प्रत्येक जिले के एक प्रखंड को कैशलेस बनाने का लक्ष्य रखा गया है. इस योजना की सफलता को लेकर उठे सवाल पर मुख्यमंत्री का मानना है कि बैंक अधिकारी, सरकारी पदाधिकारी एवं छात्रों से इस योजना को सफल बनाने के लिए राज्यव्यापी जागरूकता अभियान चलाने को कहा गया है. लोगों को इससे बहुत तरह की सहूलियत भी मिल जाएगी.

इस व्यवस्था को पूरी तरह से सुचारू बनाने के लिए पांच हजार तक के एंड्रायड मोबाइल को वैट से मुक्त कर दिया गया है. साथ ही स्वाइप मशीन पर लगने वाले 14 प्रतिशत वैट की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा व्यवसायी स्वाइप मशीन का उपयोग कर सकें. राज्य के लोगों से आग्रह करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पढ़े-लिखे लोग इस सिस्टम का उपयोग करें एवं अपने आसपास के लोगों को भी इसका प्रशिक्षण दें.

मुख्यमंत्री दास का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक साहसिक कदम उठाया है, इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगा. उन्होंने कहा कि इससे काला धन रखने वाले नेताओं, नौकरशाहों एवं व्यापारियों की नींद हराम हो गयी है. थोड़े ही समय में रिजर्व बैंक में पांच लाख करोड़ रुपये जमा हो गये हैं, और कालाधन निकालने की कोशिशें तेज हुई हैं.

बैंकों में जमा कालेधन को गरीबों के लिए चलने वाले कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किया जाएगा. मुख्यमंत्री ने कहा कि दिसम्बर 2017 तक सरकारी विभागों को पेपरलेस करने की योजना पर भी काम हो रहा है. विभागों के पेपरलेस होने से भ्रष्टाचार पर काबू पाने एवं कामों में पारदर्शिता लाई जा सकेगी.

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नक्सलियों की रीढ़ तोड़ने के काम आ रहा

रखंड में कैशलेस सिस्टम की व्यवस्था कर नक्सलियों की रीढ़ तोड़ने की कवायद भी तेज कर दी गयी है. राज्य में नक्सली गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं और ये राज्य के विकास में भी बाधक बने हैं.

राज्य के 24 जिलों में से अधिकतर नक्सल प्रभावित हैं और इनके लगातार मजबूत होने का कारण झारखंड में नक्सली संगठनों का आर्थिक रूप से मजबूत होना है. एक अनुमान के अनुसार, डेढ़ सौ करोड़ से भी अधिक की राशि नक्सली संगठन लेवी के रूप में वसूलते हैं और इन लेवी की राशि से ये लोग अत्याधुनिक हथियारों से लैस होकर अपनी ताकत को बढ़ाने में लगे हैं.

पहले जहां झारखंड में केवल माओवादी संगठन का ही वर्चस्व था, वहीं अब लगभग दो दर्जन से अधिक संगठनों ने अपना पांव राज्य के विभिन्न हिस्सों में जमा लिया है. नोटबंदी के कारण नक्सली संगठनों का मनोबल टूट गया है. इस अभियान से नक्सलियों के 1400 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए हैं. वैसे नक्सली संगठन ग्रामीणों को धमकाकर अपने कुछ कालाधन को सफेद कराने में जरूर कामयाब रहे, पर उनका बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया है.

नक्सली संगठन कोयला व्यवसायी, किसान, कर्मचारी यहां तक कि प्रशासनिक महकमों से भी लेवी वसूलते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पदस्थापित प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी भी अपनी सुरक्षा के एवज में एक निश्चित राशि प्रतिमाह लेवी के रूप में नक्सली संगठनों को देते हैं, जबकि विकास कार्यों में लगे अभियंताओं एवं ठेकेदारों से मोटी राशि नक्सली संगठन वसूलते हैं.

उम्मीद है कि कैशलेस सिस्टम लागू कर राज्य सरकार नक्सली संगठन एवं आतंकियों को ध्वस्त करने में कामयाब हो जाएगी. संगठन के पास जब रुपयों की कमी होगी, तो नक्सली अपने आप कमजोर पड़ते जाएंगे और इस तरह नक्सलियों पर नकेल कसने में सरकार को कामयाबी मिल सकती है.

कालाधन बना रहा मनोरोगी

इट कॉलर और ब्लैक मनी’ इस तरह के लोगों का समाज में कुछ ज्यादा ही सम्मान था और इस तरह के लोग रौब भी गांठते थे, पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गये नोटबंदी की घोषणा के बाद ऐसे लोग मनोरोग के शिकार हो रहे हैं. उन्हें डॉक्टर और मनोचिकित्सक की शरण में जाना पड़ रहा है. रांची स्थित मानसिक आरोग्यशाला में ऐसे लोग काउंसलिंग कर रहे हैं और चिकित्सकों की पूछताछ के क्रम में वे नोटबंदी को ही इसका कारण बता रहे हैं.

मानसिक आरोग्यशाला के चिकित्सकों के अनुसार, इस तरह के मनोरोगियों की संख्या ओपीडी में दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. सरकारी अफसर, नेता और व्यापारियों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि कालाधन को कहां रखें और किस पर विश्वास करें, कैसे इसे एक नंबर का बनाएं. बदनामी के साथ ही पकड़े जाने का खतरा भी लगातार मंडरा रहा है और ऐसे लोगों की रात की नींद भी हराम हो गयी है.

लोगों में यह बीमारी ‘बैचेनी से शुरू होकर फोबिया’ तक पहुंच गयी है. कुछ लोगों में स्ट्रेस की वजह से पागलपन के लक्षण भी आने लगे हैं. रांची के वरीय चिकित्सक भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं, और हकीकत भी कुछ ऐसी दिखायी पड़ रही है. नोटबंदी से आम लोग परेशान जरूर हैं, पर उनकी परेशानी कुछ अलग तरह की है, उन्हें रुपए निकालने के लिए बैंकों एवं एटीएम के सामने लंबी लाइन लगानी पड़ रही है, पर कुछ खास लोगों की परेशानी इलाज कराने तक पहुंच चुकी है.

रांची में मनोचिकित्सा के बड़े केंद्र एवं चिकित्सक होने के कारण झारखंड सहित पश्चिम बंगाल के भी कुछ लोग इलाज कराने आ रहे हैं. कालाधन रखने वालों के परिवार की यह भी कोशिश रहती है कि वे अपने परिचित चिकित्सक से इलाज नहीं कराकर दूसरे शहर के डॉक्टरों से इलाज कराएं. रांची के एक चिकित्सक ने यह स्वीकार भी किया कि वे दूसरे जिलों से आये दो दर्जन से अधिक लोगों का इलाज कर रहे हैं, जो इसी तरह के रोग से पीड़ित हैं.

प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ पीके वर्णवाल के अनुसार यह पूरी तरह से एनजाइटी डिसऑर्डर का मामला है. ऐसे लोगों की काउंसलिंग की जाती है. उनका लंबा इलाज चलता है. प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ वीपी सिन्हा का मानना है कि समय पर इलाज शुरू होने से ऐसे लोग किसी गंभीर बीमारी से बचाए जा सकते हैं. परिजनों को चाहिए कि वे सही बातें बताएं, ताकि समय रहते इलाज शुरू हो सके.