वैश्विक प्रेम से सराबोर हिंदी

hindiभारतीय भाषाओं का बाजार लगातार बढ़ रहा है. यह बात अरसे से कही जा रही है लेकिन हिंदी के लेखक इसको बाजार के बढ़ते वर्चस्व की तरह लेते हैं और इनमें से ज्यादातर लेखक बाजार के वर्चस्ववादी खतरे को लेकर छाती कूटते रहते हैं.

उनको लगता है कि बाजार का विस्तार होगा तो वो अपनी शर्तों पर साहित्य में दखल देगा. बजाए इस आसन्न दखल के खतरे का समाधान ढूंढने के, इससे बचकर निकलने के रास्ते ढूंढने के, बाजार की वर्चस्ववादी ताकतों को अपने हिसाब से ढालने के, बाजार से ही नाता तोड़ लेने की ओर बढ़ जाते हैं.

दरअसल बाजार का जो अर्थशास्त्र है वो बहुत अलग नहीं है. उसके व्यवहार को समझने के लिए हमारे यहां कई उदाहरण भरे पड़े हैं. जैसे कहावत है कि कमाऊ पूत का सब कुछ सहा जाता है, दूसरी कहावत है कि दुधारू गाय की लात भी भली.

इन दोनों लोकोक्तियों का अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं है. बजाए बाजार को अपनी ताकत से झुकाने के, हम बाजार के खिलाफ जाने का उपक्रम शुरू कर देते हैं, जिससे ना केवल अपना नुकसान कर डालते हैं, बल्कि भाषा का भी नुकसान होता है.

लेखक बहुधा यह आरोप लगाते हैं कि बाजार की ताकतें भाषा को भ्रष्ट कर देती हैं, वो भाषा में अपने मुताबिक बदलाव करवा देते हैं लेकिन वो भूल जाते हैं कि अगर भाषा में ताकत होती है तो वो बाजार को अपने हिसाब से झुका सकती है.

कौन बनेगा करोड़पति में पाठकों को अमिताभ बच्चन की भाषा याद होगी. वो जिस तरह की हिंदी का इस्तेमाल करते थे, वो बिल्कुल शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ हिंदी कही जाती है. कोटि जैसे शब्दों का इस्तेमाल उस शो के टाइटल में हुआ था और बाजार उस शो की लोकप्रियता के आगे बिछ गया था.

दरअसल भाषा की सबसे बड़ी ताकत होती है, उसका सहज और सरल संप्रेषण. हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की लगातार बढ़ रही ताकत ही है जिसने अमेजन जैसी बड़ी ऑनलाइन अमेरिकी कंपनी को किंडल जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों को उपलब्ध करवाने के लिए मजबूर कर दिया. इसके पहले किंडल पर जापानी, चीनी, फ्रेंच और जर्मन भाषा की कृतियां ही मौजूद थीं.

किंडल पर अब हिंदी के अलावा तमिल, मलयालम, गुजराती और मराठी भाषा की कृतियां उपलब्ध करवा दी गई हैं. किंडल से जुड़े लोगों का कहना है कि वो आनेवाले दिनों में हिंदी की तमाम कृतियों को वहां अपलोड कर देंगे. किंडल पर सिर्फ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पांच सौ किताबें दिखाई दे रही हैं, जो अपलोड कर दी गई हैं.

इसके अलावा हिंदी के अन्य प्रकाशनों की किताबें भी वहां अपलोड की गई हैं. प्रभात प्रकाशन के निदेशक पियूष कुमार इसको ऐतिहासिक घटना के तौर पर तो देखते हैं, वो इसमें हिंदी के पाठकों और लेखकों के लिए ऐतिहासिक अवसर भी तलाशते हैं. उनका मानना है कि किंडल पर हिंदी की किताबों के आ जाने से पूरी दुनिया में इस भाषा की कृतियां सहजता से उपलब्ध हो गई हैं.

दरअसल अगर हम देखें तो अमेजन का यह कदम ग्लोबल और लोकल को मिलाकर एक ग्लोकल दुनिया की ओर बढ़ाया गया कदम है. इंटनेट के विस्तार ने विश्वग्राम की अवधारणा को और मजबूती मिल रही है. सिर्फ इतना ही नहीं भारत में भी कृतियों की उपलब्धता बढ़ेगी. जैसे-जैसे इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ये विस्तार और मजबूती पाएगा.

कहते हैं ना कि अवसर अपने साथ चुनौती भी लेकर आता है, तो किंडल पर हिंदी की कृतियों के उपलब्ध होने से लेखकों और प्रकाशकों के लिए चुनौती भी बढ़ गई है. लेखकों को समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती और प्रकाशकों के सामने विश्वस्तर की रचनाएं प्रकाशित करने की चुनौती.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ अमेरिकी कंपनी अमेजन ने ही हिंदी की धमक को महसूस करते हुए उसको स्वीकार किया है. कुछ दिनों पहले हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान पर्ची पर पहली बार हिंदी में मतदाताओ को धन्यवाद का उल्लेख किया गया था.

अमेरिका के चुनावी इतिहास में पहली बार अन्य भाषाओं के साथ हिंदी ने अपनी जगह बनाई. यह एक भाषा के बढ़ते दायरे का प्रतीक तो है ही भारतीयता के बढ़ते धमक का सूचक भी है. हिंदी को लेकर एक और उत्साहवर्धक खबर ऑस्ट्रेलिया से भी आई है.

ऑस्ट्रेलिया में अपने बच्चों को विदेशी भाषा सिखाने का विकल्प दिया गया है और जिन भाषाओं को उसमें चुना गया है उसमें हिंदी भी शामिल है. अर्ली लर्निंग लैंग्वेज ऑस्ट्रेलिया ने चार साल के बच्चों से लेकर शिक्षकों को ऑनलाइन हिंदी सीखने का विकल्प दिया है. ऑस्ट्रलियाई सरकार के शिक्षा मंत्री ने ये ऐलान करते हुए कहा कि 2018 से बच्चों को हिंदी सीखाने का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा.

इटालियन, स्पैनिश, जापानी और चीनी भाषा के साथ अब हिंदी को भी ऑस्ट्रेलिया के बच्चे सीख सकेंगे. यह हिंदी के बढ़ते प्रभाव का ही संकेत है कि विदेशों में अब बच्चों को भी हिंदी सीखने का विकल्प दिया जा रहा है. अर्ली लर्निंग लैंग्वेज ऑस्ट्रेलिया के प्रोग्राम वहां काफी लोकप्रिय हैं और सरकार भी इसको बढ़ावा देने के लिए खास इंतजाम करती है.

विदेशों में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता के बाद अब हमारी भाषा से जुड़े लोगों की जिम्मेदारियां भी काफी बढ जाती है. हिंदी भाषा के विकास के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है.

हिंदी में मानक शब्दकोश की बहुत सख्त जरूरत है. शब्दकोश बनाने की दिशा में छोटी-छोटी पहल हुई है, लेकिन इसको लेकर एक गंभीर कोशिश करने की जरूरत है. किसी एक संस्था को आगे आकर हर साल शब्दकोश को अद्यतन करते रहने और उसको प्रकाशित करने की जरूरत है. इसका एक फायदा ये होगा कि हिंदी को हर साल कुछ नए शब्द मिलेंगे. अभी हाल ही में प्रदूषण को लेकर एक शब्द काफी सुनने को मिला – स्मॉग.

अब इस शब्द को लेकर हिंदी के लोगों ने काफी विमर्श किया लेकिन उसका उचित हिंदी शब्द नहीं मिल पाया. तकनीक के बढ़ते चलन की वजह से कई बार हिंदी का हाथ तंग नजर आता है. अगर हर साल शब्दकोश छपने लगे, तो इस समस्या से कुछ हद तक निजात मिल सकती है.

हिंदी से जुड़े लोगो को एक और आदत डालनी होगी वो ये कि उनको नए नए शब्द गढ़ने होंगे. न गढ़े हुए शब्दों को लेकर उनको भाषा में स्थापित करने की पहल करनी होगी. हिंदी में बोलियों के काफी शब्द इस्तेमाल होते थे, जो धीरे-धीरे गायब होते चले गए और उनका स्थान आसान अंग्रेजी के शब्दों ने ले लिया.

हर गली मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए अंग्रेजी स्कूलों ने भी इसमें अहम भूमिका अदा की. बोलियों के शब्द के हिंदी से गायब होने की वजह से हिंदी में शब्दों का टोटा पड़ता चला गया.

ये सब तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनानी होगी, विज्ञान और अन्य विषयों को लेकर किताबें लिखनी होंगी आदि आदि. लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम पहले हिंदी को मजबूत करने के लिए जिन बुनियादी सुधारों की जरूरत है वो किए जांए. अगर हम हिंदी को विश्वभाषा के तौर पर देखना चाहते हैं तो उसको बहुत मजबूत और समकालीन बनाना होगा.

अगर हम हिंदी को समकालीन बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो कोई वजह नहीं बचती है कि ये विश्वभाषा का दर्जा नहीं हासिल कर सके. विश्वभाषा बनने के लिए बाजार की भाषा होना जरूरी है और भारत का बाजार इतना बड़ा है कि वो स्वत: हिंदी को ये स्थान दिला देगा. इस बात के संकेत किंडल पर हिंदी के लिए रास्ता खुलने से मिल ही रहा है.

दरअसल जब हिंदी की बात करते हैं, तो हमें ये समझना होगा कि वो गंगा की तरह बहनेवाली भाषा है, जिसका स्वरूप गंगोत्री में अलग है और जब वो वहां से उतर कर मैदानी इलाकों में आती है, तो उत्तर प्रदेश में अलग और बिहार में अलग स्वरूप दिखाई देता है और जब वो पूर्व की ओर बहती चली जाती है तो उसका स्वरूप या गंगोत्री वाले स्वरूप से बिल्कुल अलग हो जाता है.

हिंदी से अगर हम ये अपेक्षा करें कि वो एक तालाब के ठहरे हुए जल की तरह रहे और हम लगातार उसको शुद्ध करते रहे तो इस भाषा के साथ अन्याय होगा. दरअसल ये अपेक्षा किसी भी भाषा के साथ अन्याय ही होता है.

भाषा तो बहती हुई नदी के समान होती है जिसमें आगे के पानी को पीछे से आ रहा पानी विस्थापित करता है. हिंदी के लेखकों, वरिष्ठ लेखकों के सामने बड़ी चुनौती पीछे से आ रहे पानी को रास्ता देने की है. अगर वो उसके साथ मिलकर बहा लें, तो आगे चले जाएंगे, नहीं तो पानी का स्वभाव होता है कि वो रास्ते में आनेवाली बाधाओं को किनारे कर देती हैं और आगे बढ़ जाती हैं. विचार करिए.

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