जितेंद्र सिंह जी यह ग़ुस्सा पौरुषहीन है

moneyहम अपने को उस भीड़ में चाह कर भी शामिल नहीं कर पाते, जो भीड़ विरुदावली गाती है, जो भीड़ चंदबर दाई की श्रेणी की है और जो भीड़ ताकतवर और
सत्ताधारियों के कशीदे पढ़ती है. दरअसल हमारे दिमाग में पत्रकारिता के उस सिद्धांत का फितूर भरा है कि किसी भी पत्रकार को विरुदावली गाने की भीड़ से हमेशा अलग रहना चाहिए.

उन चीजों की तरफ इशारा अवश्य करना चाहिए, जो किसी भी ताकतवर, जिसमें सत्ताधारी और विरोध पक्ष शामिल हैं, के काम करने के तरीके से अगर लोगों के ऊपर तकलीफ आने के अंदेशे हों, तो उन अंदेशों को अवश्य सामने रखना चाहिए. आजकल ऐसा नहीं हो रहा है.

नक्कारखाना तेजी से आवाजें निकाल रहा है. दूसरी तरफ, कहावत है कि नकटों के गांव में अगर कोई नाक वाला पहुंच जाए तो उस नाक वाले को नकटे कहते हैं, देखो नक्कू आ गया, नाक वाला आ गया. ये कहावत आज की स्थिति को ही ध्यान में रखकर बनाई गई होगी. हजारों साल पहले कुछ ऐसा ही हुआ होगा. यह कहावत हजारों साल से चरितार्थ होती आ रही है.

हम यह चाहते हैं और अगर कहीं ईश्वर है, तो उससे प्रार्थना भी करते हैं कि वो हमारी शंकाएं सौ फीसदी गलत साबित करे और हमें अपने ऊपर पछताने का अवसर दे. पहला सवाल, अगर हमारे बैंकों में 1000 और 500 के 11 लाख करोड़ रुपए मूल्य के नोट जमा हो गए, तो इसका मतलब क्या निकलता है?

अगर कहीं 14 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा नोट जमा हो गए तो उसका मतलब क्या निकलता है? अगर कहीं 17 लाख करोड़ रुपए जमा हो गए तो आर्थिक तंत्र के ऊपर क्या असर पड़ेगा? मैं चाहता हूं कि इसका जवाब वे सारे लोग दें, जो अर्थव्यवस्था को जानते और समझते हैं.

ये नोटबंदी या जिसे 1000 या 500 के नोटों का बदलना कहते हैं, बहुत सोच-समझकर हुआ होगा, वरना किसी भी देश का प्रधानमंत्री ऐसा फैसला ले ही नहीं सकता. उसने आने वाले संकटों, लोगों को होनी वाली परेशानियों और लोगों को फिर कितने दिनों में राहत दी जाय, इसका आकलन जरूर किया होगा, अन्यथा प्रधानमंत्री पद पर बैठने वाला व्यक्ति बुद्धिमान नहीं माना जा सकता.

मैं मानता हूं, नरेंद्र मोदी जी ने इस सारी चीजों के ऊपर बहुत ध्यान दिया होगा. अगर शंकाओं में कोई दम है, तो वो इतनी कि 25 दिन बीतने के बाद भी आम लोग परेशान हैं, उनके पास कैश नहीं है.

बहुत सारी जगहों पर, जहां की रिपोर्ट हमारे टेलीविजन और अखबारों में नहीं आ पाती है, वहां लोग दूध, सब्जी और रोजाना के खाने के सामान के लिए तरस गए हैं. उन्हें उधार मिलना मुश्किल हो रहा है. कई जगहों पर बार्टर सिस्टम भी शुरू हो चुका है, लेकिन उसमें भी लोग दोनों के अंतर को देखकर बहुत सफलतापूर्वक इस सिस्टम को नहीं चला पा रहे हैं.

सबसे बड़ा सवाल, जिसका जवाब सरकार तो नहीं देगी लेकिन अर्थशास्त्री या बैंकिंग सिस्टम को जानने वाले लोग जवाब दें कि देश में जितने नकली नोट थे, उनको इस कदम ने असली साबित कर दिया और वे सारे के सारे बैंक में जमा हो गए. कालाधन, जो नोटों की शक्ल में बाहर था और मोटे अंदाज में लगभग 10 प्रतिशत कालाधन ही नोटों के रूप में था, वो भी बैंकों में पहुंच गया.

यानी हमारी फेक करेंसी, नकली करेंसी भी बैंकों में पहुंच गई. हमारा कालाधन भी बैंक में पहुंच गया. यह तब साबित होगा, जब 30 दिसंबर को सरकार यह आंकड़ा देगी कि उसके पास कितना पैसा आया.

यह लिखे जाने तक बैंकों में लोगों का लगभग 10 लाख करोड़ रुपए जमा हो चुका है, जिसे सरकार कहती है कि यह कालाधन है, लेकिन जनता कहती है, यह उनकी गाढ़ी कमाई है, जो बुरे वक्त के लिए 125 करोड़ लोगों ने अपने घर में जमा कर के रखा था.

चूंकि नोट चलन से बाहर हो गए हैं, इसलिए उन्होंने उसे या तो बदलवाया है या अपने या किसी पड़ोसी के खाते में जमा किया है. इससे पहले अंदाजा यह था कि हमारी अर्थव्यवस्था में 50 प्रतिशत सही और 50 प्रतिशत नकली नोट हैं.

अगर 14 लाख 60 हजार करोड़ की मुद्रा प्रचलन में थी और 10 लाख करोड़ जमा हो चुके हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि नकली मुद्रा असली के नाम पर बैंकों में जमा हो चुकी है. इसका हमारी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, ये हम विशेषज्ञों से जानना चाहते हैं. हम अज्ञानी हैं, इसलिए विशेषज्ञों का फर्ज बनता है कि हमें बताएं.

भारत सरकार ने जान-बूझकर सोचा होगा कि हम नोट कम छापें, क्योंकि नोट कम छापने से लोगों की देशभक्ति का पता चलता है. लोग लाइन में खड़े हैं, पैसे जमा कर रहे हैं, पैसे नहीं मिल रहे हैं. देश बदलने के लिए सरकार ने एक कदम उठाया है, उस कदम का इस देश का गरीब समर्थन कर रहा है और टेलीविजन पर आकर इस कदम की भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहा है और कह रहा है कि सीमा पर अगर सिपाही खड़ा रह सकता है, तो क्या हम दो दिन लाइन में नहीं लगे रह सकते हैं.

लगभग इस तरह की बाइट्‌स, इस तरह के बयान टेलीविजन लगातार दिखा रहे हैं. हमें भी इसके ऊपर भरोसा हो गया कि सारा देश देशभक्तों की बाढ़ से भर गया और वो सारा पैसा बैंक में जमा कर रहा है और देश की सेवा कर रहा है.

इसमें कहीं भी गांव के 60 प्रतिशत लोगों की बात नहीं आ रही है, जिनकी खरीफ की फसल खेतों में पड़ी है, जो बिकी नहीं क्योंकि आढ़ती बिना नकद दिए फसल खरीदते नहीं, न आढ़तियों के पास नकद देने को पैसा है और न किसान नकद लेगा क्योंकि नोट बदल गए हैं और नए नोट आए नहीं हैं. वो फसल खेत में पड़ी है, बिना बिके. रबी की फसल बोने, बीज और खाद के लिए किसान के पास पैसा नहीं है.

बड़े किसानों के पास पैसा है, उनके नोट भी बदल गए लेकिन छोटे या मझोले किसानों के पास तो बिल्कुल पैसा नहीं है. वह किसान तकलीफ व्यक्त नहीं कर पा रहा है, मानना चाहिए कि वह इसका समर्थन कर रहा है और सारा कष्ट सह रहा है. उसके बच्चों की फीस नहीं जा पा रही है, उसके घर में खाने का सामान नहीं आ रहा है.

किसान अपने फसल बेचकर ही परिवार की खुशियों के लिए कुछ खरीद पाता है. उसके पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है, तो किसान इसका समर्थन कर रहा है और मुझे ये स्थिति बहुत अच्छी लग रही है.

नंबर तीन, अर्थशास्त्री ये डर निर्मूल करें कि जितनी करेंसी बैंकों में जमा हो गई है, उतनी करेंसी लोगों के पास पहुंच गई है, यानी 14 लाख 60 हजार करोड़ रुपये, अगर वो लोगों के पास तक पहुंच गई है, तो इससे कालेधन के ऊपर चोट कहां हुई.

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क्योंकि 10 लाख करोड़ अगर 30 नवंबर तक बैंकों में पहुंच गया है और सिर्फ 4 लाख 60 हजार करोड़ या 64 हजार करोड़ रुपया बाहर है, जो 30 दिसंबर आते-आते पूरा हो जाएगा, तो कालेधन के ऊपर चोट कहां हुई, इसमें लोगों को तकलीफ हुई.

नकली नोट बैंक में पहुंच गए, देश को इससे क्या मिला? ये आकलन किसी अर्थशास्त्री या सरकार को कर के देना पड़ेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री दोनों कह रहे हैं कि कालेधन वाले लाइन में खड़े हैं और बैंकों में अपना पैसा जमा करा रहे हैं.

पहली बार डॉलर और रुपए का अनुपात बहुत विकराल हो गया है. क्या डॉलर 70 रुपए को पार कर जाएगा? अगर पार कर जाएगा तो सामानों के दाम कितने बढ़ेंगे और उसका हमारे इंपोर्ट और एक्सपोर्ट पर क्या असर पड़ेगा? भारत का विशाल औद्योगिक ढांचा है, जिसमें पैदा हुई बहुत सारी चीजें हम बाहर भेजते हैं और बहुत सारी खरीदते हैं.

अगर डॉलर 70 के पास चला गया, तो क्या होगा? उसका असर हमारे बाजार पर क्या पड़ेगा? रोज की चीजों के भाव क्या होंगे और कितने पैसे में हम उन्हें खरीद पाएंगे? जिनके पास पैसा नहीं है, वे क्या करेंगे? वो अपनी भूख मिटाने के लिए या परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए क्या कदम उठाएंगे?

ये मुझे समझ नहीं आता, लेकिन मेरे दिमाग में सवाल उठता है और इन सवालों को मैं विरुदावली गाने वाले पत्रकारों, टेलीविजन के एंकरों से, जो भड़ैतों की भीड़ में शामिल हैं, उनसे भी पूछता हूं और अर्थशास्त्रियों से भी पूछता हूं, क्या आप इसका उत्तर जनता को देंगे?

डर ये भी है कि अगर 20 दिसंबर तक स्थिति सामान्य नहीं हुई, रुपए पूरे नहीं बदले गए, रुपए लोगों के हाथों में खर्च करने के लिए नहीं पहुंचे, तो वे अपनी दैनंदिन जरूरतों या अपने बच्चों का पेट पालने के लिए कहीं किसी तरह के अराजक तरीके तो नहीं इस्तेमाल करने लगेंगे?

मेरा मानना है कि ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि हम सब देशभक्त लोग हैं और हर चीज हमारे यहां देशभक्ति से जोड़ी जा रही है. अगर आप नोटबंदी का विरोध करेंगे तो आप देशद्रोही हैं.

अगर आप कहेंगे कि अभी युद्ध का माहौल मत बनाइए, तो आप देशद्रोही हैं. आपको देशभक्ति साबित करने के लिए पहले पाकिस्तान को गाली देनी है, क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह कहते हैं, जो वह खुलकर तो नहीं कहते लेकिन उसका मतलब यही है कि हम पाकिस्तान का तो कुछ नहीं बिगाड़ सकते, लेकिन जो लोग यहां पर युद्ध का विरोध करते हैं या जिनकी बातों से पाकिस्तान का समर्थन नजर आता है, उनके खिलाफ सरकार कार्रवाई करेगी.

जितेंद्र सिंह जी, इसे पौरुष-हीन गुस्सा कहते हैं. आपके अपने पास करने की कोई ताकत नहीं है, न आप अपने देश की जनता को नोट सप्लाई कर पा रहे हैं और न आप पाकिस्तान का कुछ बिगाड़ पा रहे हैं.

अगर आप में ताकत है, तो सीमा पर कुछ कर के दिखाइए. मुझे कश्मीर के एक नेता ने कहा कि रोज-रोज कश्मीर को लेकर लड़ाई की धमकी से बेहतर है, एक बार भारत क्यों नहीं पाकिस्तान के ऊपर हमला कर देता है और पूरे पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर को भारत में मिला लेता है.

कश्मीर की समस्या खत्म हो जाएगी, क्योंकि कश्मीर के लोग चाहते हैं कि पूरा कश्मीर एक हो. वह या तो बातचीत से हो सकता है या युद्ध से हो सकता है और आप इतने ज्यादा ताकतवर हैं, जितेंद्र सिंह जी, आप प्रधानमंत्री से रोज बात करते हैं.

आप उनको समझाइए कि पाकिस्तान के ऊपर हमला कर पूरा कश्मीर हिंदुस्तान में मिला लें, हमेशा के लिए कश्मीर समस्या को हल कर लें. लेकिन आप ये नहीं करेंगे. आप गुस्सा किनके ऊपर उतारेंगे, किनको धमकी देंगे, जिनको आपने आज दी है.

क्या हम हिंदुस्तान के उन बुद्धिजीवियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे, जो युद्ध का विरोध करते हैं, जो नोटबंदी का विरोध करते हैं. इसका मतलब वे पाकिस्तान के समर्थन में हवा बना रहे हैं, दरअसल हवा तो आप बना रहे हैं जितेंद्र सिंह जी, पाकिस्तान को इतना ताकतवर बताकर.

आपके जैसे वो खरीदे हुए बुद्धिजीवी हवा बना रहे हैं, जो पाकिस्तान का नाम पानी पी-पी कर लेते हैं और पाकिस्तान को कोसते हैं, मानो हिंदुस्तान की हर चीज को नियंत्रित करने का काम पाकिस्तान कर रहा हो. पाकिस्तान को बड़ा बनाने के जिम्मेदार ये लोग हैं, जिनमें आप खुद भी शामिल हैं.

मेरा निवेदन है कि सरकार को अब थोड़ी समझदारी से काम लेना चाहिए और सरकार को बहुत सारे सवालों के जवाब देने चाहिए. आने वाली शंकाओं को गलत साबित करने के लिए तमाम खतरे उठाने चाहिए. अपने संपूर्ण रक्षा व्यवस्था का विश्लेषण कीजिए जितेंद्र सिंह जी.

अभी आपके जम्मू-कश्मीर में हाल में हुए हमले में पहले दिन सेना के लोगों ने कहा कि वो हमारी चूक की वजह से हुआ. आपने वो रिपोर्ट देखी? आपने नहीं देखी होगी, क्योंकि आप रिपोर्ट देखने में बहुत भरोसा नहीं करते हैं. आप जैसे लोगों को मैं सलाम करने, आपके भविष्य के लिए शुभकामनाएं देने और देश के भविष्य के लिए अफसोस करने के सिवाय और क्या कर सकता हूं.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.